प्यारो वृन्दावन

प्यारो वृन्दावन Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from प्यारो वृन्दावन, वृन्दावन, Nokha.

गुरु ने थामा हाथ तो किस्मत भी बदल गई,सूखी सी मेरी राहें फूलों से संवर गई।🙏🏻🙏🏻❤️jai siyaram radhe radhe❤️🙏🏻🙏🏻
04/04/2026

गुरु ने थामा हाथ तो किस्मत भी बदल गई,
सूखी सी मेरी राहें फूलों से संवर गई।

🙏🏻🙏🏻❤️jai siyaram radhe radhe❤️🙏🏻🙏🏻




संबंधों के धनी, धर्म हित, सब अनुबंध निभाए थे,कई प्रयोजन रहे  राम के, तब धरती पर  आए थे, #राम  #रामलला  #रामनवमी  #गीत   ...
04/04/2026

संबंधों के धनी, धर्म हित, सब अनुबंध निभाए थे,
कई प्रयोजन रहे राम के, तब धरती पर आए थे,
#राम #रामलला #रामनवमी #गीत

भगवान श्रीकृष्ण के अथक प्रयत्नों के बाद भी महाभारत का महासंग्राम टल न सका। इस बात से महामुनि उत्तंक के हृदय में तीव्र आक...
04/04/2026

भगवान श्रीकृष्ण के अथक प्रयत्नों के बाद भी महाभारत का महासंग्राम टल न सका। इस बात से महामुनि उत्तंक के हृदय में तीव्र आक्रोश उमड़ रहा था। उन्हें लगता था कि यदि स्वयं नारायण चाह लेते, तो यह विनाश रुक सकता था।
संयोगवश उसी समय भगवान श्रीकृष्ण द्वारिका की ओर जाते हुए मुनि उत्तंक के आश्रम पर आ पहुँचे।
उन्हें देखते ही मुनि के संयम के बाँध टूट गए। कटु स्वर में बोले—
“आप सर्वशक्तिमान होकर भी इस युद्ध को रोक न सके! क्या आपको इसके लिए शाप देना अनुचित होगा?”
श्रीकृष्ण मंद मुस्कान के साथ बोले—
“महामुनि! जब किसी को विवेक दिया जाए, सत्य का मार्ग दिखाया जाए, और फिर भी वह उसे ठुकरा दे, तो उस अपराध का भार मार्गदर्शक पर कैसे डाला जा सकता है?
यदि मुझे ही सब कुछ कर देना होता, तो इस संसार में मनुष्य को कर्म और निर्णय का अधिकार क्यों दिया जाता?”
परंतु उत्तंक का क्रोध शान्त न हुआ। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे शाप देकर ही मानेंगे।
तब भगवान ने अपना दिव्य विराट स्वरूप प्रकट किया और गंभीर स्वर में बोले—
“मैंने आज तक किसी का अहित नहीं किया। जो निष्पाप होता है, वह पर्वत के समान अडिग होता है। आप चाहें तो शाप देकर देख लें—मेरा कुछ भी अनिष्ट नहीं होगा।
हाँ, यदि किसी वरदान की इच्छा हो, तो अवश्य कहिए।”
मुनि ने कहा—
“यदि ऐसा है, तो इस निर्जल मरुस्थल को भी हरा-भरा कर दीजिए। यहाँ जल-वृष्टि हो।”
कृष्ण ने सहज भाव से कहा—“तथास्तु।”
अगर आपको कथा संग्रह की पोस्ट पसंद आती है तो आज ही सब्सक्राइब करें कथा संग्रह
और वहाँ से प्रस्थान कर गए।
कुछ समय बाद एक प्रातः महामुनि भ्रमण हेतु निकले। सहसा धूलभरी आँधी उठी और वे दिशा भ्रम में मरुस्थल में भटक गए। जब आँधी थमी, तो चारों ओर न निर्जलता थी, न जीवन—केवल तपती रेत और प्रचंड धूप।
प्यास से व्याकुल होकर उनके प्राण संकट में पड़ने लगे।
तभी उन्होंने देखा—एक चाण्डाल चमड़े के पात्र में जल लेकर सामने खड़ा है और विनम्र स्वर में जल पीने का आग्रह कर रहा है।
मुनि क्रोधित हो उठे—
“दूर हट! नीच जाति के होकर मुझे जल देने आया है! अभी शाप देकर भस्म कर दूँगा!”
क्रोध के साथ उनके मन में कृष्ण के प्रति भी रोष उमड़ पड़ा—
“उस दिन मुझे छल कर चले गए, आज मेरी परीक्षा ले रहे हैं।”
जैसे ही उन्होंने शाप देने के लिए मुख खोला—
सामने भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हो गए।
शांत स्वर में बोले—
“महामुनि! आप ही तो कहते हैं कि आत्मा ही आत्मा को पहचानती है, आत्मा ही इन्द्र है और आत्मा ही परमात्मा।
फिर बताइए—क्या इस चाण्डाल की आत्मा में इन्द्र नहीं थे?
यही इन्द्र आपको अमृत पिलाने आए थे, और आपने उन्हें ठुकरा दिया।”
यह कहकर भगवान अदृश्य हो गए—और साथ ही वह चाण्डाल भी।
मुनि उत्तंक स्तब्ध रह गए। उनके हृदय में पश्चाताप की अग्नि जल उठी। उन्होंने अनुभव किया कि—
“मैंने जाति, ज्ञान और तप के अहंकार में शास्त्रों को केवल पढ़ा, जिया नहीं।
यदि कौरव और पाण्डव भी श्रीकृष्ण के उपदेश को आचरण में न ला सके, तो उसमें भगवान का क्या दोष?”
उन्होंने अंततः सत्य को स्वीकार किया—
महापुरुष केवल दिशा दिखाते हैं।
चलना स्वयं पड़ता है।
जो प्राप्त ज्ञान को व्यवहार में न उतारे, वह स्वयं ही उसके फल से वंचित रह जाता है।
🏵 ।। जय श्रीकृष्ण जी ।। 🏵

04/04/2026

श्री कृष्ण💕 आपकी मेरी प्रीत पुरानी है, शक की कोई गुंजाइश नहीं !!
श्री चरणों में रहना हमेशा मेरी सबसे बड़ी इच्छा है!!
यह मेरी एक सच्ची और पवित्र फरमाइश है
!! जय श्री कृष्णा !!

मेरे लाडले की टेढ़ी मेढ़ी चितवन पर यह सारा जग बलिहार है...!! ✨ नैनों में वो करुणा, मुख पर वो मंद मुस्कान, और चरणों में स...
04/04/2026

मेरे लाडले की टेढ़ी मेढ़ी चितवन पर यह सारा जग बलिहार है...!! ✨ नैनों में वो करुणा, मुख पर वो मंद मुस्कान, और चरणों में सारा ब्रह्मांड। 🌍❤️ जिनके दर्शन मात्र से मन की सारी उलझनें सुलझ जाती हैं, और रोम-रोम पुलकित हो उठता है। 🌿 मेरे प्राणप्रिय, मेरे सर्वस्व, बस यूँ ही अपनी कृपा की छाया बनाए रखना। आपके चरणों की धूल ही मेरी असली जागीर है! 🙏🌷💖"

​ 🌸🙌✨💐🍀❤️

हारने न देना भगवान कठिन इम्तिहान है, जीत में हम दोनों का मान है क्योंकि मैं आपके भरोसे हूं और यही मेरी पहचान है....Radhe...
04/04/2026

हारने न देना भगवान कठिन इम्तिहान है, जीत में हम दोनों का मान है क्योंकि मैं आपके भरोसे हूं और यही मेरी पहचान है....Radhe Radhe 🙏

दुर्गा सप्तशती, जिसे 'देवी महात्म्य' भी कहा जाता है, मार्कण्डेय पुराण का एक अंश है। इसमें देवी दुर्गा के शौर्य, शक्ति और...
21/03/2026

दुर्गा सप्तशती, जिसे 'देवी महात्म्य' भी कहा जाता है, मार्कण्डेय पुराण का एक अंश है। इसमें देवी दुर्गा के शौर्य, शक्ति और असुरों पर उनकी विजय की गाथा 700 श्लोकों में वर्णित है।
इसकी मुख्य कथा तीन प्रमुख भागों में विभाजित है, जो हमें राजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य के माध्यम से सुनाई जाती है।
1. प्रथम चरित्र: मधु-कैटभ वध
कथा की शुरुआत तब होती है जब राजा सुरथ और समाधि वैश्य, अपने-अपने जीवन में धोखा मिलने के बाद, महर्षि मेधा के आश्रम में मिलते हैं। महर्षि उन्हें बताते हैं कि यह सब 'महामाया' की शक्ति है।
पृष्ठभूमि: सृष्टि के आरंभ में जब भगवान विष्णु क्षीर सागर में योगनिद्रा में थे, तब उनके कान के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो भयंकर असुर पैदा हुए।
युद्ध: वे ब्रह्मा जी को मारने दौड़े। ब्रह्मा जी ने योगनिद्रा (महामाया) की स्तुति की।
परिणाम: देवी ने विष्णु जी को जगाया और उन्होंने उन असुरों का संहार किया।
2. मध्यम चरित्र: महिषासुर मर्दिनी
यह सप्तशती का सबसे लोकप्रिय हिस्सा है।
असुर का उदय: महिषासुर नामक राक्षस ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और देवताओं को वहां से निकाल दिया।
देवी का प्राकट्य: सभी देवताओं के क्रोध और तेज से एक दिव्य पुंज प्रकट हुआ, जिसने मां दुर्गा का रूप लिया। देवताओं ने उन्हें अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र भेंट किए।
युद्ध: देवी और महिषासुर के बीच भीषण युद्ध हुआ। अंत में, जब वह भैंसे का रूप धरकर आया, तब देवी ने उसका वध कर दिया। इसी कारण उन्हें 'महिषासुर मर्दिनी' कहा जाता है।
3. उत्तम चरित्र: शुम्भ-निशुम्भ और चण्ड-मुण्ड
यह भाग देवी के विभिन्न रूपों (जैसे काली और अम्बिका) की महिमा बताता है।
असुरों का अत्याचार: शुम्भ और निशुम्भ नाम के भाइयों ने तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था।
माँ काली का उदय: जब असुर चण्ड और मुण्ड देवी को पकड़ने आए, तो देवी के ललाट से माँ काली प्रकट हुईं, जिन्होंने इन दोनों का वध किया (जिससे उनका नाम 'चामुण्डा' पड़ा)।
रक्तबीज का अंत: इसके बाद रक्तबीज नामक असुर आया, जिसकी खून की हर बूंद से नया असुर पैदा होता था। काली ने उसका रक्त पीकर उसे समाप्त किया।
पूर्ण विजय: अंत में देवी ने शुम्भ और निशुम्भ का वध कर देवताओं को फिर से स्वर्ग का राज्य दिलाया।
सप्तशती का सार
दुर्गा सप्तशती केवल युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि यह अधर्म पर धर्म और अज्ञान पर ज्ञान की जीत का प्रतीक है। यह हमें सिखाती है कि जब भी संसार में बुराई बढ़ती है, शक्ति का दैवीय रूप उसे नष्ट करने के लिए अवश्य प्रकट होता है।

मध्य प्रदेश की पावन धरा पर जन्मे संत मलूक दास जी के भीतर एक दिन एक विचित्र जिज्ञासा ने जन्म लिया। उन्होंने सुना था कि पर...
21/03/2026

मध्य प्रदेश की पावन धरा पर जन्मे संत मलूक दास जी के भीतर एक दिन एक विचित्र जिज्ञासा ने जन्म लिया। उन्होंने सुना था कि परमात्मा 'अजगर' को भी पाल लेता है। उनके मन में सवाल उठा— "क्या सच में वह परमपिता इतना दयालु है कि बिना मांगे, बिना हाथ पैर हिलाए भी निवाला गले के नीचे उतार सकता है?"

यही वह पल था जब मलूक दास जी ने ठान लिया कि आज वे ईश्वर की परीक्षा लेंगे। वे एक सघन, डरावने और निर्जन जंगल की ओर निकल पड़े। जहाँ दूर-दूर तक किसी इंसान की परछाईं भी न थी, वहाँ एक विशाल बरगद के वृक्ष की सबसे ऊँची शाखा पर जाकर वे ऐसे छिप गए जैसे कोई शिकारी घात लगाकर बैठता है।

उनकी प्रतिज्ञा पत्थर की लकीर थी:

"न मैं हाथ हिलाऊंगा, न मैं मुँह खोलूंगा। हे जगत के स्वामी, अगर तू कण-कण में है, तो इस वीरान जंगल में मुझे ढूँढकर दिखा और बिना मेरी मर्जी के खिलाकर दिखा!"

जैसे-जैसे सूरज ढला, जंगल की खामोशी और गहरी होती गई। मलूक दास जी के पेट में भूख की आग दहकने लगी। गला सूखकर कांटा हो गया, शरीर कांपने लगा, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। शाम ढली और रात के साये गहराने लगे, तभी अचानक सूखी पत्तियों के चरचराने की आवाज आई।

एक शाही काफिला रास्ता भटककर उसी पेड़ के नीचे आ रुका। राजा के सेवक थे, साथ में बहुमूल्य सोने-चाँदी के बर्तनों में सजे 'छप्पन भोग' थे। अभी वे भोजन की तैयारी कर ही रहे थे कि दूर से घोड़ों की टापों की आवाज सुनाई दी। "डाकू आए! डाकू आए!" का शोर मचा और डर के मारे पूरा काफिला सारा राजसी भोजन वहीं छोड़कर जान बचाकर भाग निकला।

पेड़ के नीचे अब सुगंधित पकवानों का अंबार लगा था। मलूक दास जी ऊपर से देख रहे थे। वे मुस्कुराए— "वाह प्रभु! खाना तो भेज दिया, पर हाथ तो मुझे ही चलाना पड़ेगा न? पर याद रखना, मेरी शर्त अभी टूटी नहीं है!"

तभी झाड़ियों को चीरते हुए साक्षात काल के समान खूंखार डाकुओं का गिरोह वहाँ आ धमका। उनकी नंगी तलवारें चाँदनी रात में चमक रही थीं। सरदार की नजर उन कीमती बर्तनों और पकवानों पर पड़ी, तो वह ठिठक गया। उसे दाल में कुछ काला लगा।

वह दहाड़ा, "ठहरो! इस सुनसान जंगल में यह शाही दावत? यह पक्का कोई जाल है। किसी ने इसमें जहर मिलाया है ताकि हमें मारकर हमारा धन लूट सके।" तभी एक डाकू की निगाह ऊपर गई— "सरदार! ऊपर देखो, कालिया नाग की तरह कोई छिपा बैठा है! पक्का इसी ने यह प्रपंच रचा है।"

डाकुओं ने मलूक दास जी को नीचे घसीटा। वे भूख से अधमरे थे, पर मौन थे। सरदार ने उनकी गर्दन पर तलवार रख दी— "ए पाखंडी! बोल, क्या इसमें जहर है? तू हमें मारना चाहता है? अब देख, तू ही इसे पहले खाएगा, वरना अभी तेरा सिर धड़ से अलग कर दूँगा!"

मलूक दास जी ने मुँह नहीं खोला। वे तो अपनी जिद पर अड़े थे। डाकुओं को लगा कि यह मरने से डर रहा है क्योंकि खाना जहरीला है। गुस्से में पागल सरदार ने चिल्लाकर कहा—

"पकड़ो इसके हाथ-पैर! इसका जबड़ा फाड़ो और इसके गले में यह खाना ठूँस दो!"

* दो डाकुओं ने उनके हाथ पीछे से जकड़ लिए।

* एक ने जबरदस्ती उनका मुँह खोला।

* तीसरा डाकू बड़े-बड़े ग्रास उनके मुँह में डालने लगा।

मलूक दास जी की आँखों से प्रेमाश्रुओं की धारा बह निकली। उनके मन ने पुकारा:

"बलिहारी जाऊं तेरी लीला पर मेरे मालिक! मैं हाथ नहीं हिलाना चाहता था, तो तूने डाकुओं से मेरे हाथ पकड़वा दिए। मैं मुँह नहीं खोलना चाहता था, तो तूने मौत का डर दिखाकर मेरा मुँह खुलवा दिया। तू खिलाता भी है, और खिलाने के लिए 'नौकर' भी खुद ही भेजता है!"

जब मलूक दास जी का पेट भर गया और डाकुओं ने उनके चेहरे पर वह ईश्वरीय तेज देखा, तो वे समझ गए कि यह कोई अपराधी नहीं, महापुरुष हैं। वे सब उनके चरणों में गिर पड़े।

मलूक दास जी उसी अवस्था में उठे और वह कालजयी दोहा कहा जो आज भी हर घर में गूँजता है:

अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।
दास मलूका कहि गए, सब के दाता राम॥

यह कथा हमें यह नहीं सिखाती कि हम आलसी बन जाएं, बल्कि यह सिखाती है कि जब इंसान अपना 'अहंकार' त्याग देता है और पूरी तरह उस परम सत्ता पर भरोसा करता है, तो ईश्वर स्वयं उसकी जिम्मेदारी उठा लेते हैं। जब हम हार मान लेते हैं, तब ईश्वर की जीत शुरू होती है।

पंढरपुर धाम की पावन भूमि ने अनेक संतों को देखा है, पर संत कान्होपात्रा की कथा सबसे अलग और हृदयस्पर्शी है।संत कान्होपात्र...
21/03/2026

पंढरपुर धाम की पावन भूमि ने अनेक संतों को देखा है, पर संत कान्होपात्रा की कथा सबसे अलग और हृदयस्पर्शी है।

संत कान्होपात्रा की कहानी भक्ति, साहस और समर्पण की एक अद्भुत मिसाल है। उनकी कथा मुख्य रूप से महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय से जुड़ी है।

कान्होपात्रा का जन्म 15वीं शताब्दी में महाराष्ट्र के मंगलवेधा (पंढरपुर के पास) में हुआ था। उनकी माँ 'शामा' एक प्रसिद्ध नर्तकी और गणिका थीं। कान्होपात्रा बचपन से ही अत्यंत सुंदर थीं, लेकिन उनका मन सांसारिक चमक-धमक की जगह आध्यात्मिकता की ओर अधिक था।

जैसे-जैसे कान्होपात्रा बड़ी हुईं, उनकी सुंदरता की चर्चा दूर-दूर तक फैल गई। उनकी माँ चाहती थी कि वह भी उनकी तरह राजदरबार में नर्तकी बनें, लेकिन कान्होपात्रा ने ठान लिया था कि वह केवल उसी से विवाह करेंगी जो उनसे भी अधिक सुंदर हो।
एक बार उन्होंने वारकरी संतों के मुख से भगवान विठ्ठल (विष्णु जी) की महिमा सुनी। संतों ने उन्हें बताया कि विठ्ठल से सुंदर इस जगत में कोई नहीं है। बस उसी क्षण से कान्होपात्रा ने अपना जीवन पंढरपुर के भगवान विठ्ठल को समर्पित कर दिया।

कान्होपात्रा की सुंदरता का समाचार बीदर के सुल्तान तक पहुँचा। सुल्तान ने उन्हें अपनी दासी बनाने का आदेश दिया और उन्हें ले जाने के लिए सैनिक भेजे। कान्होपात्रा वहां नहीं जाना चाहती थीं। उन्होंने सैनिकों से प्रार्थना की कि उन्हें बीदर जाने से पहले एक बार पंढरपुर जाकर अपने आराध्य विठ्ठल के दर्शन करने की अनुमति दी जाए। सैनिक उन्हें लेकर पंढरपुर पहुँचे।
अंतिम समर्पण और मुक्ति
मंदिर पहुँचकर कान्होपात्रा सीधे गर्भगृह में गईं और विठ्ठल के चरणों में गिरकर रोने लगीं। उन्होंने प्रार्थना की कि हे प्रभु, मुझे इस अपमान से बचा लीजिए और अपने चरणों में शरण दीजिए।

कहा जाता है कि जब सुल्तान के सैनिक उन्हें जबरदस्ती ले जाने के लिए मंदिर के अंदर घुसे, तब कान्होपात्रा की आत्मा विठ्ठल की मूर्ति में समा गई। उनकी देह वहीं शांत हो गई।

उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें अपने पास बुला लिया। उनकी इच्छानुसार, उनकी समाधि पंढरपुर के मुख्य मंदिर के दक्षिणी द्वार पर बनाई गई है, जहाँ आज भी एक तरटी (बेर) का वृक्ष खड़ा है।

संत कान्होपात्रा की कहानी हमें सिखाती है कि भक्ति का मार्ग किसी जाति, पेशे या सामाजिक स्थिति का मोहताज नहीं होता। शुद्ध हृदय से पुकारने पर ईश्वर भक्त की रक्षा अवश्य करते हैं।

।। जय जय विठ्ठल, जय हरि विठ्ठल ।।

एक गरीब इन्सान था, वो हर रोज नजदीक के मंदिर में जाकर वहां साफ-सफाई करता और फिर अपने काम पर चला जाता था, अक्सर वो अपने प्...
21/03/2026

एक गरीब इन्सान था, वो हर रोज नजदीक के मंदिर में जाकर वहां साफ-सफाई करता और फिर अपने काम पर चला जाता था, अक्सर वो अपने प्रभू से कहता कि मेरे पास ढेर सारा धन-दौलत आ जाए ऎसी कृपा कर दो...
एक दिन ठाकुर जी ने बाल रूप में प्रगट होते हुए उस इन्सान से पूछ ही लिया कि क्या तुम मन्दिर में केवल इसीलिए, काम करने आते हो, उस इन्सान ने भी पूरी ईमानदारी से कहा कि हां, मेरा उद्देश्य तो यही है कि मेरे पास ढेर सारा धन आ जाए, इसीलिए तो आपके दर्शन करने आता हूं, रेल की पटरी पर सामान बेचते बेचते थक गया हूं, पता नहीं, मेरे सुख के दिन कब आएंगे...
बाल रूप ठाकुर जी ने कहा कि, तुम चिंता मत करो, जल्द ही तुम्हारी इच्छा पूरी होने वाली हैं, समय पलट गया, वो धन कमाने लगा और इतना व्यस्त हो गया कि मन्दिर में जाना ही छूट गया, कई वर्षों बाद वह एक दिन सुबह ही मन्दिर पहुंचा और साफ-सफाई करने लगा...
ठाकुर जी फिर प्रगट हुए और उस व्यक्ति से बड़े ही आश्चर्य से पूछा, क्या बात है, इतने वर्षों के बाद आए हो, सुना है बहुत बड़े सेठ बन गए हो, वो व्यक्ति बोला, बहुत धन कमाया, अच्छे घरों में बच्चों का विवाह किया, पैसे की कोई कमी नहीं है पर दिल में चैन नहीं है, मन में ऐसा ख्याल आया करता था कि रोज सेवा करने आता रहूं, पर आ ना सका, व्यक्ति बोला, हे प्रभू, आपने मुझे सब कुछ दिया पर जिंदगी में चैन और शांति नहीं दिया...
प्रभू जी ने कहा कि तुमने वह मांगा ही कब था, जो तुमने मांगा वो तो तुम्हें मिल गया ना, फिर आज यहां क्या करने आए हो?
उसकी आंखों में आंसू भर आए, ठाकुर जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला अब कुछ मांगने के लिए सेवा नहीं करूंगा, बस दिल को शांति मिल जाए, ठाकुर जी ने कहा पहले तय कर लो कि अब कुछ मागने के लिए मन्दिर की सेवा नहीं करोगे, बस मन की शांति के लिए ही आओगे...
सच में, मन की शांति सबसे अनमोल है और अपना कर्म करो, पर मनमें यह बात याद रखो जो प्राप्त है वह पर्याप्त है...
जय श्री राधे कृष्ण.....

नवरात्रि के तीसरे दिन माँ दुर्गा के तृतीय स्वरूप माँ चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद...
21/03/2026

नवरात्रि के तीसरे दिन माँ दुर्गा के तृतीय स्वरूप माँ चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण इन्हें 'चंद्रघंटा' कहा जाता है।
माँ चंद्रघंटा का यह स्वरूप अत्यंत कल्याणकारी और शांतिदायक है, लेकिन दुष्टों के लिए वे उतनी ही संहारक भी हैं।
माँ चंद्रघंटा की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब महिषासुर नामक राक्षस ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया था और देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया था, तब सभी देवता त्रस्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शरण में गए।
* देवों का तेज: देवताओं की व्यथा सुनकर त्रिदेवों को अत्यंत क्रोध आया। उस क्रोध से तीनों के मुख से एक दिव्य ऊर्जा उत्पन्न हुई, जो बाद में दसों दिशाओं की शक्तियों के साथ मिलकर एक देवी के रूप में प्रकट हुई।
* अस्त्रों का उपहार: भगवान शिव ने अपना त्रिशूल, विष्णु जी ने चक्र, इंद्र ने अपना वज्र और घंटा, और सूर्य देव ने अपनी तलवार और तेज देवी को समर्पित किया।
* महिषासुर का वध: माँ चंद्रघंटा ने अपने सिंह पर सवार होकर असुरों की सेना पर आक्रमण किया। उनके घंटे की भयानक ध्वनि से असुर मूर्छित होने लगे। अंततः माँ ने महिषासुर का वध कर देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई।
देवी का स्वरूप
माँ चंद्रघंटा का रूप स्वर्ण के समान चमकीला और दिव्य है।
उनके दस हाथ हैं, जिनमें खड्ग, बाण, त्रिशूल और गदा जैसे अस्त्र-शस्त्र सुशोभित हैं।
वे सिंह (शेर) पर सवारी करती हैं, जो वीरता का प्रतीक है।
उनके मस्तक पर स्थित अर्धचंद्र शीतलता प्रदान करता है।
महत्व और फल
माँ चंद्रघंटा की उपासना करने से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ-साथ विनम्रता का भी विकास होता है। उनकी पूजा से मुख, नेत्र और शरीर का तेज बढ़ता है तथा स्वर में मधुरता आती है।
पूजा मंत्र:
पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥

भोग: आज माँ को दूध या दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
रंग: आज के दिन गहरा लाल रंग पहनना शुभ फलदायी होता है।

Address

वृन्दावन
Nokha
012

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when प्यारो वृन्दावन posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share