15/03/2025
गांवों के आम लोग, जो प्रतिदिन पैदल ही अपने कामों के लिए चलते हैं — चाहे वे #मजदूर हों, #किसान हों या सामान्य #छात्र — वे किसी अन्य व्यक्ति या नेता के पैदल चलने मात्र से कैसे प्रभावित हो सकते हैं?
#कोरोना काल में लाखों भारतीयों ने सिर पर सामान रखकर, भूखे-प्यासे, पुलिस की लाठियां खाते हुए हजारों किलोमीटर पैदल यात्रा की थी। ऐसे लोगों के लिए #प्रशांत_किशोर, #राहुल_गांधी, #कन्हैया_कुमार या किसी अन्य नेता की पदयात्रा का क्या महत्व हो सकता है? उनके लिए पैदल चलना कोई आश्चर्य की बात नहीं, बल्कि जीवन का एक सामान्य हिस्सा है।
आजादी से पूर्व #महात्मा_गांधी की पदयात्राएं या फिर नब्बे के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री #चंद्रशेखर द्वारा की गई #पदयात्रा के समय परिस्थितियां अलग थीं। तब गांव-गांव तक पहुंचने के लिए सड़कें सीमित थीं, संसाधनों की कमी थी, और जनसंपर्क का कोई अन्य प्रभावी माध्यम नहीं था। इसलिए, पदयात्राएं संदेश पहुंचाने का एक सशक्त माध्यम थीं।
लेकिन 21वीं सदी में जब सड़कें पहले की अपेक्षा काफी सुगम हो गई हैं, जब संचार के अनेकों साधन उपलब्ध हैं—टीवी, सोशल मीडिया, रेडियो, इंटरनेट—तो इतनी लंबी पदयात्राओं का कोई व्यावहारिक औचित्य नहीं रह जाता। अब के नेताओं के पास #संसाधन का भी वैसा अभाव नहीं है। यदि किसी नेता को जनता से मिलना ही है, तो #गाड़ियों या #हेलीकॉप्टर से तेजी से अधिक स्थानों पर जाया जा सकता है। मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म का भी उपयोग किया जा सकता है, जिससे संदेश अधिक प्रभावी और व्यापक रूप से पहुंच सकता है।
#गांधी जी की यात्राओं का प्राथमिक उद्देश्य समाज का उत्थान था, जबकि आज की यात्राओं का मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ प्राप्त करना है। इसलिए, इन आधुनिक पदयात्राओं से कोई ठोस राजनीतिक या सामाजिक परिणाम निकलने की संभावना नहीं है।
जो नए नेता पदयात्रा शुरू करने की योजना बना रहे हैं, उन्हें इक्कीसवीं सदी के पदयात्रा के जनक प्रशांत किशोर से एक बार जरूर पूछ लेना चाहिए कि उनकी पदयात्रा से उन्हें कोई लाभ हुआ या नुकसान?
Political marches are meaningless in the age of communication revolution: Dhananjay Sinha