Tanwar Tomar Rajput Dynasty

Tanwar Tomar Rajput Dynasty राजस्थान के राजवाड़ों का इतिहास
तवंर तोमर क्षत्रिय राजवंश इतिहास
Admin:- शेर सिंह तवंर (सुरजनगढ़ महावा)

पठानिया तोमर राजवंश में जन्मे नुरपुर रियासत के वजीर रामसिंह पठानिया जी कि जन्म जयंती कि हार्दिक शुभकामनाए
10/04/2026

पठानिया तोमर राजवंश में जन्मे नुरपुर रियासत के वजीर रामसिंह पठानिया जी कि जन्म जयंती कि हार्दिक शुभकामनाए

तवंर राजपूतो का ठिकाना महावा जय गोपाल जी कि सा
12/03/2026

तवंर राजपूतो का ठिकाना महावा
जय गोपाल जी कि सा

23/02/2026

36. कुरु के शुभांगी से विदुरथ हुए.
37. विदुरथ के संप्रिया से अनाश्वा हुए.
38. अनाश्वा के अमृता से परीक्षित हुए.
39. परीक्षित के सुयशा से भीमसेन हुए.
40. भीमसेन के कुमारी से प्रतिश्रावा हुए.
41. प्रतिश्रावा से प्रतीप हुए.
42. प्रतीप के सुनंदा से तीन पुत्र देवापि, बाह्लीक एवं शांतनु का जन्म हुआ. देवापि किशोरावस्था में ही सन्यासी हो गए एवं बाह्लीक युवावस्था में अपने राज्य की सीमाओं को बढ़ने में लग गए इसलिए सबसे छोटे पुत्र शांतनु को गद्दी मिली. शांतनु से भीष्म हुए जिनकी कहानी और वंशावली विचित्र है ..

43. शांतनु कि गंगा से देवव्रत हुए जो आगे चलकर भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुए. भीष्म का वंश आगे नहीं बढा क्योंकि उन्होंने आजीवन ब्रम्हचारी रहने की प्रतिज्ञा कि थी. शांतनु की दूसरी पत्नी सत्यवती से चित्रांगद और विचित्रवीर्य हुए. चित्रांगद की मृत्यु युवावस्था में ही हो गयी. विचित्रवीर्य कि दो रानियाँ थी, अम्बिका और अम्बालिका. विचिचित्रवीर्य भी संतान प्राप्ति के पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो गए, लेकिन महर्षि व्यास कि कृपा से उनका वंश आगे चला.
44. विचित्रवीर्य के महर्षि व्यास की कृपा से अम्बिका से ध्रतराष्ट्र, अम्बालिका से पांडू तथा अम्बिका की दासी से विदुर का जन्म हुआ.
45. ध्रितराष्ट्र से दुर्योधन, दुहशासन, इत्यादि 100 पुत्र एवं दुशाला नमक पुत्री हुए. इनकी एक वैश्य कन्या से युयुत्सु नामक पुत्र भी हुआ जो दुर्योधन से छोटा और दुशासन से बड़ा था. इतने पुत्रों के बाद भी इनका वंश आगे नहीं चला क्योंकि इनके समूल वंश का नाश महाभारत के युद्घ में हो गया. किन्दम ऋषि के श्राप के कारण पांडू संतान उत्पत्ति में असमर्थ थे. उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों को दुर्वासा ऋषि के मंत्र से संतान उत्पत्ति की आज्ञा दी. कुंती के धर्मराज से युधिष्ठिर, पवनदेव से भीम और इन्द्रदेव से अर्जुन हुए तथा माद्री के अश्वनीकुमारों से नकुल और सहदेव का जन्म हुआ. इन पांचो के जन्म में एक एक साल का अंतर था. जिस दिन भीम का जन्म हुआ उसी दिन दुर्योधन का भी जन्म हुआ.
46. युधिष्ठिर के द्रौपदी से प्रतिविन्ध्य एवं देविका से यौधेय हुए. भीम के द्रौपदी से सुतसोम, जलन्धरा से सवर्ग तथा हिडिम्बा से घतोत्कच हुआ. घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक हुआ. नकुल के द्रौपदी से शतानीक एवं करेनुमती से निरमित्र हुए. सह्देव के द्रौपदी से श्रुतकर्मा

23/02/2026

इस पोस्ट में हम आपको बता रहे है कई एतिहासिक ग्रंथो से जुटाई ऐसी जानकारी जिसके बाद हमें अपने अतीत में झाँकने में आसानी होगी.. हम जानते हैं कि सारी सृष्टी परमपिता ब्रम्हा से उत्पन्न हुई है लेकिन अब जानते है उनकी पूरी वंशावली..

1. परमपिता ब्रम्हा से प्रजापति दक्ष हुए.
2. दक्ष से अदिति हुए.
3. अदिति से बिस्ववान हुए.
4. बिस्ववान से मनु हुए जिनके नाम से हम लोग मानव कहलाते हैं.
5. मनु से इला हुए.
6. इला से पुरुरवा हुए जिन्होंने उर्वशी से विवाह किया.
7. पुरुरवा से आयु हुए.
8. आयु से नहुष हुए जो इन्द्र के पद पर भी आसीन हुए परन्तु सप्तर्षियों के श्राप के कारण पदच्युत हुए.
9. नहुष के बड़े पुत्र यति थे जो सन्यासी हो गए इसलिए उनके दुसरे पुत्र ययाति राजा हुए. ययाति के पुत्रों से ही समस्त वंश चले. ययाति के पांच पुत्र थे. देवयानी से यदु और तर्वासु तथा शर्मिष्ठा से दृहू, अनु, एवं पुरु. यदु से यादवों का यदुकुल चला जिसमे आगे चलकर श्रीकृष्ण ने जन्म लिया. तर्वासु से मलेछ, दृहू से भोज तथा पुरु से सबसे प्रतापी पुरुवंश चला. अनु का वंश ज्यादा नहीं चला.

10. पुरु के कौशल्या से जन्मेजय हुए.
11. जन्मेजय के अनंता से प्रचिंवान हुए.
12. प्रचिंवान के अश्म्की से संयाति हुए.
13. संयाति के वारंगी से अहंयाति हुए.
14. अहंयाति के भानुमती से सार्वभौम हुए.
15. सार्वभौम के सुनंदा से जयत्सेन हुए.
16. जयत्सेन के सुश्रवा से अवाचीन हुए.
17. अवाचीन के मर्यादा से अरिह हुए.
18. अरिह के खल्वंगी से महाभौम हुए.
19. महाभौम के शुयशा से अनुतनायी हुए.
20. अनुतनायी के कामा से अक्रोधन हुए.
21. अक्रोधन के कराम्भा से देवातिथि हुए.
22. देवातिथि के मर्यादा से अरिह हुए.
23. अरिह के सुदेवा से ऋक्ष हुए.
24. ऋक्ष के ज्वाला से मतिनार हुए.
25. मतिनार के सरस्वती से तंसु हुए.
26. तंसु के कालिंदी से इलिन हुए.
27. इलिन के राथान्तरी से दुष्यंत हुए.
28. दुष्यंत के शकुंतला से भरत हुए जिनके नाम पर हमारा देश भारतवर्ष कहलाता है...

29. भरत के सुनंदा से भमन्यु हुए.
30. भमन्यु के विजय से सुहोत्र हुए.
31. सुहोत्र के सुवर्णा से हस्ती हुए जिनके नाम पर पूरे प्रदेश का नाम हस्तिनापुर पड़ा.
32. हस्ती के यशोधरा से विकुंठन हुए.
33. विकुंठन के सुदेवा से अजमीढ़ हुए.
34. अजमीढ़ से संवरण हुए.
35. संवरण के तपती से कुरु हुए जिनके नाम से ये वंश कुरुवंश कहलाय

23/02/2026

तंवर वंश के गोत्र प्रवरादि :-

1.गोत्र :-वयाग्रप्रद या गाग्र्या

2.विरुद्ध :-जावला नरेश ,खालेश नरेश

3.प्रवर :-तीन गाग्र्या,कोस्तूभ ,मांड्य

4.शाखा :-वाजसेन्यी माहयांन्दिनी

5.सूत्र :-पारस्कर ग्रह्यसूत्र

6.कुलदेवी :-चिलायमाता या श्रवणदेवी या सरुंड माता

7.ध्वज :-पचरंगा

8.वृक्ष :-गूलर

9.प्रमुख नदी :-तुंगभद्रा

10.निशान :-हरा

11.वेद :-यजुर्वेद

12.वंश :-चन्द्रवंश

13.नगारा :-रणजीत

14.घोडा :-सावकरण

15.प्रमुख गद्दी :-इन्द्रप्रस्थ

23/02/2026

जय गोपाल जी कि सभी को
कल से इस पेज पर एक तवंर राजा की कहानी आयेगी

23/02/2026
18/02/2026

मांवडा के संत के तीन थप्पड़ से झुँझनू में शेखावत स्थापित हुए
©️डाँ.महेन्द्रसिंह तँवर

राजस्थान के तोमरावाटी क्षेत्र का एक प्रसिद्ध गाँव है मांवडा जो इतिहास में वीर पुरुषों की जन्म ओर कर्म स्थली के रूप में जगत विख्यात हैं ।
मांवडा में जयपुर के महाराजा सवाई माधोसिंहजी ओर भरतपुर के राजा जवाहरमल जी के मध्य बड़ा भारी युद्ध हुवा था जो इतिहास में प्रसिद्ध मांवडा के युद्ध के नाम से जाना जाता है । इस युद्ध की प्रतीक छतरियाँ ओर चबूतरे आज भी उन महान वीर योधाओ के बलिदान कि गौरव गाथा का बखान करते हैं ।
मांवडा चिमनसिंहजी जैसे उद्घबोधक कवि की जन्मस्थली है तो विश्व विख्यात फूटबाल के खिलाड़ी मगन सिंह जी भी यही हुए हैं ।
इसी कर्मभूमि पर एक ऐसे संत का जन्म हुआ जिनके आशीर्वाद से इतिहास के सुनहरे पन्ने लिखे गये । ठाकुर अर्जुनसिंहजी तँवर मांवडा के प्रसिद्ध संत हुए हैं । जिस प्रस्तर खण्ड पर आपने तपस्या की वह स्थान आज भी पूजनिक हैं । ठाकुर अर्जुनसिंहजी की एक पुत्री का विवाह गुढा के ठाकुर जगरामसिंहजी के साथ हुवा था । इनके दो पुत्र शेखावत शार्दुलसिंहजी अौर सलहदीसिंहजी हुए ।
जब ये दोनो बालक थोड़े बड़े हुए तब अपनी माता के साथ एक समय अपने ननिहाल मांवडा आए हुए थे। एक दिन ठाकुर अर्जुनसिंहजी ध्यान में बैठकर भजन कर रहे तभी इन दोनो बालकों ने वहाँ खेल खेल में संत अर्जुनसिंहजी के ध्यान में विधन डाल दिया । ठाकुर अर्जुनसिंहजी ने अपने दोहिते शार्दुलसिंहजी को तीन थपड़ लगा दिये , सलहदीसिंह वहाँ से भाग गये । उसी समय इनकी माता ने यह देख दुखी मन से खड़ी रही तो संत ठाकुर अर्जुनसिंहजी ने कहा बेटी दुखी क्यों होती हो । तुम्हारा ये पुत्र जिसे तीन थप्पड़ लगे है ये थोड़े से संघर्ष से ही तीन परगनो पर अधिकार करके वहाँ का स्वामी बनेगा ये मेरा आशीर्वाद हैं । उसी समय बेटी ने दूसरे पुत्र के बारे पूछा तो संत ने कहा वह भागा है इसलिए जीवन भर भागता हीं फिरेगा लेकिन अपने भाई के साथ वह लक्ष्मण की भाँति साथ खड़ा रहेगा।
आगे चलकर ठाकुर अर्जुनसिंहजी के शब्द फलिभूत हुए ओर शेखावत सार्दुलसिंहजी ने तीन परगने नरहड़ सिंघाणा ओर झुँझनू पर अधिकार कर लिया। इस कार्य में भाई सलहदीसिंहजी का पुरा सहयोग मिला लेकिन वे कोई ठिकाना नहीं क़ायम कर सके ।
मांवडा का गौरव आज भी क़ायम है । वीरौ के स्मारक ओर आधुनिक प्रबुद जनो ने भी इस क्षेत्र के गौरव का मान बनाए रखने में कोई कसर नहीं रखी है लेकिन अब धीरे धीरे यह क्षेत्र अपने वैभव की पहचान को भुलता जा रहा है । नई पीढ़ी को अब अपने पूर्वजों के उस महान त्याग ओर बलिदान से प्रेरणा लेकर इस पवित्र भूमि को फिर से गौरव प्रदान करना चाहिये ।

18/02/2026

दिल्ली के तोमर सम्राट अनंगपाल द्वितीय (1051-1081 ई.)

©️डाँ.महेंद्रसिंह तँवर

1051 ई. में दिल्ली के राजसिंहासन पर अनंगपाल द्वितीय बैठे। मेहरौली के लौह स्तम्भ पर एक लेख प्राप्त हुआ उसके अनुसार वि.सं. 1109 अर्थात् 1052 ई. में अनंगपाल दिल्ली पर राज्य कर रहे थे।

अनंगपाल ने अपनी राजधानी अनंगपुर से हटाकर योगिनीपुर और महिपालपुर के बीच स्थित ढिल्लिकापुरी में स्थापित की। तोमरों के समय में उनकी राजधानी बदलती रहती थी। द्विवेदी जी के अनुसार अनंगपाल द्वितीय के पूर्व ही इस ढिल्लिका में कुछ मन्दिर और भवन बने हुए थे। अपने राज्य के दूसरे वर्ष में ही अनंगपाल ने लोह स्तम्भ की स्थापना की थी। लौहस्तम्भ को ही आधार बनाकर अनेक निर्माण कार्य करवाये ओर लालकोट नामक किला बनवाया गया।

कुव्वतुल-इस्लाम के शिलालेख के अनुसार और एक अनुश्रुति से ज्ञात होता है कि अनंगपाल द्वितीय ने 27 महल और मन्दिर बनवाये थे। इनमें से कुछ महल व मंदिर पहले बने हुए थे। अनंगपाल ने लौह स्तम्भ के समीप ही अनंगपाल नामक सरोवर भी बनवाया, इसकी लम्बाई उत्तर-दक्षिण में 169 फुट और पूर्व-पश्चिम में 152 फुट है। इस तालाब से थोड़ी दूर तक विशाल भवन था जो लौह स्तम्भ के घेरे हुए था। इन सब निर्माणों में चारों और लालकोट गढ़ बनवाया गया था। अनंगपाल ने ये निर्माण कार्य किस काल में करवाया इसके कुछ संकेत लौह स्तम्भ 1052 ई. में दिल्ली लाया गया था ऐसा उसमें उत्कीर्ण लेख से प्रकट होता है। कनिंघम ने उस लेख को पढ़ा था जिसका सही अर्थ सन्नति दिहाली 1109 अनंगपाल बही संवत् 1109 अर्थात् 1052 ई. में लौह स्तम्भ को दिल्ली लाया गया। उस समय दिल्ली में विक्रम संवत् प्रचलित हो गया था उसके पूर्व वल्लभी संवत् प्रयुक्त होता था। यह लेख अनंगपाल ने स्वयं नहीं उत्कीर्ण करवाया था जबकि लौह स्तम्भ को दिल्ली ढोकर लाने वाले कारीगर ने खुदवा दिया था।

दिल्ली के तोमर पुस्तक में द्विवेदी जी के अनुसार 1052 ई. में प्रारम्भ होकर वे निर्माण 1067 ई. तक चलते रहे। गढ़वाल की पोथी के अनुसार संवत् 1117 मार्गशीर्ष सुदी दशम, 1060 ई. को लालकोट का निर्माण पूर्ण हुआ। वि.सं. 1124 (1067 ई.) तक मन्दिर और भवन बन रहे थे, ऐसा कथन कारीगर के लेख से स्पष्ट है।

यह वही लौह स्तम्भ है जिसे रासोकारों ने अनंगपाल प्रथम से जोड़ा है जो सही नहीं है क्योंकि इसे अनंगपाल द्वितीय ने दिल्ली में स्थापित किया था। अनेक इतिहासकारों का अभिमत है कि लौह स्तम्भ पहले मथुरा में था और वहां से लाकर दिल्ली में स्थापित किया गया। शूरवीरसिंह पंवार ने अपने लेख में इसे देहरादून जिले के जौनसार बाबर तहसील में स्थित बताया है और वहां से लाकर दिल्ली में स्थापित किया परन्तु द्विवेदी ने अपना मत मथुरा पर ही दिया है जिसे मानना ही उचित होगा। पद्मावती कान्तिपुरी और मथुरा के सम्राट अधिराज भवनाग ने यह लौह स्तम्भ मथुरा के उस विशाल विष्णु मन्दिर के सामने स्थापित किया जो 1050 ई. में बने केशवदेव के मन्दिर के स्थान पर बना हुआ था और जिसे महमूद ने तोड़ दिया। 1050 ई. में कुमारपाल नगरकोट के तुर्कों से जूंझ रहे थे। उस समय उनके राजकुमार मथुरा की रक्षा के लिए नियुक्त थे। उन्होंने विष्णु के प्राचीन मन्दिर के अवशेषों में इस विष्णु ध्वज को देखा और उसे दिल्ली लाने का उपक्रम किया। सम्भव है इसे जल मार्ग से लाया गया हो, उल्टीधार में नाविक धार खे लेते हैं। इस प्रकार यह लौह स्तम्भ दिल्ली लाया गया और महरौली में इसे स्थापित किया गया। इसी समय अनंगपाल ने अपनी मुद्राएं भी चलाई जो इस लौह स्तम्भ के समय ढाली गई थी।

इब्राहिम से युद्ध:-
1059 में गजनी का सुल्तान इब्राहिम बना। यह मसऊद का दूसरा पुत्र था। मध्ययुगीन इतिहास लेखकों का कथन है कि इब्राहिम ने तंवरहिन्दा पर आक्रमण कर उसे जीत लिया था, यह तंवरहिन्दा सिरसागर ही हैं वह तोमरों के राज्य में ही था, यह भी उल्लेख प्राप्त होता है कि इब्राहीम ने रूपाल (नूरपुर) को विजय किया था। यह रूपाल तोमरों का ही गढ़ था जहां पर दिल्ली के तोमरों के वंशज राज्य कर रहे थे। इब्राहिम अनंगपाल द्वितीय का समकालीन था। केशवदास ने अपने पूर्वजों का इतिहास लिखते समय कविप्रिया में लिखा है-

जगपावन वैकुण्ठपति रामचन्द्र यह नाम।
मथुरा-मण्डल में दिये, तिन्हें सात सौ ग्राम।।
सोमवंश यदुकुल कलश त्रिभुवनपाल नरेश।
फरिदिये कलि कालपुर, तेई तिन्हें सुदेश।।

द्विवेदीजी के अनुसार यह त्रिभुवनपाल नरेश और कोई नहीं अनंगपाल द्वितीय ही थे। जब मथुरा ध्वस्त हो गई तो उसकी रक्षा का भार इस धनाढ्य कुल को देकर सात सौ ग्राम की जागीर का सामन्त बनाया। यह कुल शास्त्री जीवी ही नहीं थे, यह समरशूर शस्त्री भी थे। संभवतः केशवदास सोमवंश यदुकुल कलश तोमर राजाओं के लिए ही लिखते थे और ‘त्रिभुवन पाल नरेश’ अनंगपाल द्वितीय ही थे। ऐसा भी अनुमान है कि तहनगढ़ या त्रिभुवन गिरी को भी तोमर अनंगपाल द्वितीय ने ही बसाया था, बयाना से 14 मील और करौली से उत्तर पूर्व में 24 मील स्थित यह गढ़ तोमरों के लिए सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था। तोमरगढ़ से ऐसाह और दिल्ली के बीच होने के कारण भी इसका महत्व था इसलिए अनंगपाल ने वहां पर अपना सामन्त स्थापित किया होगा।

अनंगपाल द्वितीय के समय श्रीधर ने पार्श्वनाथ चरित नामक पुस्तक की रचना की थी उसमें अपने आश्रयदाता नट्टुल साहु का बखान करने के पश्चात् दिल्ली का भी वर्णन किया है। इसमें अनंगपाल ने किसी हमीर को पराजित किया उससे सम्बन्धित कुछ पंक्तियां लिखी जिनका अर्थ विद्वानों ने अलग-अलग दिया है।

द्विवेदीजी की पुस्तक दिल्ली के तोमर में द्विवेदीजी ने अपभ्रंश के माने हुए विद्वान, विश्व भारती, शान्ति निकेतन के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डॉ. रामसिंह तोमर से जो श्रीधर पार्श्वनाथ का अनुवाद करवाया वह निम्नवत् है-
‘‘मैं ऐसा समझता हूँ - जहां प्रसिद्ध राजा अनंगपाल की श्रेष्ठ तलवार ने रिपुकपाल को तोड़ा, बढ़े हुए हम्मीर वीर का दलन किया, बुद्धिजन वृन्द से चीर प्रापत किया। (बौद्ध सिद्धों की रचनाओं में एक स्थान पर ‘उभिलो चीरा’ मिलता है जिसका अर्थ है यशोगान किया, ध्वजा फहराई)।’

उक्त अर्थों से यही तात्पर्य है कि दिल्ली सम्राट अनंगपाल द्वितीय ने तुर्कों को पराजित किया। यह तुर्क इब्राहीम ही था, जिसे निश्चय ही अनंगपाल ने पराजित किया और अपनी पताका फहराई। इसी भाष्य का अनुवाद डॉ. दशरथ शर्मा ने इसका अर्थ प्रथम पंक्तियां प्राप्त हुए बगैर ही कर दिया और इस पूरे लेख को ही बदल दिया, जो कल्पना उन्होंने की अगर सभी इतिहासकार ऐसा करने लगेंगे तो न तो इतिहास मान्य होगा न ही दूर होगी भ्रांतिया। डॉ. शर्मा चौहानों के इतिहासकार रहे हैं परन्तु इसका अर्थ यह तो नहीं कि उनकी गलती को बार-बार दोहराया जाए किसी विद्वान से गलती हो सकती है परन्तु सभी से नहीं।

अनंगपाल द्वितीय की मृत्यु 1081 ई. में हुई। अनंगपाल ने 29 वर्ष, 6 माह और अठारह दिनों तक दिल्ली पर शासन किया। अनंगपाल द्वितीय की मुद्राएं भी प्राप्त हुई है, जिसमें उसे किल्लिदेवपाल के नाम से जाना गया है। सम्भवतः यह मुद्राएं अनंगपाल द्वितीय ने लौह स्तम्भ को दिल्ली में स्थापित करने के उपलक्ष्य में चलाई थी।

ठक्कुर फेरू ने दिल्ली की टकसाल की सभी तोमरों की मुद्राओं की जानकारी दी उसने लिखा है-
अणग मयणप्पलाहे पिथउपलाहे च चाहड़पलाहे।
सय मज्झि टंक सोलह रूप्पउ उणवीस करि मुल्लो।।

इन मुद्राओं में एक और अश्वरोही के ऊपर श्री किल्लिदेव लिखा तथा दूसरी ओर बैठे हुए नन्दी के ऊपर ‘पालश्री समन्तदेव’ लिखा है, दोनों ओर के पाठ को एक साथ पढ़ने से समस्त पाठ ‘श्रीकिल्लिदेवपाल श्री समन्तदेव’ है। अर्थात् ‘किल्लिदेवपाल’ नाम है और ‘श्री समन्तदेव’ विरद। सम्भवतः यह मुद्रा अनंगपाल द्वितीय ने 1052 ई. में जब ‘किल्ली’ लौह स्तम्भ को दिल्ली में स्थापित किया तब उसकी स्मृति में ये मुद्रा चलाई हो। इतिहास में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है कि किसी राजा ने अपने राज्यकाल की किसी विशेष उपलब्धि की स्मृति में मुद्राएं जारी की हो यह संभव है कि अनंगपाल ने भी ‘जब लौहस्तम्भ’ किल्ली को अपने प्रांगण में गाढ़ा तब उसके उपलक्ष्य में यह मुद्राएं जारी की गई होगी।

अनंगपाल द्वितीय ने अन्य दो प्रकार की मुद्राएं भी ढलवाई थी। एक प्रकार की मुद्राओं पर उनका नाम ‘अनंगपाल’ मिलता है और दूसरी मुद्राओं पर ‘श्री अणगपाल’। यह अणगपाल प्रयोग बहुत महत्वपूर्ण है। अनंगपाल शुद्ध संस्कृत रूप है और अणगपाल पर हरियाणा की लोक भाषा का प्रत्यक्ष प्रभाव है। मध्यकाल की हिन्दी की जन्म स्थली हरियाणा कुरुक्षेत्र ही है।

अनंगपाल द्वितीय की मृत्यु के पश्चात् तेजपाल प्रथम दिल्ली के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुए।

महाराजा अनंगपाल द्वितीय के संदर्भ में अनेक प्रकार के भ्रम फैलाएँ गए हैं जो तथ्यहीन हैं जिनका खंडन अनेक विद्वान समय समय पर कर चुके । दिल्ली के तोमर राजाओं में केवल दो ही अनंगपाल हुए हैं , वे सर्वविदित हैं निर्विवाद हैं । इसके लियें देखे श्री द्विवेदी जी पुस्तक दिल्ली के तोमर व मेरी शोध पुस्तक जिसने विस्तार से इन सब मिथ्यो का खंडन किया हैं ।

क्षत्रियों के साथ विभिन जातियों का बहुत बड़ा योगदान रहा हैं । भारत में यह परम्परा रही हैं जिस क्षत्रिय वंश के साथ जो जो जाती के लोग रहते थे वे अपनी कलदेवी व गोत्र उसी क्षत्रिय का मानते थे। वे कभी उस क्षत्रिय कुल से नहि निकले परन्तु वे उनके साथ रहते थे इस कारण वे भी उसी परम्परा का निर्वहन करते थे ।

आज कल इन सभी के गोत्र आदि उस वंश के होने से उन्हें उस वंश से निकले बताना इतिहास समत नहीं है । जो क्षत्रियों से निकले हैं वे इतिहास में अंकित हैं अतः यह धारणा पूरी तरह निराधार हैं ।

एक सन्देश उन सबके लिये जो राजपूत राजाओं को अपने कुल व जाति का बताकर राजनेतिक लाभ के लिये समाज में भ्रम उत्पन कर रहे हैं । वे ना केवल अपने कर्तव्य पथ से भटक रहे हैं बल्कि जिन राजपूत शासकों के कारण उनकी वंश की रक्षा हुई वे उस महान बलिदान को भुला रहे हैं । यह कृत्य उनके पतन का संकेत है जिसे उन्हें समजना चाहिये ।

भारतीय इतिहास का प्रत्येक वह शासक जिसने इस देश के गौरव एवं सनातन परम्परा तथा संस्कृति को सरंक्षण दिया जो इतिहास पुरुष हैं प्रेरणा के स्त्रोत हैं उन पर किसी एक का आधिपत्य कभी नहीं रहा क्योंकि वे सभी के ह्रदय में रचे बसे हैं ।

क्या हम भगवान श्री राम को श्री कृष्ण को भगवान बुध को महावीर स्वामी को कभी ह्रदय से निकाल सकते हैं ? कभी नहीं । वे किसी ना किसी रूप में हमारे भीतर विधमान हैं ।

इसी प्रकार सम्राट विक्रमादित्य परमार चन्द्रगुप्त मोर्य चाणक्य वराहमीर राजा भोज जगदेव परमार नागभट बप्पा रावल महाराणा प्रताप महाराजा शिवाजी दिल्ली सम्राट अनंगपाल प्रथम व द्वितीय कुमारपाल चालुक्य पृथ्वीराज चौहान कनौज नरेश जयचन्द एवं आधुनिक युग के स्वामी विवेकानन्द रामप्रसाद बिस्मिल चन्द्रशेखर आज़ाद अश्फ़ाक भगत सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानी तो वही सुभाष चंद्र बोस महात्मा गाँधी व पटेल ये सभी भारत की माटी के कण कण में रचे बसे हैं । इन्हें कैसे हम बाँट सकते हैं ।

सभी से यही अनुरोध हैं एकता में ही अनेकता हैं इतिहास को पढ़े नहीं बल्कि उसे आत्मसात करे मनन करे । राजनीति करने वाले आएँगे जायेंगे आप हम ओर समाज यही रहेगा । बाकी आपकी मर्जी
इतिहास गवाह हैं जो उसके विपरीत चला वह आज कहाँ हैं बताने की ज़रूरत नहीं ........

डॉ. महेन्द्रसिंह तंवर
सहायक निदेशक
महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश
शोध केन्द्र

18/02/2026

इतिहास प्रसिद्ध हल्दीघाटी युद्ध के योद्धाओं को वन्दन !!

अपने पूर्वज राजा रामशाह तोमर (तँवर ) एवं उनके पुत्रो के बलिदान पर सादर नमन!

©️डाँ. महेन्द्रसिंह तँवर

मध्यभारत के प्रमुख राज्य ग्वालियर पर तोमरों ने 130 वर्ष तक राज किया था । राजा वीरसिंह देव से लेकर राजा विक्रमादित्य तक 9 पीढ़ियों ने ग्वालियर पर एक छत्र शासन किया ।

उनके गौरव मय इतिहास की कीर्ति पताका आज भी क़िले मे बने उनके स्मारक ओर रचित ग्रन्थों से जानी जा सकती हैं ।

राजा मानसिंह जी तो भारतीय इतिहास के विरले राजा थे जिन्होंने ग्वालियरी संगीत घराने को जन्म दिया जिस कारण महान संगीतज्ञ बिरजु ओर तानसेन निकले ।

राजा मानसिंह के योग्य पुत्र राजा विक्रमादित्य ने सात वर्षों तक लोदियों का मुक़ाबला किया एवं भारतमाता की रक्षा करते हुए पानीपत के युद्ध में बाबर से मुक़ाबला करते हुए रणक्षेत्र में वीरगति पाई।

राजा विक्रमादित्य के युवराज राजा रामशाह हुए । इन्होंने अपने जीवन काल मे हिंदुस्थान के 9 से अधिक बादशाह देखे ओर तीन मेवाड़ के महाराणा ।

अपने जीवन में सात वर्ष की अवस्था में पिता के वीरगति प्राप्त करने के पश्चात 1526 से 1558 तक चम्बल के बीहड़ -ऐसाहगढ़ में रहकर अपने खोए राज्य की प्राप्ति में लगे रहे ।

अंत में जब अकबर की सेना ने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया तब अपने पाँच सौ योद्धाओ के साथ महाराणा उदयसिंह जी के पास मेवाड़ पहुँचे ।

मेवाड़ के अधिपति ने राजा रामशाह का भव्य स्वागत किया । मेवाड़ में रहते इन्हें बारीदासोंर ओर भेंसरोड़गढ़ की जागीर , प्रति दिवस 801 रुपए नित्य ख़र्च के देने का आदेश दिया ।

चितोड़ के 1567 के युद्ध में राजा रामशाह भी थे लेकिन उनके भाग्य में हल्दीघाटी में वीरगति पाना लिखा था , इसलिये महाराणा उदयसिंह जी अपने साथ इन्हें भी वहाँ से साथ लेकर निकल गये ।

महाराणा प्रताप के राज्यारोहण में इनकी विशेस भूमिका थी । जब हल्दीघाटी के युद्ध का बिगुल बजा तब सबसे पहले राणा प्रताप ओर सभी सामन्त गण इनके डेरे पर ही बैठक करने एकत्रित हुए थे ।

महाराणा इनका बहुत आदर करते थे जब इन्होंने पहाड़ों मे युद्ध करने क सलाह दी तब मेवाड़ के वीरो ने इनका उपहास किया । युद्ध खुले मैदान में करने का निर्णय हुवा ।

मेवाड़ की फोज के हरावल पंक्ति में महाराणा स्वम ओर दक्षिणी पंक्ति में राजा रामशाह अपने तीनो पुत्रों व पाँच सौ वीरों के साथ लड़े । युद्ध का विकराल स्वरुप ओर उसमें लड़ने वाले वीरों की अदम्य शूरवीरता के किसे आज सभी के समुख हैं ।

राजा रामशाह अपने तीनो पुत्रों व तीन सो वीरों के साथ रक्त तलाई में मेवाड़ की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये।
मेरा शोभाग्य हैं की में उनकी वंश परम्परा में 17 वें वंशधर होने का गौरव रखता हु । मेने इन पर शोध पूर्ण पुस्तक भी लिखने का प्रयास किया हैं ।

मेवाड़ के प्रसिद्ध इतिहासविद समाजसेवी सेवनिवृत्ति आई. ए. एस . श्री सज्जन सिंह जी राणावत साहेब का में ऋणी हु जिन्होंने मेरे शोध के समय मेरे पत्र के जवाब में लिखा था “ हम सब मेवाड़ वासी राजा रामशाह के नमक के चुकारे के अहसानमंद हैं “ मेने इस पत्र को पढ़ने के बाद इन भावो को समझा तब मुजे अपने पूर्वजों पर असीम गर्व हुवा ।

राजा रामशाह ओर उनको पुत्रों की वीरता पर लिखने से तो अल्बदायु भी अपनी लेखनी को रोक नहीं सका ।

हल्दीघाटी के युद्ध में दोनो ही पक्ष के योद्धाओं को अपने जीवन ओर प्राणो से बढ़कर मान- प्रतिष्ठा की चिन्ता थी

( Price of life was low , but the honour was high )

राजारामशाह के ज्येष्ठ पुत्र युवराज शालिवाहन की राजकुमारी से महाराणा अमरसिंह जी का विवाह हुवा था जिनके गर्भ से महाराणा करण सिंह जी का जन्म हुवा ।

हल्दीघाटी युद्ध के अनेक वर्षों के बाद महाराणा करणसिंह जी ने अपने नाना के ऊपर खमनोर गाँव में छतरियाँ बनवाई जो राजा रामशाह के बलिदान की वीर गाथा का गुणगान करती हैं ।

448 वीं पुण्य तिथि पर हल्दीघाटी में हुए झुँझार उन सभी महान वीरों व पूर्वजों के बलिदान को सादर वन्दन नमन !

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07/09/2025

राजपूत वंशावली में समस्त देश के राजपूतों की उत्पत्ति के 36 वंश, प्रत्येक वंश की शाखा, परशाखा आदि का विस्तृत विवेचन एवं प्रत्येक वंश के गोत्र, प्रवर, कुलदेवी, कुलदेवता एवं पवित्र परम्पराओं पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। राजपूत वंशावली ग्रन्थ से समस्त क्षत्रिय समाज को अपने विषय में पूर्ण जानकारी प्राप्त होगी, जिसमें समाज में संगठनात्मक विचारधारा को बल मिलेगा। घर बैठे किताब मंगवाने के लिए *8561060277*पर वाट्सअप करे हुक्म 🙏🙏सभी क्षत्रिय समाज से निवदेन है कि इस ग्रंथ का ज्यादा से ज्यादा प्रचार प्रसार करावे ताकि सभी राजपूत समाज के पास ये ग्रंथ पहुंच सके 🙏
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