01/05/2026
मई दिवस 2026 का संकल्प | इस हफ़्ते हम पहला ऐसा अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस मना रहे हैं जो 1 अप्रैल से मोदी सरकार के नए लेबर कोड थोपे जाने के बाद आया है. ये नए लेबर कोड मज़दूरों के अधिकार बेहतर करने, उनका दायरा बढ़ाने और श्रम कानूनों के पालन को मज़बूत करने के बजाय, भारत के विशाल मज़दूर वर्ग को एक कॉरपोरेट जंगलराज के हवाले कर रहे हैं—जहाँ मालिकों की तानाशाही को राज्य का पूरा संरक्षण हासिल है. आठ घंटे का कार्यदिवस अब कोई सार्वभौमिक अधिकार नहीं रह गया है. ठेका मज़दूरी और गिग इकॉनमी के इस दौर में यह धीरे-धीरे एक विशेषाधिकार बनता जा रहा है. काम के घंटों में बढ़ोतरी का मतलब अब ओवरटाइम की मज़दूरी नहीं, बल्कि महज़ अतिरिक्त शोषण है. ट्रेड यूनियन बनाना पहले से कहीं ज़्यादा मुश्किल कर दिया गया है, और सामूहिक सौदेबाज़ी की ताकत को बुरी तरह कमज़ोर किया गया है. वहीं मालिकों को मनमाने ढंग से कर्मचारियों को नौकरी से निकालने के और भी ज़्यादा अधिकार दे दिए गए हैं.
इन गुलामी भरे नए क़ानूनों का अमल ठीक उसी दौर में हुआ है, जब अमेरिका–इज़राइल की ईरान के ख़िलाफ़ जंग की वजह से अचानक आर्थिक संकट और भारी उथल-पुथल मच गई है. ईंधन संकट की चपेट में आकर कई उद्योग-धंधों ने अपना उत्पादन घटा दिया है या पूरी तरह बंद हो गए हैं. प्रवासी मज़दूरों को एक बार फिर गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से मजबूरन अपने घर—उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल—लौटना पड़ रहा है. एनसीआर क्षेत्र और देशभर के औद्योगिक इलाकों में ठेका मज़दूरों के बड़े-बड़े विरोध प्रदर्शन फूट पड़े हैं, जो तत्काल वेतन वृद्धि की माँग कर रहे हैं. यह समझना मुश्किल नहीं है कि बेहद कम मज़दूरी और असुरक्षा झेल रहे एनसीआर के मज़दूर अब सिर्फ़ ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष करने को क्यों मजबूर हैं. लेकिन यूपी की 'डबल इंजन' मोदी–योगी सरकार मज़दूरों के इन आंदोलनों को 'देश-विरोधी साज़िश' करार दे रही है. मज़दूरों की आवाज़ उठाने वाले कार्यकर्ताओं को फँसाने के लिए उन्हें 'मास्टरमाइंड' बताकर गिरफ़्तार किया जा रहा है, और कथित तौर पर मज़दूरों को भड़काने और देश की बदनामी का आरोप लगाया जा रहा है. जहाँ सरकार ने किसानों के आंदोलन पर बर्बर दमन करने की हिम्मत नहीं की थी, वहीं अब वही सरकार मज़दूरों के आंदोलनों को बर्बर बल-प्रयोग से कुचलने पर उतारू है.
दुनिया भर के मज़दूर वर्ग ने दशकों तक चले जुझारू संघर्षों और बड़ी कुर्बानियों के बाद ट्रेड यूनियन के बुनियादी अधिकार हासिल किए. इसी ताक़त के दम पर उन्होंने पूँजीवाद की उस बर्बर व्यवस्था में क़ायदे-कानूनों की कुछ हद तक जगह बनाई, जिसने औपनिवेशिक लूट और साम्राज्यवादी हमलों के ज़रिये पूरी दुनिया में अपने पैर पसार लिए थे. आठ घंटे का कार्यदिवस पूँजीवादी व्यवस्था की कोई "सभ्यतागत देन" नहीं था, बल्कि यह लगातार संघर्षों, बड़े उथल-पुथल और हेयमार्केट शहीदों (मई 1886) की सर्वोच्च कुर्बानी से हासिल किया गया अधिकार था. इससे पहले, प्रथम इंटरनेशनल यानी इंटरनेशनल वर्किंग मेन्स एसोसिएशन (1864–1872) के झंडे तले, कार्ल मार्क्स, फ़्रेडरिक एंगेल्स और यूरोप-अमेरिका के अन्य समाजवादी पुरोधाओं के नेतृत्व में, दुनिया भर के मज़दूर संघर्षों के बीच अंतरराष्ट्रीय एकजुटता और तालमेल की मज़बूत बुनियाद रखी जा चुकी थी. इसी पृष्ठभूमि में शिकागो के हेयमार्केट जनसंहार और मज़दूर नेताओं को दी गई फाँसी ने अंतरराष्ट्रीय मज़दूर वर्ग के संघर्षों की ज़बरदस्त हौसला अफ़ज़ाई की. इसके परिणामस्वरूप 1889 तक आते-आते मई दिवस अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मज़दूरों के गौरवशाली संघर्ष दिवस के रूप में स्थापित हो गया और दुनिया भर में मनाया जाने लगा.
भारत में भी आठ घंटे के कार्यदिवस का संघर्ष लगभग उसी दौर में शुरू हुआ, जब रेलवे से लेकर कपड़ा मिलों तक के मज़दूरों ने हड़तालें करना और अपनी यूनियनें बनाना शुरू किया. इसी बढ़ती चेतना के परिणामस्वरूप 1918 में मद्रास लेबर यूनियन के रूप में देश की पहली संगठित मज़दूर यूनियन सामने आई और 1920 तक आते-आते ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) के झंडे तले मज़दूरों का पहला राष्ट्रीय केंद्र भी खड़ा हो गया. इसी पृष्ठभूमि में जो क़ानून बने—चाहे 1881 का फ़ैक्ट्रीज़ एक्ट हो, 1923 का वर्कमेन्स कम्पेन्सेशन एक्ट या 1926 का ट्रेड यूनियन्स एक्ट—उन पर मज़दूर वर्ग की इस बढ़ती एकजुटता और दावेदारी का साफ़ असर था. संघर्ष का यह सिलसिला 1930 और 1940 के दशकों में और तेज़ हुआ, जब कम्युनिस्ट पार्टी का उभार हुआ, डॉ. बी. आर. आंबेडकर की इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी सामने आई, और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर और बाहर एक ताक़तवर वामपंथी-समाजवादी धारा ने इस आंदोलन को नई धार और दिशा दी.
आज जब मोदी सरकार नए श्रम कोड थोपकर मज़दूर-विरोधी दमन और कम्युनिस्टों के ख़िलाफ़ 'विच-हंट' (घेराबंदी) को तेज़ कर रही है, तो उसका असली मक़सद भारतीय मज़दूर आंदोलन की उन ऐतिहासिक उपलब्धियों को मटियामेट करना है, जो दशकों के ख़ून-पसीने से हासिल की गई थीं. क्रांतिकारी कम्युनिस्टों का फ़र्ज़ है कि इस साज़िश को नाकाम करने के लिए ठेका मज़दूरों और मज़दूर वर्ग के अलग-अलग हिस्सों—ख़ासकर नौजवानों और महिला मज़दूरों—के उभरते संघर्षों को एक ताक़तवर राजनीतिक धारा में पिरोना होगा. साथ ही किसानों, छात्रों व मज़दूरों के बीच गहरी, अटूट और जमीनी एकजुटता कायम करनी होगी. जिस तरह आज़ादी से पहले हिंदुत्व की सांप्रदायिक राजनीति ने ब्रिटिश औपनिवेशिक ताक़तों से साँठ-गाँठ की थी, उसी तरह आज भारतीय फ़ासीवादी ताक़तों का साम्राज्यवाद-परस्त चरित्र एक बार फिर बेनक़ाब हो रहा है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मोदी सरकार अमेरिका–इज़राइल धुरी के सामने बार-बार घुटने टेकने और मिलीभगत के चलते रंगे हाथों पकड़े जा रहे हैं. मज़दूर अधिकारों की लड़ाई को अब फ़ासीवाद-विरोधी और साम्राज्यवाद-विरोधी प्रतिरोध की एक निर्णायक धारा में बदलना होगा और भारत को आज़ादी के आंदोलन के इस नए दौर में आगे ले जाना होगा.