15/04/2026
यदुवंश का इतिहास केवल युद्धों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह अन्याय के विरुद्ध चेतना का इतिहास है। जब समाज को हाशिए पर धकेला गया, तब इसी वंश के नायकों ने मशाल थामी। आज 'यादव दिवस' पर हम उस विरासत को नमन करते हैं जिसने हमें 'गुलाम' से 'शासक' बनाया।
20वीं सदी की शुरुआत में जब दलितों और पिछड़ों को धार्मिक और सामाजिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा था, तब बाबू रासबिहारी मंडल ने मोर्चा संभाला। उन्होंने 'जनेऊ आंदोलन' के माध्यम से यह संदेश दिया कि यदुवंश क्षत्रिय है और संस्कार व शास्त्र पर सबका समान अधिकार है। उनके नेतृत्व में यदुवंशियों ने अपनी धार्मिक अस्मिता को पुनः प्राप्त किया और यह सिद्ध किया कि हम किसी से कम नहीं हैं। यह केवल एक धागे की लड़ाई नहीं थी, यह 'मानवीय गरिमा' की लड़ाई थी।
रासबिहारी मंडल जी की उसी विरासत को उनके सुपुत्र बी.पी. मंडल (बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल) ने संवैधानिक रूप दिया। 'मंडल कमीशन' की रिपोर्ट केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि पिछड़ों के लिए 'मैग्नाकार्टा' (अधिकार पत्र) साबित हुई। उन्होंने देश को बताया कि पिछड़ों की संख्या क्या है और उनका हक क्या है। आज यदि पिछड़ों का बेटा आईएएस, आईपीएस बन रहा है, तो उसका श्रेय मंडल साहब की उसी तपस्या को जाता है।
70 के दशक में जब देश में लोकतंत्र खतरे में था, तब जयप्रकाश नारायण (जेपी) के आह्वान पर दो युवा शेर उभरे— लालू प्रसाद यादव और शरद यादव।
लालू प्रसाद यादव: उन्होंने बिहार की माटी से सामाजिक न्याय का वह बिगुल फूंका जिसकी गूँज पूरे देश में सुनाई दी। उन्होंने दबे-कुचलों को 'बोलना' सिखाया और सत्ता के गलियारों तक पहुँचाया। उन्होंने सांप्रदायिक ताकतों के सामने चट्टान बनकर खड़े होने का साहस दिखाया।
शरद यादव: छात्र राजनीति से लेकर संसद तक, शरद यादव समाजवाद के वह प्रखर वक्ता रहे जिन्होंने नीतिगत स्तर पर पिछड़ों के हक की बात की। मंडल कमीशन को लागू करवाने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही।
इन दोनों जननायकों ने साबित किया कि यादव केवल हल चलाना नहीं जानता, बल्कि वह देश की राजनीति का रुख मोड़ने की ताकत भी रखता है।
इसी कड़ी में 'यदुवंशी गांधी' रंजीत यादव का योगदान अविस्मरणीय है। जहाँ राजनीतिक लड़ाई लालू और शरद जी लड़ रहे थे, वहीं रंजीत यादव जी ने सामाजिक स्तर पर उत्तर से दक्षिण तक भारत का भ्रमण किया। उन्होंने सभी उप-जातियों को त्याग कर एक 'यादव' पहचान रखने के लिए प्रेरित किया। उनका यह मिशन आज सफल है, जहाँ कन्याकुमारी से कश्मीर तक हम एक स्वर में 'यादव' कहलाते हैं।
आज का यादव समाज अपनी जड़ों को नहीं भूला है।
समाजवाद का रक्षक: हम आज भी हर वर्ग को साथ लेकर चलने वाले समाजवाद के रक्षक हैं।
मनोरंजन और खेल: चाहे अखाड़ा हो या क्रिकेट का मैदान, फिल्मी पर्दा हो या लोक संगीत, यादवों का जलवा 'On The Top' है।
भाईचारा: हमारी सबसे बड़ी पूंजी हमारा आपसी प्रेम और सर्वसमाज के प्रति सम्मान है।
रासबिहारी मंडल के त्याग से शुरू हुआ यह सफर, बीपी मंडल के संवैधानिक अधिकार, जेपी आंदोलन की तपन और लालू-शरद-रंजीत यादव के संघर्षों से होता हुआ आज हमारे कंधों पर है। आइए, इस 'यादव दिवस' पर संकल्प लें कि हम शिक्षित बनेंगे, संगठित रहेंगे और अपनी इस महान विरासत को और भी ऊँचाइयों पर ले जाएंगे।
जय यादव, जय माधव!
सामाजिक न्याय अमर रहे! Gagan Yadav Fans Nabish Yadav