21/09/2026
राजपूतों ने हमेशा बलिदान दिया है और अपने गौरवशाली इतिहास पर हमें हमेशा गर्व करना चाहिए। हमारे पूर्वजों ने साहस, स्वाभिमान और नेतृत्व के साथ इतिहास बनाया है—अब हमारी पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि उस विरासत को वर्तमान में भी मजबूत बनाए।
लोकतंत्र आने के बाद व्यवस्था और राजनीतिक समीकरण बदले। सीलिंग एक्ट जैसे कानूनों से जमीनों का स्वरूप बदला और समय के साथ हर राज्य में राजनीतिक परिस्थितियाँ भी बदलती गईं। इसके बावजूद बिहार सहित देश के अनेक राज्यों में राजपूत समाज ने राजनीति और शासन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका बनाए रखी है।
लेकिन अब सवाल यह है कि आने वाले समय में हमारी राजनीतिक हिस्सेदारी कितनी मजबूत होगी और निर्णय लेने की प्रक्रिया में हमारी आवाज कितनी प्रभावी होगी?
हमारे मंत्री, विधायक और सांसद अलग-अलग राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनसे अपेक्षा है कि समाज के सम्मान, अधिकार और हितों से जुड़े विषयों को वे लोकतांत्रिक मंचों पर मजबूती से उठाएँ। साथ ही समाज को भी अपनी राजनीतिक जिम्मेदारी समझनी होगी।
अब राजपूत युवाओं को राजनीति से दूरी बनाकर नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से जागरूक और सक्रिय होकर आगे आना होगा।
हर पंचायत में हमारी भागीदारी हो, हर विधानसभा क्षेत्र में हमारा संगठन मजबूत हो, विधानसभा और संसद में योग्य राजपूत नेतृत्व आगे आए, राजनीतिक दलों में हमारी आवाज प्रभावी हो और नीति-निर्माण की प्रक्रिया में समाज की भागीदारी बढ़े—यही राजनीतिक हिस्सेदारी का वास्तविक लक्ष्य होना चाहिए।
इसके लिए युवाओं को शिक्षा के साथ राजनीति, प्रशासन, कानून, संगठन और जनसेवा के क्षेत्रों में आगे आना होगा। सिर्फ किसी नेता के पीछे चलने से समाज मजबूत नहीं होगा; अपना नेतृत्व तैयार करना होगा।
राजपूत समाज किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने सम्मान, अपने अधिकार और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के लिए संगठित होकर आगे बढ़े।
अब सिर्फ यह पूछना नहीं कि हमारे कितने नेता हैं—अब यह सुनिश्चित करना है कि निर्णय लेने वाली हर लोकतांत्रिक व्यवस्था में हमारी प्रभावी भागीदारी हो।
इतिहास पर गर्व रहेगा, वर्तमान में सक्रिय रहेंगे और भविष्य की राजनीतिक हिस्सेदारी के लिए संगठित होकर आगे बढ़ेंगे।
जय राजपूताना🙏