विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत, कोड सं. 3011

  • Home
  • India
  • Pilibhit
  • विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत, कोड सं. 3011

विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत, कोड सं. 3011 काव्यशाला : ऑनलाइन प्रस्तुति विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत

लंका-रथी🙏🙏🙏🙏  (परिचय-पर्व)जिस क्षण तुम हो मेरे समीप, इतना समीप ‘क्षण’ ना होता।हे लखन! लाख की बात सुनो, यह रण ‘अंतिम-रण’ ...
11/06/2026

लंका-रथी

🙏🙏🙏🙏

(परिचय-पर्व)

जिस क्षण तुम हो मेरे समीप, इतना समीप ‘क्षण’ ना होता।
हे लखन! लाख की बात सुनो, यह रण ‘अंतिम-रण’ ना होता।

मैं भले हारता नारायण से, पर ‘युग’ एक खपा देता।
यह युद्ध और भीषण होता, घर यदि विभीषण ना होता।

(प्रलय-पर्व)

मैं युद्धनीति के पाश में बँधा, रण-नियमों के घेरे में।
उत्थान पतन का खेल चला, इस दिवस-निशा के फेरे में।
मैं अगर युद्ध के नियमों के, जो उल्लंघन पर अड़ जाता।
ना सूर्य अस्त होने पाता, भीति से काल ठहर जाता।

मैं सूरज के दो-टुकड़े करके दोनों-ओर लगा देता।
यह युद्ध निरंतर चलता रहता, ऐसे ‘तमस’ भगा देता।
मैं क्षुधा-शमन को, एक-एक कर, सभी ग्रहों को खा लेता,
मैं नक्षत्रों का रस निचोड़ कर अपनी प्यास बुझा लेता।

संग्राम और व्यापक होता, जो भेद-प्रकाशन ना होता।
यह युद्ध और भीषण होता, घर यदि विभीषण ना होता।

(शौर्य-पर्व)

ये वानर-भालू कुचले जाते, कीटों के अंडों जैसे।
हाथों से ही मसले जाते, मेरू प्रस्तर-खंडों जैसे।
मैं सात अंतरिख एक साथ, जकड़े रहता भुजपाशों में।
औ नित्य गूँजता ‘त्राहि-माम’ का स्वर अनगिन आकाशों में।

लेकिन मैं ये कर नहीं सका, बल का मेरे विस्तार गया।
मैं लोक विजेता रावण था, अपने ही घर में हार गया।
कुलद्रोही के मुख से, जैसे ही बाहर, घर का भेद गया।
बस उछल कूद की क्रीड़ा में, एक वानर लंका भेद गया।

यह लंका उजड़ नहीं पाती, यदि शाख संक्रमण ना होता।
यह युद्ध और भीषण होता, घर यदि विभीषण ना होता।

(गौरव-पर्व)

मैं कुम्भकर्ण की मेरुदेह, उसके निनाद पर गर्वित था।
अतिकाय और अक्षयकुमार, मैं मेघनाद पर गर्वित था।
मैं कोटि-कोटि गर्वित था, अपनी बहनों और माताओं पर,
मैं गर्वित था अपनी मिट्टी, और लंका की सेनाओं पर।

विश्रवा-कैकसी का सुपुत्र, कुल पर शर का संधान देख।
मैं ‘नारायणी’ तक हर लाया, ‘बहुरूपा’ का अपमान देख।
शत्रु का शौर्य डिगाता क्या, मैं शिव का एक पुजारी था।
भाई शत्रु खेमे में था, यह दृश्य ही मुझपे भारी था।

तुमने जितना रावण देखा, उतना ही रावण ना होता।
यह युद्ध और भीषण होता, घर यदि विभीषण ना होता।

(बलिदान-पर्व)

भाई, बेटा, सहचर, संगी, सौ-सौ कुटुम्ब, अनगिनत भृत्य।
मेरे प्रियजन मेरे समक्ष, भू-शायी होते रहे नित्य।
अंतिम शोणित की बूँद एक, बल भरती रही भुजाओं तक।
सबकी आसक्ति जुड़ी रही, बस लंका की सीमाओं तक।

हे लखन देख इन आँखों में, थोड़ा संशय, क्या दिखता है?
देखो विदीर्ण भुजदंडों में, मृत्यु का भय, क्या दिखता है?
जब मान जुड़ा हो मिट्टी का, सम्मान जुड़ा हो मिट्टी का।
तब युद्ध, कर्म रह जाता है, यह राष्ट्र, धर्म रह जाता है।

कर जोड़ खड़े तुम ना होते, मैं आज आकिंचन ना होता।
यह युद्ध और भीषण होता, घर यदि विभीषण ना होता।

(मोक्ष-पर्व)

मुझको कोई संताप नहीं, मन में भी पश्चाताप नहीं।
मैं एक पक्ष, तुम एक पक्ष, अनुनय का कोई प्रलाप नहीं।
हरि से शत्रुता भी गरिमा है, हरि के हाथों मरना वैभव।
अपनों में रह, अपनों के हित, साँसे अर्पित करना वैभव।

जब तलक राम का नाम रहेगा, रावण सुमिरा जाएगा।
पर कहो, विभीषण, देशद्रोह का दाग हटा क्या पाएगा।
बिन रावण का अभिधान लिये, युगबोध नहीं हो पायेगा।
पर हाय! ‘चिरंजीवी’ पर कोई शोध नहीं हो पायेगा।

भाई जैसे संबंधों का, ऐसा विद्रूपण ना होता।
यह युद्ध और भीषण होता, घर यदि विभीषण ना होता।

(न्याय-पर्व)

गणना होगी उसकी अनंत, गृहभेदी के पर्यायों में।
औ’ नाम रहेगा उसका भी, छल के कलुषित अध्यायों में।
शेषावतार! बतलाओ, वह कितना दूषित क्षण हो जाता?
तुम एक कल्पना करो अभी, जो ‘भरत’ ‘विभीषण’ हो जाता।

विधि के व्युत्क्रम का एक अंश, विपरीत कथाएँ गढ़ देता।
विश्वासघात यदि भाग्य राम के दाएँ-बाएँ मढ़ देता।
क्या ध्वजा दशानन की नगरी की, इतना शीघ्र झुका पाते?
क्या राम सुगमता से रावण का अमृत कलश सुखा पाते?

तब रण का बस विप्लव होता, इतना सम्भाषण ना होता।
यह युद्ध और भीषण होता, घर यदि विभीषण ना होता।

(प्रायश्चित-पर्व)

मैं युद्धसभा के मध्य मनोबल, के प्रपात से विचलित था।
क्या एक शासक के दृष्टिकोण से, देश-निकाला अनुचित था?
शब्दों से मैंने दुत्कारा, लंकेश यहीं पर था हारा।
स्वीकार नहीं था, हो जाना, मालिनीपुत्र का हत्यारा।

एक शासक का, एक भाई का, संतुलन बना रख नहीं सका।
दृग में थी दर्प की छाया, उसको पुनः बुला तक नहीं सका।
सौमित्र! अनुज से कह देना, ‘हरि-शरण’ की लाख बधाई हो।
स्वजनों की अस्थियों पर शोभित, यह ‘सिंहासन’ सुखदायी हो।

है चित्त व्यथित, ‘भाई’ मेरी मृत्यु का कारण न होता।
यह युद्ध और भीषण होता, घर यदि विभीषण न होता।


✍️✍️✍️✍️✍️

रचना: पियूष प्रणव सुमित
सतीपुरी बेढ़ना, बाढ़, पटना, बिहार

09/06/2026
एक कदम और........................24वें संस्करण के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित हैं।पियूष प्रणव सुमित संपादक : एक कदम और।
25/05/2026

एक कदम और........................
24वें संस्करण के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित हैं।

पियूष प्रणव सुमित
संपादक : एक कदम और।

13/05/2026
विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत जिला इकाई दतिया मध्य प्रदेश के जिला अध्यक्ष आ. मूरत सिंह यादव जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामन...
10/05/2026

विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत जिला इकाई दतिया मध्य प्रदेश के जिला अध्यक्ष आ. मूरत सिंह यादव जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं

09/05/2026

स्वागत है....

विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत के कोषाध्यक्ष एवं उत्तराखंड के अध्यक्ष हम सबके प्रिय अनुज आ0 ओमप्रकाश फुलारा 'प्रफुल्ल' जी को ...
02/05/2026

विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत के कोषाध्यक्ष एवं उत्तराखंड के अध्यक्ष हम सबके प्रिय अनुज आ0 ओमप्रकाश फुलारा 'प्रफुल्ल' जी को जन्मदिवस की बहुत बहुत बधाई व हार्दिक शुभकामनाएं।
💐💐💐💐💐💐💐

Address

Bisalpur
Pilibhit
262201

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत, कोड सं. 3011 posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Organization

Send a message to विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत, कोड सं. 3011:

Share