Bhagat Singh student front

Bhagat Singh student front यह संगठन भगत सिंह के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए बनाया गया है।

23/04/2026

लेनिन जयंती पर आयोजित साम्राज्यवाद विरोधी कन्वेंशन की कुछ झलकियां

22 अप्रैल, 2026 को बिहार के तीन क्रांतिकारी संगठनों - सीपीआई (एमएल), जनवादी लोक मंच तथा सीपीआई (एमएल) - न्यू डेमोक्रेसी ...
23/04/2026

22 अप्रैल, 2026 को बिहार के तीन क्रांतिकारी संगठनों - सीपीआई (एमएल), जनवादी लोक मंच तथा सीपीआई (एमएल) - न्यू डेमोक्रेसी के संयुक्त तत्वावधान में लेनिन के जन्मदिवस के अवसर पर पटना के आईएमए सभागार में एक साम्राज्यवाद विरोधी कन्वेंशन का आयोजन किया गया। कन्वेंशन का विषय था : "अमेरिकी साम्राज्यवाद आज विश्व शांति का सबसे बड़ा खतरा है।"

कन्वेंशन की शुरुआत में सीपीआई (एमएल) के प्रांतीय सचिव कॉमरेड नन्द किशोर सिंह ने कन्वेंशन में शिरकत कर रहे सभी प्रतिनिधियों एवं बिरादराना अतिथियों का स्वागत करते हुए उनका क्रांतिकारी अभिवादन किया तथा संक्षेप में विषय पर प्रकाश डाला। साथ ही उन्होंने कन्वेंशन के संचालन के लिए एक 3 सदस्यीय अध्यक्ष मंडल का प्रस्ताव रखा जिसमें सीपीआई (एमएल)- न्यू डेमोक्रेसी के कॉ. रामवृक्ष राम, जनवादी लोक मंच के साथी पुकार तथा सीपीआई (एमएल) के कॉ. नन्द किशोर सिंह शामिल थे।

साम्राज्यवाद विरोधी कन्वेंशन को सम्बोधित करने वाले प्रमुख नेताओं में सीपीआई (एमएल)- न्यू डेमोक्रेसी के बिहार के प्रवक्ता कॉ. वी.के. पटोले, जनवादी लोक मंच के पूर्व संयोजक कॉ. बलदेव झा, सीपीआई (एमएल) के केन्द्रीय कार्यकारिणी कमिटी सदस्य कॉ. अरविन्द सिन्हा, कम्युनिस्ट सेंटर फॉर साइंटिफिक सोशलिज्म के नेता कॉ. नरेन्द्र कुमार, रिवोल्यूशनरी वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया के नेता साथी अजीत, नागरिक अधिकार रक्षा मंच के नेता साथी संजय श्याम, श्रम मुक्ति संगठन के नेता साथी आदित्य कमल आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

तीनों क्रांतिकारी संगठनों के नेताओं तथा बिरादराना संगठनों के प्रतिनिधियों ने विस्तार से आज की वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था में साम्राज्यवादी ताकतों खासकर अमेरिका द्वारा पूरी दुनिया में किये जा रहे हस्तक्षेप तथा हमले की चर्चा की। जिस प्रकार से वेनेजुएला में अमेरिकी साम्राज्यवाद ने वहां के तेल संसाधनों पर कब्जा करने के लिए सैन्य कार्रवाई कर वहां के राष्ट्रपति मादुरो तथा उनकी पत्नी को गिरफ्तार कर अमेरिका के जेल में बंद कर दिया, वह सरासर अमेरिका की दादागिरी एवं गुंडागर्दी है। इसी प्रकार अमेरिका और ईरान के बीच ओमान की मध्यस्थता में जारी वार्ता जब एक समाधान के करीब पहुंच गयी थी, तब 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर एकतरफा हमला कर दिया। उन दोनों आक्रमणकारी मुल्कों ने न सिर्फ ईरान के सैन्य ठिकानों पर हमला किया,बल्कि उसने नागरिक आबादी, स्कूल एवं अस्पताल को भी नहीं छोड़ा। इस हमले में ईरान के एक स्कूल की 160 से अधिक छात्राएं मारी गईं। साम्राज्यवादी अमेरिका और जियोनवादी इजरायल द्वारा ईरान पर थोपे गये इस अन्यायपूर्ण युद्ध के खिलाफ आत्म रक्षा में ईरान ने भी बहादुरी से मुकाबला किया और खाड़ी के देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डों तथा इजरायली सैन्य ठिकानों को अपना निशाना बनाया। इसके लिए वक्ताओं ने ईरान की बहादुर जनता को सलाम पेश किया।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के दौर में साम्राज्यवादी अमेरिका ने दर्जनों देशों में खूनी हस्तक्षेप किया है और वहां की चुनी हुई सरकार को अपदस्थ करके अपनी पिट्ठू कठपुतली सरकार बनाया है। आज भी चिली , वियतनाम, अफगानिस्तान, इराक , लीबिया, सीरिया, वेनेजुएला तथा ईरान सहित दर्जनों देशों की जनता ने साम्राज्यवादी हस्तक्षेप तथा युद्ध की विभीषिका को झेला है।

कन्वेंशन में एक प्रस्ताव पारित किया गया जो इस प्रकार है :

यह कन्वेंशन साम्राज्यवादी अमेरिका और उसके पिट्ठू इजराइल द्वारा ईरान पर 28 फरवरी, 2026 से शुरू किये गये सैनिक हमले और इसी क्रम में इजराइल द्वारा लेबनान पर किये गये हमले की कड़ी निन्दा करता है। अमेरिका-इजराइल ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्य युद्ध नियमों को ही केवल नहीं तोड़ा है, बल्कि सभी मानवीय सरोकारों को भी नजरअंदाज करते हुए नैतिक पतन के निचले स्तर पर गिर गया है। अमेरिका ने लड़कियों के एक स्कूल पर बमबारी की, जिसमें 168 से ज्यादा छात्राएँ और 14 शिक्षक मारे गए। नागरिक ठिकानों विशेषकर अस्पतालों और उच्च शिक्षा संस्थानों को निशाना बनाया गया और प्रख्यात वैज्ञानिकों सहित आम शहरी आबादी को मारा गया। उन्होंने ईरान में प्राचीन ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों को भी नहीं बख्शा। अमेरिका-इजराइल ने ईरान के सर्वोच्च नेता सैयद अयातुल्ला अली खामेनेई और ईरान की सुरक्षा परिषद के सचिव अली लरजानी को निशाना बनाया और उनकी हत्या कर दी। परंतु ईरानियों के दृढ़ प्रतिरोध ने हमलावर साम्राज्यवादी अमेरिका को पीछे धकेला और युद्ध विराम मांगने के लिये मजबूर किया।

वैसे तो उत्पीड़ित देशों के संसाधन, बाजार और श्रमशक्ति पर नियंत्रण व उसके दोहन की होड़ में युद्ध साम्राज्यवाद की आम प्रवृत्ति है। काॅ. लेनिन ने स्पष्ट कहा था कि ”साम्राज्यवाद का अर्थ युद्ध है”। अमेरिकी साम्राज्यवाद ने इसे नये आयाम तक पहुंचा दिया है। ईरान पर यह वर्तमान आक्रमण अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा उत्पीड़ित पिछड़े राष्ट्रों पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से किये गये कई युद्धों के सिलसिले की एक और कड़ी है। सामाजिक साम्राज्यवादी सोवियत संघ के विघटन के बाद कुछ दशकों तक अमेरिकी साम्राज्यवाद के वर्चस्व के अधीन एक ध्रुवीय दुनिया का दौर चला, परंतु अब अन्य साम्राज्यवादी देश विशेषकर चीन व रूस कम-से-कम आर्थिक क्षेत्र में उसे चुनौती दे रहे हैं और दुनिया में बहु ध्रुवीयता बढ़ रही है। विश्व में साम्राज्यवादी लूट व नव-औपनिवेशिक शोषण पर अपने एकछत्र वर्चस्व को पुनःस्थापित करने के लिये अमेरिकी साम्राज्यवाद पुरजोर कोशिश कर रहा है जिसका परिणाम उत्पीड़ित राष्ट्रों के खिलाफ युद्धों में दिखता है। हालांकि जहां भारत की भाजपानीत केन्द्र सरकार जैसी सरकार हो, जो साम्राज्यवाद के समक्ष घुटने टेकने को तत्पर हो, वहां बिना युद्ध के ही काम हो जाता है।

अमेरिकी सेना ने अपने देश की सीमाओं की रक्षा के लिये कोई युद्ध नहीं लड़ा है और ना ही उसे अपने पड़ोसियों से कोई खतरा है। फिर भी उसका वार्षिक सैनिक बजट 830 बिलियन डाॅलर है जो चीन, रूस, ब्रिटेन, जर्मनी व फ्रांस पांचों देशों के कुल सैनिक बजट से अधिक है। उसकी सेना के दूसरे देशों में 700 से अधिक सैनिक अड्डे हैं। मध्य पूर्व में ही विभिन्न अरब देशों में ईरान की घेराबंदी करते हुए थल सेना, वायु सेना व नौसेना के कई अड्डे लम्बे समय से हैं जिनमें 50,000 से अधिक अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। खनिज तेल के स्रोतों पर नियंत्रण की होड़ में इराक, लीबिया, जैसे कई देशों पर युद्ध थोपकर सत्ता पलटने का इसका इतिहास है। हाल की वेनेजुएला की घटनाएं सबने देखी हैं जहां विमानों से अपने सैनिक भेजकर अमेरिका ने वहां के राष्ट्रपति मादुरो व उनकी पत्नी का अपहरण किया और अमेरिका में उन्हें जेल में रखकर मुकदमा चलाया जा रहा है। वेनेजुएला का विशाल तेल भंडार अब अमेरिका के नियंत्रण में है।

यह कन्वेंशन मानता है कि विश्व शांति के लिए आज सबसे बडा खतरा अमेरिकी साम्राज्यवाद है। यह कन्वेंशन भारत सरकार से मांग करता है कि वह अमेरिका-इजराइल द्वारा भारत के पारम्परिक मित्र ईरान पर किये गये इस आक्रमण का विरोध करे। यह कन्वेंशन देश की जनता से आह्वान करता है कि ईरान के विरुद्ध किये जा रहे युद्ध का विरोध करने के साथ-साथ भारत सरकार से मांग करे कि वह अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा भारत पर थोपी जा रही सभी असमान शोषणकारी व्यापारिक संधियों को अस्वीकार करे।

कन्वेंशन ने हाल में नोएडा में मजदूरों के शांतिपूर्ण ढंग से चल रहे आन्दोलन पर पुलिस द्वारा षड्यंत्रकारी तरीके से हिंसा भड़काने तथा असंवैधानिक और गैर कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल करते हुए बिगुल मजदूर दस्ता के कार्यकर्ताओं रूपेश, आदित्य आनन्द, मनीषा, आकृति, सृष्टि और हिमांशु की गिरफ्तारी की निन्दा की। साथ ही प्रख्यात पत्रकार और बुद्धिजीवी सत्यम वर्मा को लखनऊ से गिरफ्तार कर लिया गया। इसके अतिरिक्त गुरुग्राम में भी मजदूर आंदोलन में शामिल इंकलाबी मजदूर केन्द्र के छः कार्यकर्ताओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर उनपर संगीन धाराएं लगाई हैं। पूरे प्रकरण में पुलिस योगी-मोदी के फासीवादी एजेंडे के तहत काम कर रही है। यह कन्वेंशन ऐसे दमन एवं गिरफ्तारी की तीव्र भर्त्सना करता है। हम सभी जनपक्षधर राजनीतिक कार्यकर्ताओं की अविलम्ब बिना शर्त रिहाई की मांग करते हैं।

जारीकर्ता : नन्द किशोर सिंह, रामवृक्ष राम, पुकार

23/04/2026

विश्व सर्वहारा के महान नेता कॉमरेड लेनिन के जन्मदिन के अवसर पर पर आयोजित 'साम्राज्यवाद विरोधी कन्वेंशन' में अपनी बातें रखते हुए कॉमरेड नरेन्द्र कुमार

23/04/2026
प्रेस विज्ञप्ति (21 अप्रैल 2026)- प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, न्यू दिल्लीमज़दूर अधिकारों की मांग कोई “पाकिस्तान से जुड़ी” साज़...
23/04/2026

प्रेस विज्ञप्ति (21 अप्रैल 2026)- प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, न्यू दिल्ली
मज़दूर अधिकारों की मांग कोई “पाकिस्तान से जुड़ी” साज़िश नहीं है -मानेसर (हरियाणा) और नोएडा (उत्तर प्रदेश) में गिरफ्तार मज़दूरों और यूनियन कार्यकर्ताओ को रिहा करो

मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (MASA), जो विभिन्न मजदूर संघठनों और ट्रेड यूनियनों का एक संयुक्त मंच है, ने मंगलवार, 21 अप्रैल को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। इस कार्यक्रम को सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एडवोकेट प्रशांत भूषण और विभिन्न मज़दूर संगठनों के नेताओं ने संबोधित किया। इस समय दिल्ली-एनसीआर और देश के अन्य कई राज्यों में हजारों मज़दूर हड़ताल और विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इस आंदोलन के पीछे मुख्य कारण है आसमान छूती महंगाई और स्थिर वेतन, जिसने मज़दूरों को भुखमरी के कगार पर पहुँचा दिया है। यह संकट इज़राइल-अमेरिका द्वारा ईरान पर हमले के कारण उत्पन्न एलपीजी की कमी से और गहरा गया है, जिससे मज़दूरों की भूख और बदहाली बढ़ी है। परिणामस्वरूप, गुड़गांव-मानेसर, नोएडा, फरीदाबाद, भिवाड़ी, पानीपत और रुद्रपुर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में लाखों मज़दूर न्यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं।

वक्ताओं ने बताया कि खासकर हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने दमन का क्रूर अभियान छेड़ दिया है। कॉरपोरेट नियंत्रित मीडिया सरकार की आवाज़ बनकर “पाकिस्तानी लिंक” और “बाहरी उकसावे” जैसे बेबुनियाद आरोप लगाकर अपने अधिकार मांग रहे मज़दूरों को “दंगाई” करार दे रहा है, नोएडा के एसी स्टूडियो में बैठे गोदी मीडिया के एंकर, मज़दूर कार्यकर्ताओं के खिलाफ टूलकिट चला रहे हैं |जबकि पुलिस बेरहमी से लाठीचार्ज कर रही है और निर्दोष लोगों को जेलों में ठूंस रही है।

अप्रैल के पहले सप्ताह में हरियाणा के आईएमटी मानेसर स्थित होंडा मोटरसाइकिल एंड स्कूटर इंडिया प्लांट के ठेका मज़दूर हड़ताल पर चले गए। उनकी मांगें थीं बेहतर वेतन, 8 घंटे का कार्यदिवस, डबल ओवरटाइम और सम्मानजनक कार्य स्थितियाँ, खासकर 1 अप्रैल 2026 से श्रम संहिताओं के लागू होने के बाद। इससे पूरे क्षेत्र में हड़ताल की लहर शुरू हो गई, जिसमें हजारों मज़दूर शामिल हो गए, जिनमें रिचा ग्लोबल, मोडलेमा गारमेंट्स जैसे परिधान निर्माता और सत्यम ऑटो, मुंजाल शोवा जैसे ऑटो पार्ट्स निर्माता शामिल हैं। 7 अप्रैल को हरियाणा सरकार ने धारा 163 लागू की और 8 अप्रैल को “अकुशल” श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन ₹11,274 से बढ़ाकर ₹15,220 करने की घोषणा की। हालांकि यह 35% वृद्धि एक दशक से अधिक समय (अक्टूबर 2015 के बाद) के बाद की गई, जो पुराने न्यूनतम वेतन अधिनियम और नए वेज कोड 2020 दोनों का उल्लंघन है। यह वृद्धि जीवन-यापन की लागत में हुई वृद्धि के मुकाबले बहुत कम है, इसलिए हड़ताल जारी रही।
9 अप्रैल को प्रबंधन ने सिविल कपड़ों में बाउंसर भेजकर हिंसा भड़काने की कोशिश की, जिसे मज़दूर नेताओं की गिरफ्तारी का बहाना बनाया गया। 12 अप्रैल की आधी रात को छह नेताओं को गिरफ्तार किया गया, जिनमें इंकलाबी मज़दूर केंद्र के कॉमरेड श्यामबीर, हरीश और राजू; बेलसोनिका कर्मचारी यूनियन के कॉमरेड अजीत और पिंटू; तथा मुंजाल शोवा के मज़दूर आकाश शामिल हैं। हरियाणा पुलिस ने मीडिया में दावा किया कि ये नेता व्हाट्सऐप ग्रुप के जरिए मज़दूरों को पेट्रोल बम बनाना और इस्तेमाल करना सिखा रहे थे, जबकि वे घटनास्थल पर मौजूद भी नहीं थे। इसके अलावा मानेसर से 56 मज़दूरों (जिनमें 20 महिलाएँ शामिल हैं) को गिरफ्तार कर भोंडसी जेल भेज दिया गया। सभी को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया है।

मानेसर की घटना के बाद उत्तर प्रदेश के नोएडा में भी हड़तालें शुरू हुईं। हरियाणा में वेतन वृद्धि की घोषणा से प्रेरित होकर यहाँ भी मज़दूर हड़ताल पर गए, जिसके बाद कागज़ों पर 21% वेतन वृद्धि घोषित की गई। लेकिन यहाँ भी वही दमन दोहराया गया। शांतिपूर्ण हड़तालों को हिंसा और दमन के जरिए कुचल दिया गया। मज़दूर बिगुल के कार्यकर्ताओं—रुपेश, आकृति, सृष्टि, मनीषा,सत्यम वर्मा और आदित्य आनंद—सहित 13 अप्रैल के बाद नोएडा, लखनऊ और वाराणसी में हजार से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया। |कई मज़दूरों को बेहतर वेतन का झांसा देकर बुलाया गया और फिर पुलिस को सौंप दिया गया। “नारी शक्ति” के दावों के विपरीत, वीडियो में पुलिस द्वारा निहत्थी महिला मज़दूरों पर लाठीचार्ज करते हुए देखा गया है। उत्तर प्रदेश सरकार मज़दूरों की मांगों को हल करने के बजाय “नक्सल” और “पाकिस्तान लिंक” की साज़िश की जांच कर रही है, जबकि परिवारजन अपने प्रियजनों की जानकारी के लिए इंतजार कर रहे हैं। हड़तालों में भाग लेने के कारण महिला मज़दूरों को विशेष उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है।
1 अप्रैल से लागू चारों नए श्रम कानूनों ने मज़दूरों के संगठन के अधिकार पर सीधा हमला किया है और शोषण को बढ़ावा दिया है। ये कानून मज़दूर वर्ग के हितों के खिलाफ हैं। हम इनके तत्काल निरस्तीकरण की मांग करते हैं और चल रहे संघर्ष के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त करते हैं।तमाम मजदूर, मजदूरों के संगठन, ट्रेड यूनियनें इस दमन का मिलकर जबाव दें। आज अकेले अकेले लड़ने का समय नहीं है। मज़दूर आन्दोलन पर सरकार व पुलिस द्वारा किए जा रहे दमन पर चुप्पी साधकर बैठने वाले, सरकार और मालिकों की गोद में बैठे हुए नकली मजदूर हितैषियों को अलग थलग किया जाए। आगामी एक मई अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस पर मिलकर मजदूर वर्ग की वर्गीय एकजुटता के तौर पर जबाव देने का आह्वान किया जाए।‌
मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान की मांगें:
1. सभी गिरफ्तार मज़दूरों और श्रमिक नेताओं की तुरंत और बिना शर्त रिहा किया जाए 2. सभी झूठे और गंभीर आपराधिक मामलों को तुरंत वापस लिया जाए।
चारों मजदूर विरोधी श्रम कानूनों को रद्द किया जाए। 3. स्थायी काम के लिए स्थायी रोजगार सुनिश्चित किया जाए और ठेका प्रणाली को पूरी तरह समाप्त किया जाए। 4. 8 घंटे के कार्यदिवस के लिए न्यूनतम वेतन ₹30,000 प्रति माह किया जाए। 5. महिला मज़दूरों को रात की शिफ्ट में काम करने के लिए बाध्य करने वाले कानूनों को समाप्त किया जाए। 6। मज़दूरों और महिला श्रमिकों पर लाठीचार्ज करने वाले अधिकारियों और पुलिसकर्मियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।

मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (MASA)

दिल्ली : मासा की द्वारा प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंसमज़दूर अधिकारों की मांग कोई “पाकिस्तान से जुड़ी” साज़िश नह...
22/04/2026

दिल्ली : मासा की द्वारा प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस

मज़दूर अधिकारों की मांग कोई “पाकिस्तान से जुड़ी” साज़िश नहीं है -मानेसर (हरियाणा) और नोएडा (उत्तर प्रदेश) में गिरफ्तार मज़दूरों और यूनियन कार्यकर्ताओ को रिहा करो!

"सरकार को यह समझना होगा की एक तरफ लेबर कोड से कानूनी अधिकार छीन लेंगे और मज़दूरों को दबाएंगे, शांतिपूर्ण प्रतिरोध का दामन करेंगे तो वह दिन दूर नहीं जब मज़दूरों को लगेगा कि पानी सर से ऊपर चला गया तब बड़े विस्फोट से रोका नहीं जा सकता।"
-सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री प्रशांत भूषण

विभिन्न मजदूर संगठनों और ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (MASA), द्वारा मंगलवार, 21 अप्रैल को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में की। इस कार्यक्रम को सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एडवोकेट प्रशांत भूषण और विभिन्न मज़दूर संगठनों के नेताओं ने संबोधित किया।

वक्ताओं ने कहा कि हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने दमन का क्रूर अभियान छेड़ दिया है। कॉरपोरेट नियंत्रित मीडिया सरकार की आवाज़ बनकर “पाकिस्तानी लिंक” और “बाहरी उकसावे” जैसे बेबुनियाद आरोप लगाकर अपने अधिकार मांग रहे मज़दूरों को “दंगाई” करार दे रहा है, नोएडा के एसी स्टूडियो में बैठे गोदी मीडिया के एंकर, मज़दूर कार्यकर्ताओं के खिलाफ टूलकिट चला रहे हैं। जबकि पुलिस बेरहमी से लाठीचार्ज कर रही है और निर्दोष लोगों को जेलों में ठूंस रही है।

इस समय दिल्ली-एनसीआर और देश के अन्य कई राज्यों में हजारों मज़दूर हड़ताल और विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इस आंदोलन के पीछे मुख्य कारण है आसमान छूती महंगाई और स्थिर वेतन, जिसने मज़दूरों को भुखमरी के कगार पर पहुँचा दिया है। यह संकट इज़राइल-अमेरिका द्वारा ईरान पर हमले के कारण उत्पन्न एलपीजी की कमी से और गहरा गया है, जिससे मज़दूरों की भूख और बदहाली बढ़ी है। परिणामस्वरूप, गुड़गांव-मानेसर, नोएडा, फरीदाबाद, भिवाड़ी, पानीपत और रुद्रपुर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में लाखों मज़दूर न्यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं।

वक्ताओं ने बताया कि अप्रैल के पहले सप्ताह में हरियाणा के आईएमटी मानेसर स्थित होंडा मोटरसाइकिल एंड स्कूटर इंडिया प्लांट के ठेका मज़दूर हड़ताल पर चले गए। उनकी मांगें थीं बेहतर वेतन, 8 घंटे का कार्यदिवस, डबल ओवरटाइम और सम्मानजनक कार्य स्थितियाँ, खासकर 1 अप्रैल 2026 से श्रम संहिताओं के लागू होने के बाद। इससे पूरे क्षेत्र में हड़ताल की लहर शुरू हो गई, जिसमें हजारों मज़दूर शामिल हो गए, जिनमें रिचा ग्लोबल, मोडलेमा गारमेंट्स जैसे परिधान निर्माता और सत्यम ऑटो, मुंजाल शोवा जैसे ऑटो पार्ट्स निर्माता शामिल हैं। 7 अप्रैल को हरियाणा सरकार ने धारा 163 लागू की और 8 अप्रैल को “अकुशल” श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन ₹11,274 से बढ़ाकर ₹15,220 करने की घोषणा की।

हालांकि यह 35% वृद्धि एक दशक से अधिक समय (अक्टूबर 2015 के बाद) के बाद की गई, जो पुराने न्यूनतम वेतन अधिनियम और नए वेज कोड 2020 दोनों का उल्लंघन है। यह वृद्धि जीवन-यापन की लागत में हुई वृद्धि के मुकाबले बहुत कम है, इसलिए हड़ताल जारी रही।

वक्ताओं ने कहा कि 9 अप्रैल को प्रबंधन ने सिविल कपड़ों में बाउंसर भेजकर हिंसा भड़काने की कोशिश की, जिसे मज़दूर नेताओं की गिरफ्तारी का बहाना बनाया गया। 12 अप्रैल की आधी रात को छह नेताओं को गिरफ्तार किया गया, जिनमें इंकलाबी मज़दूर केंद्र के कॉमरेड श्यामबीर, हरीश और राजू; बेलसोनिका कर्मचारी यूनियन के कॉमरेड अजीत और पिंटू; तथा मुंजाल शोवा के मज़दूर आकाश शामिल हैं। हरियाणा पुलिस ने मीडिया में दावा किया कि ये नेता व्हाट्सऐप ग्रुप के जरिए मज़दूरों को पेट्रोल बम बनाना और इस्तेमाल करना सिखा रहे थे, जबकि वे घटनास्थल पर मौजूद भी नहीं थे।

इसके अलावा मानेसर से 56 मज़दूरों (जिनमें 20 महिलाएँ शामिल हैं) को गिरफ्तार कर भोंडसी जेल भेज दिया गया। सभी को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया है।

मानेसर की घटना के बाद उत्तर प्रदेश के नोएडा में भी हड़तालें शुरू हुईं। हरियाणा में वेतन वृद्धि की घोषणा से प्रेरित होकर यहाँ भी मज़दूर हड़ताल पर गए, जिसके बाद कागज़ों पर 21% वेतन वृद्धि घोषित की गई। लेकिन यहाँ भी वही दमन दोहराया गया। शांतिपूर्ण हड़तालों को हिंसा और दमन के जरिए कुचल दिया गया। मज़दूर बिगुल के कार्यकर्ताओं—रुपेश, आकृति, सृष्टि, मनीषा, सत्यम वर्मा और आदित्य आनंद— सहित 13 अप्रैल के बाद नोएडा, लखनऊ और वाराणसी में हजार से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया। कई मज़दूरों को बेहतर वेतन का झांसा देकर बुलाया गया और फिर पुलिस को सौंप दिया गया।

“नारी शक्ति” के दावों के विपरीत, वीडियो में पुलिस द्वारा निहत्थी महिला मज़दूरों पर लाठीचार्ज करते हुए देखा गया है। उत्तर प्रदेश सरकार मज़दूरों की मांगों को हल करने के बजाय “नक्सल” और “पाकिस्तान लिंक” की साज़िश की जांच कर रही है, जबकि परिवारजन अपने प्रियजनों की जानकारी के लिए इंतजार कर रहे हैं। हड़तालों में भाग लेने के कारण महिला मज़दूरों को विशेष उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है।

वक्ताओं ने कहा कि 1 अप्रैल से लागू चारों नए श्रम कानूनों ने मज़दूरों के संगठन के अधिकार पर सीधा हमला किया है और शोषण को बढ़ावा दिया है। ये कानून मज़दूर वर्ग के हितों के खिलाफ हैं। हम इनके तत्काल निरस्तीकरण की मांग करते हैं और चल रहे संघर्ष के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त करते हैं। तमाम मजदूर, मजदूरों के संगठन, ट्रेड यूनियनें इस दमन का मिलकर जबाव दें।

आज अकेले अकेले लड़ने का समय नहीं है। मज़दूर आन्दोलन पर सरकार व पुलिस द्वारा किए जा रहे दमन पर चुप्पी साधकर बैठने वाले, सरकार और मालिकों की गोद में बैठे हुए नकली मजदूर हितैषियों को अलग थलग किया जाए। आगामी एक मई अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस पर मिलकर मजदूर वर्ग की वर्गीय एकजुटता के तौर पर जबाव देने का आह्वान किया जाए।‌

मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान की मांगें:

1. सभी गिरफ्तार मज़दूरों और श्रमिक नेताओं की तुरंत और बिना शर्त रिहा किया जाए
2. सभी झूठे और गंभीर आपराधिक मामलों को तुरंत वापस लिया जाए।
3. चारों मजदूर विरोधी श्रम कानूनों को रद्द किया जाए।
4. स्थायी काम के लिए स्थायी रोजगार सुनिश्चित किया जाए और ठेका प्रणाली को पूरी तरह समाप्त किया जाए।
5. 8 घंटे के कार्यदिवस के लिए न्यूनतम वेतन ₹30,000 प्रति माह किया जाए।
6. महिला मज़दूरों को रात की शिफ्ट में काम करने के लिए बाध्य करने वाले कानूनों को समाप्त किया जाए।
7. मज़दूरों और महिला श्रमिकों पर लाठीचार्ज करने वाले अधिकारियों और पुलिसकर्मियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।

20/04/2026
प्रेस आमंत्रण (Press Invitation)प्रेस कॉन्फ्रेंसविषय: मज़दूर आंदोलनों और मज़दूर कार्यकर्ताओं पर हो रहे दमन के खिलाफतारीख...
20/04/2026

प्रेस आमंत्रण (Press Invitation)
प्रेस कॉन्फ्रेंस
विषय: मज़दूर आंदोलनों और मज़दूर कार्यकर्ताओं पर हो रहे दमन के खिलाफ
तारीख: 21 अप्रैल 2026, 🕒 समय: दोपहर 3 बजे,
📍 स्थान: प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, 1 रायसीना रोड, केन्द्रीय सचिवालय मेट्रो के पास, नई दिल्ली
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मीडिया साथियों,
मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) की ओर से आप सभी उपरोक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में सादर आमंत्रित हैं।

हाल के दिनों में देश भर में मज़दूर आंदोलनों और मज़दूर कार्यकर्ताओं पर दमन की घटनाओं में चिंताजनक वृद्धि हुई है। प्रशासन ने न केवल अनेक मज़दूरों और मज़दूर कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया है, बल्कि उन पर हिंसा भड़काने के गंभीर आरोप भी लगाए हैं।

इंकलाबी मज़दूर केंद्र के कार्यकर्ताओं श्यामबीर, हरीश और राजू, बेलसोनिका के अजीत और पिंटू यादव तथा मुंजाल शोवा के मज़दूर आकाश को साजिशकर्ता बताकर गिरफ्तार किया गया है और इन घटनाओं की जिम्मेदारी मज़दूरों पर थोपी जा रही है — जो पूरी तरह अन्यायपूर्ण है, और इन सभी मामलों की निष्पक्ष न्यायिक जांच होनी चाहिए | कई मज़दूरों और बुद्धिजीवियों का अभी भी कोई अता-पता नहीं है।

इसके अलावा, नोएडा में बिगुल मज़दूर दस्ता के कार्यकर्ताओं पर की जा रही कार्रवाई, विभिन्न राज्यों में ट्रेड यूनियन नेताओं, लेखकों और पत्रकारों पर बढ़ता दबाव, सीटू नेताओं जयभगवान और विनोद को फेसबुक पर कथित भड़काऊ भाषण के आरोप में नोटिस जारी करना, तथा ट्रेड यूनियन प्रतिनिधियों और जनप्रतिनिधियों को मज़दूर परिवारों से मिलने से रोकना — ये सभी घटनाएं लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा हमला हैं और गंभीर चिंता का विषय हैं।

इन्हीं सवालों पर हम यह प्रेस कान्फ्रन्स आयोजित कर रहे है जिसमे कार्यकर्ता, वकील, बुद्धिजीवी भाग लेंगे|

सभी विवेकशील और जन-सरोकारी मीडियाकर्मियों से आग्रह है कि वे इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में अवश्य पधारें, ताकि दमन का पूरा सच देश के सामने आ सके।
सधन्यवाद,

मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा)
Contact: Email: [email protected]

19/04/2026

आंदोलित मजदूरों की मांगों को पूरा करने तथा गिरफ्तार राजनीतिक कार्यकर्ताओं व मजदूरों को रिहा करने के लिए गुड़गांव के लघु सचिवालय में ज्ञापन देने के लिए जाते हुए 'मासा' के साथीगण

19/04/2026

गुड़गांव के लघु सचिवालय के पास आंदोलित मजदूरों की मांगों को पूरा करने तथा गिरफ्तार राजनीतिक कार्यकर्ताओं व मजदूरों को रिहा करने के लिए नारा लगाते हुए 'मासा' के साथीगण

इस विरोध प्रदर्शन में हमारा मजदूर संगठन बिहार निर्माण व असंगठित श्रमिक यूनियन तथा छात्र संगठन भगत सिंह स्टूडेंट & यूथ फ्...
19/04/2026

इस विरोध प्रदर्शन में हमारा मजदूर संगठन बिहार निर्माण व असंगठित श्रमिक यूनियन तथा छात्र संगठन भगत सिंह स्टूडेंट & यूथ फ्रंट के साथियों ने भी भागीदारी की।

प्रेस विज्ञप्ति
दिनांक: 19 अप्रैल 2026
स्थान: लघु सचिवालय, गुड़गांव (हरियाणा)
मज़दूर आंदोलन पर दमन के खिलाफ गुड़गांव में विरोध-प्रदर्शन आयोजित!
आज, 19 अप्रैल 2026 को लघु सचिवालय, गुड़गांव में मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) के आह्वान पर देशभर में जारी मज़दूर आंदोलनों और उन पर हो रहे पुलिसिया दमन के खिलाफ एक विरोध-प्रदर्शन आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में विभिन्न मज़दूर संगठनों, ट्रेड यूनियनों, छात्र-युवा संगठनों और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।
प्रदर्शनकारियों ने गुड़गांव–मानेसर, नोएडा तथा देश के अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में शांतिपूर्ण संघर्ष कर रहे मज़दूरों पर हो रहे बर्बर दमन की कड़ी निंदा की। वक्ताओं ने विशेष रूप से गुड़गांव–मानेसर में मॉडेलमा और रिचा ग्लोबल के 56 से अधिक मज़दूरों — जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं — और साथ ही नोएडा से ३५० मज़दूरों और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और उन पर हत्या के प्रयास, आगजनी व दंगे जैसी गंभीर धाराएं लगाने को अन्यायपूर्ण बताया। इसके साथ ही
प्रदर्शन के दौरान मानेसर व नोएडा में गिरफ्तार पुरुष व महिला मज़दूरों तथा इंकलाबी मज़दूर केंद्र और बिगुल मज़दूर संगठन के कार्यकर्ताओं की तत्काल रिहाई और उन पर लगाए गए फर्जी मुकदमों को रद्द करने की जोरदार मांग की गई।
सभा को संबोधित करते हुए इंकलाबी मजदूर केंद्र के मुन्ना प्रसाद ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई मजदूर-विरोधी श्रम संहिताओं के दुष्परिणाम अब स्पष्ट रूप से सामने आ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इन नीतियों के चलते मालिकान द्वारा मजदूरों से 12–12 घंटे काम कराया जा रहा है, जिसके खिलाफ मजदूरों का आक्रोश स्वतःस्फूर्त रूप से विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में उभर रहा है। उन्होंने हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकारों द्वारा इस आंदोलन के दमन की कड़ी आलोचना की।
बेलसोनिका से मोहिंदर ने कहा कि हाल में किए गए आपराधिक कानूनों में संशोधनों का इस्तेमाल मजदूर आंदोलनों को दबाने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि हड़ताल जैसे बुनियादी अधिकारों को सीमित किया जा रहा है और आंदोलन में शामिल मजदूरों को जेल में रखा जा रहा है, जबकि उनके परिवारों को उनसे मिलने तक नहीं दिया जा रहा।
CSTU से सौरभ ने बढ़ती महंगाई के बीच मजदूरों की आर्थिक स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि जब मजदूर ₹30,000 न्यूनतम वेतन की मांग कर रहे हैं, तो सरकार को इसे स्वीकार करने में हिचक नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मजदूरों की मेहनत से भारी मुनाफा कमाने वाले पूंजीपतियों के पक्ष में सरकार खड़ी दिखाई दे रही है। जन संघर्ष मंच, हरियाणा से सोमनाथ ने मांग रखी कि मजदूरों पर दमन तुरंत बंद किया जाए, सभी गिरफ्तार मजदूरों को रिहा किया जाए, न्यूनतम मजदूरी ₹30,000 की जाए और श्रम संहिताओं को रद्द किया जाए।
प्रदर्शन में यह भी उठाया गया कि इंकलाबी मज़दूर केंद्र के कार्यकर्ताओं श्यामबीर, हरीश और राजू, बेलसोनिका के अजीत और पिंटू यादव तथा मुंजाल शोवा के मज़दूर आकाश को साजिशकर्ता बताकर गिरफ्तार करना एक सुनियोजित कार्रवाई है। वक्ताओं ने कहा कि इन घटनाओं की जिम्मेदारी मज़दूरों पर थोपना गलत है और इसकी निष्पक्ष न्यायिक जांच होनी चाहिए।
नोएडा में बिगुल मज़दूर के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की भी कड़ी आलोचना की गई। इसके अलावा, विभिन्न राज्यों में ट्रेड यूनियन नेताओं, लेखकों और पत्रकारों पर की जा रही कार्रवाई को लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बताया गया। सीटू नेताओं जयभगवान व विनोद को फेसबुक पर भड़काऊ भाषण का आरोप लगाकर नोटिस जारी करना, CITU और cpm के सांसदों को मजदूर परिवारों से मिलें से रोकना, फिरोजाबाद में सीटू के नेता भूरी सिंह यादव को जेल भेज दिया गया, नोएडा में गंगेश्वर दत्त शर्मा और अन्य नेताओं को लंबे समय से नजरबंद रखा गया है, किसान नेता व एडवोकेट रुपेश वर्मा पर पुलिस निगरानी जारी है, और देश भर से ट्रेड यूनियन नेताओं की धर-पकड़ व नजरबंदी की घटनाएं सामने आ रही हैं। यह पूरी स्थिति लोकतंत्र और कानून के शासन के विरुद्ध है तथा संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन है।
वक्ताओं ने कहा कि “बाहरी तत्वों” का आरोप लगाकर मज़दूर आंदोलन को बदनाम करने और उसे तोड़ने की कोशिश की जा रही है, जबकि यह आंदोलन मज़दूरों की बुनियादी मांगों — 8 घंटे का कार्यदिवस, ओवरटाइम का उचित भुगतान, साप्ताहिक अवकाश, सुरक्षित कार्य परिस्थितियां और ₹30,000 न्यूनतम वेतन — को लेकर चल रहा है।
प्रदर्शन में यह भी रेखांकित किया गया कि पिछले कुछ महीनों में उत्तर भारत के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में ठेका मज़दूरों के आंदोलन ने एक नई ऊर्जा और एकजुटता दिखाई है। इसके बावजूद सरकारों द्वारा 350 से अधिक मज़दूरों की गिरफ्तारी और आंदोलन को साजिश करार देना बेहद चिंताजनक है।
मासा और अन्य संगठनों की प्रमुख मांगें:
• सभी गिरफ्तार मज़दूरों और कार्यकर्ताओं की तत्काल और बिना शर्त रिहाई
• फर्जी मुकदमों की वापसी
• मज़दूर आंदोलनों पर पुलिसिया दमन पर रोक
• 9 और 13–14 अप्रैल की घटनाओं की निष्पक्ष न्यायिक जांच
• हड़ताल और यूनियन बनाने के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा
सभा को मजदूर संघर्ष संगठन से सूरज, संयुक्त किसान मोर्चा से विमल, श्रमिक संग्राम कमिटी से सुभाष, TUCI से उमाकांत , AIUTUC से श्रवण, एफटीआईआईयू न्यू से पी के शाही, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र से ऋचा, ग्रामीण मजदूर यूनियन से संतोष, निर्माण
कार्य मजदूर मिस्त्री यूनियन से रघुबीर, पछास से राहुल , लोकपक्ष से अन्वीर, बिहार निर्माण व असंगठित श्रमिक यूनियन (BNASU) के अनिरुद्ध और सतीश माहना, आकांक्षा प्रिया,राहुल सिद्धांत, सहित अन्य वक्ताओं ने भी संबोधित किया, जबकि कार्यक्रम का संचालन रंजना और सोमनाथ ने किया और समापन व्यक्तत्व IMK से खीमानंद ने किया !
प्रदर्शन के अंत में यह संकल्प लिया गया कि मज़दूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए यह संघर्ष आगे भी जारी रहेगा और देशभर में व्यापक एकजुटता बनाई जाएगी।

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