Anti Superstition Organization -ASO

Anti Superstition Organization -ASO अंधविश्वास विरोधी संगठन

अंधविश्वास, रूढ़िवाद व तमाम कुरीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद करें और बेहतर समाज बनाने के लिए संघर्ष करें

आज 21वीं सदी में भी समाज में अंधविश्वास, रूढ़िवाद और कई कुरीतियां व्याप्त हैं। ये चीजें आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक विकास में पूरी तरह से बाधा बनीं हुई हैं। आज अंधविश्वास का संक्रमण भयानक रूप ले चुका है। लोग अज्ञानतावश अवैज्ञानिक सोच की ओर बढ़ रहे हैं। तमाम अंधविश्वास को खत्म करने के लिए हमें एकजुट ह

ोकर संघर्ष करना होगा, ताकि एक बेहतर समाज का निर्माण हो सके। सभी को खुले दिमाग से सोचने और तर्कसंगत जीवन जीने की जरूरत है, ताकि समाज को रूढ़िवाद और अंधविश्वास के बंधनों से मुक्त किया जा सके।

भारत देश में तर्कवादी समाज सुधारकों की एक लंबी विरासत है, जिन्होंने हमेशा अंधविश्वास के खिलाफ जोरदार आवाज उठाई है. हमारे यहां महामानव गौतम बुद्ध से लेकर शहीद भगत सिंह तक के तार्किक विचारों का अथाह भंडार है। 15वीं सदी में संत कबीर ने भी धार्मिक पाखंड और रूढ़ीवाद के खिलाफ बिगुल फूंका था। छत्तीसगढ़ में गुरू घासीदास ने जाति-धर्म और मूर्ति-पूजा का जबरदस्त खंडन किया। उन्होंने मनुवादियों की चूले हिला दी थी। महाराष्ट्र में तर्कवादी लेखक डॉ. नरेंद्र दाभोलकर ने पोंगापंथियों के खिलाफ जबर्दस्त मोर्चा खोला था। दाभोलकर ने 1989 महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की स्थापना की। वे अंधविश्वास उन्मूलन के लिए गठित संगठन के संस्थापक एवं अध्यक्ष थे। पुणे में धर्म के गुंडों ने डॉ. दाभोलकर की 20 अगस्त 2013 को हत्या कर दी। अब आज इन सभी समाज सुधारकों के तार्किक विचारों को जनता तक पहुंचाने की जरूरत है।

बेहतर समाज के लिए हमें तमाम महापुरुषों की राह पर चलना होगा। पथभ्रष्ट और शोषण करने वाले हानिकारक अंधविश्वासों और कर्मकांडों का खुलकर विरोध करें। वैज्ञानिक दृष्टिकोण, यथार्थवाद, मानवतावाद और तार्किक सोच को विकसित और प्रचारित करना होगा। आइए प्रगतिशील विचारधाराओं को जन-जन तक पहुंचाकर बेहतर समाज बनाने में अपना बड़ा योगदान दें।

एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

क्यों कहते थे राहुल सांकृत्यायन कि ‘भागो नहीं दुनिया को बदलो’अनुभवों से सीखने की क्षमता से और किसी भी पद्धति कि कोई औपचा...
18/08/2026

क्यों कहते थे राहुल सांकृत्यायन कि ‘भागो नहीं दुनिया को बदलो’

अनुभवों से सीखने की क्षमता से और किसी भी पद्धति कि कोई औपचारिक शिक्षा नहीं लेने वाले एकमात्र महापंडित बने राहुल सांकृत्यायन। उनके जीवन परिचय से ज्ञात होता है कि उनकी शिक्षा केवल मिडिल स्कूल तक ही हुई थी। तर्कशील और मानवतावादी विचारों से प्रेरित होने से ही उनकी यात्रा का क्रम एक सामान्य सनातनी ब्राह्मण परिवार के केदारनाथ पाण्डेय से आर्य समाजी परिव्राजक दामोदर साधु, एक बौद्ध विद्वान के रूप में राहुल सांकृत्यायन और साम्यवाद के सामाजिक चिन्तक का है।

उनके जीवन का परिचय देना इतना आवश्यक नहीं है जितना की उनके क्रांतिकारी विचारों का परिचय देना आवश्यक है। उन्होनें अपने समग्र लेखन में ईश्वर, कर्मकाण्ड, रूढ़िवाद, जाति-व्यवस्था एवं अन्धविश्वास पर कड़ा प्रहार कियाथा। जन्म से वे एक सनातनी ब्राह्मण परिवार के थे, किन्तु रूढ़िवाद के कट्टर आलोचक थे। वे लगभग 30 भाषाओं के जानकार थे।

उन्होंने समाजशास्त्र, धर्म, आध्यात्म, दर्शन, साम्यवाद, इतिहास, भाषा-विज्ञान एवं संस्कृति जैसे अनेक विषयों पर अनेक किताबें लिखी। उनकी कुछ किताबें प्रकाशित है और कुछ अभी भी अप्रकाशित ही हैं।

उनकी विशेषता यह है कि वे किसी भी विचारधारा के बंधन से मुक्त एक स्वतंत्र चिंतक हैं। अपने जीवन यात्रा के अनेक विध पहलुओ को स्पष्ट करते हुए वे मज्झिम निकाय में आगत भगवान बुद्ध के उद्धरण उद्धृत करते है कि “बड़े की भाँति मैंने तुम्हें उपदेश दिया हैं, सिर पर ढोये-ढोये फिरने के लिए नहीं- तो मालूम हुआ कि जिस चीज़ को मैं इतने दिनों से ढूँढता रहा हूँ, वह मिल गयी।”

उनके तर्कशील और मानवतावादी विचारों को प्रतिपादित करते हुए वे कहते है कि भागो नहीं दुनिया को बदलो! हमें अपनी मानसिक दासता कि बेड़ी कि एक-एक कड़ी को बेदर्दी के साथ तोड़कर फेंकने के लिए तैयार रहना चाहिए। बाहरी क्रान्ति से ज्यादा जरूरत मानसिक क्रान्ति की है। हमें आगे पीछे दाहिने बायें दोनों हाथों से नंगी तलवारें नचाते हुए अपनी सभी रूढ़ियों को काटकर आगे बढ़ना होगा।

जीवन के अंतिम दिनों में उनका झुकाव कार्ल मार्क्स के सिद्धांतों की ओर हुआ। उनकी मान्यता यह थी कि रूढ़ियों को लोग इसलिए मानते हैं, क्योंकि उनके सामने रूढ़ियों को तोड़ने के उदाहरण पर्याप्त मात्रा में नहीं होते। सनातनी ब्राह्मण परिवार में जन्म होने बावजूद भी उनके विचारों में ईश्वरवाद का खण्डन परिलक्षित होता है।

अज्ञान का दूसरा नाम ही ईश्वर है। हम अपने अज्ञान को साफ स्वीकार करने में शरमाते हैं, अतः उसके लिए संभ्रांत नाम 'ईश्वर' ढूंढ निकाला गया है। ईश्वर-विश्वास का दूसरा कारण मनुष्य की असमर्थता और बेबसी है।लोगों को इस बात का जोर से प्रचार करना चाहिए कि धर्म और ईश्वर गरीबों के सबसे बड़े दुश्मन हैं।

अपनी किताब वोल्गा से गंगा में वह कहते है कि अकल से मारे हुये की जड़ता के पाँच लक्षण होते है; यथा –

बुद्धि के ऊपर वेद (पोथी) को रखना
संसार का कर्ता ईश्वर को मानना
धर्म की इच्छा से ही स्नान करना
जन्म जाति का अभिमान करना और
पाप नाश के लिए शरीर को कष्ट देना
वर्तमान राजनीति में मजहब एक मुख्य बिन्दु बन गया है; मजहब के नाम पर होने वाली राजनीति आलोचना भी उनके विचारों का एक पक्ष है। उनकी दृष्टि में गरीबी, अशिक्षा, बेकारी का कोई मजहब नहीं होता है और इंसानियत से बड़ा कोई मजहब हो भी नहीं सकता।

उनके विचार में ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’- इस सफेद झूठ का क्या ठिकाना। अगर मजहब बैर नहीं सिखलाता तो चोटी–दाढ़ी की लड़ाई में हजार बरस से आज तक हमारा मुल्क पामाल क्यों हैं? पुराने इतिहास को छोड़ दीजिए, आज भी हिंदुस्तान के शहरों और गांवों में एक मजहब वालों को दूसरे मजहब वालों के खून का प्यासा कौन बना रहा हैं? और कौन गाय खाने वालों को गोबर खाने वालों से लड़ा रहा है।

असल बात यह है कि ‘मजहब तो है सिखाता आपस में बैर रखना। भाई को सिखाता है भाई का खून पीना।’

वे कहते हैं, हिंदुस्तानियों की एकता मजहबों के मेल पर नहीं होगी, बल्कि मजहबों की चिता पर। कौए को धोकर हंस नहीं बनाया जा सकता। कमली धोकर रंग नहीं चढ़ाया जा सकता। मजहबों की बीमारी स्वाभाविक है। उसकी मौत को छोड़कर इसका कोई इलाज नहीं है!

– शुभमचित्त

(लेखक पी-एच.डी. शोधार्थी हैं।)

Anti Superstition Organization (A*O)
अंधविश्वास, रूढ़िवाद व तमाम कुरीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद करें और बेहतर समाज बनाने के लिए संघर्ष करें।

मनुष्य का जीवन तभी प्रगति करता है, जब वह अपने विचारों को तर्क और प्रमाण की कसौटी पर कसता है।-डॉ. भीमराव आंबेडकर
07/08/2026

मनुष्य का जीवन तभी प्रगति करता है, जब वह अपने विचारों को तर्क और प्रमाण की कसौटी पर कसता है।
-डॉ. भीमराव आंबेडकर

जो बात तर्क और अनुभव से सिद्ध न हो, उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।-पेरियार ई. वी. रामासामीप्रगतिशील व तर्कशील पुस्तक मंगवा...
06/08/2026

जो बात तर्क और अनुभव से सिद्ध न हो, उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।
-पेरियार ई. वी. रामासामी

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कबीर किताब केंद्र
मिनीमाता चौक, बालमुकुंद स्कूल के पास, तालापारा, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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29/07/2026

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23/07/2026

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22/07/2026

20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर पर CJP के प्रोटेस्ट के दौरान छात्रों को डंडो से मारा गया, लड़कियों की पिटाई हुई, पुलिसवाले पत्थरबाजी करते नजर आये, सैंकड़ो घायल हुए हैं और कई लापता हैं. दिल्ली पुलिस की इसी बर्बरता को लेकर 22 जुलाई को दोपहर एक वकील ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करने से ही इनकार कर दिया.

22 जुलाई को प्रोटेस्ट के दौरान छात्रों पर हुए पुलिसिया बर्बरता के खिलाफ न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच के सामने पेश हुए एक वकील ने कहा- जल्द सुनवाई कीजिए, बच्चों की जान का सवाल है लेकिन सीजेआई सूर्यकान्त ने सुनवाई से इनकार करते हुए कहा- वक्त बर्बाद मत कीजिए. वकील ने मामले को अगले दिन सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की मांग करते हुए कहा, "पुलिस की सख़्ती के वीडियो सबूत मौजूद हैं"

इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, "कृपया हमारा समय बर्बाद मत कीजिए और अपना भी समय बर्बाद मत कीजिए. आपका समय हमारे समय से ज़्यादा क़ीमती है."

इसके बाद वकील ने कहा कि “छात्रों की मांग सुन ली जाये जिसमें नीट को निष्पक्ष तरीक़े से कराने और बार-बार पेपर लीक होने के कारण राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी एनटीए को ख़त्म करने की मांग शामिल है”

वकील की इस बात को अनसुना करते हुए कोर्ट ने अगले मामले की सुनवाई के लिए पुकारा तो वकील ने फिर कहा कि वह प्रदर्शन कर रहे छात्रों के ख़िलाफ़ पुलिस की कार्रवाई के वीडियो दिखा सकते हैं.

इस पर सीजेआई सूर्यकान्त ने कहा- "वक्त बर्बाद मत कीजिए"

सड़क पर लाठी चली, थाने में बच्चे बंद हैं और देश की सबसे बड़ी अदालत के पास वक़्त नहीं है. सवाल यह है कि जब नागरिक सड़क पर लाठियाँ खा रहे हो और अदालत दरवाजा बंद कर ले तो लोग इंसाफ के लिए कहां जाएंगे?

सूर्यकान्त साहब के बयान पहले भी सुर्खियों में रहे हैं. कुछ महीने पहले उन्होंने प्रदर्शनकारियों की तुलना "कॉकरोच" से कर दी थी. कहा था - "इन्हें कुचलना पड़ेगा". किसी देश की न्यायव्यवस्था के सबसे उंची कुर्सी पर बैठे व्यक्ति के मुंह से ऐसी भाषा शोभा नहीं देती. इस भाषा की जितनी निंदा की जाये कम है. न्यायाधीश का काम डंडा चलाना नहीं, डंडा खाने वाले को सुनना होता है. सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई के पद पर बैठा शख्श अगर नागरिकों को कीड़ा-मकोड़ा समझेगा तो फिर आम आदमी अदालत से उम्मीद क्या करेगा?

2014 के बाद से लोकतंत्र के हर स्तंभ को कमजोर किया गया है. न्यायपालिका भी इसमें शामिल है. जब सरकार छात्रों को पीटे और CJI कहे वक्त बर्बाद मत करो तो संदेश साफ है, सत्ता के खिलाफ आवाज उठाओगे तो न सड़क पर सुनवाई होगी और न कोर्ट में.

सुप्रीम कोर्ट भी जनता के टैक्स से चलता है. सीजेआई की कुर्सी पर बैठकर वक्त नहीं है कहना जनता के साथ सबसे बड़ी बेईमानी ही है. देश के युवाओं को तानाशाही सरकार सड़कों पर पीट रही है, लाठियाँ बरसा रही है और अब सुप्रीम कोर्ट ने भी आंख बंद कर ली तो फिर इस देश में बचा क्या? न्याय में देरी अन्याय है और सीजेआई का यह कहना कि वक्त बर्बाद मत कीजिए उस अन्याय पर मोहर लगाना है.

- शकील प्रेम

18/07/2026

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