Kavi g aashray trust

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कविता ✨सुकून है इन हवाओं में,सुकून है इन फ़िज़ाओं में,तुझको ढूंढूं वादियों में,या इन खुले आसमानों में…हर सरसराहट कुछ कहत...
24/04/2026

कविता ✨
सुकून है इन हवाओं में,
सुकून है इन फ़िज़ाओं में,
तुझको ढूंढूं वादियों में,
या इन खुले आसमानों में…
हर सरसराहट कुछ कहती है,
हर ख़ामोशी गुनगुनाती है,
जब तू साथ महसूस होता है,
तो हर जगह सुकून समाती है…
वरना सच तो ये है,
ना वादियों में, ना आसमानों में—
सुकून बस वहीं मिलता है,
जहाँ तू बसता है… 💫
writer
Kavipriti singh

कभी-कभी दिल आदतों का कैदी हो जाता है,साथ की छांव में ही सुकून ढूँढता है…हम सोचते हैं —कोई हो जो सुने, जो थामे, जो समझे,क...
16/04/2026

कभी-कभी दिल आदतों का कैदी हो जाता है,
साथ की छांव में ही सुकून ढूँढता है…
हम सोचते हैं —
कोई हो जो सुने, जो थामे, जो समझे,
क्योंकि खामोशी में अपने ही सवाल
थोड़े भारी लगते हैं।
पर सच इतना भी अधूरा नहीं…
अकेलापन कमजोरी नहीं होता,
वो एक आईना है—
जहाँ तुम खुद से मिलते हो,
और धीरे-धीरे समझते हो
कि तुम्हारा सबसे सच्चा साथी
तुम खुद हो।
हाँ, हम ढूँढते हैं किसी को…
क्योंकि दिल जुड़ना चाहता है,
पर जीना सीखते हैं तब,
जब ये समझ आता है—
"मेरे अंदर ही एक दुनिया है,
जहाँ मैं खुद का सहारा हूँ…
और जब मैं खुद के साथ हूँ,
तो कोई कमी नहीं रहती।"
बस फर्क इतना है—
दूसरों के साथ रहना एक चाह है,
पर खुद के साथ रहना
एक शक्ति है।
Writer
Kavipriti singh

28/03/2026

“मन का समंदर”
काश कोई चमत्कार होता,
और मन यूँ ही शांत हो जाता…
सारी हलचल थम जाती,
हर सवाल कहीं खो जाता।
चिंताओं का बोझ उतर जाता,
दिल हल्का सा हो जाता…
जैसे ठहरा हुआ समंदर,
बस खुद में ही सो जाता।
पर सच तो ये है —
लहरें कभी रुकती नहीं,
बस उनका शोर कम हो जाता है…
और मन भी एक दिन,
उन्हीं के साथ जीना सीख जाता है। 🌊
Writer
Kavipriti singh

मैं अब बेगानी हो गई हूँजाने किस मोड़ पर खुद से ही अनजानी हो गई हूँ…भीड़ में चलते-चलते,अचानक फिर से अकेली रह गई हूँ।जिस र...
28/03/2026

मैं अब बेगानी हो गई हूँ

जाने किस मोड़ पर खुद से ही अनजानी हो गई हूँ…
भीड़ में चलते-चलते,
अचानक फिर से अकेली रह गई हूँ।
जिस रास्ते पर खड़ी थी कभी,
वही मोड़ फिर सामने आ गया…
फर्क बस इतना है,
अब साथ कोई नहीं,
और चलना फिर भी है।
हां, अब अकेले ही सही,
पर कदम रुकेंगे नहीं…
क्योंकि शायद यही सफर,
मुझे मुझसे फिर मिला देगा।
Writer
Kavipriti singh

सुधरा हुआ रूप:औरत को समझना आसान नहीं,क्योंकि वह जो है, वैसा कोई और हो ही नहीं सकता।वह कभी बेटी बनकर घर में खुशियाँ लाती ...
12/03/2026

सुधरा हुआ रूप:

औरत को समझना आसान नहीं,
क्योंकि वह जो है, वैसा कोई और हो ही नहीं सकता।
वह कभी बेटी बनकर घर में खुशियाँ लाती है,
कभी बहन बनकर स्नेह निभाती है,
कभी पत्नी बनकर जीवन का साथ देती है,
और सबसे गहरी पहचान — माँ बनकर दुनिया को जन्म देती है।
कहने को वह सिर्फ एक औरत है,
लेकिन उसके बिना न घर पूरा होता है,
न जीवन।
वह ही तो है जो
आसमान और ज़मीन के बीच
जीवन को सजा कर रखती है।
औरत के बिना
पानी भी पानी नहीं लगता,
भोजन भी भोजन नहीं लगता।
हम जो हर साँस लेते हैं,
उसमें भी कहीं न कहीं
एक औरत का ही योगदान होता है।
अपने घर की ही नहीं,
समाज की हर औरत उतनी ही आदरणीय है —
क्योंकि वह भी किसी की माँ है,
किसी की बहन है,
किसी की बेटी है।
ईश्वर ने इस दुनिया में
सबसे सुंदर रचना अगर बनाई है,
तो वह औरत है,
जो खेतों को, घरों को,
फूलों को, बच्चों को
और पूरे समाज को
अपने प्रेम और त्याग से सँवार कर रखती है। 🌸
Writer
Kavipriti singh

कहानी — “वो एक रुपया वाला बचपन”बात उस समय की है जब हम उन्नीसवीं सदी के बच्चे थे। तब गाँव सिर्फ एक जगह नहीं था, बल्कि हमा...
08/03/2026

कहानी — “वो एक रुपया वाला बचपन”
बात उस समय की है जब हम उन्नीसवीं सदी के बच्चे थे। तब गाँव सिर्फ एक जगह नहीं था, बल्कि हमारी खुशियों की पूरी दुनिया था। गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू होते ही मन बस एक ही बात सोचता—नानी या दादी के घर जाना है।
गाँव पहुँचते ही जैसे समय धीमा हो जाता था। कच्ची गलियाँ, पेड़ों की छाँव, आँगन में बैठी दादी और बड़ी माँ… सब कुछ इतना अपनापन भरा लगता था। उस समय एक रुपया भी बहुत बड़ा खज़ाना होता था। हम दौड़कर दुकान पर जाते और उस एक रुपये में चार चीज़ें ले आते—25 पैसे के बिस्कुट, 25 पैसे की दालमोट, 25 पैसे का निमचूस और 25 पैसे का बादामदाना।
कितना अद्भुत स्वाद लगता था उन छोटी-छोटी चीज़ों में। आज के पाँच सौ रुपये के बड़े डिब्बों में भी वैसा स्वाद और खुशी नहीं मिलती।
दिन भर हम बच्चे खेल में खोए रहते। कभी दो टोली बनाकर खेलना, कभी गुड्डे-गुड़िया की शादी रचाना। हम उनकी शादी के लिए नए कपड़े बनाते, सबको न्योता देते और बड़े उत्साह से सारी तैयारी करते। उस खेल में सिर्फ बच्चे ही नहीं, दादी, बड़ी माँ और घर के दूसरे बड़े लोग भी शामिल हो जाते थे।
वो हँसी, वो शोर, वो सादगी… सच में जीवन का सबसे सुहाना समय था। तब शायद हमारे पास बहुत कुछ नहीं था, लेकिन खुशियाँ इतनी थीं कि उनकी तुलना आज के बड़े घरों और सोने-चाँदी से भी नहीं की जा सकती।
आज जब पीछे मुड़कर देखते हैं, तो लगता है—वो एक रुपया नहीं, बल्कि पूरे बचपन की सबसे कीमती दौलत था। 🌿

Writer
Kavipriti singh

03/03/2026

वो बचपन वाला वक्त
कहानी उस वक्त की है,
जब 50 पैसे हाथ में आ जाना ही किसी ख़ज़ाने से कम नहीं लगता था।
जब जेब में सिक्के खनकते थे, तो दिल भी वैसे ही खिल उठता था।
त्योहार आते ही जैसे पूरा आसमान अपने घर उतर आता था।
ना किसी बड़े तोहफ़े की उम्मीद, ना किसी खास इंतज़ार की जरूरत…
बस सुबह-सुबह नहा-धोकर नए या कभी-कभी धुले-इस्त्री किए पुराने कपड़े पहन लेना,
और दौड़ पड़ना गली-गली, घर-घर।
हर दरवाज़े पर दस्तक,
बड़ों के चरण छूकर आशीर्वाद लेना,
और छोटों के सिर पर प्यार से हाथ फेर देना…
वो रिश्तों की मिठास ही असली मिठाई होती थी।
बातों में ऐसे घुल जाना,
जैसे चाय में शक्कर घुल जाती है—
ना दिखाई दे, पर हर घूंट में मिठास भर दे।
हँसी इतनी सच्ची होती थी कि
कब सुबह से शाम और शाम से रात हो जाती, पता ही नहीं चलता।
वो वक्त ऐसा था
जब खुश होने के लिए किसी और का इंतज़ार नहीं करना पड़ता था।
दिल छोटा था, पर खुशियाँ बहुत बड़ी थीं।
सपने छोटे थे, पर सुकून गहरा था।
अब समझ आता है—
हम बड़े नहीं हुए,
बस वो बचपन कहीं पीछे छूट गया।
क्या वक्त था वो…
जब थोड़ी सी चीज़ों में पूरा संसार बस जाता था। 🌸
Writer
Kavipriti singh

कभी आसमान भी अपना होता है, और ज़मीं भी अपनी लगती है,हर दिशा में अपना ही नाम लिखा सा दिखता है।पर वक़्त जब चुपचाप करवट लेत...
27/02/2026

कभी आसमान भी अपना होता है, और ज़मीं भी अपनी लगती है,
हर दिशा में अपना ही नाम लिखा सा दिखता है।
पर वक़्त जब चुपचाप करवट लेता है,
तो हाथों की लकीरों से भी यक़ीन फिसल जाता है।
कभी हर साँस में अपनापन घुला होता है,
हर लम्हा जैसे दिल की मुट्ठी में क़ैद होता है,
और कभी वही साँस उधार सी लगती है,
जैसे जीना भी किसी और की अमानत होता है।
कभी घर की दीवारें भी अपनी बाहों सी लगती हैं,
और कभी वही छत सिर पर बोझ बन जाती है।
कभी सब कुछ अपना-अपना सा चमकता है,
और कभी आईना भी पराया नज़र आता है।
जाने किस ख़्वाब की चादर ओढ़े रहते हैं हम,
कि हर सच भी सपना सा लगता है…
और कब अपना सब कुछ किराये का हो जाता है,
ये दर्द भी धीरे से आता है, पता भी नहीं चलता है…

Writer
Kavipriti singh

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Vatikapuri Colony
Patna

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