कारवाँ-ए-रफ़ीक़

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इस पेज का बुनियादी मक़सद, इलाक़ा-ए-मेवात के मज़लूम, ख़ारिज व इस्तेहसाल तबक़ों को पसमांदगी, ता'आलीमी, समाजी और सियासी मसाइलों से 'बा-ख़बर' करने के साथ 'मजमू'ई तरक़्क़ी' व 'ज़वाबदेही' के एक नए दौर में शामिल करना है।

शुक्रिया।
डॉ. मोहम्मद रफ़ीक़
एम.फिल., पीएच.डी.

कल जनाब अशरफ़ मेवाती साहेब के रिटायरमेंट का दिन था; एक ऐसा दिन जिसमें फख़्र और ख़ामोश उदासी, दोनों शामिल थीं।करीब साढ़े ...
31/03/2026

कल जनाब अशरफ़ मेवाती साहेब के रिटायरमेंट का दिन था; एक ऐसा दिन जिसमें फख़्र और ख़ामोश उदासी, दोनों शामिल थीं।

करीब साढ़े तीन दशकों तक उन्होंने तालीम के इस पाक और मुक़द्दस मिशन को अपनी ज़िंदगी का मक़सद बनाया। उन्होंने न सिर्फ़ इल्म दिया, बल्कि अपने छात्रों का किरदार बनाया, उनमें कॉन्फिडेंस पैदा किया और बेइंतहा बच्चों के लिए राह रोशन की, जो उनकी सीख को ता-उम्र साथ लेकर चलेंगे।

ऐसा नहीं कि उनकी ख़िदमत सिर्फ़ क्लासरूम या नौकरी तक महदूद रही हो, बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि उनकी ज़िंदगी सच्चाई और लगन की एक मिसाल है।

हालाँकि मुझे कभी उनके अंडर पढ़ने का मौक़ा तो नसीब नहीं हुआ, लेकिन फिर भी मैं अपने आपको ख़ुशनसीब समझता हूँ कि मुझे उनकी ज़िंदगी के तजुर्बों से बहुत कुछ सीखने को मिला। मेरे लिए वह हमेशा एक टीचर से बढ़कर रहे हैं; एक मेंटर, एक खैरख़्वाह, जो हमेशा साथ खड़े रहते हैं; और एक दोस्त जो मोहब्बत से सुख-दुःख सुनते हैं।

पिछले चार-पाँच सालों में उनसे मेरी जो मुलाक़ातें और बातचीत होती रही हैं, वह मेरे लिए बहुत क़ीमती और सीख देने वाली रही हैं। चाहे बात खेलों की हो, तालीम की हो या समाजी मसलों की; वह हमेशा अपने उसूलों पर क़ायम, अपनी सोच में वाज़ेह और अपने अमल में मिसाल नज़र आए। उनसे होने वाली हर बातचीत अपने पीछे कोई न कोई सीख छोड़ जाती थी, जो अक्सर बिना कहे ही दिल में उतर जाती थी।

जनाब अशरफ़ मेवाती साहेब को अल्लाह त'आला ने एक असरदार और खूबसूरत अंदाज़ में तक़रीर करने की ख़ास क़ाबिलियत अता की है। उनकी शायरी और उनकी स्पीच लोगों का सिर्फ़ ध्यान ही नहीं खींचती, बल्कि दिलों को भी जोड़ती है। अनगिनत सरकारी प्रोग्रामों और तक़रीबों में, चाहे स्टेज संभालना हो या माइक... उनकी मौजूदगी सिर्फ़ अहम नहीं, बल्कि पूरी महफ़िल की जान हुआ करती थी।

आज जब अशरफ़ साहेब ज़िंदगी के एक नए मरहले में क़दम रख रहे हैं, तो हमें एहसास होता है कि रिटायरमेंट सिर्फ़ एक रस्मी बात है; क्योंकि ऐसे लोग असल में कभी रिटायर ही नहीं होते। मुझे यक़ीन है कि उनकी विरासत उन छात्रों की ज़िंदगी में हमेशा ज़िंदा रहेगी, जिन्हें उन्होंने पढ़ाया है और जिनमें उन्होंने क़ीमती उसूल और क़दरें पैदा की हैं।

अल्लाह त'आला हाजी अशरफ साहेब को लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुकून भरी ज़िंदगी अता फरमाए। उनकी हिकमत और तजुर्बा हमें आगे भी राह दिखाता रहे, और उनकी विरासत आने वाली नस्लों को हमेशा प्रेरित करती रहे, आमीन। 🤲

शुक्रिया।
डॉ. मोहम्मद रफ़ीक़

नमाज़ ईद की पढ़ कर मैं ढूँढता ही रहा,कहीं दिखे कोई अपना गले लगाना है। - सय्यद सरोश आसिफ़
21/03/2026

नमाज़ ईद की पढ़ कर मैं ढूँढता ही रहा,
कहीं दिखे कोई अपना गले लगाना है। - सय्यद सरोश आसिफ़

19/03/2026

मैं अपने सियासी रहनुमाओं को ताना देने के लिए नहीं बोल रहा, बल्कि एक दर्द, जिम्मेदारी और जवाबदेही के एहसास के साथ हक़ीक़त बयान कर रहा हूँ। सच्चाई यह है कि जब किसी क़ौम में बेईमानी, धोखेबाज़ी और खुदगर्ज़ी आम हो जाए, तो उसका ज़वाल तय हो जाता है।

हमारे पास कभी वसाइल, मौके और काबिलियत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन अफसोस कि हमारे सियासी रहनुमाओं ने उन्हें अक्सर अपने ज़ाती फायदे और परिवारिक हितों तक सीमित कर दिया। और जो कुछ बचा, उसे हमने खुद आपसी जलन, दिखावे, घमंड और लापरवाही में गंवा दिया।

यह सिर्फ नाकामी नहीं, बल्कि एक अमानत में खयानत है। हक़ीक़त तो यह है कि आज हमारी क़ौम अख़लाक़ी गिरावट और बेईमानी में घिर चुकी है। शायद ही कोई ऐसा गुनाह बचा हो जो हमसे न हुआ हो (ऐसे काम जो हमारे दीन और मुल्क दोनों के कानून में गलत ठहराए गए हैं)। जब गुनाह आम हो जाए और ज़मीर खामोश हो जाए, तो बर्बादी क़रीब आना लाज़मी है।

अगर एक विधायक, अपनी उम्र के आख़िरी पड़ाव में भी, अपनी पार्टी और अपने इलाक़े लोगों से धोखा कर सकता है, तो सोचिए कि हमारी रहनुमाई किन लोगों के हाथ में है। दोनों विधायकों के ज़रिए, राज्यसभा इलेक्शन में जो क्रॉस वोटिंग और सियासी धोखेबाज़ी की गई है, उसने न सिर्फ हमें अंदर से कमजोर किया है बल्कि पूरे हरियाणा में मुसलामानों और हमारे इलाक़े की छवि को भी नुकसान पहुँचाया है। अगर रहनुमाई ही भरोसे के काबिल न रहे, तो अवाम का भरोसा किस पर कायम रहेगा?

हमारे नामों की शुरुआत मोहम्मद और अहमद जैसे इस्लामी नामों से होती है, लेकिन हमारी कारगुजारी ऐसी हैं की नमरूद और फिरौन भी शर्मसार हो जायें। हमारे नबी ने फरमाया कि मेरे उम्मती हर गुनाह में मुब्तला हो सकते हैं लेकिन झूठे और धोखेबाज बिल्कुल नहीं हो सकते।

दुनियावी तौर पर हम पहले ही देश के सबसे पिछड़े लोगों में गिने जाते हैं, लेकिन इससे भी ज़्यादा फिक्र की बात हमारे दीन की हालत है। अगर आज के हालात ऐसे हैं, तो हमें सोचना चाहिए कि अल्लाह के सामने हमारा क्या मुकाम होगा और आख़िरत में हमारा क्या अंजाम होगा!

दोस्तों, मैं देख रहा हूँ कि हमारी क़ौम के अक्सरियत लोग रोज़ा, नमाज़, तरावीह और क़ुरआन की तिलावत से गाफिल हो चुके हैं। ये सिर्फ इबादतें नहीं हैं, बल्कि हमारे दीन की बुनियाद हैं; इन्हें छोड़ देना, अल्लाह की रहमत से दूर होना है।

हमें अपने आप से यह सवाल पूछना होगा कि हमने अपने रब को कितनी सच्चाई से पहचाना है, और क्या हम उसे वह अहमियत दे रहे हैं जिसके वह हक़दार हैं?

बदलाव बाहर से नहीं आएगा; असली इस्लाह तब शुरू होगी जब हम अपनी गलतियों को ईमानदारी से मानेंगे, तौबा करेंगे, और अपने अख़लाक़, अपने किरदार और अपनी नीयत को सुधारेंगे। सियासी इस्लाह ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है अख़लाक़ी और रूहानी बेदारी।

शुक्रिया।
डॉ. मोहम्मद रफ़ीक़

कोई भी समाज तब तक तरक़्क़ी नहीं कर सकता जब तक उसकी आधी आबादी तालीम से महरूम रहे।हमारे मज़हब, दीन-ए-इस्लाम ने हमें यह सच्...
16/03/2026

कोई भी समाज तब तक तरक़्क़ी नहीं कर सकता जब तक उसकी आधी आबादी तालीम से महरूम रहे।

हमारे मज़हब, दीन-ए-इस्लाम ने हमें यह सच्चाई चौदह सौ साल पहले ही बता दी थी। हज़रत मुहम्मद नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि "इल्म हासिल करना हर मुसलमान मर्द और औरत पर फ़र्ज़ है"। - इब्न माजह, हदीस: 224

इसी तरह, आप नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह भी फरमाया कि "जो शख़्स इल्म हासिल करने के रास्ते पर चलता है, अल्लाह उसके लिए जन्नत का रास्ता आसान कर देता है"। - सही मुस्लिम, हदीस: 2699

हमारे नबी करीम की ज़िन्दगी से एक बहुत ख़ूबसूरत मिसाल भी मिलती है। हज़रत अबू सईद अल-ख़ुदरी रज़ि अल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि कुछ औरतें नबी के पास आईं और उन्होंने कहा कि मर्दों को इल्म सीखने के ज़्यादा मौके मिलते हैं। उन्होंने अपने लिए तालीम का एक ख़ास दिन तय करने की दरख़्वास्त की। प्यारे नबी ने फ़ौरन उनके लिए अलग दिन मुक़र्रर कर दिया और उन्हें तालीम दी। - सही बुख़ारी, हदीस 1.50

इससे साफ़ पता चलता है कि इस्लाम में मर्द और औरत दोनों की तालीम और इल्म को बहुत अहमियत दी गई है। हमारे इलाक़ा-ए-मेवात में, जहाँ आज भी तालीम और समाजी तरक़्क़ी की कई चुनौतियाँ मौजूद हैं, वहाँ औरतों की तालीम असली बदलाव की कुंजी है। जब एक लड़की पढ़ती है तो सिर्फ़ उसकी ज़िन्दगी ही नहीं बदलती, बल्कि पूरा ख़ानदान मज़बूत होता है और पूरी क़ौम तरक़्क़ी करती है।

इसलिए यह हम सब, वालिदैन, समाजी रहनुमा और उस्तादों की ज़िम्मेदारी है कि हमारी बेटियों को भी बराबर के तालीमी मौके मिलें।

साथियों, इलाक़ा-ए-मेवात का बेहतर मुस्तक़बिल सिर्फ़ बातों से नहीं बनेगा, बल्कि उस तालीम से बनेगा जो हम अपनी नई नस्ल को देंगे। आइए आज अपनी बेटियों की तालीम में निवेश करें, ताकि कल हमारा समाज ज़्यादा मज़बूत, समझदार और रोशन हो सके।

शुक्रिया।
डॉ. मोहम्मद रफ़ीक़

आज रोज़ा इफ्तार के बाद प्रोफेसर एजाज़ अहमद साहेब, सीनियर लेक्चरर जनाब तैय्यब हुसैन साहेब, डॉ. इमरान चौधरी साहेब और डॉ. म...
14/03/2026

आज रोज़ा इफ्तार के बाद प्रोफेसर एजाज़ अहमद साहेब, सीनियर लेक्चरर जनाब तैय्यब हुसैन साहेब, डॉ. इमरान चौधरी साहेब और डॉ. मोहम्मद ख़ालिद साहेब के साथ चाय पर एक अच्छी और मुफ़ीद बातचीत हुई।

इस दौरान इलाक़ा-ए-मेवात में तालीम, सेहत और समाजी तरक़्क़ी से जुड़े कई अहम मुद्दों पर बात हुई और विचारों का आदान-प्रदान किया गया। बातचीत बहुत सकारात्मक रही और समाज की बेहतरी के लिए मिलकर काम करने के तरीक़ों पर चर्चा की गई।

शुक्रिया।
डॉ. मोहम्मद रफ़ीक़

आज मुझे ज़िला स्तरीय "विकसित भारत यूथ पार्लियामेंट – 2026" कार्यक्रम में एक 'ज्यूरी मेंबर' के तौर पर शामिल होने का अवसर ...
10/03/2026

आज मुझे ज़िला स्तरीय "विकसित भारत यूथ पार्लियामेंट – 2026" कार्यक्रम में एक 'ज्यूरी मेंबर' के तौर पर शामिल होने का अवसर मिला। यह कार्यक्रम भारत सरकार के युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय के तहत यासीन मेव डिग्री कॉलेज, नूंह द्वारा आयोजित किया गया।

इस कार्यक्रम में नूंह ज़िले के अलग-अलग शिक्षण संस्थानों से आए कई प्रतिभाशाली युवा वक्ताओं ने भाग लिया। सभी प्रतिभागियों ने बहुत अच्छी तैयारी के साथ अपने विचार प्रस्तुत किए। उनकी रिसर्च, आत्मविश्वास, साफ़ सोच और फ़्लुएंट स्पीच ने वहाँ मौजूद सभी जजों, शिक्षकों और छात्रों को काफ़ी प्रभावित किया। इतनी कम उम्र में युवाओं की समझ और जागरूकता देखकर सच में बहुत खुशी हुई।

कार्यक्रम में नूंह ज़िले के विभिन्न कॉलेजों और संस्थानों से आए छात्रों की भी अच्छी भागीदारी रही। उन्होंने पूरे कार्यक्रम को बड़े ध्यान और उत्साह के साथ सुना और प्रतिभागियों का हौसला बढ़ाया। यह देखकर अच्छा लगा कि हमारे युवा लोकतंत्र, देश के अहम मुद्दों और विकसित भारत के विज़न में इतनी दिलचस्पी रखते हैं।

मैं यासीन मेव डिग्री कॉलेज के प्रिंसिपल जनाब प्रोफ़ेसर एजाज़ अहमद साहेब का दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ, जिनकी लीडरशिप और मार्गदर्शन में यह कार्यक्रम बहुत शानदार तरीक़े से आयोजित किया गया। कॉलेज के स्टाफ, विशेषकर जनाब लेक्चरर तैय्यब हुसैन साहेब, जनाब डॉ. इमरान चौधरी साहेब, जनाब डॉ. खालिद खान साहेब, जनाब डॉ. भूपेंद्र मालिक साहेब, मोहतरमा गुलिशतां बेगम साहिबा, और आयोजन समिति की मेहनत, लगन और बेहतरीन व्यवस्था वाकई क़ाबिले-तारीफ़ रही।

साथियों, ऐसे कार्यक्रम हमारे युवाओं में नेतृत्व क्षमता, तर्कशील सोच और ज़िम्मेदार नागरिक बनने की भावना को मज़बूत करते हैं। नूंह ज़िले के युवाओं का उत्साह और प्रतिभा देखकर हमारे इस पिछड़े इलाक़े के भविष्य के लिए बहुत उम्मीद पैदा होती है।

सभी प्रतिभागियों, कॉलेज स्टाफ और कार्यक्रम में शामिल छात्रों को इस सफल आयोजन के लिए दिल से मुबारकबाद। उम्मीद है कि हमारे युवा आगे भी इसी तरह देश और समाज के लिए अपनी सकारात्मक भूमिका निभाते रहेंगे।

शुक्रिया।
डॉ. मोहम्मद रफ़ीक़

जब कोई जिला लेवल का अफसर, वो भी एक ब्यूरोक्रेट आपकी बात की अहमियत समझते हुए अपनी गाड़ी से उतरकर ध्यान से सुनने लगे, तो स...
18/02/2026

जब कोई जिला लेवल का अफसर, वो भी एक ब्यूरोक्रेट आपकी बात की अहमियत समझते हुए अपनी गाड़ी से उतरकर ध्यान से सुनने लगे, तो समझ लीजिए कि आपने अपने सिर के बाल यूँ ही नहीं उड़ाए, यानि आपकी मेहनत और संघर्ष बेकार नहीं गए।

जी हाँ, यहां ज़िक्र जिला नूंह के अतिरिक्त उपायुक्त, श्री दलबीर सिंह जी का हो रहा है, जिन्होंने न सिर्फ़ गाड़ी से उतरकर हमारी बात सुनी, बल्कि अपने ड्राइवर को हिदायत दी कि सभी बुजुर्गों को CRID ऑफिस लेकर चलें। एडीसी साहेब के इस छोटे, लेकिन महत्वपूर्ण वाक़ये से यह साफ़ हुआ कि असली तालीम इंसान को विनम्र बनाती है, घमंडी नहीं।

साथियों, मामला बहुत संजीदा था; सैकड़ों बुजुर्गों की बुढ़ापा पेंशन पिछले करीब तीन महीनों से बंद थी, और कई दूसरे हकदार बुजुर्गों की पेंशन बनी ही नहीं। बुजुर्ग बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाते रहे, लेकिन हर बार यही कहा गया कि परिवार पहचान पत्र - PPP में उनकी सालाना आमदनी तय हद से ज़्यादा दर्ज है।

हकीकत यह है कि ज़्यादातर बुजुर्गों की कोई पक्की या रेगुलर आमदनी नहीं है। फिर भी उनके परिवार की सालाना इनकम ₹3 लाख से ₹8 लाख तक दिखा दी गई। इसी गलत एंट्री की वजह से उनकी पेंशन रोक दी गई। जबकि यह पेंशन उनके लिए सिर्फ पैसों का मसला नहीं, बल्कि इज़्ज़त के साथ ज़िंदगी गुज़ारने का सहारा है।

पेंशन बंद होने से उन्हें माली परेशानियों के साथ-साथ ज़हनी तनाव भी झेलना पड़ा। पिछले हफ्ते माननीय मुख्यमंत्री के दखल के बाद नवंबर 2025 की एक किस्त उनके खातों में आ गई, लेकिन PPP में दर्ज गलत आमदनी की दिक्कत अब भी बरकरार है।

इसी मसले को लेकर मैंने दर्जनों हकदार बुजुर्गों के साथ मिलकर एडीसी साहब से मुलाक़ात कर गुज़ारिश की कि इस मामले में फौरन, संजीदगी और मजबूती से कार्रवाई की जाए। हमने साफ कहा कि अगर PPP में दर्ज आमदनी को असली आर्थिक हालात के मुताबिक सही नहीं किया गया, तो आगे भी पेंशन रुकने का खतरा रहेगा। इसलिए सभी हकदार बुजुर्गों की आमदनी का निष्पक्ष वेरिफिकेशन हो और PPP में दर्ज गलत इनकम को तुरंत दुरुस्त किया जाए, ताकि आगे किसी की पेंशन बेवजह बंद न हो।

साथियों, यह सिर्फ़ पेंशन का मसला नहीं है, बल्कि हमारे बुजुर्गों की इज़्ज़त, हक़ और सोशल सिक्योरिटी का सवाल है। हमें उम्मीद है कि जिला प्रशासन असली हालात को समझते हुए इंसाफ़पूर्ण और संवेदनशील कार्यवाही करेगा।

नोट: ये तस्वीरें किसी शख़्स ने बिना बताए खींचीं और बाद में मुझे सरप्राइज़ करते हुए व्हाट्सएप पर भेजीं। मेरा मक़सद बुजुर्गों की तकलीफ को सोशल मीडिया पर परोस कर वाहवाही लूटना नहीं है, बल्कि एक असली मुद्दे को सामने लाना और एक अफ़सर की अपनी ड्यूटी के प्रति लगन को शेयर करना है।

शुक्रिया।
डॉ. मोहम्मद रफ़ीक़

01/02/2026

कुछ दिन पहले हमारे इलाक़े के एक गाँव में सरकारी नौकरी लगे हुए एक लड़के की सगाई हुई। सरकारी नौकरी थी, तो सगाई कैसी रही होगी, आप खुद समझ सकते हैं; जो कुछ भी आपके दिमाग में आ रहा है, ठीक वही सब हुआ।

सगाई के बाद लड़के ने लड़की के बारे में तहक़ीक़ात शुरू कर दी। लड़की ने जिस-जिस स्कूल-कॉलेज से पढ़ाई की थी, लड़का वहाँ ख़ुद पहुँचकर लोगों से सवाल करता रहा और लड़की के 'किरदार' की जाँच करता रहा।

आख़िरकार लड़के को लड़की पसंद नहीं आई। शादी से सिर्फ़ तीन-चार दिन पहले उसने शादी से इनकार कर दिया। लड़की वालों की लाखों रुपये की गाड़ी, तैयारी, सामान सब बेकार पड़ा रह गया और लड़की पक्ष को भारी बेइज़्ज़ती झेलनी पड़ी।

यह वाक़या आज की उस कड़वी सच्चाई को सामने लाता है, जहां रुतबे की भूख, दिखावे की शादियाँ, और तथाकथित एलीट बनने की अंधी दौड़, जिसकी क़ीमत औरतों की इज़्ज़त और परिवारों की ज़िंदगियाँ चुका रही हैं।

शुक्रिया।
डॉ. मोहम्मद रफ़ीक़

01/02/2026

हमारा इलाक़ा उत्तर भारत के सबसे ग़रीब इलाक़ों में से एक है। यह कोई बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात नहीं है। यहाँ की प्रति व्यक्ति आय राज्य और देश के औसत से बहुत कम है, और यही हमारी असली हक़ीक़त है। यहाँ ग़रीबी कोई आंकड़ा नहीं, बल्कि लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी की सच्चाई है।

ज़िले में लगभग आठ लाख महिलाएँ रहती हैं। इनमें से ज़्यादातर महिलाएँ खून की कमी और कुपोषण की शिकार हैं। बच्चे कमज़ोर हालत में पैदा होते हैं, और ग़रीबी बचपन से लेकर जवानी तक उनका पीछा नहीं छोड़ती। ये सब 'तथ्य' सरकारी और आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित हैं।

अब मैं अपना एक निजी तजुर्बा साझा करना चाहता हूँ, जो मैंने ख़ुद देखा और महसूस किया है। अपनी पीएचडी के लिए डेटा कलेक्शन के दौरान मैं ज़िले के एक गाँव में महिलाओं से इंटरव्यू कर रहा था। मैंने वहाँ मौजूद महिलाओं से उनकी उम्र, शिक्षा और वैवाहिक स्थिति के बारे में सवाल पूछे। लगभग सभी महिलाओं ने शांति और आत्मविश्वास के साथ जवाब दिए, सिवाय एक 23-24 साल की लड़की के।

जब मैंने उस बहन से पूरे सम्मान के साथ उनकी वैवाहिक स्थिति स्पष्ट करने को कहा, तो वह अचानक उठीं और रोते हुए वहाँ से चली गईं। कुछ पल के लिए मुझे लगा कि शायद मुझसे कोई ग़लत शब्द निकल गया हो। ख़ैर, हिम्मत जुटाकर मैंने वहाँ मौजूद दूसरी महिलाओं से पूछा कि वह इतनी भावुक होकर क्यों चली गईं। जो वजह उन्होंने बताई, उसे मैं ज़िंदगी भर नहीं भूल पाऊँगा।

उन्होंने बताया कि "यह लड़की पिछले पाँच-छह सालों से कुँवारी ही बैठी है। उसकी शादी सिर्फ़ इसलिए नहीं हो पा रही क्योंकि उसके पिता दहेज में मोटरसाइकिल देने की हैसियत नहीं रखते। इसी वजह से उसकी अब तक सगाई भी नहीं हो पाई है"। न सगाई, न शादी, न सामाजिक इज़्ज़त। उसकी हम-उम्र लड़कियाँ माँ तक बन चुकी थीं, जबकि वह ग़रीबी में एक गुमनाम ज़िंदगी जी रही थी; अपनी मर्ज़ी से नहीं, बल्कि मजबूरी से। यही वजह थी कि शादी का सवाल सुनते ही वह टूट गई और रोते हुए चली गई।

यह दर्द सिर्फ़ एक बेटी का नहीं है। हमारे इलाक़े में हज़ारों बेटियाँ ऐसी हैं जो ग़रीबी की वजह से आज भी शादी के इंतज़ार में अपने घरों में बैठी हैं।

साथियों, क्या ये हालात अचानक पैदा हुए हैं? बिल्कुल नहीं। यही वह सच्चाई है जो दिल्ली, गुरुग्राम और फ़रीदाबाद के चमकदार फ़ार्महाउसों में होने वाली भव्य शादियों के पीछे छुपी रहती है। ऐसे हालात में एलीट लोगों का दिखावा कोई परंपरा नहीं, बल्कि बेपरवाही और हवाबाज़ी का घिनौना तमाशा बन जाता है।

जब एलीट लोग एक ही रात में इतना पैसा उड़ा देते हैं, जितना ज़िले के 95 प्रतिशत से ज़्यादा परिवार पूरी ज़िंदगी में नहीं कमा पाते, तो वह खुशी का जश्न नहीं होता। वह इस बात का खुला एलान होता है कि उन्हें अपने आसपास की ग़रीबी से कोई मतलब नहीं है। इनके लिए क़ौम की ग़रीबी और दर्द सिर्फ़ अपनी कमाई का ज़रिया बन गया है।

जहाँ ज़्यादातर लोग दो वक्त की रोटी, इलाज और ज़रूरी ज़रूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हों, वहाँ स्थानीय एलीट द्वारा की जाने वाली भव्य शादियाँ निजी मामला नहीं रहतीं। यह एक गंभीर सामाजिक और नैतिक सवाल बन जाता है।

जब हज़ारों परिवार अपनी बेटियों की शादी इज़्ज़त से करने, बच्चों को पेट भर खाना खिलाने और इलाज कराने के लिए परेशान हों, तब अमीरों द्वारा दौलत का खुला प्रदर्शन एक तरह का सामाजिक ज़ुल्म है। सच यह है कि ऐसी शादियाँ खुशी के लिए नहीं, बल्कि ताक़त, रुतबा और दबदबा दिखाने के लिए की जाती हैं। ये गरीबों को उनकी 'औक़ात' याद दिलाने का तमाशा बन चुकी हैं।

इसके अलावा, जो नेता, समाजसेवी, अधिवक्ता, जेई, पटवारी, भावी, युवा या फ़ेसबुकिया लोग दहेज और ग़रीबी में फँसी अपने इलाक़े की बेटियों के बीच खड़े होकर ऐसे जश्नों में शामिल होते हैं, और वहाँ की रील या फोटो सोशल मीडिया पर डालते हैं, उन्हें समाज में इंसाफ़ और एकता की बातें करने का कोई नैतिक हक़ नहीं होना चाहिए।

याद रखिए, किसी समाज को इस बात से नहीं परखा जाता कि उसके अमीर लोग कितनी शानो-शौकत से शादी करते हैं, बल्कि इस बात से परखा जाता है कि वह अपने आसपास के दर्द और ग़रीबी को कितनी ईमानदारी से देखता और समझता है।

वैसे भी, हमारा मज़हब हमें सादगी, रहम और ज़िम्मेदारी की सीख देता है। और इंसानियत भी यही कहती है कि जब आसपास इतनी तकलीफ़ हो, तो जश्न के साथ संवेदनशीलता भी होनी चाहिए।

आज मेवात को चमकदार लाइटों, महंगे टेंटों और आलीशान कार्पेटों वाली शादियों की नहीं, बल्कि एक ऐसी सामाजिक मुहिम की ज़रूरत है जो एलीट वर्ग को उनके दिखावे की इंसानी क़ीमत का एहसास कराए।

शुक्रिया।
डॉ. मोहम्मद रफ़ीक़

21/01/2026

किसी भी समाज में 'सिविक सेंस' का स्तर वहाँ की तालीम, सेहत की सुविधाओं और पब्लिक संस्थाओं की हालत को दर्शाता है। अफ़सोस की बात यह है कि हमारे रोज़मर्रा के पब्लिक स्पेसेज़ में जो कुछ हम देखते हैं, उससे साफ़ झलकता है कि यह संकट कितना गहरा हो चुका है।

मामला गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, नल्हड़ से जुड़ा हुआ है। जी हाँ, एक ऐसी जगह जो इलाज और राहत के लिए बनी है, न कि लापरवाही से पैदा हुई अफ़रातफ़री के लिए।

मेडिकल कॉलेज में मरीज़ों और उनके साथ आने वाले लोगों के लिए बाकायदा पार्किंग की व्यवस्था मौजूद है। इसके बावजूद, लगभग रोज़ ही हमारी अपनी क़ौम के कुछ लोग मुख्य रास्तों को ब्लॉक करते हुए अपनी गाड़ियाँ बेढंगी तरीके से पार्क कर देते हैं और फिर ऐसे गायब हो जाते हैं, जैसे यह जगह उनकी बपौती हो।

कल ही का एक ताज़ा मामला है। दो-तीन गाड़ियों को इस तरह खड़ा किया गया था कि पूरी पार्किंग जाम हो गई। नतीजा यह हुआ कि दो दर्जन से अधिक गाड़ियां, 15-20 मरीज़ और उनके साथ आए लोग 45 मिनट से ज़्यादा समय तक वहीं फँसे रहे। हालात ऐसे बन गए कि बीमार मरीज़ इंतज़ार करते रहे, और उनके घरवाले घबराते रहे।

जब काफ़ी देर बाद रास्ता रोकने वाली गाड़ियों के ड्राइवर लौटे और उनसे सवाल किया गया, तो उनका रवैया ऐसा था जैसे उन्होंने कोई ग़लत काम ही न किया हो। और करें भी क्यों; जिस समाज में क़ानून और नियमों को मज़ाक समझा जाता हो, वहाँ घमंड ही हिम्मत बन जाता है।

दोस्तों, यह सिर्फ़ पार्किंग की समस्या नहीं है। असली समस्या बेसिक सिविक सेंस की कमी है, जिसे हम रोज़ नज़रअंदाज़ करते आ रहे हैं। यह घटना साफ़ बताती है कि बिना सिविक सेंस के कोई भी इंफ़्रास्ट्रक्चर, बजट या सरकारी योजना ठीक से परवान नहीं चढ़ सकती। जब निजी सहूलियत को सार्वजनिक ज़िम्मेदारी से ऊपर रखा जाता है, तो अस्पताल इंतज़ारख़ाने बन जाते हैं और मरीज़ों को उसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ता है।

वैसे भी, जो समाज अस्पताल के बाहर ढंग से पार्किंग भी नहीं कर सकता, उसे टूटी हुई हेल्थकेयर व्यवस्था पर शिकायत करने का नैतिक हक़ नहीं है। जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि पब्लिक जगहें पब्लिक ज़िम्मेदारी माँगती हैं, और जब तक हम ख़ुद में बदलाव नहीं लाएँगे, तब तक ऐसी हरकतें हमारी सार्वजनिक संस्थाओं को अंदर से खोखला करती रहेंगी।

धन्यवाद।
डॉ. मोहम्मद रफ़ीक़

हमारे गांव सूड़ाका से बड़े भाई जनाब अली मोहम्मद पहलवान साहेब के बेटे समीर खान ने अंडर-19 स्कूल नेशनल गेम्स 2026 की वेटलि...
09/01/2026

हमारे गांव सूड़ाका से बड़े भाई जनाब अली मोहम्मद पहलवान साहेब के बेटे समीर खान ने अंडर-19 स्कूल नेशनल गेम्स 2026 की वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीत कर न सिर्फ मेवात, बल्कि पूरे हरियाणा राज्य का नाम रोशन किया है। इससे पहले वे खेलो इंडिया यूथ गेम्स 2025 में 'ब्रॉन्ज मेडल' भी जीत चुके हैं।

समीर की यह कामयाबी महज़ एक खिलाड़ी की व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि सरकारी उपेक्षा और संसाधनों की भारी कमी के बावजूद उभरी हुई प्रतिभा की जीत है। यह उपलब्धि उन तमाम दावों पर सीधा सवाल खड़ा करती है, जिनमें कहा जाता है कि हमारे इलाक़े में क़ाबिलियत की कमी है। सच्चाई यह है कि कमी क़ाबिलियत की नहीं, बल्कि मौकों, सुविधाओं और ईमानदार राजनीतिक नीयत की है।

यह सफलता सरकारों और स्थानीय नेतृत्व, दोनों के लिए एक आईना है। अगर मेवात जैसे इलाक़े में खेल के मैदान, प्रशिक्षित कोच, छात्रवृत्तियाँ और बुनियादी सुविधाएँ ईमानदारी से मुहैया कराई जाएँ, तो यहाँ के नौजवान किसी भी ज़िले या राज्य से पीछे नहीं हैं।

समीर की इस मंज़िल के पीछे उनके वालिद अली मोहम्मद साहेब, जो ख़ुद राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रह चुके हैं, और उनके कोच मास्टर आबिद हुसैन साहेब की लगातार मेहनत, अनुशासन और निस्वार्थ योगदान है। यह इस बात का सबूत है कि सही मार्गदर्शन मिलने पर सीमित संसाधन भी रुकावट नहीं बनते।

समीर के अलावा, अली मोहम्मद साहेब के एक बेटे ज़हीर खान, CISF में हेड कांस्टेबल के तौर पर देश की सेवा कर रहे हैं और साथ ही वेटलिफ्टिंग में भी सक्रिय हैं। वहीं उनके सबसे बड़े बेटे आमिर खान, गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, नल्हड़ से एमबीबीएस के फाइनल ईयर में पढ़ाई कर रहे हैं।

साथियों, आज ज़रूरत इस बात की है कि ऐसी कामयाबियों को केवल बधाइयों और तारीफ़ तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इन्हें नीतिगत बदलाव की बुनियाद बनाया जाए। मेवात के नौजवानों को भी वही अवसर, वही सम्मान और वही निवेश मिलना चाहिए, जो राज्य के अन्य ज़िलों को मिलता रहा है।

अब भी वक्त है कि हम नारों और खोखले वादों की राजनीति से आगे बढ़ें और शिक्षा व खेलों में वास्तविक, ज़मीनी निवेश करें। क्योंकि खेलों में उत्कृष्टता और तालीम में लगन ही एक प्रोग्रेसिव समाज की असली तरक़्क़ी और आत्मसम्मान की पहचान होती है।

शुक्रिया।
डॉ. मोहम्मद रफ़ीक़

हमारे इलाके की यह एक कड़वी और शर्मनाक सच्चाई है कि गाँवों के सरपंच, एयरमैन-चेयरमैन, ठोंडां, अगैरह-वगैरह सफेदपोश लोगों के...
04/01/2026

हमारे इलाके की यह एक कड़वी और शर्मनाक सच्चाई है कि गाँवों के सरपंच, एयरमैन-चेयरमैन, ठोंडां, अगैरह-वगैरह सफेदपोश लोगों के दल प्रस्तावित यूनिवर्सिटी के लिए ज़मीन देने को लेकर जिला उपायुक्त के दफ्तर में एक के बाद एक मेमोरेंडम जमा कर रहे हैं, लेकिन उन्हीं के गाँवों में पहले से ही मौजूद सरकारी स्कूलों में जो शिक्षा पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है, उस पर वे जानबूझकर चुप्पी साधे हुए हैं।

ख़ुद उनके गांवों के स्कूलों में न टीचर हैं, न निगरानी; यह सब उन्हें उतना ज़रूरी मुद्दा नहीं लगता, जितना यूनिवर्सिटी के लिए जमीन मुहैया कराने की तत्परता। मतलब अपने गांव के बच्चों को चुपचाप सिस्टम के हवाले छोड़ा हुआ है।

इन तथाकथित जनप्रतिनिधियों में से ज़्यादातर आख़िरी बार अपने नज़दीकी स्कूल में तब दाख़िल हुए थे, जब चुनाव थे। उस समय स्कूल उन्हें पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि सिर्फ़ पोलिंग बूथ के रूप में याद आए; ना कभी बच्चों की पढ़ाई पर सवाल, ना जवाबदेही की माँग।

यूनिवर्सिटी के लिए उनका जोश शिक्षा की ज़रूरत से नहीं, बल्कि निजी सुविधा से जुड़ा हुआ है। उनकी दलीलें हैं कि "उनके वहां पानी है, पहाड़ हैं, ये है, वो है"। ऐसे बहाने देकर असल मक़सद यह है कि यूनिवर्सिटी उनके घर, उनके बटेवड़े, उनके भूसा भरने के बोंगे या उनके चुनावी कार्यालय के आसपास ही बने।

साथियों, जिले में यूनिवर्सिटी चाहे जहाँ बने, लेकिन एक सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता: जो लोग रौशनी के सबसे क़रीब खड़े होते हैं, वही अक्सर अपने आसपास अँधेरा बनाए रखते हैं।

इसे हक़ीक़त को समझने के लिए दिल्ली में मौजूद जामिया मिलिया इस्लामिया और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी का उदाहरण काफ़ी है। मैंने जामिया में अपनी ज़िंदगी के बेशक़ीमती पंद्रह साल बिताए। इस दौरान मैंने जामिया से सटे इलाक़े, 'अज़ीम डेयरी' को बहुत क़रीब से देखा।

इन पंद्रह सालों में मुझे उस मोहल्ले का एक भी लड़का या लड़की ऐसा नहीं मिला जिसने जामिया से ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई पूरी की हो। जबकि हम हरियाणा, राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से आए हज़ारों छात्रों ने वहाँ किराये पर कमरे लेकर अपनी तालीम पूरी की।

यही हाल जेएनयू से सटे हुए 'मुनिरका' इलाक़े का है। वहाँ भी शायद ही कोई स्थानीय लोग, (अगर कोई हों भी तो बहुत कम) जेएनयू से पढ़ाई पूरी कर पाए हैं।

इससे एक बात बिल्कुल साफ़ हो जाती है कि किसी इलाक़े में यूनिवर्सिटी का होना अपने-आप में वहाँ के लोगों की तालीम की गारंटी नहीं होती। असली सवाल यह है कि इस सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े ज़िले में बनने वाली यूनिवर्सिटी वाक़ई यहाँ के नौजवानों के लिए होगी या फिर बाहर से आने वाले छात्रों के लिए? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे स्थानीय युवा बस तमाशबीन बने रहें!

कहने का मतलब साफ है मोहल्ले में यूनिवर्सिटी होना, मोहल्ले के बच्चों के पढ़े-लिखे होने की गारंटी नहीं है। अगर इस ज़िले को सच में बदलना है, तो सवाल यह नहीं कि यूनिवर्सिटी कहाँ बनेगी, बल्कि यह है कि वह किसके लिए बनेगी। वरना यूनिवर्सिटी तो अपनी रौशनी में चमकती व जगमगाती रहेगी, लेकिन उसकी परछाईं में रहने वाले हमारे बच्चे अँधेरे में ही रह जाएंगे।

सोचिएगा ज़रूर!

शुक्रिया।
डॉ. मोहम्मद रफ़ीक़

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