BAZM E BAHAR

BAZM E BAHAR Bazm E Bahar is a non profit organisation devoted to promote and popularize Urdu Shayri, Gazal, Quwwalia, Noha and Mersia....

04/08/2026

हम जी रहे हैं कोई बहाना किए बग़ैर
उस के बग़ैर उस की तमन्ना किए बग़ैर

अम्बार उस का पर्दा-ए-हुरमत बना मियाँ
दीवार तक नहीं गिरी पर्दा किए बग़ैर

याराँ वो जो है मेरा मसीहा-ए-जान-ओ-दिल
बे-हद अज़ीज़ है मुझे अच्छा किए बग़ैर

मैं बिस्तर-ए-ख़याल पे लेटा हूँ उस के पास
सुब्ह-ए-अज़ल से कोई तक़ाज़ा किए बग़ैर

उस का है जो भी कुछ है मिरा और मैं मगर
वो मुझ को चाहिए कोई सौदा किए बग़ैर

ये ज़िंदगी जो है उसे मअना भी चाहिए
वा'दा हमें क़ुबूल है ईफ़ा किए बग़ैर

ऐ क़ातिलों के शहर बस इतनी ही अर्ज़ है
मैं हूँ न क़त्ल कोई तमाशा किए बग़ैर

मुर्शिद के झूट की तो सज़ा बे-हिसाब है
तुम छोड़ियो न शहर को सहरा किए बग़ैर

उन आँगनों में कितना सुकून ओ सुरूर था
आराइश-ए-नज़र तिरी पर्वा किए बग़ैर

याराँ ख़ुशा ये रोज़ ओ शब-ए-दिल कि अब हमें
सब कुछ है ख़ुश-गवार गवारा किए बग़ैर

गिर्या-कुनाँ की फ़र्द में अपना नहीं है नाम
हम गिर्या-कुन अज़ल के हैं गिर्या किए बग़ैर

आख़िर हैं कौन लोग जो बख़्शे ही जाएँगे
तारीख़ के हराम से तौबा किए बग़ैर

वो सुन्नी बच्चा कौन था जिस की जफ़ा ने 'जौन'
शीआ' बना दिया हमें शीआ' किए बग़ैर

अब तुम कभी न आओगे या'नी कभी कभी
रुख़्सत करो मुझे कोई वा'दा किए बग़ैर

जौन एलिया

30/07/2026

ख़ुद को कितना छोटा करना पड़ता है
बेटे से समझौता करना पड़ता है

जब औलादें नालायक़ हो जाती हैं
अपने ऊपर ग़ुस्सा करना पड़ता है

सच्चाई को अपनाना आसान नहीं
दुनिया भर से झगड़ा करना पड़ता है

जब सारे के सारे ही बे-पर्दा हों
ऐसे में ख़ुद पर्दा करना पड़ता है

प्यासों की बस्ती में शो’ले भड़का कर
फिर पानी को महँगा करना पड़ता है

हँस कर अपने चेहरे की हर सिलवट पर
शीशे को शर्मिंदा करना पड़ता है
Nawaj Dewbandi

11/07/2026

रुख़्सत हुआ तो आँख मिला कर नहीं गया
वो क्यूँ गया है ये भी बता कर नहीं गया

वो यूँ गया कि बाद-ए-सबा याद आ गई
एहसास तक भी हम को दिला कर नहीं गया

यूँ लग रहा है जैसे अभी लौट आएगा
जाते हुए चराग़ बुझा कर नहीं गया

बस इक लकीर खींच गया दरमियान में
दीवार रास्ते में बना कर नहीं गया

शायद वो मिल ही जाए मगर जुस्तुजू है शर्त
वो अपने नक़्श-ए-पा तो मिटा कर नहीं गया

घर में है आज तक वही ख़ुश्बू बसी हुई
लगता है यूँ कि जैसे वो आ कर नहीं गया

तब तक तो फूल जैसी ही ताज़ा थी उस की याद
जब तक वो पत्तियों को जुदा कर नहीं गया

रहने दिया न उस ने किसी काम का मुझे
और ख़ाक में भी मुझ को मिला कर नहीं गया

वैसी ही बे-तलब है अभी मेरी ज़िंदगी
वो ख़ार-ओ-ख़स में आग लगा कर नहीं गया

'शहज़ाद' ये गिला ही रहा उस की ज़ात से
जाते हुए वो कोई गिला कर नहीं गया

शहज़ाद अहमद

#शायरी #जिंदगी #याद #फूल #आग #खुशबू #

17/06/2026
09/06/2026

शौक़ को आज़िम-ए-सफ़र रखिए
बे-ख़बर बन के सब ख़बर रखिए

चाहे नज़रें हो आसमानों पर
पाँव लेकिन ज़मीन पर रखिए

बात है क्या ये कौन परखेगा
आप लहजे को पुर-असर रखिए

जाने किस वक़्त कूच करना हो
अपना सामान मुख़्तसर रखिए

एक टुक मुझ को देखे जाती हैं
अपनी नज़रों पे कुछ नज़र रखिए

निकहत इफ़्तिख़ार

#सफर #खबर #नजर #जमीन #आसमान #वक्त #शेर

26/05/2026

در محبتِ علی دل آشکار است
اوست آرام و سکون و قرارِ ما

28/04/2026

मुख़्तसर होते हुए भी ज़िंदगी बढ़ जाएगी
माँ की आँखें चूम लीजे रौशनी बढ़ जाएगी

मौत का आना तो तय है मौत आएगी मगर
आप के आने से थोड़ी ज़िंदगी बढ़ जाएगी

इतनी चाहत से न देखा कीजिए महफ़िल में आप
शहर वालों से हमारी दुश्मनी बढ़ जाएगी

आप के हँसने से ख़तरा और भी बढ़ जाएगा
इस तरह तो और आँखों की नमी बढ़ जाएगी

बेवफ़ाई खेल का हिस्सा है जाने दे इसे
तज़्किरा उस से न कर शर्मिंदगी बढ़ जाएगी

मुनव्वर राना

17/04/2026

सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं

कोई तो निकल आएगा सरबाज़-ए-मोहब्बत
दिल देख रहे हैं वो जिगर देख रहे हैं

कुछ देख रहे हैं दिल-ए-बिस्मिल का तड़पना
कुछ ग़ौर से क़ातिल का हुनर देख रहे हैं

पहले तो सुना करते थे आशिक़ की मुसीबत
अब आँख से वो आठ पहर देख रहे हैं

ख़त ग़ैर का पढ़ते थे जो टोका तो वो बोले
अख़बार का परचा है ख़बर देख रहे हैं

पढ़ पढ़ के वो दम करते हैं कुछ हाथ पर अपने
हँस हँस के मेरे ज़ख़्म-ए-जिगर देख रहे हैं

मैं 'दाग़' हूँ मरता हूँ इधर देखिए मुझ को
मुँह फेर के ये आप किधर देख रहे हैं

दाग़ देहलवी

11/04/2026

मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए
गाँव-गाँव जख़्मी फ़ज़ाएँ हो गईं
ज़हरीली घर की हवाएँ हो गईं
मँहगीं शराब से दवाएँ हो गईं
जाइए आवाम को जवाब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए

लोग जो ग़रीब थे हक़ीर हो गये
आप तो ग़रीब से अमीर हो गये
यानी कि हुज़ूर बे-ज़मीर हो गये
ख़ुद को बे-ज़मीरी का ख़िताब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए

राहतों के नाम पे कमाई कीजिए
जेब-ए-आवाम की सफाई कीजिए
लूट के ग़रीबों की भलाई कीजिए
कुछ तो निगाहों को हिजाब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए

कैसी-कैसी देखो योजनाएँ खा गये
बेचकर ये अपनी आत्माएँ खा गये
मार के मरीज़ों को दवाएँ खा गये
इन्हें पद्मशिरी का ख़िताब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए
-मंजर भोपाली

میری بزم سے روٹھ کر جانا تیرا،ایسے آنے سے بہتر تھا نہ آنا تیرا۔— وارث ✍️
11/04/2026

میری بزم سے روٹھ کر جانا تیرا،
ایسے آنے سے بہتر تھا نہ آنا تیرا۔

— وارث ✍️

Address

Phulwari Sharif
Patna
801505

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when BAZM E BAHAR posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share