18/08/2026
🏔️ कुमौड़ की हिलजात्रा — इतिहास, आस्था और हमारी पहचान 🙏
सोर घाटी की मिट्टी में रची-बसी हिलजात्रा केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि हमारी सदियों पुरानी लोकसंस्कृति, कृषि परंपरा और वीरता की जीवंत कहानी है।
कहा जाता है कि हिलजात्रा की परंपरा पश्चिमी नेपाल के सोरार (महाकाली) क्षेत्र से पिथौरागढ़ की घाटी तक पहुँची और कुमौड़ गाँव ने इसे सबसे पहले अपनाया। समय के साथ यह पर्व सोर घाटी की विशिष्ट पहचान बन गया। (Kumaon)
लोकमान्यता के अनुसार, लगभग 16वीं शताब्दी में सोर पिथौरागढ़ के चार वीर महर भाइयों — कुंवर सिंह महर, चहज सिंह महर, चंचल सिंह महर और जाख सिंह महर — की वीरता से प्रभावित होकर नेपाल नरेश ने उन्हें विशेष मुखौटे भेंट किए। इन्हीं मुखौटों को कुमौड़ लाकर इस परंपरा को नए रूप में आगे बढ़ाया गया।
🌾 हिलजात्रा का संबंध हमारी खेती और पहाड़ के जीवन से भी गहरा है।
धान की रोपाई, हल चलाना, बैलों के साथ कृषि कार्य और पहाड़ी जीवन की अनेक गतिविधियाँ इस लोकनाट्य में जीवंत हो उठती हैं। इसी कारण यह पर्व किसान और पशुपालक जीवन का उत्सव भी माना जाता है।
👹 और फिर मैदान में प्रकट होता है लखियाभूत — हिलजात्रा का सबसे प्रमुख और आकर्षक पात्र। कुमौड़ में लखियाभूत को ग्राम देवता के रूप में भी श्रद्धा प्राप्त है।
सैकड़ों वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी हमें हमारी माटी, हमारे पुरखों और हमारी संस्कृति से जोड़ती है।
कुमौड़ की हिलजात्रा सिर्फ एक पर्व नहीं…
यह सोर घाटी की आत्मा है। ❤️🏔️
🙏 जय कुमाऊँ | जय देवभूमि | जय हिलजात्रा 🙏
📍 कुमौड़, पिथौरागढ़
📅 24 अगस्त
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