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एनी बेसेंट : ज्ञान, नारी अधिकार और स्वराज की पुकार20 सितम्बर 1933 को अडयार (मद्रास प्रेसीडेंसी) में एनी बेसेंट का जीवन स...
19/09/2026

एनी बेसेंट : ज्ञान, नारी अधिकार और स्वराज की पुकार

20 सितम्बर 1933 को अडयार (मद्रास प्रेसीडेंसी) में एनी बेसेंट का जीवन समाप्त हुआ, लेकिन उनका नाम आज भी भारत की स्वतंत्रता यात्रा और शिक्षा तथा समाज सुधार आंदोलनों में गूंजता है। 1 अक्तूबर 1847 को लंदन में एनी वुड के रूप में जन्मी, वे बचपन से ही प्रश्न पूछने वाली और परम्पराओं को चुनौती देने वाली थीं। उन्होंने चर्च की कठोरताओं के विरुद्ध आवाज़ उठाई, मज़दूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और पश्चिम में स्त्रियों की मुक्ति की सबसे शुरुआती समर्थक बनीं। अपने व्यक्तिगत जीवन में भी उन्होंने साहस दिखाया- असफल वैवाहिक जीवन को पीछे छोड़कर उन्होंने विचारक, लेखिका और कार्यकर्ता के रूप में अपना मार्ग स्वयं बनाया।

सत्य की खोज ने उन्हें 1889 में थियोसोफिकल सोसाइटी तक पहुँचाया और 1893 में वे भारत आईं। यह वही भूमि थी, जिसने आगे चलकर उनका स्थायी घर और कर्मक्षेत्र बनना था। अडयार में बसकर उन्होंने भारतीय आध्यात्मिक धारा को अपनाया और साथ ही यहाँ के सामाजिक तथा राजनीतिक संघर्षों में सक्रिय भूमिका निभाई। 1907 में वे थियोसोफिकल सोसाइटी की अध्यक्ष बनीं और जीवन के अंतिम क्षण तक इस पद पर रहीं। उनके लिए थियोसोफी केवल दर्शन नहीं, बल्कि पूर्व और पश्चिम को जोड़ने का सेतु था।

शिक्षा उनके जीवन का सबसे प्रिय उद्देश्य था। उनका विश्वास था कि ज्ञान ही सच्चा मार्गदर्शन है, विशेषकर उस राष्ट्र के लिए जो पराधीन है। 1898 में उन्होंने वाराणसी में सेंट्रल हिन्दू स्कूल की स्थापना की, जो आगे चलकर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का हिस्सा बना। स्त्रियों की शिक्षा के लिए भी उन्होंने अथक प्रयास किया और यह स्पष्ट कहा कि जब तक आधी जनसंख्या अंधकार में रहेगी, कोई समाज आगे नहीं बढ़ सकता।

भारत में उनका योगदान केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहा। आयरलैण्ड के ‘होम रूल आंदोलन’ से प्रेरित होकर उन्होंने 1916 में बाल गंगाधर तिलक के साथ मिलकर ‘ऑल इंडिया होम रूल लीग’ की स्थापना की। पहली बार भारत में स्वराज की मांग एक संगठित रूप से उठाई गई। एनी बेसेंट के भाषणों और लेखन ने स्वतंत्रता की चिनगारी गाँव-गाँव तक पहुँचा दी। इस कारण उन्हें कारावास भी झेलना पड़ा, किन्तु उसी वर्ष 1917 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष निर्वाचित हुईं।

गांधी युग में उनकी राजनीतिक भूमिका घट गई, फिर भी उनका सेवाभाव नहीं रुका। उन्होंने बाल विवाह और जातिगत भेदभाव का विरोध किया और स्त्रियों के अधिकारों की निरंतर हिमायत करती रहीं। जीवन के अंतिम वर्षों तक वे लिखती और बोलती रहीं और 380 से अधिक पुस्तकें व पुस्तिकाएँ समाज को देकर गईं।

85 वर्ष की आयु में जब उनका निधन हुआ, भारत ने एक सच्ची मित्र खो दी। पर उनकी स्मृति जीवित है - उनके नाम पर बसाए गए नगरों में, उनके द्वारा स्थापित संस्थानों में और उस निडर विचारधारा में, जो स्वतंत्रता और समानता को मानव जीवन का आधार मानती है। एनी बेसेंट केवल भारत आई नहीं थीं, बल्कि भारत की मिट्टी, संघर्ष और स्वप्न का हिस्सा बन गई थीं।

उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें केवल स्वतंत्रता सेनानी के रूप में नहीं, बल्कि एक सेतु, एक पथप्रदर्शक और एक ऐसी स्त्री के रूप में याद करते हैं, जिसने सत्य और न्याय के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पित कर दिया। भारत ने उन्हें अपनाया, और उन्होंने भारत को अपना अमर प्रेम।
#स्वराज #पुण्यतिथि #नारी_शक्ति

20 सितम्बर/पुण्य-तिथि                   एकात्मता के पुजारी नारायण गुरुहिन्दू धर्म विश्व का सर्वश्रेष्ठ धर्म है; पर छुआछू...
19/09/2026

20 सितम्बर/पुण्य-तिथि

एकात्मता के पुजारी नारायण गुरु

हिन्दू धर्म विश्व का सर्वश्रेष्ठ धर्म है; पर छुआछूत और ऊंचनीच जैसी कुरीतियों के कारण हमें नीचा भी देखना पड़ता है। इसका सबसे अधिक प्रकोप किसी समय केरल में था। इससे संघर्ष कर एकात्मता का संचार करने वाले श्री नारायण गुरु का जन्म 1856 ई. में तिरुअनंतपुरम् के पास चेम्बा जनती कस्बे में ऐजवा जाति के श्री मदन एवं श्रीमती कुट्टी के घर में हुआ था।

नारायण के पिता अध्यापक एवं वैद्य थे; पर प्राथमिक शिक्षा के बाद कोई व्यवस्था न होने से वे अपने साथियों के साथ गाय चराने जाने लगे। वे इस दौरान संस्कृत श्लोक याद करते रहते थे। कुछ समय बाद वे खेती में भी हाथ बंटाने लगे। 1876 में गुरुकुल में भर्ती होकर उनकी शिक्षा फिर प्रारम्भ हुई। वे खेलकूद का समय प्रार्थना एवं ध्यान में बिताते थे। स्वास्थ्य खराबी के कारण उनकी शिक्षा पूरी नहीं हो सकी। घर आकर उन्होंने एक विद्यालय खोल लिया। इसी समय उन्होंने काव्य रचना और गीता पर प्रवचन भी प्रारम्भ कर दिये। उन्होंने गृहस्थ जीवन के बंधन में बंधने से मना कर दिया।

अध्यात्म एवं एकांत प्रेमी नारायण भोजन, आवास और हिंसक पशुओं की चिन्ता किये बिना जंगलों में साधनारत रहते थे। अतः लोग उन्हें चमत्कारी पुरुष मानकर स्वामी जी एवं नारायण गुरु कहने लगे। यह देखकर ईसाई और मुसलमान विद्वानों ने उन्हें धर्मान्तरित करने का प्रयास किया; पर वे सफल नहीं हुए। 1888 में वे नयार नदी के पास अरूबीपुर में साधना करने लगे। वहां उन्होंने शिवरात्रि पर मंदिर बनाने की घोषणा की। आधी रात में भक्तों की भीड़ के बीच वे नदी में से एक शिवलिंग लेकर आये और उसे वैदिक मंत्रों के साथ एक चट्टान पर स्थापित कर दिया। इस प्रकार अरूबीपुर नूतन तीर्थ बन गया। कई लोगों ने यह कहकर इसका विरोध किया कि छोटी जाति के व्यक्ति को मूर्ति स्थापना का अधिकार नहीं है; पर स्वामी जी चुपचाप काम में लगे रहे।

समाज सुधार के अगले चरण के रूप में 100 से अधिक मंदिरों से उन्होंने मदिरा एवं पक्षीबलि से जुड़े देवताओं की मूर्तियां हटवा कर शिव, गणेश और सुब्रह्मण्यम की मूर्तियां स्थापित कीं। उन्होंने नये मंदिर भी बनवाये, जो उद्यान, विद्यालय एवं पुस्तकालय युक्त होते थे। इनके पुजारी तथाकथित छोटी जातियों के होते थे; पर उन्हें तंत्र, मंत्र एवं शास्त्रों का नौ साल का प्रशिक्षण दिया जाता था। मंदिर की आय का उपयोग विद्यालयों में होता था। दिन भर काम में व्यस्त रहने वालों के लिए रात्रि पाठशालाएं खोली गयीं। अनेक तीर्थों में अनुष्ठानों की उचित व्यवस्था कर पंडों द्वारा की जाने वाली ठगाई को बंद किया। बरकला की शिवगिरी पहाड़ी पर उन्होंने ‘शारदा मठम्’ नामक वैदिक विद्यालय एवं सरस्वती मंदिर की स्थापना की। इसी प्रकार अलवै में ‘अद्वैत आश्रम’ बनाया।

1924 ई. की शिवरात्रि को स्वामी जी ने अलवै में सर्वधर्म सम्मेलन कर सब धर्मों को जानने का आग्रह किया। वे तर्क-वितर्क और कुतर्क से दूर रहते थे। इससे लोगों के विचार बदलने लगे। ‘वैकोम सत्याग्रह’ के माध्यम से कई मंदिरों एवं उनके पास की सड़कों पर सब जाति वालों का मुक्त प्रवेश होने लगा। इसमें उच्च जातियों के लोग भी सहभागी हुए। यह सुनकर गांधी जी उनसे मिलने आये और उन्हें ‘पवित्र आत्मा’ कहकर सम्मानित किया।

स्वामी जी ने सहभोज, अंतरजातीय विवाह तथा कर्मकांड रहित सस्ते विवाहों का प्रचलन किया। बाल विवाह तथा वयस्क होने पर कन्या के पिता द्वारा दिये जाने वाले भोज को बंद कराया। उन्होंने अपने विचारों के प्रसार हेतु ‘विवेक उदयम्’ पत्रिका प्रारम्भ की। 20 सितम्बर, 1928 को एकात्मता के इस पुजारी का देहांत हुआ। केरल में उनके द्वारा स्थापित मंदिर, आश्रम तथा संस्थाएं समाज सुधार के उनके काम को आगे बढ़ा रही हैं।
(संदर्भ : नररत्न नारायण गुरु - वीरेश्वर द्विवेदी)

संस्कृति के संवाहक डा. हरवंशलाल ओबरायभारत में अनेक मनीषी ऐसे हुए हैं, जिन्होंने दुनिया के अन्य देशों में जाकर भारतीय धर्...
19/09/2026

संस्कृति के संवाहक डा. हरवंशलाल ओबराय

भारत में अनेक मनीषी ऐसे हुए हैं, जिन्होंने दुनिया के अन्य देशों में जाकर भारतीय धर्म एवं संस्कृति का प्रचार किया। बहुमुखी प्रतिभा के धनी डा. हरवंशलाल ओबराय ऐसे ही एक विद्वान् थे, जो एक दुर्घटना के कारण असमय ही दुनिया छोड़ गये।

डा. हरवंशलाल का जन्म रावलपिंडी में 21 अक्तूबर, 1925 को हुआ था। प्रारम्भ से ही उनकी रुचि हिन्दू धर्म के अध्ययन के प्रति अत्यधिक थी। 1947 में देश विभाजन के बाद वे अपनी माता जी एवं छह भाई-बहिनों सहित भारत आ गये। यहाँ उन्होंने सम्मानपूर्वक हिन्दी साहित्य, भारतीय संस्कृति (इण्डोलॉजी) एवं दर्शनशास्त्र में एम.ए. किया। इसके बाद 1948 में उन्होंने दर्शनशास्त्र में पी-एच.डी. पूर्ण की। इस दौरान उनका स्वतन्त्र अध्ययन भी चलता रहा और वे प्राच्य विद्या के अधिकारी विद्वान माने जाने लगे।

सामाजिक क्षेत्र में वे 'अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद' से जुड़े और 1960 एवं 61 में उसके अध्यक्ष रहे। 1963 में यूनेस्को के निमन्त्रण पर वे यूरोप, अमरीका, कनाडा और एशियाई देशों में भारतीय संस्कृति पर व्याख्यान देने के लिए गये। इसके बाद भी उनका विदेश यात्राओं का क्रम चलता रहा।

उन्होंने 105 देशों की यात्रा की। हर यात्रा में वे उस देश के प्रभावी लोगों से मिले और वहाँ भारतीय राजाओं, संन्यासियों एवं धर्माचार्याें द्वारा किये कार्यों को संकलित किया। इस प्रकार ऐसे शिलालेख, भित्तिचित्र और प्रकाशित सामग्री का एक अच्छा संग्रह उनके पास हो गया।

एक बार अमरीका में उनका भाषण सुनकर बिड़ला प्रौद्योगिकी संस्थान, राँची के श्री चन्द्रकान्त बिड़ला ने उन्हें अपने संस्थान में काम करने का निमन्त्रण दिया। 1964 में वहाँ दर्शन एवं मानविकी शास्त्र का विभाग खोलकर डा. ओबराय को उसका अध्यक्ष बनाया गया। उनके सुझाव पर सेठ जुगलकिशोर बिड़ला ने छोटा नागपुर में ‘सरस्वती विहार’ की स्थापना कर भारतीय संस्कृति के शोध, अध्ययन एवं प्रचार की व्यवस्था की।

सेठ जुगलकिशोर बिड़ला को इस बात का बहुत दुःख था कि वनवासी क्षेत्र में ईसाई मिशनरियाँ सक्रिय हैं तथा वे निर्धन, अशिक्षित लोगों को छल-बल से ईसाई बना रही हैं। यह देखकर डा. ओबराय ने ‘सरस्वती विहार’ की गतिविधियों में ऐसे अनेक आयाम जोड़े, जिससे धर्मान्तरण को रोका जा सके। इसके साथ ही उन्होंने शुद्धीकरण के काम को भी तेज किया।

डा. ओबराय हिन्दी, संस्कृत, पंजाबी, उर्दू, अंग्रेजी तथा फ्रेंच के विद्वान थे। सम्पूर्ण भागवत, रामायण, गीता एवं रामचरितमानस उन्हें कण्ठस्थ थे। उनके सैकड़ों शोध प्रबन्ध देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपे। अनेक भारतीय एवं विदेशी छात्रों ने उनके निर्देशन में शोध कर उपाधियाँ प्राप्त कीं। उनकी विद्वत्ता देखकर देश-विदेश के अनेक मठ मन्दिरों से उनके पास गद्दी सँभालने के प्रस्ताव आये; पर उन्होंने विनम्रतापूर्वक सबको मना कर दिया।

एक बार वे रेल से इन्दौर जा रहे थे। मार्ग में रायपुर स्टेशन पर उनके एक परिचित मिल गये। उनसे वे बात कर ही रहे थे कि गाड़ी चल दी। डा. ओबराय ने दौड़कर गाड़ी में बैठना चाहा; पर अचानक ठोकर खाकर वे गिर पड़े। उन्हें तत्काल राँची लाया गया; पर चोट इतनी घातक थी कि उन्हें बचाया नहीं जा सका। इस प्रकार सैकड़ों देशों में हिन्दुत्व की विजय पताका फहराने वाला योद्धा 20 सितम्बर, 1983 को चल बसा।
विनम्र श्रद्धासुमन
#इतिहास #भारतीय_संस्कृति

संघ के प्रचारक जहां भी भेजे जाते हैं, वहां की भाषा, बोली, खानपान और वेशभूषा से एकरूप हो जाते हैं। ऐसे ही थे श्री केशवराव...
19/09/2026

संघ के प्रचारक जहां भी भेजे जाते हैं, वहां की भाषा, बोली, खानपान और वेशभूषा से एकरूप हो जाते हैं। ऐसे ही थे श्री केशवराव दीक्षित।

केशवजी के पिता संघचालक थे। अतः जलगांव प्रवास में संघ संस्थापक डा. हेडगेवार उनके घर आते ही थे। केशवजी भी छह वर्ष की अवस्था से ही शाखा में जाने लगे थे। 1939, 40 और 41 में उन्होंने संघ शिक्षा वर्ग के तीनों वर्ष के प्रशिक्षण लिये थे। एक बार डा. जी ने दत्तात्रेय जी से आग्रह किया कि वे केशव को संघ कार्य के लिए दे दें। 1940 में डा. जी का देहांत हो गया; पर उनकी कही बात केशवजी को याद रही। अतः 1949 में जलगांव से मराठी और संस्कृत में बी.ए. आनर्स करने के बाद वे प्रचारक हो गये।

1950 में संघ योजना से वे कोलकाता आये। बड़ा बाजार और फिर विधान सरणी में रहकर उन्होंने संघ कार्य का विस्तार किया। कोलकाता महानगर से लेकर प्रांत संपर्क प्रमुख, प्रांत प्रचारक, क्षेत्र बौद्धिक प्रमुख और पूर्वोत्तर भारत के क्षेत्र प्रचारक की जिम्मेदारी उन पर रही। संघ कार्य में शारीरिक, बौद्धिक और घोष आदि सभी में वे माहिर थे। वे कहते थे कि संघ कार्य को समझने के लिए डा. हेडगेवार और उस काल की परिस्थिति को समझना जरूरी है। संघ का काम करने के लिए उच्च शिक्षा या पैसे की नहीं, मन में सेवा भाव की जरूरत है।

उन्होंने 72 वर्ष तक बंगाल और पूरे पूर्वोत्तर भारत में संघ का काम किया। अतः केशव भवन में बड़ी संख्या में लोग उनसे मिलने आते थे। वे सबसे बहुत प्रेम से उसका नाम लेकर बात करते थे। एक बुजुर्ग की तरह उनके घर-परिवार का हालचाल लेते थे तथा आग्रहपूर्वक कुछ अल्पाहार भी कराते थे।

बंगाल में वामपंथियों और पूर्वोत्तर भारत में ईसाई प्रभाव के कारण संघ के कार्यकर्ताओं को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। संघ को वहां उच्च वर्ग के बंगाली और मारवाड़ी व्यापारियों की संस्था माना जाता था। इस माहौल में केशव जी ने अथक परिश्रम करते हुए हजारों स्थानीय कार्यकर्ता तैयार किये। इसका प्रगटीकरण 1992 के जनवरी मास में बंगाल में हुए एक शीत शिविर में हुआ, जिसमें 20 हजार स्वयंसेवक शामिल हुए। इससे संपूर्ण क्षेत्र में उत्साह का वातावरण बना। 1975 के आपातकाल में तथा 1992 में बाबरी ढांचे के ध्वंस के बाद संघ पर प्रतिबंध लगाया गया। उस दौर में केशवजी के नेतृत्व में स्वयंसेवकों ने धैर्यपूर्वक सत्याग्रह कर इस संकट का सामना किया।

केशवजी बड़े दायित्व पर रहने के बाद भी स्वयं को सामान्य स्वयंसेवक समझते थे। अतः दैनिक शाखा, कार्यालय के प्रातःस्मरण, गीतापाठ आदि में वे नियमित रूप से शामिल होते थे। वे बहुत शांत, सौम्य और प्रसिद्धि से दूर रहने वाले थे। विचार की बजाय व्यवहार से सिखाने के कारण वे बंगाल में संघ कार्य के पर्याय बन गये। लोग उन्हें ‘बंगाली भद्र मानुष’ ही समझते थे।

लम्बी बीमारी के बाद 20 सितम्बर, 2022 को कोलकाता में उनका देहांत हुआ। हजारों कार्यकर्ता उन्हें अपना अभिभावक और मार्गदर्शक मानते थे। उनकी प्रेरणा से वे सब लगातार संघ और विविध क्षेत्रों में काम कर रहे हैं।

(अद्वैत जी, महावीर बजाज, पांचजन्य 2.10.22)
#केशवराव_दीक्षित

20 सितंबर/बलिदान दिवसकनकलता बरुआ कनकलता का जन्म 22 दिसंबर 1924 को हुआ था।  बरुआ का जन्म असम के अविभाजित दारंग जिले के बो...
19/09/2026

20 सितंबर/बलिदान दिवस
कनकलता बरुआ

कनकलता का जन्म 22 दिसंबर 1924 को हुआ था। बरुआ का जन्म असम के अविभाजित दारंग जिले के बोरंगाबाड़ी गांव में कृष्णकांत और कर्णेश्वरी बरुआ की बेटी के रूप में हुआ था। उनके दादा घाना कांता बरुआ दारंग में एक प्रसिद्ध शिकारी थे। उनके पूर्वज तत्कालीन अहोम राज्य के डोलकाशरिया बरुआ साम्राज्य ( चुटिया जागीरदार सरदार) से थे , जिन्होंने डोलकाशरिया उपाधि को त्याग दिया और बरुआ उपाधि को बरकरार रखा। जब वह केवल पाँच वर्ष की थी तब उसकी माँ की मृत्यु हो गई और जब वह तेरह वर्ष की हुई तो उसके पिता की मृत्यु हो गई, वह कक्षा तीन तक स्कूल गई लेकिन फिर अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल के लिए स्कूल छोड़ दिया।

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बरुआ मृत्यु वाहिनी में शामिल हो गई, जो एक मौत का दस्ता था जिसमें असम के गोहपुर उप-मंडल के युवाओं के समूह शामिल थे। 20 सितंबर 1942 को वाहिनी ने निर्णय लिया कि वह स्थानीय पुलिस स्टेशन पर राष्ट्रीय ध्वज फहराएंगी। बरुआ ने ऐसा करने के लिए निहत्थे ग्रामीणों के एक जुलूस का नेतृत्व किया। पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी रेबती महान सोम के नेतृत्व में पुलिस ने जुलूस को अपनी योजना के साथ आगे बढ़ने पर गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी। चेतावनी के बाद भी जुलूस आगे बढ़ता रहा तभी पुलिस ने जुलूस पर फायरिंग कर दी. बरुआ को गोली मार दी गई और वह जो झंडा अपने साथ ले जा रही थी, उसे मुकुंद काकोटी ने ले लिया, जिस पर भी गोली चलाई गई। पुलिस कार्रवाई में बरुआ और काकोटी दोनों मारे गए। अपनी मृत्यु के समय बरुआ 17 वर्ष की थी।

1997 में कमीशन किए गए भारतीय तट रक्षक के फास्ट पेट्रोल वेसल ICGS कनक लता बरुआ का नाम बरुआ के नाम पर रखा गया है। 2011 में गौरीपुर में उनकी एक आदमकद प्रतिमा का अनावरण किया गया।
#बलिदान_दिवस #स्वतंत्रता_सेनानी #असमकीलक्ष्मी

20 सितम्बर/जन्म-दिवस                   गायत्री के आराधक आचार्य श्रीराम शर्मागायत्री परिवार नामक संस्था के संस्थापक आचार्...
19/09/2026

20 सितम्बर/जन्म-दिवस
गायत्री के आराधक आचार्य श्रीराम शर्मा

गायत्री परिवार नामक संस्था के संस्थापक आचार्य श्रीराम शर्मा का जन्म 20 सितम्बर, 1911 को ग्राम आँवलखेड़ा (जिला आगरा, उ.प्र.) में हुआ था। यद्यपि वे एक जमींदार घराने में जन्मे थे; पर उनका मन प्रारम्भ से ही अध्यात्म साधना के साथ-साथ निर्धन एवं निर्बल की पीड़ा के प्रति संवेदनशील था। जब गाँव की एक हरिजन महिला कुष्ठ से पीड़ित हो गयी, तो बालक श्रीराम ने घर वालों का विरोध सहकर भी उसकी भरपूर सेवा की। उस महिला ने स्वस्थ होकर उन्हें ढेरों आशीर्वाद दिये।

15 वर्ष की अवस्था में वसन्त पंचमी पर काशी में पण्डित मदनमोहन मालवीय ने बालक श्रीराम को गायत्री की दीक्षा दी। तबसे उनका जीवन बदल गया। उसी समय उन्हें अदृश्य छायारूप में अपनी गुरुसत्ता के दर्शन हुए, जिसने उन्हें हिमालय आकर गायत्री की साधना करने का आदेश दिया। उनका आदेश पाकर वे हिमालय जाकर कठोर तप में लीन हो गये।

वहाँ से लौटकर वे समाजसेवा के साथ स्वतन्त्रता आन्दोलन में भी कूद पड़े। नमक आन्दोलन के दौरान सत्याग्रह करने वे आगरा गये। पुलिस ने उनसे तिरंगा छीनने का बहुत प्रयास किया। उन्हें पीटा गया; पर उन्होंने झण्डा नहीं छोड़ा। उन्होंने झण्डा मुँह में दबा लिया, जिसके टुकड़े उनके बेहोश होने के बाद ही मुँह से निकाले जा सके। इस कारण उन्हें श्रीराम ‘मत्त’ नाम मिला।

1935 के बाद उनके जीवन का नया दौर शुरू हुआ। वे ऋषि अरविन्द से मिलने पांडिचेरी, श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर से मिलने शान्ति निकेतन तथा गांधी जी से मिलने सेवाग्राम गये। वहाँ से लौटकर उन्होंने ‘अखण्ड ज्योति’ नामक मासिक पत्रिका प्रारम्भ की। आज भी यह लाखों की संख्या में भारत की अनेक भाषाओं में छप रही है।

इसी बीच वे समय-समय पर हिमालय पर जाकर साधना एवं अनुष्ठान भी करते रहे। गायत्री तपोभूमि, मथुरा और शान्तिकुंज, हरिद्वार को उन्होंने अपने क्रियाकलापों का केन्द्र बनाया। वहाँ हिमालय के किसी पवित्र स्थान से लायी गयी ‘अखण्ड ज्योति’ का दीपक आज भी निरन्तर प्रज्वलित है।

आचार्य श्रीराम शर्मा जी का मत था कि पठन-पाठन तथा यज्ञ करने एवं कराने का अधिकार सभी को है। अतः उन्होंने 1958 में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर दस लाख लोगों को गायत्री की दीक्षा दी। इसमें सभी वर्ग, वर्ण और अवस्था के लोग शामिल थे। उनके कार्यक्रमों की एक विशेषता यह थी कि वे सबसे सपरिवार आने का आग्रह करते थे। इस प्रकार केवल घर-गृहस्थी में उलझी नारियों को भी उन्होंने समाजसेवा एवं अध्यात्म की ओर मोड़ा। नारी शक्ति के जागरण से सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि इससे परिवारों का वातावरण सुधरने लगा।

आचार्य जी ने वेद, पुराण, उपनिषद, स्मृति, आरण्यक, ब्राह्मण ग्रन्थ, योगवाशिष्ठ, तन्त्र एवं मन्त्र महाविज्ञान आदि सैकड़ों ग्रन्थों की व्याख्याएँ लिखीं। वे बीच-बीच में साधना के लिए जाते रहते थे। इस दौरान सारा कार्य उनकी धर्मपत्नी श्रीमती भगवती देवी सँभालती थीं। इसमें से ही ‘युग निर्माण योजना’ जैसे प्रकल्प का जन्म हुआ। इसके द्वारा आयोजित यज्ञ में सब भाग लेते हैं। अवैज्ञानिक एवं कालबाह्य हो चुकी सामाजिक रूढ़ियों के बदले नयी मान्यताएँ स्थापित करने का यह एक सार्थक प्रयास है। दो जून, 1990 को गायत्री जयन्ती पर आचार्य जी ने स्वयं को परमसत्ता में विलीन कर लिया।
#पंडित_श्रीराम_शर्मा_आचार्य #विचार_क्रांति #युगऋषि #जयंती

*🚩--आज का पंचांग*🚩*अद्य श्री ब्रह्मणो, द्वितीये परार्धे श्री श्वेत वराह कल्पे, वैवस्वत  मन्वन्तरे,  अष्टाविंशति-तमे, युग...
19/09/2026

*🚩--आज का पंचांग*🚩

*अद्य श्री ब्रह्मणो, द्वितीये परार्धे श्री श्वेत वराह कल्पे, वैवस्वत मन्वन्तरे, अष्टाविंशति-तमे, युग चतुष्के कलियुगे, कलि प्रथम चरणे सिद्धार्थी* (विक्रमी सम्वत) *पराभव* (शक सम्वत) नाम संवत्सरे

*युगाब्द* 5128
*विक्रमी संवत्* 2083
*शिवशके* 352-53
*शके* 1948
*अयन* दक्षिणायन
*ऋतु* वर्षा-शरद
*मास* भाद्रपद
*पक्ष* शुक्ल
*नक्षत्र* पूर्वाषाढा
*योग* सौभाग्य
*करण* कौलव, तैत्तिल
*तिथि* नवमी
*वार* रविवार

*तदनुसार*
20 सितंबर 2026

*दिन विशेष*
अदुःख नवमी, तल नवमी (उड़ीसा), भागवत सप्ताहारम्भ, गुरु आश्लेषा में
*जन्मदिवस*
1. गायत्री के आराधक, गायत्री परिवार के संस्थापक श्रीराम शर्मा आचार्य
2. स्वतन्त्रता सेनानी मोहम्मद बरकतुल्ला
*पुण्यतिथि*
1. गोवा के वैज्ञानिक-क्रान्तिकारी जोस कसटोडियो
2. एकात्मता के पुजारी नारायण गुरु
3. सामाजिक कार्यकर्ता और भारत की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करने वाली अंग्रेज महिला एनी बेसेंट
4. संस्कृति के संवाहक डॉ हरवंश लाल ओबरॉय
5. बंगाल में संघ के पर्याय केशवराव दीक्षित
6. क्रान्तिकारी कनक लता बरुआ बलिदान
*आज का दिन सबके लिए मंगलमय हो*
🙏🕉️🙏

*🚩जय भारत 🌞 वन्दे मातरम**🪂संस्कृति अपनी एक चिरन्तन 🪂*🍁 *यस्याँके च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके, भाले बालविधुर्गले च ग...
19/09/2026

*🚩जय भारत 🌞 वन्दे मातरम*
*🪂संस्कृति अपनी एक चिरन्तन 🪂*

🍁 *यस्याँके च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके, भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्।*🍁
*🍁सोयं भूतिविभूषण: सुरवर: सर्वाधिप: सर्वदा, सर्व: सर्वगत: शिव: शशिनिभ: श्रीशंकरः पातुमाम्।।🍁*
(रामचरितमानस 2/1)

*जिनकी गोद में हिमालय की पुत्री पार्वती जी सुशोभित हैं, मस्तक पर गंगा जी, ललाट पर दूज का चन्द्रमा, कण्ठ में हलाहल विष, वक्ष सर्पराज शेषनाग से विभूषित है, वे वे देवताओं में श्रेष्ठ, सर्वेश्वर, भक्तों के पापकर्म, कल्याणस्वरूप, चन्द्र के समान श्वेत वर्ण शिव मेरी रक्षा करें।*🍁

🌹☘ *सुप्रभात जय श्रीराधेकृष्ण। जय भोलेनाथ*☘🌹

हिन्दी साहित्य के शीर्ष स्तंभ, ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित ज्ञानमार्गी और चेतना के कवि कुंवर नारायण जी की जयंती पर उन्...
18/09/2026

हिन्दी साहित्य के शीर्ष स्तंभ, ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित ज्ञानमार्गी और चेतना के कवि कुंवर नारायण जी की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।

कुंवर नारायण जी की कविताएं मानवीय संवेदना, दर्शन और इतिहासबोध का एक अनूठा संगम हैं। उन्होंने सीधी-सरल भाषा में जीवन के गहरे सत्यों को उजागर किया। 'आत्मजयी' जैसी कालजयी कृति के रचनाकार कुंवर नारायण जी ने साहित्य जगत को अपनी वैचारिक प्रखरता और संवेदनशीलता से समृद्ध किया।

आज उनकी जयंती पर, आइए उनकी एक प्रसिद्ध कविता की इन सुंदर पंक्तियों को याद करें:

"कविता एक उड़ान है चिड़िया के बहाने कविता की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने!बाहर भीतर, इस घर, उस घर कविता के पंख लगा उड़ने के माने चिड़िया क्या जाने?"

19 सितम्बर/जन्म-दिवसवेदमूर्ति पंडित श्रीपाद सातवलेकरवेदों के सुप्रसिद्ध भाष्यकार पंडित श्रीपाद दामोदर सातवलेकर का जन्म 1...
18/09/2026

19 सितम्बर/जन्म-दिवस
वेदमूर्ति पंडित श्रीपाद सातवलेकर

वेदों के सुप्रसिद्ध भाष्यकार पंडित श्रीपाद दामोदर सातवलेकर का जन्म 19 सितम्बर, 1867 को महाराष्ट्र के सावंतवाड़ी रियासत के कोलगाव में हुआ था। जन्मपत्री के अनुसार 16 वें वर्ष में उनकी मृत्यु का योग था; पर ईश्वर की कृपा से उन्होंने 102 की आयु पाई। वेदपाठी परिवार होने से उनके कानों में सदा वेदमंत्र गूंजते रहते थे। मामा श्री पेंढारकर के घर सावंतवाड़ी में रहकर उन्होंने प्राथमिक शिक्षा ली। 1887 में एक अंग्रेज वेस्ट्रॉप ने वहां चित्रशाला प्रारम्भ की। श्रीपाद ने यहां चित्र और मूर्तिकला का रुचिपूर्वक गहन अध्ययन किया।

22 वर्ष की अवस्था में विवाह के बाद वे मुंबई आ गये। यहां उनकी कला परिमार्जित हुई तथा अनेक पुरस्कार मिले। इसके साथ वे संस्कृत अध्ययन की अपनी परम्परा भी निभाते रहे। वेदों के बारे में लिखे उनके लेख लोकमान्य तिलक ने ‘केसरी’ में प्रकाशित किये। 1900 ई. में हैदराबाद आकर वे आर्य समाज से जुड़े और ऋषि दयानंद के कई ग्रन्थों का अनुवाद किया। वेदों में बलिप्रथा नहीं है, इसे सिद्ध करते हुए उन्होंने कई लेख लिखे। उन्होंने अथर्ववेद के पृथ्वीसूक्त को ‘वैदिक राष्ट्रगीत’ बताकर एक पुस्तिका लिखी। कुछ समय बाद वे थियोसोफिकल सोसायटी के सदस्य भी बने।

श्रीपाद जी की स्वाधीनता आंदोलन में सक्रियता को देखकर अंग्रेजों ने अपने मित्र हैदराबाद के निजाम को इसे रोकने को कहा। अतः वे गुरुकुल कांगड़ी (हरिद्वार) आकर चित्रकला तथा वेद पढ़ाने लगे। उनके एक लेख के लिए कोल्हापुर में उन पर राजद्रोह का मुकदमा चला, जिसमें तीन वर्ष की सजा सुनाई गयी। वे चुपचाप वहां से निकल गये; पर हरिद्वार पुलिस ने उन्हें हथकड़ी और बेड़ी डालकर बिजनौर जेल में बंद कर दिया। रेल से कोल्हापुर ले जाते समय रास्ते भर लोगों ने उनका भव्य सत्कार किया। कोल्हापुर न्यायालय में हुई बहस में पंडित जी ने स्वयं को वेदों का पुजारी कहकर देश के क्षत्रियत्व को जाग्रत करना अपना धर्म बताया। अतः न्यायाधीश ने उन्हें छोड़ दिया।

सातवलेकर जी फिर हरिद्वार आये; पर प्रशासन उनके कारण गुरुकुल के छात्रों को परेशान न करे, यह सोचकर वे लाहौर आ गये। यहां उन्होंने ‘सातवलेकर आर्ट स्टूडियो’ स्थापित कर चित्रकला के साथ फोटोग्राफी भी प्रारम्भ कर दी। ‘हिन्द केसरी’ पत्र में उनके वेद-विषयक लेख छपने से उन्हें व्याख्यान के लिए भी निमन्त्रण मिलने लगे। कांग्रेस में सक्रियता के कारण पुलिस फिर उनके पीछे पड़ गयी। उनके बच्चे छोटे थे। अतः 1919 में वे लाहौर छोड़कर औंध आ गये। यहां ‘स्वाध्याय मंडल’ स्थापित कर वे वेदों का अनुवाद करने लगे। दक्षिण की अनेक रियासतों में उन्होंने ‘प्रजा परिषद’ का गठन कर जागृति फैलाई। उनके प्रयास से औंध में स्वराज्य का संविधान लागू हुआ।

1936 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और औंध में संघचालक बने। देश स्वाधीन होने पर वे वे बलसाड़ (गुजरात) के पारडी ग्राम में बस गये। यहां उन्होंने एक चर्च खरीद कर उसमें वेदमंदिर स्थापित किया। 90 वर्ष पूर्ण होने पर मुंबई में उनका भव्य सत्कार किया गया। 100 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित समारोह में सरसंघचालक श्री गुरुजी ने उन्हें मानपत्र समर्पित किया।

31 जुलाई, 1969 को वेदों के भाष्यकार, स्वाधीनता सेनानी तथा श्रेष्ठ चित्रकार पंडित सातवलेकर जी के सक्रिय जीवन का समापन हुआ।
(संदर्भ : पं. सातवलेकर, श्री भारती प्रकाशन, नागपुर)
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