Social and Motivational Trust

Social and Motivational Trust समाजिक और साहित्यिक कार्यक्रम के लिए ?

 #संस्थापक_की_कलम_से :आदरणीय प्रबुद्ध साहित्यकार गण,सादर प्रणाम!"नुमाइश की हवस में आदमी बौना हुआ लगता,दिलों का जो बसेरा ...
27/05/2026

#संस्थापक_की_कलम_से :

आदरणीय प्रबुद्ध साहित्यकार गण,
सादर प्रणाम!

"नुमाइश की हवस में आदमी बौना हुआ लगता,
दिलों का जो बसेरा था, वो अब सूना हुआ लगता।
तरक्की की बड़ी ऊँची उड़ानें तो भरीं लेकिन-
घरों का ताना-बाना आज बिखरा सा हुआ लगता।

हाल के दिनों में समाचार माध्यमों के जरिए कुछ ऐसी अप्रत्याशित और विचलित करने वाली सामाजिक घटनाएँ सामने आई हैं, जिन्होंने हर संवेदनशील मन को झकझोर कर रख दिया है। एक तरफ जहाँ भोपाल का 'ट्विशा शर्मा प्रकरण' जैसी घटनाएँ हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ ही दिनों पहले हनीमून टूर के दौरान एक पत्नी द्वारा कथित रूप से अपने ही पति की हत्या की साजिश रचने जैसी खौफनाक खबरें भी आई हैं। ऐसी घटनाओं ने आज हमें एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ ठहरकर आत्ममंथन करना अनिवार्य हो गया है कि क्या हमारा सामाजिक ताना-बाना सचमुच छिन्न-भिन्न हो रहा है?
एक निष्पक्ष और सजग विचारक के रूप में, हमें इन बदलती परिस्थितियों के सभी पहलुओं को बारीकी से समझना होगा:
आज संचार माध्यमों की आधुनिकता ने 'दिखावे' और 'देखा-देखी' की एक ऐसी अंधी संस्कृति को जन्म दिया है, जिसने इंसान को केवल अपनी आभासी छवि में आत्ममुग्ध कर दिया है। इस चकाचौंध ने हमारी इच्छाओं को 'अतृप्त अभिलाषा' में बदल दिया है, जिससे समाज में धैर्यहीनता और नैतिकताहीनता साफ झलकती है। जब शादी जैसे पवित्र बंधन में भी यह अहंकार, लालच या कोई छिपा हुआ एजेंडा आ जाता है, तो पढ़ा-लिखा संभ्रांत वर्ग भी कानून और मर्यादा को ताक पर रखकर हिंसक साजिश या उत्पीड़न का रास्ता चुन लेता है।
इस विमर्श में हमें एक और अत्यंत संवेदनशील और छिपी हुई संभावना पर भी विचार करना होगा—क्या ये घटनाएँ किसी गहरी साजिश का हिस्सा तो नहीं? आज के दौर में ऐसे मामले भी सामने आते हैं जहाँ रसूखदार या मजबूत पृष्ठभूमि वाले परिवारों को निशाना बनाने, कानून की सख्त धाराओं का डर दिखाकर ब्लैकमेल करने या किसी छिपे हुए व्यक्तिगत एजेंडे के तहत जाल बुना जाता है। कई बार पर्दे के पीछे सक्रिय कोई तीसरा पक्ष या छिपी हुई ब्लैकमेलिंग की कड़वी सच्चाई पूरे हंसते-खेलते परिवार को इस विनाशकारी मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है।
तीसरा पहलू यह है कि आधुनिकता की इस दौड़ में इंसान पूरी तरह आत्मकेंद्रित हो चुका है। “मैं जो कह रहा हूं वही सही है” इस प्रवृत्ति ने इंसान को दिशाहीन बना दिया है। साकारात्मक सुझाव भी लोगों को निजी मामले में अतिक्रमण जैसा लगता है।तकनीक ने हमें पूरी दुनिया से तो जोड़ दिया, लेकिन अपनों से पूरी तरह काट दिया है। इस गहरे संवादहीनता और भावनात्मक खालीपन के कारण व्यक्ति गंभीर मानसिक तनाव या अवसाद का शिकार हो रहा है। कई बार बाहरी तौर पर बेहद सामान्य या खुश दिखने वाला व्यक्ति भी भीतर से इतना अकेला होता है कि वह अप्रत्याशित आत्मघाती कदम उठा बैठता है।
हर मामले में सत्य क्या है—यह तो गहन कानूनी, तकनीकी और वैज्ञानिक जांच के बाद ही साफ होगा, क्योंकि बिना प्रामाणिक तथ्यों के किसी को पूरी तरह दोषी या निर्दोष मानना जल्दबाजी होगी। सच्चाई भविष्य के गर्भ में छुपा है, जिसके सामने आने में समय लगेगा। लेकिन सच चाहे जो भी हो, यह परिस्थिति हमारे आधुनिक समाज पर एक गहरा धब्बा है।यदि ये घटनाएँ किसी पर हुआ जुल्म या सोची-समझी साजिश हैं, तो यह हमारे समाज की 'नैतिक कंगाली' को दिखाता है।
यदि यह कानूनी दुरुपयोग या ब्लैकमेलिंग की साजिश का नतीजा है, तो यह सामाजिक गिरावट के एक नए स्तर को दर्शाता है।
यदि यह मानसिक असंतुलन का परिणाम है, तो यह दिखाता है कि हम एक ऐसा संवेदनशून्य समाज बनते जा रहे हैं जहाँ इंसान के पास अपनी बात साझा करने के लिए कोई अपना नहीं है।
ये तीनों ही परिस्थितियां तथाकथित सभ्य और आधुनिक समाज के ऊपर एक प्रश्नचिन्ह लगा रहा है।
हमारी डिग्रियां, ऊंचे पद और वैभव तब तक पूरी तरह बेमानी हैं, जब तक वे हमारे भीतर मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं का निर्माण न कर सकें। यह आलेख केवल एक चर्चा नहीं, बल्कि हम सबके लिए एक सामूहिक आत्ममंथन का आह्वान है।
इस नैतिक और सामाजिक बिखराव को रोकने के लिए, क्या आपको लगता है कि साहित्य, कला और हमारी सांस्कृतिक विरासत में आज भी वह सामर्थ्य बचा है जो इस बिखरते हुए ताने-बाने को दोबारा जोड़ सके? या फिर हमें अपनी प्राथमिकताओं और पारिवारिक संस्कारों को नए सिरे से परिभाषित करना होगा?
इस विमर्श में आपकी निष्पक्ष टिप्पणियों का स्वागत है।
धन्यवाद!
आप सभी खुश और स्वस्थ रहते हुए साकारात्मक दिशा में सदैव गतिमान रहें।

इन्हीं शुभकामनाओं के साथ –

#रवींद्र_नाथ_सिंह
संस्थापक,
सोशल एंड मोटिवेशनल ट्रस्ट
नई दिल्ली।
दिनांक: 27/05/2026

26/05/2026
With Maitreyi Tripathi – I just got recognised as one of their top fans! 🎉
26/05/2026

With Maitreyi Tripathi – I just got recognised as one of their top fans! 🎉

 #संस्थापक_की_कलम_से :आदरणीय प्रबुद्ध साहित्यकार गण,सादर नमस्कार!आज के इक्कीसवीं सदी के डिजिटल युग में यदि कोई ऐसी चीज़ ...
26/05/2026

#संस्थापक_की_कलम_से :

आदरणीय प्रबुद्ध साहित्यकार गण,
सादर नमस्कार!

आज के इक्कीसवीं सदी के डिजिटल युग में यदि कोई ऐसी चीज़ है जिसने मनुष्य के जीवन को सबसे गहरे स्तर पर प्रभावित किया है, तो वह है 'सोशल मीडिया'। सुबह आँख खुलने से लेकर रात को सोने तक, हमारी उंगलियाँ अनजाने ही मोबाइल की स्क्रीन पर किसी न किसी सोशल मीडिया ऐप को खंगाल रही होती हैं। फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे माध्यम आज हमारी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं।
परंतु, जैसे-जैसे इसका दायरा बढ़ा है, समाज के सामने एक बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है—क्या सोशल मीडिया वास्तव में ज्ञान और सूचना का आधुनिक केंद्र है, या फिर यह भ्रामक जानकारियों का एक ऐसा मायाजाल बन चुका है जिसमें आम आदमी लगातार उलझता जा रहा है?
मुझे भी अक्सर इसी प्रश्न से जुझना पड़ता है।

यदि हम सोशल मीडिया के साकारात्मक पक्ष को देखें, तो इसके कारण आज सूचना का 'लोकतंत्रीकरण' हुआ है। दुनिया के किसी भी कोने में बैठी कोई प्रतिभा, कोई घटना या कोई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोज क्षण भर में हमारे सामने आ जाती है। समाज के शोषित और वंचित वर्ग, जिनकी आवाज़ मुख्यधारा के मीडिया में दब जाती थी, आज सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी बात सीधे दुनिया के सामने रख रहे हैं। विद्यार्थियों के लिए शिक्षा, गृहणियों के लिए नए हुनर, और साहित्यकारों व कलाकारों के लिए अपनी कला को बिना किसी बिचौलिए के सीधे पाठकों तक पहुँचाने का यह एक अद्भुत मंच साबित हुआ है। आपातकाल या प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत और मदद पहुँचाने में भी इसने एक जीवनदायिनी केंद्र की भूमिका निभाई है।

लेकिन इसका दुसरा पहलु अत्यंत चिंताजनक और डरावना है। सूचना के इस महासागर में 'सत्य' की तुलना में 'अर्धसत्य' और 'झूठ' की गति कई गुना तेज़ है। आज एआई (AI) और आधुनिक तकनीक के इस दौर में किसी की भी तस्वीर, आवाज़ या वीडियो को इस तरह बदल दिया जाता है कि असली और नकली का भेद करना लगभग असंभव हो जाता है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी पर तैरते बिना सिर-पैर के संदेश और भ्रामक ऐतिहासिक तथ्य समाज में नफ़रत और अविश्वास का ज़हर घोल रहे हैं। सोशल मीडिया के पीछे काम करने वाली तकनीक हमें केवल वही दिखाती है जो हम देखना चाहते हैं। इससे हमारी सोच एक दायरे में सिमट कर रह जाती है। हम अपनी ही विचारधारा के घेरे में बंद हो जाते हैं और दूसरों के प्रति हमारी असहिष्णुता बढ़ जाती है। 'लाइक्स' और 'कमेंट्स' की अंधी दौड़ ने युवाओं को एक आभासी डिप्रेशन की ओर धकेल दिया है। यहाँ हर कोई सुखी दिखने का ढोंग कर रहा है, जिससे वास्तविक जीवन का अकेलापन और गहरा होता जा रहा है। साथ ही कई लोग ऐसे ज्ञान की बातें सोशल मिडिया पर डाल देते हैं जो स्वयं उन्होंने भी वहीं से लेकर कापी पेस्ट किया है। उनके पास न तो उस विषय का तजुर्बा है और न हीं आधार। उद्देश्य है, बस लोगों को अच्छा लगेगा और लाइक्स मिलेंगे। परंतु उनके ऐसे गैरजिम्मेदाराना हरकत से कई बार समस्याएं आ जाती हैं। जैसे- “नीम हकीम खतरे जान”।

वस्तुतः हकीकत यह है कि सोशल मीडिया अपने आप में न तो पूरी तरह वरदान है और न ही पूरी तरह अभिशाप। यह विज्ञान का एक ऐसा साधन है जिसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि इसका उपयोग करने वाला हाथ किसका है। चाकू से किसी का जीवन भी बचाया जा सकता है और किसी को नुकसान भी पहुँचाया जा सकता है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा था:
"जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहीं पय परिहरि बारि बिकार॥"
अर्थात, इस संसार में गुण और दोष दोनों मिले हुए हैं, यह हमें तय करना है कि हम बत्तख की तरह पानी को छोड़कर केवल दूध (ज्ञान और सत्य) को ग्रहण करें।

ऐसी परिस्थिति में हमारा कर्तव्य है कि जब भी पटल पर कोई सूचना आए, तो उसे तुरंत 'फॉरवर्ड' या साझा करने से पहले अपने विवेक की कसौटी पर ज़रूर कसें। झूठी वाहवाही करने से बचें। सूचना की प्रामाणिकता की जाँच करें। यदि हम बिना सोचे-समझे हर बात पर विश्वास करना बंद कर देंगे, तो यह मायाजाल स्वतः ही छिन्न-भिन्न हो जाएगा।

आइए, सोशल मीडिया को भ्रम का बाज़ार बनने से रोकें और इसे एक स्वस्थ, वैचारिक और ज्ञानवर्धक 'सूचना का केंद्र' बनाए रखने में अपना योगदान दें।
साहित्यकार हमेशा सामाजिक बदलाव के अग्रणी झंडाबरदार रहे हैं और आज भी यहां हमारी सशक्त भूमिका वांछित है।इस विषय पर आप अपने अनुभव और विचार अवश्य साझा करें।

धन्यवाद!

सुभेक्षा सहित,

#रवींद्र_नाथ_सिंह
संस्थापक,
सोशल एंड मोटिवेशनल ट्रस्ट
नई दिल्ली।
दिनांक: 26/05/2026.

24/05/2026

#एक मासूम सी आवाज #लंबी जुदाई

 #संस्थापक_की_कलम_से   :आदरणीय प्रबुद्ध साहित्यकार गण,सादर नमस्कार!आज के विमर्श का विषय जीवन के उतार चढ़ाव से जुड़ा है। ...
24/05/2026

#संस्थापक_की_कलम_से :

आदरणीय प्रबुद्ध साहित्यकार गण,
सादर नमस्कार!

आज के विमर्श का विषय जीवन के उतार चढ़ाव से जुड़ा है। इस विषय पर आज अपने विचार साझा करने की इच्छा हुई।

जीवन कोई सीधी और सपाट राह नहीं है। एक तरफ तमाम खुशियां तथा अनेक महत्वपूर्ण उपलब्धियां और दूसरी तरफ संघर्षों, चुनौतियों, आशाओं और अनुभवों से बुनी हुई एक सतत यात्रा । इस यात्रा में हर व्यक्ति को कभी न कभी ऐसे क्षणों से गुजरना पड़ता है जब परिस्थितियाँ उसके धैर्य की परीक्षा लेने लगती हैं। कभी असफलताएँ मार्ग रोकती हैं, कभी निराशाएँ मन को घेर लेती हैं, तो कभी अपने ही सपने दूर और धुंधले प्रतीत होने लगते हैं। ऐसे समय में मनुष्य की सबसे बड़ी परीक्षा परिस्थितियों से नहीं, बल्कि स्वयं से होती है। यही कारण है कि कहा जाता है — "स्वयं से हार मानना ही असली हार है।"

जीवन में बाहरी बाधाएँ हमें उतना कमजोर नहीं करतीं, जितना हमारा टूटता हुआ आत्मविश्वास हमें दुर्बल बना देता है। जब तक मन में विश्वास की लौ जलती रहती है, तब तक अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, प्रकाश की संभावना बनी रहती है। पर जैसे ही मनुष्य अपने भीतर यह स्वीकार कर लेता है कि वह अब आगे नहीं बढ़ सकता, उसी क्षण उसके प्रयासों की दिशा रुकने लगती है। वास्तविक हार वही होती है, जहाँ मनुष्य अपने प्रयासों का अंत स्वयं घोषित कर देता है।

इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहाँ लोगों ने कठिनाइयों के पहाड़ों को अपने संकल्प से छोटा कर दिया। यदि वे असफलताओं के सामने स्वयं को पराजित मान लेते, तो शायद उनके नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज न होते। सफलता उन लोगों को नहीं मिलती जिनके रास्ते सरल होते हैं, बल्कि उन्हें मिलती है जो कठिन रास्तों पर भी अपने कदमों की गति बनाए रखते हैं। जीवन हमें यह भी सिखाता है कि असफल होना अपराध नहीं है। गिरना भी असामान्य नहीं है। असामान्य तब होता है जब व्यक्ति गिरकर उठने की इच्छा छोड़ देता है। एक छोटा बच्चा जब चलना सीखता है, तो वह बार-बार गिरता है, लेकिन उसके मन में हार का विचार नहीं आता। वह फिर उठता है, फिर प्रयास करता है और अंततः चलना सीख जाता है। यदि वह पहली बार गिरकर बैठ जाता, तो शायद वह कभी चलना नहीं सीख पाता। मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र उसका आत्मविश्वास और सबसे बड़ा शत्रु उसकी निराशा होती है। जो व्यक्ति स्वयं पर विश्वास करना छोड़ देता है, वह अवसरों के द्वार स्वयं बंद कर देता है; लेकिन जो व्यक्ति कठिन समय में भी अपने मनोबल को थामे रखता है, वह असंभव को भी संभव बनाने की क्षमता रखता है। संघर्ष जीवन की परीक्षा अवश्य है, परंतु वही संघर्ष हमें मजबूत और परिपक्व भी बनाता है।

अंततः जीवन का सार यही है कि परिस्थितियाँ हमें नहीं हरातीं, बल्कि हार तब होती है जब हम अपने भीतर की आशा, साहस और विश्वास को छोड़ देते हैं। जब तक मनुष्य स्वयं का साथ नहीं छोड़ता, तब तक हर हार के भीतर जीत का एक नया अवसर छिपा रहता है। इसलिए परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, अपने हौसलों की लौ को बुझने मत दीजिए, क्योंकि—
"जो स्वयं पर विश्वास रखता है, उसके लिए हर अंधेरी रात के बाद एक नई सुबह अवश्य होती है।"

आईए हम अपने जीवन को साकारात्मक दिशा दें और समाज के सर्वांगीण विकास के लिए स्वयं को समर्पित करें।

इस विषय पर कमेन्ट बॉक्स में आपके विचार और प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।

सुभेक्षा सहित,

#रवींद्र_नाथ_सिंह
संस्थापक
सोशल एंड मोटिवेशनल ट्रस्ट
नई दिल्ली।
दिनांक: 24/05/2024

सोशल एंड मोटिवेशनल ट्रस्ट के तत्वावधान में फ्रैंच सोसायटी के क्लब में आयोजित आज के   'प्रतिभा सम्मान '  कार्यक्रम की सफल...
24/05/2026

सोशल एंड मोटिवेशनल ट्रस्ट के तत्वावधान में फ्रैंच सोसायटी के क्लब में आयोजित आज के 'प्रतिभा सम्मान ' कार्यक्रम की सफलता पर सभी नन्हे प्रतिभागियों को बहुत बहुत बधाई। कार्यक्रम को सफलता के सोपान तक ले जाने में बच्चों के माता-पिता, उनके संगीत शिक्षक‌ गण, हमारे माननीय अतिथि गण, निर्णायक मंडल के सदस्यों एवं सोशल एंड मोटिवेशनल ट्रस्ट के समर्पित पदाधिकारी एवं सदस्य गण को धन्यवाद। फ्रेंच सोसायटी ए ओ ए टीम के द्वारा साकारात्मक सहयोग के लिए धन्यवाद!
हमारी संस्था आमतौर पर स्कूलों में ऐसे कार्यक्रमों का समय समय पर आयोजन कर नई पीढी के बीच स्वच्छ प्रतियोगिता की भावना और बच्चों में आत्मविश्वास पैदा करने का प्रयास करते रहती है परंतु अपनी सोसायटी में यह कार्यक्रम आयोजित कर हमें गर्व का अनुभव हुआ क्योंकि हमारे पास इतनी विलक्षण प्रतिभाएं विद्यमान है और अभिभावक गण का समर्पण भी अतुलनीय है, यह जानने का यह एक सुखद अवसर था।
इस कार्यक्रम में फ्रैंच सोसायटी निवासियों के जो बच्चे इस वर्ष 10वीं एवं 12वीं बोर्ड परीक्षाओं में उत्कृष्ट परिणाम हासिल किए हैं उन्हें भी प्रशस्ति पत्र एवं सम्मान प्रतिक देकर सम्मानित किया गया। इस प्रकार इस कार्यक्रम में संगीत और विद्या दोनों को प्रोत्साहित किया गया।
आप सभी को कार्यक्रम की सफलता पर बहुत बहुत बधाई एवं हमारे होनहार बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए अनंत शुभकामनाएं।
सोशल एंड मोटिवेशनल ट्रस्ट अपने ऐसे संकल्प के साथ सामाजिक और साहित्यिक विकास में अपना सतत योगदान करती रहेगी।
आप सभी को पुनः धन्यवाद!

 #संस्थापक_की_कलम_से  :मेरा अनुभव है कि अधिकांश लोगों की ईश्वर में अटूट आस्था होती है, पर कुछ लोग ईश्वर के अस्तित्व के प...
21/05/2026

#संस्थापक_की_कलम_से :

मेरा अनुभव है कि अधिकांश लोगों की ईश्वर में अटूट आस्था होती है, पर कुछ लोग ईश्वर के अस्तित्व के प्रति दुविधाग्रस्त होते हैं। वहीं कुछ लोग ईश्वर को एक कल्पना मात्र मानकर चलते हैं। आज मेरे मन में आत्ममंथन के लिए एक प्रश्न आया और इसपर चिंतन के पश्चात जो परिणाम मिला उसको आपसे साझा करने की इच्छा हुई।
क्या ईश्वर साक्षात मदद करते हैं? यह प्रश्न मानव चेतना, आस्था और दर्शन के इतिहास में सबसे गहरा और संवेदनशील रहा है। जब हम इस पर आत्ममंथन करते हैं, तो इसके कई परतें और दृष्टिकोण सामने आते हैं।
साक्षात शब्द का अर्थ होता है—जो आँखों के सामने प्रत्यक्ष हो। इस दृष्टि से देखें तो ईश्वर की साक्षात मदद को समझने के दो मुख्य मार्ग हैं:
पहली स्थिति में अक्सर लोग अपेक्षा करते हैं कि ईश्वर किसी दैवीय चमत्कार या किसी अलौकिक रूप में प्रकट होकर संकट टालेंगे। लेकिन आत्ममंथन की गहराई में यह समझ आता है कि ईश्वर की साक्षात मदद अक्सर 'माध्यमों' के द्वारा होती है।जीवन के किसी अत्यंत कठिन क्षण में किसी अजनबी का आकर अचानक हाथ थाम लेना, डूबते को तिनके का सहारा मिल जाना—क्या वह साक्षात मदद नहीं है?
जब व्यक्ति पूरी तरह निराश हो चुका हो और अचानक भीतर से एक अदम्य साहस, धैर्य या कोई नया विचार कौंध जाए जो उसे संकट से निकाल ले, तो वह अंतःप्रेरणा ही ईश्वर का साक्षात रूप है।
प्रकृति के सारे नियम, जैसे पृथ्वी की गति का नियंत्रण,समय पर वर्षा होना, मौसम का आना जाना,संकट के बाद परिस्थितियों का स्वतः अनुकूल हो जाना, यह सब उस परम सत्ता की मूक लेकिन प्रत्यक्ष सहायता ही तो है।
एक दुसरा पक्ष, भारतीय दर्शन और अध्यात्म के अनुसार, ईश्वर कहीं बाहर नहीं, बल्कि हर जीव के भीतर 'आत्मरूप' में विद्यमान है।

"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति"

जब हम इस सत्य को स्वीकार करते हैं, तो साक्षात मदद की परिभाषा बदल जाती है। तब हमारी अपनी सद्बुद्धि, विवेक, सेवा भाव और कर्तव्यपरायणता ही ईश्वर की साक्षात उपस्थिति बन जाती है। जब आप किसी भूखे को अन्न देते हैं या किसी पीड़ित की सेवा करते हैं, तब आप स्वयं उस ईश्वर की मदद का 'साक्षात माध्यम' बन रहे होते हैं।
आत्ममंथन का एक पहलू यह भी है कि ईश्वर की मदद का नियम क्या है?
ईश्वर कभी भी व्यक्ति को आलसी बनाने के लिए साक्षात मदद नहीं भेजते। कर्म प्रधान विश्व में जब मनुष्य अपने पुरुषार्थ की अंतिम सीमा तक प्रयास कर लेता है और फिर भी निष्काम भाव से शरणागत होता है, तब 'कृपा' का प्राकट्य होता है। वह कृपा ही साक्षात मदद है जो अदृश्य रहकर भी भाग्य को बदल देती है।
यदि हम चमत्कार की उम्मीद में बैठे हैं कि कोई आकाश से उतरकर आएगा, तो शायद हमें निराशा हो। लेकिन यदि हम अपनी आँखों पर से संशय का पर्दा हटाकर देखें, तो:

• विपरीत परिस्थितियों में हमारा बचा हुआ धैर्य ही ईश्वर है।
• सही समय पर सही राह दिखाने वाला विवेक ही ईश्वर है।
• और संकट में काम आने वाला कोई परोपकारी मनुष्य ही ईश्वर का साक्षात रूप है।

जो व्यक्ति ईश्वर के अस्तित्व को कल्पना मात्र मानता है उसके लिए एक उदाहरण : एक आदमी किसी विकट परिस्थिति से गुजर रहा हो और कोई प्रभावशाली व्यक्ति उससे कहता है कि आप आगे बढ़कर प्रयास कीजिए मैं आपके पीछे खड़ा हूं, वह आदमी आगे बढता है और उसके अंदर भरोसे की एक अतिरिक्त ऊर्जा पैदा हो जाती है तथा वह अपने काम में सफलता पा लेता है। भले वह प्रभावशाली व्यक्ति किसी कारण वश उसके पीछे नहीं आ पाया पर उसके विश्वास की ताकत के कारण एक असंभव काम संभव हो गया। रात के अंधेरे में एक बच्चा एक कमरे से दुसरे कमरे में जाने से डरता है। मां से कहता है, तुम साथ चलो मुझे डर लग रहा है। मां कहती है चलो मैं पीछे हूं और बच्चा बेधड़क दुसरे कमरे में चला जाता है, भले मां उसके पीछे नहीं गई। इसी प्रकार हम ईश्वर के भरोसे कोई काम करते हैं तो भले ही ईश्वर साक्षात वहां मदद के लिए नहीं आते पर विश्वास के रूप में उनकी शक्ति हमारे साथ आ जाती है और हम सफल हो जाते हैं।
ईश्वर सब-कुछ देखता है, इस भावना से प्रभावित होकर मनुष्य गलत कर्मों से बच जाता है। तो फिर ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास क्यों नहीं होना चाहिए? आज यह प्रश्न आपके लिए है।

इस विषय पर आपके क्या विचार हैं? क्या आपके जीवन में कभी ऐसा कोई अनुभव रहा है जिसने इस विश्वास को और गहरा किया हो?

आज के लिए बस इतना ही। कल विमर्श के किसी नये प्रसंग के साथ मिलते हैं।
शुभेच्छा के साथ धन्यवाद!

# रवींद्र_नाथ_सिंह
संस्थापक,
सोशल एंड मोटिवेशनल ट्रस्ट,
नई दिल्ली।
दिनांक: 21/05/2026

 #संस्थापक_की_कलम_से :आदरणीय विद्वत साहित्यकार गण,सादर नमस्कार!आज के विमर्श का विषय है, "लोग क्या कहेंगे?" "लोग क्या कहे...
20/05/2026

#संस्थापक_की_कलम_से :
आदरणीय विद्वत साहित्यकार गण,
सादर नमस्कार!

आज के विमर्श का विषय है, "लोग क्या कहेंगे?"
"लोग क्या कहेंगे?" — यह तीन शब्द नहीं, बल्कि हमारे समाज का एक ऐसा अदृश्य पिंजरा हैं जिसमें न जाने कितनी उड़ानें शुरू होने से पहले ही दम तोड़ देती हैं। बचपन के खिलौनों से लेकर बुढ़ापे के फैसलों तक, यह सवाल एक साए की तरह हमारा पीछा करता है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या लोगों की धारणाओं को संभालना सचमुच हमारी जिम्मेदारी है? आइए इस विषय को गहराई से समझते हैं।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, इसलिए समाज में बने रहने और स्वीकृत होने की चाह स्वाभाविक है। आदिम काल में समाज से निष्कासित होने का अर्थ था जीवन का अंत, इसीलिए लोक-लाज या सामाजिक राय का डर हमारे भीतर गहरे तक बैठा हुआ है। परंतु, हमें यह समझना होगा कि 'लोग' कोई एक निश्चित इकाई नहीं हैं। यह एक बदलता हुआ समूह है, जिसकी राय उनके अपने अनुभवों, कुंठाओं, संस्कारों और व्यक्तिगत लाभ-हानि पर टिकी होती है।

"तुलसी देखि सुबेषु, भूलहिं मूढ़ न चतुर नर।"

अर्थात, लोग तो केवल बाहरी रूप-रंग और तात्कालिक परिस्थितियों को देखकर राय बना लेते हैं। वे आपकी आंतरिक यात्रा, संघर्ष या नीयत से सर्वथा अनभिज्ञ होते हैं।
आज का प्रश्न है ‘“लोग क्या कहेंगे?” क्या यह हमारी जिम्मेदारी है?
इसका सीधा और स्पष्ट उत्तर है — कदापि नहीं।
दूसरों के विचारों को नियंत्रित करना न तो हमारे अधिकार क्षेत्र में है और न ही हमारी जिम्मेदारी। इसके पीछे कुछ ठोस व्यावहारिक कारण हैं:
यदि आप आज किसी को खुश करने के लिए अपनी पसंद बदलते हैं, तो कल उनकी अपेक्षाएं और बढ़ जाएंगी। आप कभी भी हर व्यक्ति को एक साथ संतुष्ट नहीं कर सकते।
जो लोग आज आपके किसी निर्णय की आलोचना कर रहे हैं, वही कल आपकी सफलता देखकर उसकी सराहना करने लगेंगे। लोगों की राय मौसम की तरह बदलती है।
दूसरों के दृष्टिकोण को सुधारने या बदलने में अपनी ऊर्जा लगाना एक निरर्थक प्रयास है। हमारी ऊर्जा का सर्वश्रेष्ठ उपयोग आत्म-विकास और अपने कर्तव्यों के निर्वहन में होना चाहिए।
यहाँ एक सूक्ष्म अंतर को समझना आवश्यक है। लोगों की परवाह न करने का अर्थ 'उच्छृंखलता' या 'सामाजिक अराजकता' नहीं है। हमारी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि हमारे कर्म न्यायसंगत हों, सत्य पर आधारित हों और उनसे किसी निर्दोष को ठेस न पहुँचे।
यदि हमारा विवेक और अंतरात्मा हमारे कर्मों को सही मानती है, तो फिर लोक-अपवाद का कोई औचित्य नहीं रह जाता। महाकवि और दार्शनिक सदैव इसी मार्ग पर चले हैं, जहाँ उन्होंने समाज की रूढ़ियों को तोड़कर सत्य को प्राथमिकता दी।
"लोग क्या कहेंगे" की जिम्मेदारी को अपने कंधों से उतार देना ही मानसिक शांति का पहला कदम है। जीवन की अंतिम जवाबदेही हमारी स्वयं के प्रति और शाश्वत मूल्यों के प्रति है, न कि किसी चौराहे पर खड़े चार लोगों की तात्कालिक राय के प्रति।
हमें लोगों की राय का प्रबंधक बनने के बजाय, अपने कर्मों का निष्ठावान कर्ता बनना चाहिए। यही जीवन जीने का सबसे गरिमामय और मुक्त मार्ग है।

इस विमर्श पर अपने विचार कमेंट बॉक्स में अवश्य दें । प्रतीक्षा रहेगी।

कल फिर किसी आवश्यक और महत्वपूर्ण प्रसंग के साथ आपसे मिलते हैं
शुभेच्छा के साथ धन्यवाद!

#रवीन्द्र_नाथ_सिंह
संस्थापक
सोशल एंड मोटिवेशनल ट्रस्ट, नई दिल्ली।
दिनांक: 20/05/2026.

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