09/03/2025
"धार्मिक/मजहबी लोग दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में दखलंदाजी करते हैं। किसी को कब भोजन करना है, कब पानी पीना है, क्या खाना है, क्या पहनना है आदि व्यक्तिगत मामले हैं।
धार्मिक/मजहबी लोग खुद धर्मग्रंथों/मजहबी किताबों की बेड़ियों में जकड़े हुए हैं तथा उनसे बेड़ियां टूट नहीं पाती हैं लेकिन जब कोई दूसरा उन बेड़ियों को तोड़ता है तो उनका हौंसला बढ़ाना चाहिए।
धर्मग्रन्थ/मजहबी किताबें कुछ भी नया नहीं करने देते हैं बल्कि पुरातनपंथी सोच को जारी रखने के पक्षधर होते हैं।
अब हमें सभी धर्मग्रंथों/मजहबी किताबों से मुक्ति दिलानी है इसलिए सभी परम्परागत धर्मों(ईसाई, इस्लाम, हिन्दू, बौद्ध, सिक्ख, यहूदी, जैन, पारसी आदि) को खत्म करने के लिए लगातार प्रयासरत रहने की जरूरत है।
जब से विज्ञान ने प्रकृति के विभिन्न रहस्यों से पर्दा उठाया है तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने सभी धार्मिक/मजहबी अंधविश्वासों को नकार दिया है इसलिए परम्परागत धर्मों/मजहबों व इनके धर्मग्रंथों/मजहबी किताबों की अनावश्यकता उजागर हो गई है।अब धर्मग्रंथों/मजहबी की मान्यताओं से बंधे रहने की कोई जरूरत नहीं है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण या कॉमन सेंस (common sense) कहता है कि परिस्थितियों के अनुकूल जीवन जिएँ जबकि धर्मग्रन्थ/मजहबी किताबें कहती हैं कि उनमें लिखी हुई बातों के अनुसार जीवन जिएँ।
वर्तमान समय में स्कूल/कॉलेज की किताबें पर्याप्त हैं तथा वे हमें उत्तरी/दक्षिणी ध्रुव या विषुवत रेखा के आसपास के भौगोलिक वातावरण के अनुसार जीवन जीने व शरीर की आवश्यकतानुसार जीवन जीने के लिए प्रेरित करती हैं।"
किशन सहाय आईपीएस
मो 9460928737