Nandi mahadev sewadar charitable society Pahar ganj new delhi110055

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भोलेनाथ की नगरी भरमौर में लंगर पर ‘टैक्स’! भरमौर 84 परिसर में प्रशासन का फरमान, श्रद्धालुओं में भारी रोषएक दिन के लंगर क...
20/03/2026

भोलेनाथ की नगरी भरमौर में लंगर पर ‘टैक्स’! भरमौर 84 परिसर में प्रशासन का फरमान, श्रद्धालुओं में भारी रोष
एक दिन के लंगर के ₹1000, दो दिन के ₹2500 वसूलेगा प्रशासन
‘स्वच्छता’ के नाम पर आस्था पर चोट, सदियों पुरानी परंपरा पर उठे बड़े सवाल

जब परीक्षित जी को भागवत कथा सुनते सुनते 6 दिन बीत गए तब शुकदेव जी ने देखा कि परीक्षित के मन में अभी भी मृत्यु का भय हैं ...
26/02/2026

जब परीक्षित जी को भागवत कथा सुनते सुनते 6 दिन बीत गए तब शुकदेव जी ने देखा कि परीक्षित के मन में अभी भी मृत्यु का भय हैं फिर उनकी इस दशा को देखते हुए शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को एक कथा सुनाई , कथा के अनुसार एक राजा एक बार जंगल में शिकार करने गए और जंगल में शिकार करते वक्त राजा अपना रास्ता भटक गया। इधर उधर भटकने के बाद उसे एक छोटी सी झोपड़ी नज़र आयी। जब राजा उसके अंदर गया तो उसने देखा वहाँ पर एक बहेलिया रहता है जो कि लम्बे समय से बीमार चल रहा था।
जब राजा झोपड़ी में गया तो उसने देखा कि उस बीमार बहेलिया ने उसी झोपड़ी में एक तरफ शौच करने का स्थान बना रखा था तो खाने पीने के लिए जानवरों का मांस छत से टांग रखा था । उस छोटी सी झोपड़ी में ये सब चीजों कि वजह से वह झोपड़ी दुर्गन्ध से भरी हुई थी। लेकिन राजा के पास कोई दूसरा रास्ता न होने कि वजह से राजा ने उस बहेलिया से उस झोपड़ी में रुकने के लिए निवेदन किया।

इस बात पर बहेलिया बोला कि " मैं हमेशा से भटके हुए राहगीरों को अपनी इस झोपड़ी में पनाह देता हूँ। लेकिन जब दूसरे दिन कि सुबह होती है तो कोई यहाँ से जाना नहीं चाहता और यहीं रुकने कि ज़िद करने लगता है। अब मैं बार बार इस झंझट में नहीं पड़ना चाहता तो मैं आपको अपनी इस झोपड़ी मे रुकने नहीं दे सकता। यह सुनकर राजा थोड़े अचंभित हुए और फिर बोले कि मैं आपको वचन देता हूँ कि मैं ऐसा नहीं करूँगा और सुबह होते ही अपने घर के लिए चला जाऊंगा। तो राजा कि इस बात पर बीमार बहेलिया राजा पर भरोसा कर उसको रुकने के लिए जगह दे देता है। अब राजा रात को वहीं विश्राम करने के लिए लेटता है और उस झोपड़ी की गंध उसके अंदर जा रही थी और सुबह होते होते राजा के अंदर उस गंध का ऐसा नशा चढ़ गया कि वो भी अपना वचन भूल दूसरे लोगों की भाँति वहीं पर रुकने कि बात करने लगा और इस बात को लेकर राजा ने उस बीमार बहेलिया से कलह कर लिया।

फिर शुकदेव राजा परीक्षित से पूछते है कि क्या उस राजा ने यह सही किया तो शुकदेव के इस प्रश्न का जवाब देते हुए राजा परीक्षित ने कहा कि नहीं उसने बिल्कुल गलत किया और वो मूर्ख राजा था जो अपना इतना अच्छा राज पाठ छोड़कर और अपना वचन तोड़ कर उस गन्दी झोपड़ी में रहना चाहता था। क्या आप बता सकते हो कौन था वो राजा ?

तब शुकदेव जी ने कहा कि वह राजा कोई और नहीं स्वयं तुम ही हो राजन। जो कि इस मल मूत्र से भरे झोपड़ी यानी इस शरीर में रहना चाहते हो जब के तुम्हारी आत्मा का इस शरीर में रहने का समय समाप्त हो गया है। तब भी तुम उसके ही शोक में पड़े हुए हो। और फिर शुकदेव जी पूछते है कि क्या अब भी मरने का शोक करना सही है। उसके बाद राजा परीक्षित ने अपने मन से मौत का डर निकलने का फैसला किया और अपने अंतिम समय तक पूरे भक्ति भाव से कथा श्रवण की।
ॐ जय श्री राधे कृष्णा👏🚩
प्रभु जी ध्यान तोड़े 👏🚩
राधे राधे यहीं पार करेगा 👏🚩
राधे राधे 👏🚩

देहरादूनचार धाम यात्रा के रजिस्ट्रेशन नियमों में बदलाव, अब ऑनलाइन आवेदन पर देना होगा शुल्कChar Dham Yatra : उत्तराखंड मे...
17/02/2026

देहरादून
चार धाम यात्रा के रजिस्ट्रेशन नियमों में बदलाव, अब ऑनलाइन आवेदन पर देना होगा शुल्क
Char Dham Yatra : उत्तराखंड में चार धाम यात्रा के ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन पर अब शुल्क लागू करने की तैयारी। फर्जी बुकिंग रोकने के लिए सरकार सख्त, जानिए क्या होंगे नए नियम।
चार धाम यात्रा के रजिस्ट्रेशन नियमों में बदलाव
चार धाम यात्रा के रजिस्ट्रेशन नियमों में बदलाव
Char Dham Yatra : देवभूमि उत्तराखंड में होने वाली पवित्र चार धाम यात्रा को लेकर इस बार प्रशासन सख्त नजर आ रहा है। राज्य सरकार ने ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में बदलाव का फैसला लिया है। अब श्रद्धालुओं को पंजीकरण के दौरान नाममात्र का शुल्क देना पड़ सकता है। सूत्रों के अनुसार, यह कदम मुख्य रूप से फर्जी रजिस्ट्रेशन और स्लॉट ब्लॉक करने की समस्या को रोकने के लिए उठाया जा रहा है। हर साल बड़ी संख्या में ऐसे आवेदन सामने आते हैं, जिनमें यात्री यात्रा पर पहुंचते ही नहीं, जिससे वास्तविक श्रद्धालुओं को परेशानी होती है।

शुल्क तय करेगी कमेटी
गढ़वाल मंडल प्रशासन की ओर से बनाई गई कमेटी इस शुल्क की अंतिम राशि तय करेगी। अधिकारियों का मानना है कि कम से कम 10 रुपये का शुल्क भी फर्जी आवेदनों पर प्रभावी रोक लगा सकता है। कितनी राशी होगी अभी कोई तय नहीं है। कमेटी की रिपोर्ट आने और सरकार से मंजूरी मिलने के बाद फाइनल फीस तय की जाएगी।
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22 अप्रैल को खुलेंगे श्री बाबा केदारनाथ धाम के कपाट Har har Mahadev
16/02/2026

22 अप्रैल को खुलेंगे श्री बाबा केदारनाथ धाम के कपाट
Har har Mahadev

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक प्रमुख तीर्थ है, जो महाराष्ट्र के पुणे ज़िले में सह्याद्र...
16/02/2026

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक प्रमुख तीर्थ है, जो महाराष्ट्र के पुणे ज़िले में सह्याद्रि (पश्चिमी घाट) की पर्वत श्रृंखला में स्थित है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव ने यहाँ भीमासुर का वध किया था, उसी के पश्चात यह स्थल भीमाशंकर कहलाया। यह स्थान भीमा नदी का उद्गम भी माना जाता है, जिससे इसका धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है। घने जंगलों, पर्वतीय वातावरण और शांत प्राकृतिक परिवेश के बीच स्थित यह मंदिर भक्तों को आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है। विशेष रूप से महाशिवरात्रि और श्रावण मास में यहाँ दर्शन का अत्यंत पुण्य फल माना जाता है। 🙏 जय भीमाशंकर महादेव 🔱

16/02/2026

बाबा श्री महाकाल जी की आरती दर्शन
जय श्री महाकाल

बाबा श्री अमरनाथ जी
31/01/2026

बाबा श्री अमरनाथ जी

*लंकाधीश रावण कि मांग*(अद्भुत प्रसंग, भावविभोर करने वाला प्रसंग जरुर प्ढ़े)बाल्मीकि रामायण और तुलसीकृत रामायण में इस कथा ...
31/01/2026

*लंकाधीश रावण कि मांग*

(अद्भुत प्रसंग, भावविभोर करने वाला प्रसंग जरुर प्ढ़े)

बाल्मीकि रामायण और तुलसीकृत रामायण में इस कथा का वर्णन नहीं है, पर तमिल भाषा में लिखी *महर्षि कम्बन की इरामावतारम्'* मे यह कथा है।

रावण केवल शिवभक्त, विद्वान एवं वीर ही नहीं, अति-मानववादी भी था..। उसे भविष्य का पता था..। वह जानता था कि श्रीराम से जीत पाना उसके लिए असंभव है..।

जब श्री राम ने खर-दूषण का सहज ही बध कर दिया तब तुलसी कृत मानस में भी रावण के मन भाव लिखे हैं--

खर दूसन मो सम बलवंता ।
तिनहि को मरहि बिनु भगवंता।।

रावण के पास जामवंत जी को आचार्यत्व का निमंत्रण देने के लिए लंका भेजा गया..।
जामवन्त जी दीर्घाकार थे, वे आकार में कुम्भकर्ण से तनिक ही छोटे थे। लंका में प्रहरी भी हाथ जोड़कर मार्ग दिखा रहे थे। इस प्रकार जामवन्त को किसी से कुछ पूछना नहीं पड़ा। स्वयं रावण को उन्हें राजद्वार पर अभिवादन का उपक्रम करते देख जामवन्त ने मुस्कराते हुए कहा कि मैं अभिनंदन का पात्र नहीं हूँ। मैं वनवासी राम का दूत बनकर आया हूँ। उन्होंने तुम्हें सादर प्रणाम कहा है।

रावण ने सविनय कहा– "आप हमारे पितामह के भाई हैं। इस नाते आप हमारे पूज्य हैं। आप कृपया आसन ग्रहण करें। यदि आप मेरा निवेदन स्वीकार कर लेंगे, तभी संभवतः मैं भी आपका संदेश सावधानी से सुन सकूंगा।"

जामवन्त ने कोई आपत्ति नहीं की। उन्होंने आसन ग्रहण किया। रावण ने भी अपना स्थान ग्रहण किया। तदुपरान्त जामवन्त ने पुनः सुनाया कि वनवासी राम ने सागर-सेतु निर्माण उपरांत अब यथाशीघ्र महेश्व-लिंग-विग्रह की स्थापना करना चाहते हैं। इस अनुष्ठान को सम्पन्न कराने के लिए उन्होंने ब्राह्मण, वेदज्ञ और शैव रावण को आचर्य पद पर वरण करने की इच्छा प्रकट की है।
" मैं उनकी ओर से आपको आमंत्रित करने आया हूँ।"

प्रणाम प्रतिक्रिया, अभिव्यक्ति उपरान्त रावण ने मुस्कान भरे स्वर में पूछ ही लिया

"क्या राम द्वारा महेश्व-लिंग-विग्रह स्थापना लंका-विजय की कामना से किया जा रहा है ?"

"बिल्कुल ठीक। श्रीराम की महेश्वर के चरणों में पूर्ण भक्ति है. I"

जीवन में प्रथम बार किसी ने रावण को ब्राह्मण माना है और आचार्य बनने योग्य जाना है। क्या रावण इतना अधिक मूर्ख कहलाना चाहेगा कि वह भारतवर्ष के प्रथम प्रशंसित महर्षि पुलस्त्य के सगे भाई महर्षि वशिष्ठ के यजमान का आमंत्रण और अपने आराध्य की स्थापना हेतु आचार्य पद अस्वीकार कर दे?

रावण ने अपने आपको संभाल कर कहा –" आप पधारें। यजमान उचित अधिकारी है। उसे अपने दूत को संरक्षण देना आता है। राम से कहिएगा कि मैंने उसका आचार्यत्व स्वीकार किया।"

जामवन्त को विदा करने के तत्काल उपरान्त लंकेश ने सेवकों को आवश्यक सामग्री संग्रह करने हेतु आदेश दिया और स्वयं अशोक वाटिका पहुँचे, जो आवश्यक उपकरण यजमान उपलब्ध न कर सके जुटाना आचार्य का परम कर्त्तव्य होता है। रावण जानता है कि वनवासी राम के पास क्या है और क्या होना चाहिए।

अशोक उद्यान पहुँचते ही रावण ने सीता से कहा कि राम लंका विजय की कामना से समुद्रतट पर महेश्वर लिंग विग्रह की स्थापना करने जा रहे हैं और रावण को आचार्य वरण किया है।

" .यजमान का अनुष्ठान पूर्ण हो यह दायित्व आचार्य का भी होता है। तुम्हें विदित है कि अर्द्धांगिनी के बिना गृहस्थ के सभी अनुष्ठान अपूर्ण रहते हैं। विमान आ रहा है, उस पर बैठ जाना। ध्यान रहे कि तुम वहाँ भी रावण के अधीन ही रहोगी। अनुष्ठान समापन उपरान्त यहाँ आने के लिए विमान पर पुनः बैठ जाना। "

स्वामी का आचार्य अर्थात स्वयं का आचार्य।
यह जान जानकी जी ने दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुका दिया। स्वस्थ कण्ठ से "सौभाग्यवती भव" कहते रावण ने दोनों हाथ उठाकर भरपूर आशीर्वाद दिया।

सीता और अन्य आवश्यक उपकरण सहित रावण आकाश मार्ग से समुद्र तट पर उतरे ।

" आदेश मिलने पर आना" कहकर सीता को उन्होंने विमान में ही छोड़ा और स्वयं राम के सम्मुख पहुँचे ।

जामवन्त से संदेश पाकर भाई, मित्र और सेना सहित श्रीराम स्वागत सत्कार हेतु पहले से ही तत्पर थे। सम्मुख होते ही वनवासी राम आचार्य दशग्रीव को हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

" दीर्घायु भव ! लंका विजयी भव ! "

दशग्रीव के आशीर्वचन के शब्द ने सबको चौंका दिया ।

सुग्रीव ही नहीं विभीषण की भी उन्होंने उपेक्षा कर दी। जैसे वे वहाँ हों ही नहीं।

भूमि शोधन के उपरान्त रावणाचार्य ने कहा

" यजमान ! अर्द्धांगिनी कहाँ है ? उन्हें यथास्थान आसन दें।"

श्रीराम ने मस्तक झुकाते हुए हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र स्वर से प्रार्थना की कि यदि यजमान असमर्थ हो तो योग्याचार्य सर्वोत्कृष्ट विकल्प के अभाव में अन्य समकक्ष विकल्प से भी तो अनुष्ठान सम्पादन कर सकते हैं।

" अवश्य-अवश्य, किन्तु अन्य विकल्प के अभाव में ऐसा संभव है, प्रमुख विकल्प के अभाव में नहीं। यदि तुम अविवाहित, विधुर अथवा परित्यक्त होते तो संभव था। इन सबके अतिरिक्त तुम संन्यासी भी नहीं हो और पत्नीहीन वानप्रस्थ का भी तुमने व्रत नहीं लिया है। इन परिस्थितियों में पत्नीरहित अनुष्ठान तुम कैसे कर सकते हो ?"

" कोई उपाय आचार्य ?"


" आचार्य आवश्यक साधन, उपकरण अनुष्ठान उपरान्त वापस ले जाते हैं। स्वीकार हो तो किसी को भेज दो, सागर सन्निकट पुष्पक विमान में यजमान पत्नी विराजमान हैं।"

श्रीराम ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाते हुए मौन भाव से इस सर्वश्रेष्ठ युक्ति को स्वीकार किया। श्री रामादेश के परिपालन में. विभीषण मंत्रियों सहित पुष्पक विमान तक गए और सीता सहित लौटे।

" अर्द्ध यजमान के पार्श्व में बैठो अर्द्ध यजमान ..."

आचार्य के इस आदेश का वैदेही ने पालन किया।
गणपति पूजन, कलश स्थापना और नवग्रह पूजन उपरान्त आचार्य ने पूछा - लिंग विग्रह ?

यजमान ने निवेदन किया कि उसे लेने गत रात्रि के प्रथम प्रहर से पवनपुत्र कैलाश गए हुए हैं। अभी तक लौटे नहीं हैं। आते ही होंगे।

आचार्य ने आदेश दे दिया - " विलम्ब नहीं किया जा सकता। उत्तम मुहूर्त उपस्थित है। इसलिए अविलम्ब यजमान-पत्नी बालू का लिंग-विग्रह स्वयं बना ले।"


जनक नंदिनी ने स्वयं के कर-कमलों से समुद्र तट की आर्द्र रेणुकाओं से आचार्य के निर्देशानुसार यथेष्ट लिंग-विग्रह निर्मित किया ।

यजमान द्वारा रेणुकाओं का आधार पीठ बनाया गया। श्री सीताराम ने वही महेश्वर लिंग-विग्रह स्थापित किया।

आचार्य ने परिपूर्ण विधि-विधान के साथ अनुष्ठान सम्पन्न कराया।.

अब आती है बारी आचार्य की दक्षिणा की..

श्रीराम ने पूछा - "आपकी दक्षिणा ?"

पुनः एक बार सभी को चौंकाया। ... आचार्य के शब्दों ने।

" घबराओ नहीं यजमान। स्वर्णपुरी के स्वामी की दक्षिणा सम्पत्ति नहीं हो सकती। आचार्य जानते हैं कि उनका यजमान वर्तमान में वनवासी है ..."

" लेकिन फिर भी राम अपने आचार्य की जो भी माँग हो उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता है।"

"आचार्य जब मृत्यु शैय्या ग्रहण करे तब यजमान सम्मुख उपस्थित रहे ....." आचार्य ने अपनी दक्षिणा मांगी।


"ऐसा ही होगा आचार्य।" यजमान ने वचन दिया और समय आने पर निभाया भी--

“रघुकुल रीति सदा चली आई ।
प्राण जाई पर वचन न जाई ।”

यह दृश्य वार्ता देख सुनकर उपस्थित समस्त जन समुदाय के नयनाभिराम प्रेमाश्रुजल से भर गए। सभी ने एक साथ एक स्वर से सच्ची श्रद्धा के साथ इस अद्भुत आचार्य को प्रणाम किया ।


रावण जैसे भविष्यदृष्टा ने जो दक्षिणा माँगी, उससे बड़ी दक्षिणा क्या हो सकती थी? जो रावण यज्ञ-कार्य पूरा करने हेतु राम की बंदी पत्नी को शत्रु के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है, वह राम से लौट जाने की दक्षिणा कैसे मांग सकता है ?

(रामेश्वरम् देवस्थान में लिखा हुआ है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना श्रीराम ने रावण द्वारा करवाई थी )

🙏🏼जय श्री राम

इस प्रसंग को पढ़ने का सादर आभार.!!

तंत्र साधनाओं में प्रमुखी 14 रात्रियों का महत्व1- दारुण रात्रि-चैत्रशुक्ल प्रतिपदा, चैत्रशुक्ल नवमी, कृष्णपक्ष की अष्टमी...
14/01/2026

तंत्र साधनाओं में प्रमुखी 14 रात्रियों का महत्व

1- दारुण रात्रि-
चैत्रशुक्ल प्रतिपदा, चैत्रशुक्ल नवमी,
कृष्णपक्ष की अष्टमी,
जेष्ठ शुक्ल तृतीया,
आषाढ़ शुक्ल दशमी,
भाद्रपदमास की शुद्ध द्वादशी, तृतीया,
मार्गशीर्ष मास की द्वितीया

तिथियों के विषय में ज्ञानी जन कहते हैं कि इनमें यदि संक्रांति, ग्रहण अथवा मंगलवार हो तो इन तिथियों की रात दारुण रात्रि कही जाती है।

इसके अलावा यदि चैत्र कृष्ण तृतीया को अर्धरात्रि में चित्रा नक्षत्र का योग हो तो भी दारुणरात्रि का प्रमाण माना गया है

2- वीर रात्रि-
चतुर्दशी संक्रमश्च कुलर्क्षे कुलवासरे।
अर्द्धरात्रौ यथा योगो वीररात्रि प्रकीर्तिता।।

अर्थात यदि चतुर्दशी तिथि का कुलवासर वा अर्धरात्रि के साथ संक्रमण हो तो उसे वीर रात्रि कहा गया है।

3- महारात्रि-
यूं तो सामान्य क्रम में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि महाशिवरात्रि को महा रात्रि माना गया। लेकिन इस बारे में भगवान महादेव माता पार्वती से कहते हैं-
हे प्रिय! आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी अर्थात नवरात्र की अष्टमी महारात्रि कही जाती है।

4- कालरात्रि-
हे महेशानि! दीपावली का उत्सव आने पर कार्तिक में अमावस्या युक्त चतुर्दशी की रात्रि काल रात्र कहीं गई है ।
यह महारात्रि भगवती तारा व मां महाकाली को अतिप्रिय कर है।

5- मोहरात्रि-कृष्ण जन्माष्टमी को मोहरात्रि कहा जाता है।

6- घोररात्रि-
मार्गशीर्ष महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी जो स्वयं महाकाली स्वरूप है, उसे घोररात्रि कहा गया है।

7- क्रोधरात्रि-
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी यदि भूमिपुत्र अर्थात मंगल से युक्त हो तो वह तारा स्वरुपा है। उसे क्रोध रात्रि के रूप में याद किया जाता है।

8- अचलरात्रि-
फाल्गुन मास आने पर जो कृष्ण पक्ष की एकादशी है वह शुक्रवार अथवा भोमवार से युक्त हो तो उसे अचलरात्रि कहा जाता है।

9- दिव्यरात्रि-
जेष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी यदि दश योग युक्त हो, साथ ही उस दिन शुक्रवार एवं एकादशी हो तो हे परमेश्वरी उस तिथि को दिव्य रात्रि कहते हैं।

यह दशयोग क्या है ॽ इसके बारे में शास्त्र कहते हैं-
ज्येष्ठ मासे सिते पक्षे दशम्यां बुधहस्तयो।
व्यतीपाते गरानंदे कन्या चन्द्र बृषे रवौ।।

10- विष्णुरात्रि-
प्रति मास में यदि बुधवार को अष्टमी तिथि पड़े तो उसे विष्णुरात्रि कहा जाता है। भाद्रपद मास में इस योग की विशेष महिमा है।

11- मृतसंजीवनी रात्रि-
यदि शुक्रवार को अमावस्या तिथि हो और उस दिन ग्रहण का योग बने तो उस रात का तुरीय काल मृत संजीवनी रात्र के रूप में जाना जाता है। एक विवरण के अनुसार शिवरात्रि को यदि शुक्रवार हो तो उसे भी मृत संजीवनी रात्रि माना जाता है।

12- सिद्ध रात्रि-
यदि चैत्र शुक्ल अष्टमी को संक्रांति का योग बने तो उसे सिद्धरात्रि के रूप में जाना जाता है। यह सिद्धरात्रि मंत्र सिद्ध का शुभ फल प्रदान करती है।

13- गणेशरात्रि-
माघ मास की चतुर्थी का काल यदि अर्धरात्रि के समय में हो, तो सिद्ध की आकांक्षा करने वाले उसे गणेश रात्रि के रूप में जानते हैं।

14- देवी रात्रि-
भगवान महादेव कहते हैं की हे पार्वती! प्रति मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी यदि मंगलवार से युक्त हो अथवा केवल प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को देवीरात्रि के रूप में जाना जाता है। यह देवी रात्रि सर्व सिद्धि प्रदायिनी है

उपरोक्त इन सभी रात्रियों में से कहीं महत्वपूर्ण और उत्तम है नवरात्रि। नवरात्रि की प्रत्येक रात्रि साक्षात योगमाया आदि शक्ति का स्वरुप है। इन दिवस व रात्रियों में की गई प्रत्येक साधना अनंत गुणा शुभ फल प्रदान करती है।
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