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बुन्देलखण्ड क्षेत्र में बुन्देली (हिन्दी) भाषा अधिकतर बोली जाती है। यह ऐतिहासिक रूप से हिन्दू व जैन धर्म के लोगों का महत्व रहा है। यह क्षेत्र यू.पी. व म. प्र. में 23°10' और 26°30' उत्तर लेटिटयूड, 78°20' और 81°40' पूरब लेटिटयूड में है। यह 70,000 किलोमीटर लम्बा-चौड़ा क्षेत्र है। बुन्देलखण्ड भारत का हृदये स्थल है । भारत की सरकारों को हृदये स्थल का ख्याल नही रहेगा तो देश की राजनीति की संचार व्यवस्था ठण्डी पड़ जायेगी| झांसी के गजैटियर के अनुसार प्रथम रूप से अपने राज्य को चक्रवती चंद्रवंशी सम्राट महाराज ययाति ने अपने पुत्र यदु को दिया था। उस समय इस क्षेत्र का नाम अहिरवाल था। इस क्षेत्र को कई नामों से जाना गया जैसे:- विन्ध्याटवी, विन्ध्य भूमि, विन्ध्य प्रदेश, विन्ध्यलखण्ड, विन्ध्योला (विन्ध्य-इला) बाद में उपभ्रंश में बुन्देलखण्ड जाना जाने लगा। यह आल्हा-ऊदल जैसे वीरों की बुन्देलखण्ड भूमि एवं तपो भूमि है और जहां से असंख्य वीर पुरूष, महावीरों, स्वतन्त्रता संग्राम के क्रांतिवीरों का जन्म तथा कर्मभूमि होने का इस क्षेत्र को गर्व है, वहीं महान ऋषियों-मुनियों, कवियों, साहित्यकारों आदि को तप एवं साधना-भूमि और साथ ही अत्यन्त निपुण वास्तुशिल्प कलाविदों, कारीगरों, वस्त्र शिलिपयों की मात्र भूमि होने का गौरव प्राप्त है। यहां के वनवासी भीलों ने भगवान श्रीराम का प्रेम और सेवा भावना से दिल जीत लिया था। क्षेत्र की ऐसी गौरवशाली परम्परा शानदार ऐतिहासिक पृष्ठभूमि लिए यह वीर बुन्देलखण्ड भूमि देश की आजादी के 64 वर्षों के बाद भी विकास की किरणों से वंचित है। आज भी यह क्षेत्र भुखमरी, गरीबी, कर्ज, अशिक्षा, बेकारी और अज्ञान के अभाव में भारत के सबसे अधिक पिछड़े क्षेत्रों में से एक है। बुन्देलखण्ड को दो भागों में बांट कर रखा गया है: 1) उत्तर प्रदेश व 2) मध्य प्रदेश। 70,000 किलोमीटर में फैला लम्बा-चौड़ा क्षेत्र, दो लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्रफल और 5 करोड़ लगभग आबादी वाला यह बुन्देलखण्ड क्षेत्र केवल एक ही राज्य के रूप में होना चाहिये। अगर नाप तौल के अनुसार से देखें तो पृथक राज्य का दर्जा पाये प्रदेशों में अधिकरतर ऐसे ही हैं, जिनसे प्रस्तावित बुन्देलखण्ड का क्षेत्रफल कई गुना अधिक है जैसे इसके दो लाख वर्ग मीटर के मुकाबले त्रिपुरा का क्षेत्रफल मात्र 10486 वर्ग किलोमीटर, नागालैण्ड का क्षेत्रफल 16579 वर्ग किलोमीटर, मेघालय का क्षेत्रफल 22498 वर्ग किलोमीटर, मणिपुर का क्षेत्रफल 22356 वर्ग किलोमीटर, हरियाणा का क्षेत्रफल 44722 वर्ग किलोमीटर और मिजोरम का क्षेत्रफल 21090 वर्ग किलोमीटर ही है। एक बात और है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, बिहार, राजस्थान, कर्नाटक, तमिलनाडु तथा महाराष्ट्र के बाद सबसे बड़ा प्रदेश बुन्देलखण्ड ही होगा। इस प्रकार राज्य का दर्जा पाने के लिये क्षेत्रफल या नाप की कोई बात है तो बुन्देलखण्ड में वह सब जोरदार तरीके से है। बुन्देलखण्ड का इतिहास, संस्कृति, भाषा (बोली) सामाजिक रीति-रिवाज, रिश्ते-नाते समस्त क्षेत्र में एक जैसे ही हैं। इस पृथक क्षेत्र के शरीर पर खींची गयी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा रेखा के माध्यम से इसे बांटे रखने का प्रयास भी दोनों ओर के बुन्देली लोगों को अलग करने में थोड़ा भी सफल नहीं हो सके हैं जबकि सीमाओं के कारण दोनों ओर की क्षेत्रीय जनता का सामाजिक जीवन और व्यापारिक कार्य कष्टमय में है साथ ही आर्थिक हानि भी होती है। इसके चलते गरीबी के नीचे रहने वाले अब और शोषण का सामना कर रहे हैं। जिसका अन्त बुन्देलखण्ड के दोनों भागों को मिलाकर और पृथक राज्य के निर्माण से ही सम्भव है। उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश में 97 प्रतिशत बजट खुद रखते हैं, वहीं लगभग 2 से 3 प्रतिशत बजट बुन्देलखण्ड के हिस्से में आता है। अब जाग जाओ और सावधान हो जाओ वरना ये शोषण जारी रहेगा। जैसा कि आप जानते हैं कि बुन्देलखण्ड की धरती पर विकास के नाम पर दोनों ही उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश सरकारें मात्र औपचारिकताओं को छोड़कर कुछ नहीं करती बल्कि इसको पिछड़ा रखने में ही अपनी जीत समझती हैं, ऐसा यहां की जनता देखती आ रही है। जैसा कि आप जानते हैं कि नये उधोग पनपे नहीं बांदा की सूती मिल जैसी जमे जमाये उधोग पर ताला लग चुका है। इस क्षेत्र के लोग जानते हैं कि केवल पृथक बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण ही विकास दिला सकता है। आप जानते हैं कि सभी को कटु अनुभव है बड़े राज्यों के बारे में, ध्वस्त विकास योजनाएं, पिछड़ों और गरीबों को और पिछड़ा बनाना आदि। छोटे राज्य जो भाषा (बोली), समाज, संस्कृति, इतिहास व भौगोलिक परिसिथतियों आदि की समानता व एकरूपता के आधार पर बने हैं उनका तीव्र विकास हुआ और अच्छे परिणाम देखने को मिले जैसे पंजाब, केरल, कर्नाटक, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों का उदाहरण हमारे सामने हैं। इन राज्यों के लोगों ने अपना प्रशासन स्वयं संभाल लिया है तबसे विकास कार्यों में जो प्रगति हुई है वह सराहनीय है। उपरोक्त राज्यों में विकासमयी वातावरण को देखकर बुन्देखण्ड के लोगों द्वारा यह अनुभव करना स्वाभाविक ही है कि भारत देश के सबसे बड़े दो प्रदेशों के बीच लम्बे समय से कटते-पिस्ते आ रहे इस क्षेत्र के पिछड़ेपन को दूर करने के लिये पृथक बुन्देलखण्ड राज्य का बनना ही मात्र हल है। बुन्देलखण्ड की जनता ही इस क्षेत्र की समस्त परिस्थितियो को निकट से जानती है अब वही उन स्थितियो में विकास की रोशनी ला सकती है। हम जानते हैं कि आजादी के पूर्व से ही पृथक राज्य निर्माण के लिये यहां की जनता की मांग रही है। इस क्षेत्र के विभिन्न भाग से इसकी मांग भी समय-समय पर होती रही है परन्तु देश के नेताओं ने इसे कभी जरूरी नहीं समझा। केन्द्र सरकार द्वारा सन 1955 में गठित 3 सदस्यीय राज्य पुनर्गठन आयोग के अध्यक्ष सुविख्यात विचारक श्री पणिक्कर ने अपनी रिपोर्ट में बुन्देलखण्ड प्रान्त बनाने का तर्क पूर्वक समर्थन इस प्रकार किया था, यह क्षेत्र हृदये स्थल, ''बुन्देलखण्ड राज्य" के रूप में जिन्दा रह पायेगा। 1955 में रिपोर्ट सार्वजनिक होने पर बुन्देलखण्ड राज्य बनने के वायदे खूब हुऐ लेकिन कोइ निष्कर्ष नहीं निकला। स्वाधीनता के समय केन्द्र सरकार के स्वराष्ट्र विभाग के सचिव श्री मेनन ने भी पूर्ण अध्ययन के बाद जो रिपोर्ट प्रस्तुत की उसमें बुन्देलखण्ड के विभाजित सिथति को समाप्त करने की जोरदार वकालत की गयी। किन्तु तबसे अब तक हमारी दिल्ली की सरकार यहां की जनता की मांग को अनदेखा करती रही। अंतत: पृथक प्रदेश व प्रशासन के लिये आज भी बुन्देलखण्ड वासी पिछड़ेपन में जी रहे हैं। इन विचार और स्थिति के स्पष्टीकरण के साथ कइ बातें साफ हो गयी हैं। खास तौर पर प्रथम रूप से बुन्देलखण्ड प्रदेश को उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश से अलग करके पृथक राज्य बनाने की मांग कोई स्थानीय राजनीति या संकीर्ण विचार से ग्रसित नहीं है। वरन ठोस व यथार्थ तर्कों पर आधारित व राष्ट्रहित में है। भारत देश व कानून (संविधान) की जिन व्यवस्थाओं के अन्तर्गत व औचित्य के आधार पर भारत देश में अन्य राज्य बने जैसे आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, हिमांचल प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड आदि इसी तरह बुन्देलखण्ड को अलग राज्य का दर्जा क्यों नहीं मिलना चाहिये, यह सोचना बुन्देलखण्ड की जनता व केन्द्र, राज्य सरकार का कर्तव्य, कर्म व काम है। आप बतायें कि अपनी क्षेत्रीय भाषा (बोली) स्थानीय सांस्कृतिक पहचान और अपनी ऊंची परम्पराओं व सम्मान के सहारे अपना विकास करने की छूट केवल बुन्देली लोगों को ही क्यों नहीं मिलनी चाहिए? इस बात को निम्न सोंच कहने वाले न केवल इस क्षेत्र से, यहां की जनता से, यहां की भाषा से व संस्कृति से, यहां की परम्परा से गलत भावना रखते हैं या किसी स्वार्थ-परक राजनीति से प्रेरित लगते हैं और ऐसा लगता है कि सम्पूर्ण भारत देश के विचार एवं संकीर्ण सोच के शिकार हैं। बुन्देलखण्ड को उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से अलग करने में भले ही समय लग जाये लेकिन इस क्षेत्र का एकीकरण, लोकहित में उचित और आवश्यक है। सच यह है कि बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण की भावना एक पवित्र प्रयास है न कि राजनीति। हम जानते हैं कि बुन्देलखण्ड पृथक राज्य के लिये जिन आवश्यक संसाधनों की जरूरत विकास के लिये है वो इस क्षेत्र में भरपूर रूप से उपलब्ध हैं जैसे कि गोरा पत्थर, चूना, ग्रेनाइट, यूरेनियम, तांबा, जिप्सम, हीरा आदि खनिज सम्पदा। और वन संपदा के रूप में अनन्त भण्डार हैं और विधुत उत्पादन के लिये नदी जल शक्ति की अनन्त सम्भावनाएं इस क्षेत्र में हैं जो कि अब तक उनका उपभोग उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश की सरकारें कर रही हैं। लकड़ी, टिम्बर का उधोग भी प्रबल रूप से है इसका भी उपभोग दोनों सरकारें कर रही हैं। यहां के लोग मजदूर बनकर देश के अन्य प्रदेशों में जगह जगह भटक रहे हैं और यहीं पर समस्त सम्भावनाएं होते हुये केन्द्र व राज्य सरकारों ने कोई भी लघु उधोग, उधोग आदि नहीं विकसित किये। चंदेरी का वस्त्र शिल्प सर्वश्रेष्ठ साड़ियो द्वारा पूरी दुनिया में जाना जाता है लेकिन इसके प्रोत्साहन के लिये आज तक कोइ सुनिश्चित योजना नही बनाई गयी। इन स्थितियो से सभी परिचित हैं और ऐसा नहीं है कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सरकारें इससे अंजान हैं। दोनों सरकरों व केन्द्र सरकार द्वारा यहां की जनता को मूर्ख बनाया जा हा है अब यहां की जनता इस बात को अच्छी तरह समझने लगी है इसलिये बुन्देलखण्ड राज्य बनाने के लिये उनका गुस्सा भड़कना स्वभाविक है। इस संघर्ष के लिये इससे पहले भी प्रयास किये जाते रहे हैं व किसी न किसी कारण धीमे भले पड़ गये हों और खत्म होते हुये लगते हों परन्तु बुन्देलखण्ड राज्य के एकीकरण व प्रदेश बनने के मार्ग को बुन्देली जनता पुन: आन्दोलन कर मजबूत बना लेगी। -------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- बुन्देलखण्ड की बात(Brief History of Bundelkhand-II): बुन्देलखण्ड नाम मात्र से ही मानस पटल पर वीरता, शौर्य, ओज, देशभक्ति एवं त्याग का भाव अपनेआप ही चित्रित हो उठता है। यहाँ के विशाल दुर्ग, पत्थरों का सीना पार करती हुयीं खूवसूरत नदियां, प्राचीन मूर्तियों, विभन्य महलों एवं मंदिरों के भग्नावेष अतीत की गौरव की कहानी कहते है। इतिहास उद्धारित करता है कि बुन्देलखण्ड क्षेत्र जो कभी मुगल या बिट्रिश शासकों के पूणतः अधीन नहीं रहा, एक वीरता पूर्ण इतिहास रखता है। प्रथम स्वतंत्रता संगा्रम की महान बीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के शौर्य तथा पराक्रम की अप्रियतम कथा एवं उनकी आत्माहुति.युगों- युगों तक जन मानस के लिये प्रेरणाश्रोत बनी रहेगी। पौराणिक काल में इस धरती का नाम जैजाक भुक्ति था। प्राचीन भारत के सोलह महाजनपदों में से एक चेदि बुन्देलखण्ड का ही प्रचीन नाम है । बुन्देलखण्ड को दशार्ण प्रदेश भी कहा जाता है। ईसा से पूर्व कात्यायन, कौटिल्य तथा कालिदास आदि ने अपने.अपने ग्रन्थों में दशार्ण का नाम का उल्लेख किया है। कौमुदी में दशार्ण शब्द का अर्थ है दस जल वाला। इस प्रकार बुन्देलखण्ड का दशार्ण नाम दस नदियों के कारण पड़ा। बुन्देलखण्ड का वास्तविक नाम विन्ध्याइलखण्ड है और यह विन्ध्यांचल के तराई में बसने के कारण पड़ा है, संस्कृत में इला का अर्थ पृथ्वी है। बुन्देलखण्ड की सीमाओं के बारे में यह लाकोक्ति प्रायः उद्घृत की जाती है:. इत यमुना उत नर्वदा, इत चंबल उत टोंस। छत्रसाल सों लरन की, रहीं न काहूँ हौस।। किन्तु यह बुन्देलखण्ड की सही सीमा नहीं है। यह बुन्देलखण्ड राज्य के विस्तारक महाराजा छत्रसाल के शौर्य की सीमा है। इसके अंतर्गत किसी को भी छत्रसाल से लड़ने का हौसला नहीं था। बुन्देलखण्ड की सीमा के निर्धारण में विद्वानों में मत भिन्यता है। कुछ विद्वान भौगोलिक आधार पर इसका सीमांकन करते है तो कुछ ऐतिहासिक आधार पर कुछ आबादी के आधार पर इसका निर्धारण करते है