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“कन्यादान “नहीं,“पाणिग्रहण “कहें ।हाल ही में एक ख़बर ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया,जिसमें एक आईएएस लड़की ने ,अपनी शा...
09/10/2025

“कन्यादान “नहीं,
“पाणिग्रहण “कहें ।
हाल ही में एक ख़बर ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया,
जिसमें एक आईएएस लड़की ने ,
अपनी शादी में कन्यादान नहीं करने दिया,
उसने अपने पिता को कहा कि मैं आपकी बेटी हूँ,दान की वस्तु नहीं।इस प्रकार इस विवाह में सारी रस्में हुई,एक कन्यादान को छोड़कर।

आइये जानते हैं,हिन्दू समाज में कन्यादान की जो परंपरा है,
वह कितनी पौराणिक है,
आज के इस युग में इसका क्या औचित्य है?
जहां तक मेरी जानकारी है कन्यादान शब्द वैदिक व पौराणिक वाड्मय में कहीं नहीं है,
पौराणिक कथाओं में विवाह और स्वयंवर ,
जैसे आयोजनों का उल्लेख तो मिलता है,
पर कन्यादान का ज़िक्र कहीं नहीं दिखता।

वर्तमान में हिन्दू धर्म में शादियों में ,
तमाम रस्म और रिवाज निभाने के उपरांत ही ,
विवाह को पूर्ण माना जाता है।
विवाह की इस रस्मों में एक रस्म कन्यादान का है,
कन्यादान का अर्थ होता है,कन्या का दान,
अर्थात् पिता अपनी पुत्री का हाथ वर के हाथ में सौंपते हैं,
यानी इसके बाद से कन्या की सारी सुख-दुख की ,
ज़िम्मेदारियाँ अब वर को निभानी होगी।
कन्यादान करना हर माता-पिता के लिए ,
बड़े सौभाग्य की बात होती है।कहते हैं,
जो माता-पिता बेटी का दान करते हैं,
उनके लिए स्वर्ग का रास्ता हमेशा के लिये खुल जाता है।

वास्तव में कन्यादान कन्या+आदान(ग्रहण) का बिगड़ा रूप है,परन्तु सुलभतावश इसे कन्यादान बोलने से अर्थ का अनर्थ हो जाता है।भला क्या कन्या कोई दान देने की वस्तु है?कदापि नहीं।वाल्मीकि रामायण में भी कन्यादान की नहीं बल्कि पाणिग्रहण की बात है।वाल्मीकि जी ने लिखा है:-

इयं सीता मम सुता सहधर्मचरी तव ।
प्रतीच्छ चैनां भद्रंते पाणि गृह्नीष्व पाणिना।

वर द्वारा वचन स्वीकारोक्ति के उपरांत कन्या के पिता अपनी बेटी का हाथ(पाणि) वर के हाथ में सौंपते हैं।इसे ही पाणिग्रहण कहा जाता है,जिसे कालांतर में कन्यादान कहा जाने लगा,जो सर्वथा अनुचित है।
विवाह को शादी भी कहा जाता है,जो बिलकुल ग़लत है।विवाह का कोई समानार्थी शब्द नहीं है।विवाह वि+वाह अर्थात् इसका शाब्दिक अर्थ है-विशेष रूप से उत्तरदायित्व वहन करना।अन्य धर्मों में शादी पति-पत्नी के बीच एक प्रकार का करार होता है।जिसे विशेष परिस्थितियों में तोड़ा भी जा सकता है,परन्तु हिन्दू धर्म में विवाह बहुत ही भली-भाँति सोच-समझकर किए जाने वाला संस्कार है।हिन्दू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संबंध से अधिक आत्मिक संबंध होता है।

विवाह के दौरान पाणिग्रहण की रस्म के बाद वर के वस्त्र (दुपट्टा)और कन्या की साड़ी या ओढ़ना के पल्ले में फूल,हल्दी,दूर्वा,चावल और सिक्का बांधकर गाँठ बनाया जाता है,जिसे गठबंधन कहा जाता है।इस गठबंधन को दोनों के शरीर और मन को आपस में बांधने का प्रतीक माना जाता है।इस प्रकार जीवनभर के लिए एक-दूसरे के साथ पूरी तरह से बंध जाना ही गठबंधन है।अग्नि के समक्ष सात फेरे लेकर तन,मन और आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं।हिन्दू वैवाहिक संस्कार के अंतर्गत वर के वाम अंग की तरफ़ बैठने से पूर्व कन्या अग्नि के सात फेरे में वर से एक-एक कर सात वचन लेते हुए वह हर वार कहती है कि यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो ही मैं आपके वाम अंग में आना स्वीकार करूँगी।इसे च्सप्तपदीज् कहा जाता है।
अतः “कन्यादान “कहीं से भी उपयुक्त शब्द नहीं है।इसे पौराणिक शब्द “पाणिग्रहण “कहना ही उचित होगा ।👍🙏🏽
अनुपम रामस्नेही जी की वाल से

वो नीली चिट्ठियां कहां खो गईजिनमे लिखने के सलीके छुपे होते थेकुशलता की कामना से शुरू होते थेंबड़ों के चरणस्पर्श पर ख़त्म...
27/07/2023

वो नीली चिट्ठियां कहां खो गई
जिनमे लिखने के सलीके छुपे होते थे

कुशलता की कामना से शुरू होते थें
बड़ों के चरणस्पर्श पर ख़त्म होते थें

और बीच में लिखी होती थी जिंदगी
प्रियतमा का विछोह,
पत्नी की विवशताएं
नन्हें के आने की खबर,
मां की तबियत का दर्दं
और पैसे भेजने का अनुनय
फसलों के खराब होने की वजह

कितना कुछ सिमट जाता था
एक नीले से कागज में
जिसे नवयौवना भाग कर सीने से लगाती
और अकेले में आंखों से आंसू बहाती

मां की आस थी ये चिट्ठियां
पिता का संबल थी ये चिट्ठियां
बच्चों का भविष्य थी ये चिट्ठियां
और गांव का गौरव थी ये चिट्ठियां

अब तो स्क्रीन पर अंगूठा दौड़ता हैं
और अक्सर ही दिल तोड़ता हैं
मोबाइल का स्पेस भर जाए तो
सब कुछ दो मिनिट में डिलीट होता हैं
सब कुछ सिमट गया छै इंच में
जैसे मकान सिमट गए फ्लैटों में
जज्बात सिमट गए मैसेजों में
चूल्हे सिमट गए गैसों में
और इंसान सिमट गए पैसों में,,
🤗🤔🤔🤔🤗

खो गई वो...चिट्ठियाँ...जिनमे लिखने के सलीके छुपे होते थेकुशलता की कामना से शुरू होते थेबड़ों के चरणस्पर्श पर ख़त्म होते ...
10/02/2023

खो गई वो...

चिट्ठियाँ...
जिनमे लिखने के सलीके छुपे होते थे
कुशलता की कामना से शुरू होते थे
बड़ों के चरणस्पर्श पर ख़त्म होते थे!

और बीच में लिखी होती थी जिंदगी...

नन्हें के आने की खबर
मां की तबियत का दर्दं
और पैसे भेजने का अनुनय
फसलों के अच्छा या खराब होने की वजह!

कितना कुछ सिमट जाता था
एक नीले से कागज में....

जिसे नवयौवना भाग कर सीने से लगाती
और अकेले में आंखों से आंसू बहाती!

मां की आस थी
पिता का संबल थी
बच्चों का भविष्य थी
और गांव का गौरव थी ये चिट्ठियाँ!

डाकिया चिट्ठी लाएगा
कोई बांच कर सुनाएगा
देख देख चिट्ठी को
कई कई बार छू कर चिट्टी को
अनपढ़ भी
एहसासों को पढ़ लेते थे!

अब तो स्क्रीन पर अंगूठा दौड़ता है
और अक्सर ही दिल तोड़ता हैं
मोबाइल का स्पेस भर जाए तो
सब कुछ दो मिनिट में डिलीट होता है!

सब कुछ सिमट गया छै इंच में
जैसे मकान सिमट गए फ्लैटों में
जज्बात सिमट गए मैसेजों में
चूल्हे सिमट गए गैसों में,

और इंसान सिमट गए पैसों में🌚🌚

26/12/2022

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