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We are Associated with ideology of Nation.and give a DYNAMIC CHANCE TO GET A Well DEVELOPED SOCIETY. बिहार से ईर्ष्या क्यों होती है!
हम भी भारतीय ही हैं!

नेहा झा, चार बहनों में सबसे छोटी, 25 साल की नेहा दरभंगा में मेडिकल  रिप्रेजेंटेटिव यानि  M.R.का काम कर रही थी। वैसे तो उ...
13/09/2026

नेहा झा, चार बहनों में सबसे छोटी, 25 साल की नेहा दरभंगा में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव यानि M.R.का काम कर रही थी।
वैसे तो उसकी तीसरी बहन अंजू झा भी दरभंगा के ही एक डायग्नोस्टिक सेंटर में काम करती है।
नेहा के पिता संजय झा पहले खेती का काम किया करते थे, फिर शायद किसी ने सलाह मशवरा दिया होगा कि खेती से ज्यादा पैसे तो शराब की तस्करी में है।
बस संजय झा खेती- बाड़ी छोड़ तस्करी के धंधे में लग गए, शायद कमाई अच्छी खासी हो रही थी सो ज्यादा कमाने के चक्कर में अपनी बड़ी बेटी निशु को भी इस नेक काम में शामिल कर लिया।
बस पैसे ही पैसे आ रहे थे घर में।
फिर जब दोनों बाप - बेटी की तस्करी वाली बात उत्पाद विभाग के टीम को मालूम हुई, बस रंगेहाथ उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
अब संजय झा ने जेल जाने के बाद ये काम अपनी छोटी बेटी नेहा के कंधे पर दे दी।
नेहा ने अपने साथ शराब तस्करी में अपने जीजा को भी शामिल कर लिया।
पिछले दिनों समस्तीपुर स्टेशन पर आरपीएफ और सीआईबी ने स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस के एसी फर्स्ट क्लास का कूपे खुलवाया।
(उन्हें वाराणसी स्टेशन से एक गुप्त सूचना मिली थी। )
ये गुप्त सूचना सही निकली उस कूपे में नेहा और उसका जीजा था, और साथ में दो भारी - भरकम ट्रॉली जिसमें लगभग 75 लीटर विदेशी शराब भरी पड़ी थी।
परतों का खुलना शुरू हुआ तो मालूम चला जिस एसी फर्स्ट क्लास के मजे वो ले रहे थे उनके पास तो उसके टिकट भी नहीं थे।
नेहा कह रही थी कि ये शराब उसके इसी जीजा ने हरियाणा से खरीदा था, और वो इन शराबों को बिहार में होने वाली शादियों में सप्लाई करने वाली थी।
वैसे उड़ती हुई खबर ये भी है कि , नेहा M. R. के काम की आड़ में बड़े डाक्टर और रसूख वाले को शराब पहुंचाती थी।
नेहा बड़े ही आत्मविशवास से पुलिस वालों के सवालों के जवाब दे रही थी, जिसे सुनकर और देखकर सारे पुलिस वाले हैरान थे।
नेहा और उसके जीजा दोनों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।
संजय झा की लालच ने पूरे परिवार को तहस- नहस कर दिया।
चार बेटियों में से सिर्फ एक सुकून में
2 बेटों में से छोटा बेटा गाँव के ही स्कूल में दसवीं में पढ़ता है, और बड़ा बेटा मेडिकल की परीक्षा में असफल होने पर नशा करने लगा और वो अभी नशा मुक्ति केंद्र में है।
जिस बाप को अपने बच्चों को सही राह दिखाने का काम करना था, उसने ही गलत राह पर अपने बच्चों को चलने को कह दिया।
ये गलत तरीके से पैसे कमाने और अमीर बनने की जिद ने पूरे परिवार को ही तितर- बितर कर दिया।
राधे राधे।

मतलब अभी भी तुमलोग चाय से आगे नहीं बढ़ रहे हो..😂😂दूर छी 😅चाय से काम नहीं चलेगा मुख 😄ना रे बाबा ना चाय वाला ने.....
15/07/2026

मतलब अभी भी तुमलोग चाय से आगे नहीं बढ़ रहे हो..😂😂

दूर छी 😅चाय से काम नहीं चलेगा मुख 😄ना रे बाबा ना चाय वाला ने.....

पटना जंक्शन — 40₹ के खाए छोले भटूरे और ₹100 का आया दवाई का खर्चा। अब आप मानो या ना मानो लेकिन रेलवे स्टेशन के बाहर जितने...
12/07/2026

पटना जंक्शन — 40₹ के खाए छोले भटूरे और ₹100 का आया दवाई का खर्चा। अब आप मानो या ना मानो लेकिन रेलवे स्टेशन के बाहर जितने भी ठेले पर खाने पीने की चीजें बेचने वाले लोग होते हैं वह थोड़ा सा भी साफ सफाई का ध्यान नहीं रखते और इसी वजह से कई लोगों को खाया हुआ खाना हजम नहीं होता।

चार दिन पहले ही मैं दिल्ली से पटना आया था सुबह के करीब 11 बज रहे थे जोरो से भूख लगी थी आस पास नजर दौड़ाई तो हमें ठेले पर छोले भटूरे, लिट्टी चोखा, समोसा यही सब दिख रहा था और भूख भी बहुत तेज थी इसलिए हमने ₹40 का छोला भटूरा खाया। अब खाने में तो बड़ी लाजवाब था एकदम बड़े चाव से हमने छोले खाएं साथ में फूल फूल भटूरे भी थे वह भी बड़े चाव से खाया। फिर ₹20 की एक पानी बोतल खरीदी। अब खाना भी खा लिए पानी भी पी लिए पेट पूरी तरह भर चुका था जो ज़बरदस्त भूख लगी थी अब पूरी तरह खत्म हो चुका था मन एकदम खुश हो गया।

फिर वहां से निकल गए बस पकड़ने सब कुछ एकदम सही था बस भी हमारी पटना से खुल चुकी थी और हम अपने घर की ओर निकल गए। लेकिन आधे रास्ते में ही पेट में कुछ गुड़-गुड़ की आवाज़ आई मुझे लगा ऐसे ही कोई आवाज़ होगा लेकिन ये आवाज़ एक संकेत था कि पेट खराब हो चुका है। और कुछ दूर बाद वही हुआ जोरो से बाथरूम लग गई अब चलती बस में करे तो करे क्या। किसी तरह मुट्ठी बांध कर रोकने की कोशिश करते रहे लेकिन जब-जब बस झटके लेटी तो प्रेसर और भी तेज हो जाता। किस तरह हम अपने मंजिल पर पहुंचे वह हमें ही पता है जहां बस रुकी और जहां हमको उतरना था फटाफट वहां उतरे बाथरूम खोजा बाथरूम गए तब जाकर थोड़ी बहुत राहत मिली फिर वहां से हमने दवाई खरीदी और दो खुराक दवाई की कीमत मुझे ₹100 पड़ गई।

पटना जंक्शन के बाहर ₹40 के छोले भटूरे मुझे बहुत महंगे पड़ गए। और मैंने कसम खाई कि अब दुबारा कभी किसी रेलवे स्टेशन के बाहर कुछ भी नहीं खाएंगे भले उसके लिए मुझे भूखा ही क्यों न रहना पड़े!

194 नॉट आउट! वो फैसला जिसने सचिन को चौंकाया और देश को दो हिस्सों में बांट दिया!क्रिकेट एक टीम गेम है, लेकिन क्या 'टीम गे...
12/07/2026

194 नॉट आउट! वो फैसला जिसने सचिन को चौंकाया और देश को दो हिस्सों में बांट दिया!क्रिकेट एक टीम गेम है, लेकिन क्या 'टीम गेम' के नाम पर किसी महान खिलाड़ी का व्यक्तिगत रिकॉर्ड रोका जा सकता है? 29 मार्च 2004। मुल्तान का मैदान। भारत बनाम पाकिस्तान।यह वही मैच था जिसमें वीरेंद्र सहवाग ने 309 रन बनाकर 'सुल्तान ऑफ मुल्तान' का खिताब पाया था।
लेकिन दूसरे दिन शाम को ड्रामा कुछ और ही हुआ।
सचिन तेंदुलकर क्रीज़ पर थे। वे 194 रन पर बल्लेबाजी कर रहे थे।
वे अपने दोहरे शतक (Double Century) से सिर्फ़ 6 रन दूर थे। एक ओवर, शायद दो शॉट और इतिहास बन जाता।
तभी ड्रेसिंग रूम से इशारा हुआ।
कार्यवाहक कप्तान राहुल द्रविड़ (Rahul Dravid) ने पारी घोषित (Declare) कर दी!
मैदान पर सन्नाटा:
सचिन को विश्वास नहीं हुआ। पाकिस्तान के फील्डर भी हैरान थे।
सचिन चुपचाप, सिर झुकाए पैविलियन लौट आए। उनके चेहरे पर गुस्सा नहीं, लेकिन गहरी निराशा साफ दिख रही थी।
ड्रेसिंग रूम का तनाव:
मीडिया में आग लग गई। सवाल उठे—
"क्या द्रविड़ एक ओवर और नहीं रुक सकते थे?"
"क्या यह व्यक्तिगत खुन्नस थी?"
कोच जॉन राइट और कप्तान सौरव गांगुली (जो चोटिल थे) को भी सफाई देनी पड़ी।
सचिन ने अपनी आत्मकथा में लिखा है:
"मैं हैरान था। मुझे नहीं लगता था कि उस समय पारी घोषित करने का कोई मतलब था। मुझे बहुत बुरा लगा था।"
हालाँकि, राहुल द्रविड़ का तर्क था—"हमें पाकिस्तान को दिन के आखिरी कुछ ओवरों में खिलाना था ताकि विकेट मिल सके। टीम व्यक्तिगत रिकॉर्ड से बड़ी है।"
भारत वह मैच पारी और 52 रन से जीता। दोनों महान खिलाड़ियों ने परिपक्वता दिखाई और विवाद को पीछे छोड़ दिया। लेकिन फैंस आज भी उस फैसले पर बहस करते हैं।
द ग्रेट डिबेट:
मैच: Ind vs Pak, 2004 (Multan)
सचिन का स्कोर: 194* (Not Out)
फैसला: राहुल द्रविड़ (कार्यवाहक कप्तान)
सवाल: टीम फर्स्ट या एक ओवर का इंतज़ार?
आज 20 साल बाद, आप किसकी साइड हैं?
राहुल द्रविड़ सही थे (नियम तो नियम हैं, टीम सबसे पहले)।
गलत फैसला (सचिन जैसे लेजेंड के लिए 1-2 ओवर रुकना चाहिए था)

एक नंबर का लफ़्फ़ू और रीलबाज लड़का है,ज़मीन के नाम पर करोड़ों रुपया ठगी किया तो विजय सिन्हा जी ने इसको बीच सभा में हाँल ...
12/07/2026

एक नंबर का लफ़्फ़ू और रीलबाज लड़का है,ज़मीन के नाम पर करोड़ों रुपया ठगी किया तो विजय सिन्हा जी ने इसको बीच सभा में हाँल से बाहर निकाला था।प्रशांत जी के साथ आगे पीछे घूमते थे पहले श्री मान,जब प्रशांत जी को इसके काले करतूत का पता चला तो इनको गेट आउट कर दिया।आज देख रहे है श्री मान रील डाल कर विरोध कर रहे है,रील से राजनीति होता है बच्चा??मैं प्रशांत जी का एक मज़बूत सिपाही हूँ और हरेक परिस्थिति में उनके साथ खड़ा हूँ।लाखों रुपया पार्टी के पीछे खर्चा किया,टिकट नहीं मिला तो क्या हुआ??अभी पार्टी खड़ा करने का समय है।बिहारवासी को एक नया विकल्प देने का समय है,अभी त्याग करना होगा।
Jan Suraaj

बिहार का मुख्यमंत्री एक साधारण यूट्यूबर्स पत्रकार , जिसकी कोई क्रेडिटेबिलिटी नहीं है , कोई आइडियोलॉजी नहीं है ! उसके यहा...
11/07/2026

बिहार का मुख्यमंत्री एक साधारण यूट्यूबर्स पत्रकार , जिसकी कोई क्रेडिटेबिलिटी नहीं है , कोई आइडियोलॉजी नहीं है !

उसके यहां पक्ष विपक्ष का पूरा पॉलिटिकल क्लास माथा टेकने पहुंच जाता है ! एक मुख्यमंत्री के तौर पर ये तस्वीर अच्छी नहीं लगती है !

ये सबको ब्लैक मेल करता है ! सबसे पैसे लेकर planted political खबर, podcasts चलता है !

बिहार का पूरा political class , unprofessional journalists भाड़ गिरोह सब सड़ा हुआ है ! इस सड़े सिस्टम को विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव भी सहलाता है ?

क्या मज़बूरी है ! इस भाड़ को इतना महत्व मिलता है !

इस तस्वीर में भाजपा प्रत्याशी अभिषेक बंटी जी हैं। गौर से अगर देखेंगे तो आपको मैं भी दिखूंगा, स्वर्गीय सुशील मोदी जी के व...
11/07/2026

इस तस्वीर में भाजपा प्रत्याशी अभिषेक बंटी जी हैं। गौर से अगर देखेंगे तो आपको मैं भी दिखूंगा, स्वर्गीय सुशील मोदी जी के वैन पर हेलमेट पहनकर बैठा हुआ।
ये उस समय की तस्वीर है जब भाजपा विपक्ष में थी.
13 जुलाई 2023 को बिहार में भाजपा ने तत्कालीन सरकार के खिलाफ 'विधानसभा मार्च' और प्रदर्शन किया था. इस विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज में भाजपा नेता अभिषेक कुमार सिन्हा की पीठ पर गंभीर चोटें आई थीं, जिसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब वाइरल हुई थी. लाठी खाने वाले नेताओं में कई बड़े नेताओं का नाम भी शामिल है, जो इस प्रकार है. जनार्दन सिंह सिग्रीवाल, पूर्व मंत्री अजित कुमार, विजय कुमार सिन्हा, सहित कई अन्य कार्यकर्ताओं को पुलिस ने पीटा था.
अभिषेक बंटी जी को इनाम मिला इसकी मुझे खुशी है।
अब बांकीपुर की जनता को तय करना है वो क्या करेंगे?

कहते हैं, जो किस्मत में लिखा है उसे कोई छीन नहीं सकता, और जो नहीं लिखा, वह लाख कोशिशों के बाद भी नहीं मिलता।कल तक अभिषेक...
11/07/2026

कहते हैं, जो किस्मत में लिखा है उसे कोई छीन नहीं सकता, और जो नहीं लिखा, वह लाख कोशिशों के बाद भी नहीं मिलता।

कल तक अभिषेक कुमार ‘बंटी’ माता-पिता का आशीर्वाद लेकर बाकीपुर से नामांकन भरने निकले थे। आज उन्हें अपनी उम्मीदवारी वापस लेनी पड़ी।

अब बीजेपी ने युवा नीरज कुमार को उम्मीदवार बनाया है। इनकी शादी तक नहीं हुई है..! इनकी उम्र मात्र अभी 32 वर्ष है ..!

राजनीति में समीकरण और किस्मत—दोनों पल भर में बदल जाते हैं।

09/07/2026

पटना के IGIMS के न्यूरो वार्ड (सेकंड फ्लोर) का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

दावा किया जा रहा है कि लाइन में घंटों से खड़े मरीजों और उनके परिजनों को छोड़कर ₹50 लेकर साइड से लोगों का काम कराया जा रहा है। विरोध करने और वीडियो बनाने पर मारपीट की धमकी तक दी जा रही है। यहां तक कहा जा रहा है, "जहां जाना है जाओ, यहां का मालिक मैं हूं।"

अगर ये वीडियो और आरोप सही हैं, तो यह बेहद शर्मनाक है। मरीजों के साथ ऐसा व्यवहार बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होना चाहिए।

बिहार सरकार और IGIMS प्रशासन इस मामले की निष्पक्ष जांच करे और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करे।

दुलारचंद दुलारचंद कर रहे हो न तो देख लो आंखे फाड़कर कुर्मी कोयरी नितीश जी किसके सामने हाथ जोड़कर खड़ा है।साल था 1991। बि...
05/07/2026

दुलारचंद दुलारचंद कर रहे हो न तो देख लो आंखे फाड़कर कुर्मी कोयरी नितीश जी किसके सामने हाथ जोड़कर खड़ा है।

साल था 1991। बिहार की राजनीति उस वक्त एक नये मोड़ पर खड़ी थी। हवा में बदलाव की सुगबुगाहट थी, और उम्मीदों के दीये जल रहे थे।

मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव खुद अपनी गाड़ी से उतरे और सीधे दुलारचंद जी के घर पहुँच गए। कोई बड़ा सभा-समारोह नहीं, न कोई मंच, न कोई माइक। बस, एक साधारण घर का आँगन, जहाँ दोस्ती और विश्वास की बात हो रही थी। लालू ने दुलारचंद से नीतीश कुमार के लिए समर्थन माँगा।

दुलारचंद ने कुछ पल चुपचाप सुना। फिर धीरे से मुस्कुराए। बिना किसी लंबे भाषण के उन्होंने अपनी सहमति जताई — और उस सहमति को शब्दों से ज़्यादा गहरा अर्थ दिया।

उन्होंने अपनी पगड़ी खोली और नीतीश कुमार के सिर पर सलीके से बाँध दी।

वो पल जादुई था।

नीतीश कुमार की आँखों में सम्मान झलक रहा था, हाथ जोड़े हुए खड़े थे, जैसे किसी बड़े रिश्ते को स्वीकार कर रहे हों। बगल में लालू प्रसाद यादव बैठे थे — चुपचाप, लेकिन पूरी तरह संतुष्ट। उनके चेहरे पर वो चमक थी जो तब आती है जब कोई योजना बिना शोर के सफल हो जाती है।

चारों तरफ साधारण लोग थे, मगर उस छोटे से आँगन में उस वक्त बिहार के आने वाले कई सालों की राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय लिखा जा रहा था।

कोई नारा नहीं, कोई जुलूस नहीं — सिर्फ़ एक पगड़ी, एक विश्वास और एक अनकही सौदेबाजी जो बाद में इतिहास बन गई।

यह तस्वीर उसी पल को कैद किए हुए है — जब शब्दों की जगह रिवाज़ ने बात की थी।

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