19/09/2026
एनी बेसेंट : ज्ञान, नारी अधिकार और स्वराज की पुकार
20 सितम्बर 1933 को अडयार (मद्रास प्रेसीडेंसी) में एनी बेसेंट का जीवन समाप्त हुआ, लेकिन उनका नाम आज भी भारत की स्वतंत्रता यात्रा और शिक्षा तथा समाज सुधार आंदोलनों में गूंजता है। 1 अक्तूबर 1847 को लंदन में एनी वुड के रूप में जन्मी, वे बचपन से ही प्रश्न पूछने वाली और परम्पराओं को चुनौती देने वाली थीं। उन्होंने चर्च की कठोरताओं के विरुद्ध आवाज़ उठाई, मज़दूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और पश्चिम में स्त्रियों की मुक्ति की सबसे शुरुआती समर्थक बनीं। अपने व्यक्तिगत जीवन में भी उन्होंने साहस दिखाया- असफल वैवाहिक जीवन को पीछे छोड़कर उन्होंने विचारक, लेखिका और कार्यकर्ता के रूप में अपना मार्ग स्वयं बनाया।
सत्य की खोज ने उन्हें 1889 में थियोसोफिकल सोसाइटी तक पहुँचाया और 1893 में वे भारत आईं। यह वही भूमि थी, जिसने आगे चलकर उनका स्थायी घर और कर्मक्षेत्र बनना था। अडयार में बसकर उन्होंने भारतीय आध्यात्मिक धारा को अपनाया और साथ ही यहाँ के सामाजिक तथा राजनीतिक संघर्षों में सक्रिय भूमिका निभाई। 1907 में वे थियोसोफिकल सोसाइटी की अध्यक्ष बनीं और जीवन के अंतिम क्षण तक इस पद पर रहीं। उनके लिए थियोसोफी केवल दर्शन नहीं, बल्कि पूर्व और पश्चिम को जोड़ने का सेतु था।
शिक्षा उनके जीवन का सबसे प्रिय उद्देश्य था। उनका विश्वास था कि ज्ञान ही सच्चा मार्गदर्शन है, विशेषकर उस राष्ट्र के लिए जो पराधीन है। 1898 में उन्होंने वाराणसी में सेंट्रल हिन्दू स्कूल की स्थापना की, जो आगे चलकर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का हिस्सा बना। स्त्रियों की शिक्षा के लिए भी उन्होंने अथक प्रयास किया और यह स्पष्ट कहा कि जब तक आधी जनसंख्या अंधकार में रहेगी, कोई समाज आगे नहीं बढ़ सकता।
भारत में उनका योगदान केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहा। आयरलैण्ड के ‘होम रूल आंदोलन’ से प्रेरित होकर उन्होंने 1916 में बाल गंगाधर तिलक के साथ मिलकर ‘ऑल इंडिया होम रूल लीग’ की स्थापना की। पहली बार भारत में स्वराज की मांग एक संगठित रूप से उठाई गई। एनी बेसेंट के भाषणों और लेखन ने स्वतंत्रता की चिनगारी गाँव-गाँव तक पहुँचा दी। इस कारण उन्हें कारावास भी झेलना पड़ा, किन्तु उसी वर्ष 1917 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष निर्वाचित हुईं।
गांधी युग में उनकी राजनीतिक भूमिका घट गई, फिर भी उनका सेवाभाव नहीं रुका। उन्होंने बाल विवाह और जातिगत भेदभाव का विरोध किया और स्त्रियों के अधिकारों की निरंतर हिमायत करती रहीं। जीवन के अंतिम वर्षों तक वे लिखती और बोलती रहीं और 380 से अधिक पुस्तकें व पुस्तिकाएँ समाज को देकर गईं।
85 वर्ष की आयु में जब उनका निधन हुआ, भारत ने एक सच्ची मित्र खो दी। पर उनकी स्मृति जीवित है - उनके नाम पर बसाए गए नगरों में, उनके द्वारा स्थापित संस्थानों में और उस निडर विचारधारा में, जो स्वतंत्रता और समानता को मानव जीवन का आधार मानती है। एनी बेसेंट केवल भारत आई नहीं थीं, बल्कि भारत की मिट्टी, संघर्ष और स्वप्न का हिस्सा बन गई थीं।
उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें केवल स्वतंत्रता सेनानी के रूप में नहीं, बल्कि एक सेतु, एक पथप्रदर्शक और एक ऐसी स्त्री के रूप में याद करते हैं, जिसने सत्य और न्याय के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पित कर दिया। भारत ने उन्हें अपनाया, और उन्होंने भारत को अपना अमर प्रेम।
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