27/05/2026
#संस्थापक_की_कलम_से :
आदरणीय प्रबुद्ध साहित्यकार गण,
सादर प्रणाम!
"नुमाइश की हवस में आदमी बौना हुआ लगता,
दिलों का जो बसेरा था, वो अब सूना हुआ लगता।
तरक्की की बड़ी ऊँची उड़ानें तो भरीं लेकिन-
घरों का ताना-बाना आज बिखरा सा हुआ लगता।
हाल के दिनों में समाचार माध्यमों के जरिए कुछ ऐसी अप्रत्याशित और विचलित करने वाली सामाजिक घटनाएँ सामने आई हैं, जिन्होंने हर संवेदनशील मन को झकझोर कर रख दिया है। एक तरफ जहाँ भोपाल का 'ट्विशा शर्मा प्रकरण' जैसी घटनाएँ हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ ही दिनों पहले हनीमून टूर के दौरान एक पत्नी द्वारा कथित रूप से अपने ही पति की हत्या की साजिश रचने जैसी खौफनाक खबरें भी आई हैं। ऐसी घटनाओं ने आज हमें एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ ठहरकर आत्ममंथन करना अनिवार्य हो गया है कि क्या हमारा सामाजिक ताना-बाना सचमुच छिन्न-भिन्न हो रहा है?
एक निष्पक्ष और सजग विचारक के रूप में, हमें इन बदलती परिस्थितियों के सभी पहलुओं को बारीकी से समझना होगा:
आज संचार माध्यमों की आधुनिकता ने 'दिखावे' और 'देखा-देखी' की एक ऐसी अंधी संस्कृति को जन्म दिया है, जिसने इंसान को केवल अपनी आभासी छवि में आत्ममुग्ध कर दिया है। इस चकाचौंध ने हमारी इच्छाओं को 'अतृप्त अभिलाषा' में बदल दिया है, जिससे समाज में धैर्यहीनता और नैतिकताहीनता साफ झलकती है। जब शादी जैसे पवित्र बंधन में भी यह अहंकार, लालच या कोई छिपा हुआ एजेंडा आ जाता है, तो पढ़ा-लिखा संभ्रांत वर्ग भी कानून और मर्यादा को ताक पर रखकर हिंसक साजिश या उत्पीड़न का रास्ता चुन लेता है।
इस विमर्श में हमें एक और अत्यंत संवेदनशील और छिपी हुई संभावना पर भी विचार करना होगा—क्या ये घटनाएँ किसी गहरी साजिश का हिस्सा तो नहीं? आज के दौर में ऐसे मामले भी सामने आते हैं जहाँ रसूखदार या मजबूत पृष्ठभूमि वाले परिवारों को निशाना बनाने, कानून की सख्त धाराओं का डर दिखाकर ब्लैकमेल करने या किसी छिपे हुए व्यक्तिगत एजेंडे के तहत जाल बुना जाता है। कई बार पर्दे के पीछे सक्रिय कोई तीसरा पक्ष या छिपी हुई ब्लैकमेलिंग की कड़वी सच्चाई पूरे हंसते-खेलते परिवार को इस विनाशकारी मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है।
तीसरा पहलू यह है कि आधुनिकता की इस दौड़ में इंसान पूरी तरह आत्मकेंद्रित हो चुका है। “मैं जो कह रहा हूं वही सही है” इस प्रवृत्ति ने इंसान को दिशाहीन बना दिया है। साकारात्मक सुझाव भी लोगों को निजी मामले में अतिक्रमण जैसा लगता है।तकनीक ने हमें पूरी दुनिया से तो जोड़ दिया, लेकिन अपनों से पूरी तरह काट दिया है। इस गहरे संवादहीनता और भावनात्मक खालीपन के कारण व्यक्ति गंभीर मानसिक तनाव या अवसाद का शिकार हो रहा है। कई बार बाहरी तौर पर बेहद सामान्य या खुश दिखने वाला व्यक्ति भी भीतर से इतना अकेला होता है कि वह अप्रत्याशित आत्मघाती कदम उठा बैठता है।
हर मामले में सत्य क्या है—यह तो गहन कानूनी, तकनीकी और वैज्ञानिक जांच के बाद ही साफ होगा, क्योंकि बिना प्रामाणिक तथ्यों के किसी को पूरी तरह दोषी या निर्दोष मानना जल्दबाजी होगी। सच्चाई भविष्य के गर्भ में छुपा है, जिसके सामने आने में समय लगेगा। लेकिन सच चाहे जो भी हो, यह परिस्थिति हमारे आधुनिक समाज पर एक गहरा धब्बा है।यदि ये घटनाएँ किसी पर हुआ जुल्म या सोची-समझी साजिश हैं, तो यह हमारे समाज की 'नैतिक कंगाली' को दिखाता है।
यदि यह कानूनी दुरुपयोग या ब्लैकमेलिंग की साजिश का नतीजा है, तो यह सामाजिक गिरावट के एक नए स्तर को दर्शाता है।
यदि यह मानसिक असंतुलन का परिणाम है, तो यह दिखाता है कि हम एक ऐसा संवेदनशून्य समाज बनते जा रहे हैं जहाँ इंसान के पास अपनी बात साझा करने के लिए कोई अपना नहीं है।
ये तीनों ही परिस्थितियां तथाकथित सभ्य और आधुनिक समाज के ऊपर एक प्रश्नचिन्ह लगा रहा है।
हमारी डिग्रियां, ऊंचे पद और वैभव तब तक पूरी तरह बेमानी हैं, जब तक वे हमारे भीतर मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं का निर्माण न कर सकें। यह आलेख केवल एक चर्चा नहीं, बल्कि हम सबके लिए एक सामूहिक आत्ममंथन का आह्वान है।
इस नैतिक और सामाजिक बिखराव को रोकने के लिए, क्या आपको लगता है कि साहित्य, कला और हमारी सांस्कृतिक विरासत में आज भी वह सामर्थ्य बचा है जो इस बिखरते हुए ताने-बाने को दोबारा जोड़ सके? या फिर हमें अपनी प्राथमिकताओं और पारिवारिक संस्कारों को नए सिरे से परिभाषित करना होगा?
इस विमर्श में आपकी निष्पक्ष टिप्पणियों का स्वागत है।
धन्यवाद!
आप सभी खुश और स्वस्थ रहते हुए साकारात्मक दिशा में सदैव गतिमान रहें।
इन्हीं शुभकामनाओं के साथ –
#रवींद्र_नाथ_सिंह
संस्थापक,
सोशल एंड मोटिवेशनल ट्रस्ट
नई दिल्ली।
दिनांक: 27/05/2026