BAZM E BAHAR

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17/04/2026

सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं

कोई तो निकल आएगा सरबाज़-ए-मोहब्बत
दिल देख रहे हैं वो जिगर देख रहे हैं

कुछ देख रहे हैं दिल-ए-बिस्मिल का तड़पना
कुछ ग़ौर से क़ातिल का हुनर देख रहे हैं

पहले तो सुना करते थे आशिक़ की मुसीबत
अब आँख से वो आठ पहर देख रहे हैं

ख़त ग़ैर का पढ़ते थे जो टोका तो वो बोले
अख़बार का परचा है ख़बर देख रहे हैं

पढ़ पढ़ के वो दम करते हैं कुछ हाथ पर अपने
हँस हँस के मेरे ज़ख़्म-ए-जिगर देख रहे हैं

मैं 'दाग़' हूँ मरता हूँ इधर देखिए मुझ को
मुँह फेर के ये आप किधर देख रहे हैं

दाग़ देहलवी

11/04/2026

मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए
गाँव-गाँव जख़्मी फ़ज़ाएँ हो गईं
ज़हरीली घर की हवाएँ हो गईं
मँहगीं शराब से दवाएँ हो गईं
जाइए आवाम को जवाब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए

लोग जो ग़रीब थे हक़ीर हो गये
आप तो ग़रीब से अमीर हो गये
यानी कि हुज़ूर बे-ज़मीर हो गये
ख़ुद को बे-ज़मीरी का ख़िताब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए

राहतों के नाम पे कमाई कीजिए
जेब-ए-आवाम की सफाई कीजिए
लूट के ग़रीबों की भलाई कीजिए
कुछ तो निगाहों को हिजाब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए

कैसी-कैसी देखो योजनाएँ खा गये
बेचकर ये अपनी आत्माएँ खा गये
मार के मरीज़ों को दवाएँ खा गये
इन्हें पद्मशिरी का ख़िताब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए
-मंजर भोपाली

میری بزم سے روٹھ کر جانا تیرا،ایسے آنے سے بہتر تھا نہ آنا تیرا۔— وارث ✍️
11/04/2026

میری بزم سے روٹھ کر جانا تیرا،
ایسے آنے سے بہتر تھا نہ آنا تیرا۔

— وارث ✍️

10/04/2026

हज़ार दिल में सवाल रखना उसे न कहना
और इस हुनर में कमाल रखना उसे न कहना

तुम्हारी सारी उदासियों का सबब वही है
ये ठीक है पर ख़याल रखना उसे न कहना

वो इस बहाने पलट के आएगा देख लेना
किताब उस की संभाल रखना उसे न कहना

वो तर्क ए उल्फ़त की बात छेड़े तो मान जाना
फिर अपना जैसा भी हाल रखना उसे न कहना

ये रख रखाव ही शायरी है सो मेरे शायर
ग़ज़ल में उस का जमाल रखना उसे न कहना

अहमद सलमान

06/04/2026

आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक

दाम-ए-हर-मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होने तक

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक

हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होने तक

परतव-ए-ख़ुर से है शबनम को फ़ना की ता'लीम
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होने तक

यक नज़र बेश नहीं फ़ुर्सत-ए-हस्ती ग़ाफ़िल
गर्मी-ए-बज़्म है इक रक़्स-ए-शरर होने तक

ग़म-ए-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़ मर्ग इलाज
शम्अ हर रंग में जलती है सहर होने तक

ता-क़यामत शब-ए-फ़ुर्क़त में गुज़र जाएगी उम्र
सात दिन हम पे भी भारी हैं सहर होने तक

मिर्ज़ा ग़ालिब

ख़त  के  छोटे से  तराशे  में  नहीं आएंगे ग़म  ज़ियादा  हैं  लिफ़ाफ़े में नहीं आएंगे हम ना मजनूँ हैं ,ना फ़रहाद के कुछ लगते हैं...
05/04/2026

ख़त के छोटे से तराशे में नहीं आएंगे
ग़म ज़ियादा हैं लिफ़ाफ़े में नहीं आएंगे

हम ना मजनूँ हैं ,ना फ़रहाद के कुछ लगते हैं
हम किसी दश्त तमाशे में नहीं आएंगे

मुख़्तसर वक़्त में यह बात नहीं हो सकती
दर्द इतने हैं खुलासे में नहीं आएंगे

उसकी कुछ ख़ैर ख़बर हो तो बताओ यारों
हम किसी और दिलासे में नहीं आएंगे

जिस तरह आपने बीमार से रुख़सत ली है
साफ़ लगता है जनाज़े में नहीं आएंगे

खालिद नदीम शानी

03/04/2026

तू ने दीवाना बनाया तो मैं दीवाना बना
अब मुझे होश की दुनिया में तमाशा न बना

इ'श्क़ में दीदा-ओ-दिल शीशा-ओ-पैमाना बना
झूम कर बैठ गए हम वहीं मय-ख़ाना बना

ये तमन्ना है कि आज़ाद-ए-तमन्ना ही रहूँ
दिल-ए-मायूस को मानूस-ए-तमन्ना न बना

दिल-ए-बेताब को तस्कीन तबस्सुम से न दे
चश्म-ए-मजनूँ के लिए महमिल-ए-लैला न बना

ज़ौक़-ए-बर्बादी-ए-दिल को भी न कर तू बर्बाद
दिल की उजड़ी हुई बिगड़ी हुई दुनिया न बना

मुंकिर-ए-होश हूँ में मो'तक़िद-ए-होश न कर
मस्त-ए-इमरोज़ को महव-ए-ग़म-ए-फ़र्दा न बना

यूसुफ़-ए-मिस्र तमन्ना तेरे जल्वों के निसार
मेरी बेदारियों को ख़्वाब-ए-ज़ुलैख़ा न बना

निगह-ए-नाज़ से पूछेंगे किसी दिन ये 'ज़हीन'
तू ने क्या क्या न बनाया कोई क्या क्या न बना

ज़हीन शाह ताजी

01/04/2026

वो हर्फ़-ए-राज़ कि मुझ को सिखा गया है जुनूँ
ख़ुदा मुझे नफ़स-ए-जिबरईल दे तो कहूँ

सितारा क्या मिरी तक़दीर की ख़बर देगा
वो ख़ुद फ़राख़ी-ए-अफ़्लाक में है ख़्वार ओ ज़ुबूँ

हयात क्या है ख़याल ओ नज़र की मजज़ूबी
ख़ुदी की मौत है अँदेशा-हा-ए-गूना-गूँ

अजब मज़ा है मुझे लज़्ज़त-ए-ख़ुदी दे कर
वो चाहते हैं कि मैं अपने आप में न रहूँ

ज़मीर-ए-पाक ओ निगाह-ए-बुलंद ओ मस्ती-ए-शौक़
न माल-ओ-दौलत-ए-क़ारूँ न फ़िक्र-ए-अफ़लातूँ

सबक़ मिला है ये मेराज-ए-मुस्तफ़ा से मुझे
कि आलम-ए-बशरीयत की ज़द में है गर्दूं

ये काएनात अभी ना-तमाम है शायद
कि आ रही है दमादम सदा-ए-कुन-फ़यकूँ

इलाज आतिश-ए-'रूमी' के सोज़ में है तिरा
तिरी ख़िरद पे है ग़ालिब फ़िरंगियों का फ़ुसूँ

उसी के फ़ैज़ से मेरी निगाह है रौशन
उसी के फ़ैज़ से मेरे सुबू में है जेहूँ

अल्लामा इक़बाल

01/04/2026

सबक़ मिला है ये मेराज-ए-मुस्तफ़ा से मुझे
कि आलम-ए-बशरीयत की ज़द में है गर्दूं
अल्लामा इक़बाल
Ishq Urdu Urdu News

31/03/2026

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