22/08/2026
संविधान सबका है, लोकतंत्र सबका है, देश सबका है लेकिन यदि किसी व्यवस्था में एक वर्ग से लगातार त्याग, सहनशीलता ,भाईचारा और राष्ट्रवाद की उम्मीद की जाए और बदले में उसी वर्ग को लगातार अपमान, राजनीतिक उपेक्षा और कानूनी असमानता का अनुभव कराया जाए, तो उस व्यवस्था से सवाल पूछना लोकतंत्र-विरोध नहीं है।
बलिदान हमेशा उसी से क्यों मांगा जाए जिसके पास सबसे कम राजनीतिक शक्ति है?
एक संयुक्त परिवार की कल्पना कीजिए।
एक भाई कमाता है, परिवार संभालता है, संकट में खड़ा रहता है और हर बार परिवार बचाने के लिए अपना हिस्सा छोड़ देता है। दूसरा भाई जिद्दी है, बेईमान है स्वार्थी है बद्तमीज है परिवार को बार-बार तोड़ने की धमकी देता है और हर बार उसकी धमकी के सामने पहले भाई से ही समझौता कराया जाता है।
एक दिन कमाऊ भाई भी कह दे
“अब हर कीमत पर परिवार बचाने की जिम्मेदारी मेरी नहीं है। परिवार तभी बचेगा जब हिस्सेदारी, सम्मान और जिम्मेदारी तीनों बराबर होंगे अन्यथा ऐसे परिवार को टूट जाना ही चाहिए”
तब समीकरण बदल जाएगा? बटवारा होना तय नहीं है ?
यही बात राजनीति में भी समझनी होगी।
राष्ट्रवाद का अर्थ यह नहीं कि एक वर्ग हमेशा बलिदान देता रहे और दूसरा वर्ग हमेशा राजनीतिक सौदेबाजी करता रहे।
संविधान का अर्थ यह नहीं कि कोई भी नागरिक किसी दूसरे नागरिक को उसकी जाति के कारण अपमानित करे।
लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि संख्या के आधार पर किसी वर्ग को डराया जाए।
सामाजिक न्याय का अर्थ यह नहीं कि न्याय के नाम पर किसी दूसरे के सम्मान और अधिकारों को कुचला जाए।
और सबसे महत्वपूर्ण!
सामान्य वर्ग को संविधान से बाहर नहीं जाना है; संविधान के भीतर अपने बराबर अधिकार की लड़ाई लड़नी है।
हम किसी जाति के विरुद्ध नहीं हैं।
हम उस मानसिकता के विरुद्ध हैं जो जाति के नाम पर राजनीतिक वर्चस्व चाहती है।
हम किसी गरीब के विरुद्ध नहीं हैं।
हम उस व्यवस्था के विरुद्ध हैं जो गरीब को उसकी जाति के आधार पर अलग-अलग तराजू में तौलती है।
हम लोकतंत्र के विरुद्ध नहीं हैं।
हम उस लोकतंत्र पर सवाल उठा रहे हैं जिसमें चुनाव के समय हर नागरिक महत्वपूर्ण होता है, लेकिन सत्ता मिलने के बाद कुछ समूह स्थायी रूप से प्रभावशाली और कुछ स्थायी रूप से उपेक्षित हो जाते हैं।
अब समय “सब सह लो, देश बच जाएगा” कहने का नहीं है।
अब सवाल होगा आवाज उठेगा!
देश भी हमारा, संविधान भी हमारा, लोकतंत्र भी हमारा तो सम्मान, अधिकार और राजनीतिक हिस्सेदारी भी हमारी बराबर क्यों नहीं?
और याद रखिए।
किसी भी लोकतंत्र को बचाने का सबसे मजबूत रास्ता किसी वर्ग को दबाना नहीं, बल्कि हर नागरिक को यह विश्वास दिलाना है कि इस देश में उसका सम्मान, उसका अधिकार और उसका भविष्य सुरक्षित है।
बलिदान बहुत हो चुका।
अब बराबरी चाहिए।
अब सम्मान चाहिए।
अब समान कसौटी चाहिए।
और सबसे बढ़कर अब राजनीतिक तुष्टिकरण नहीं, समान नागरिकता चाहिए।