राष्ट्र निर्माण

राष्ट्र निर्माण राष्ट्र सर्वोपरि। राष्ट्र सेविका समिति दिल्ली प्रांत आधिकारिक पेज
(1)

*🚩--आज का पंचांग--🚩* *अद्य श्री ब्रह्मणो, द्वितीये परार्धे श्री श्वेत वराह कल्पे, वैवस्वत  मन्वन्तरे,  अष्टाविंशति-तमे, ...
17/08/2026

*🚩--आज का पंचांग--🚩*

*अद्य श्री ब्रह्मणो, द्वितीये परार्धे श्री श्वेत वराह कल्पे, वैवस्वत मन्वन्तरे, अष्टाविंशति-तमे, युग चतुष्के कलियुगे, कलि प्रथम चरणे सिद्धार्थी* (विक्रमी सम्वत) *पराभव* (शक सम्वत) नाम संवत्सरे

*युगाब्द* 5128
*विक्रमी संवत्* 2083
*शिवशके* 352-53
*शके* 1948
*अयन* दक्षिणायन
*ऋतु* वर्षा
*मास* श्रावण
*पक्ष* शुक्ल
*नक्षत्र* स्वाती
*योग* शुक्ल, ब्रह्म
*करण* तैतिल, गर, वणिज
*तिथि* षष्ठी
*वार* मंगलवार
*तदनुसार* 18 अगस्त, 2026

*दिन विशेष*
कल्की जयन्ती, स्कन्द-सुपौदन-श्रियाळ-वर्ण षष्ठी, ऋक् हिरण्यकेशी श्रावणी,पूर्व में मंगलागौरी पूजन , बूधास्त
*जन्मदिवस*
1. मराठा साम्राज्य का महान् सेनानायक बाजीराव प्रथम
2. पेशवा बाजीराव प्रथम के द्वितीय पुत्र और एक कुशल सेना नायक राघोबा
3. महाराष्ट्र के शास्त्रीय गायक, नेत्रहीन संगीतज्ञ पण्डित विष्णु दिगम्बर
4. परमवीर चक्र से सम्मानित भारतीय सैनिक ए. बी. तारापोरे
*पुण्यतिथि*

1. स्वतन्त्रता सेनानी सुभाष चन्द्र बोस
2. हिन्दी साहित्यकार तथा सरस्वती पत्रिका के संपादक श्री नारायण चतुर्वेदी
*आज का दिन सबके लिए मंगलमय हो* 🌹🙏🕉️🙏🌹

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पुण्यतिथि: संघर्ष और बलिदान का अमर इतिहासनेताजी सुभाष चंद्र बोस की पुण्यतिथि के अवसर पर हम उनक...
17/08/2026

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पुण्यतिथि: संघर्ष और बलिदान का अमर इतिहास

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पुण्यतिथि के अवसर पर हम उनके असाधारण जीवन को याद करते हैं, जो नि:स्वार्थ सेवा, अपार देशभक्ति और स्वतंत्रता संग्राम में अनथक संघर्ष का प्रतीक था। 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में जन्मे सुभाष चंद्र बोस एक ऐसे महान नेता थे, जिनकी बौद्धिक क्षमता, साहस और देश के प्रति प्रेम आज भी हमारे दिलों में जीवित हैं। उनका जीवन और बलिदान आज भी भारतीयों को प्रेरित करता है।

नेताजी का प्रारंभिक जीवन: राष्ट्रवाद की नींव

नेताजी का जन्म एक संपन्न परिवार में हुआ था। उनके पिता जानकीनाथ बोस एक प्रतिष्ठित वकील थे और मां प्रभावती देवी ने उन्हें भारतीय संस्कृति और देशप्रेम की शिक्षा दी। बोस जी बचपन से ही मेधावी छात्र रहे। अपनी शिक्षा का आरम्भ कटक के प्रोटेस्टेंट यूरोपियन स्कूल और रेवन्सहॉ कॉलेज से की, जहां उनकी राष्ट्रवादी सोच सबसे पहले उभरी। यही वह समय था जब उन्होंने भारतीय शिक्षकों के विरुद्ध ब्रिटिश प्रोफेसर के अपमानजनक बयान के कारण कॉलेज में ब्रिटिश प्रोफेसर को धक्का दे दिया था, जिससे उन्हें कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया।

1919 में अपने पिता के कहने पर उन्होंने इंग्लैंड में भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) की परीक्षा दी। हालांकि, परीक्षा में सफलता पाने के बावजूद उन्होंने ब्रिटिश शासन में काम करने का प्रस्ताव ठुकरा दिया और 1921 में उन्होंने यह निर्णय लिया कि वह भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन समर्पित करेंगे। उन्होंने अपने भाई शरत से पत्र में लिखा था, “बलिदान और दुखों की भूमि पर ही हम अपना राष्ट्रीय भवन उठा सकते हैं।” यही वह क्षण था जब उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की ओर कदम बढ़ाए।

संघर्ष और बलिदान का जीवन

नेताजी का राजनीतिक जीवन संघर्ष से भरा हुआ था। उन्हें कई बार ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार किया गया और बार-बार प्रताड़ित किया गया। 1938 में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने, लेकिन महात्मा गांधी की अहिंसा आधारित नीति से असहमत होकर 1939 में उन्होंने कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया। बोस जी का मानना था कि भारत की स्वतंत्रता के लिए हिंसक प्रतिरोध आवश्यक है। उन्होंने एक बार कहा था, “तुम मुझे खून दो मैं आपको आजादी दूंगा!”

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, जब ब्रिटिश साम्राज्य युद्ध के बीच संघर्ष कर रहा था, नेताजी ने इसका एक अवसर माना और भारत को स्वतंत्र कराने के लिए ब्रिटेन के विरोधियों से समर्थन प्राप्त करने की योजना बनाई। 1941 में उन्होंने ब्रिटिश खुफिया अधिकारियों से बचकर जर्मनी पहुंचने में सफलता पाई और वहां उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय सेना (आईएनए) का गठन किया, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष करना था।

आज़ाद हिंद फौज का निर्माण

जर्मनी में बोस जी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए व्यापक रूप से समर्थन जुटाया। उन्होंने आजाद हिंद रेडियो की स्थापना की, जिसके माध्यम से वह भारतवासियों को स्वतंत्रता की राह पर चलने के लिए प्रेरित करते थे। 1943 में, बोस जी सिंगापुर पहुंचे और भारतीय स्वतंत्रता संघ का नेतृत्व किया। उन्होंने 21 अक्टूबर 1943 को स्वतंत्र भारत सरकार की घोषणा की और ब्रिटेन और अमेरिका के खिलाफ युद्ध की घोषणा की। आज़ाद हिंद फौज ने बर्मा के मोर्चे पर वीरता से संघर्ष किया और मणिपुर में तिरंगा फहराया।

हालांकि, युद्ध के परिणामस्वरूप जापान की हार के बाद बोस को पीछे हटना पड़ा। उनका प्रयास जारी रहा, और उन्होंने सोवियत संघ से समर्थन प्राप्त करने के लिए अंतिम प्रयास किया, लेकिन यह उनकी दुखद अंत की ओर बढ़ रहा था।

बैंक ऑफ आज़ाद हिंद: जब नेताजी ने भारत को अपनी मुद्रा दी

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 5 अप्रैल 1944 को रंगून में आजाद हिंद बैंक की स्थापना की। यह बैंक भारत के स्वतंत्रता संग्राम के लिए एक महत्वपूर्ण कदम था। इसका उद्देश्य युद्ध के लिए वित्तीय संसाधन जुटाना और स्वतंत्र भारत के लिए एक सक्षम बैंकिंग प्रणाली की शुरुआत करना था। यह बैंक भारतीयों द्वारा चलाया गया था और इसके तहत आजाद हिंद मुद्रा जारी की गई, जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बनी।

1943 में अंडमान में स्वतंत्रता की घोषणा

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 29 दिसंबर 1943 को अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में स्वतंत्रता की घोषणा की। यह घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में मील का पत्थर साबित हुई। अंडमान द्वीप समूह को जापानियों ने 1942 में ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्त कर दिया था और नेताजी ने वहां भारतीय तिरंगा फहराया। इस ऐतिहासिक मौके पर उन्होंने अंडमान द्वीपों का नाम बदलकर 'शहीद द्वीप' और निकोबार द्वीपों का नाम 'स्वराज द्वीप' रखा, ताकि स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों को सम्मानित किया जा सके।

नेताजी की मृत्यु: एक रहस्य और एक धरोहर

18 अगस्त 1945 को ताइहोकू (ताइपे) में उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और उन्होंने अपनी जान गंवा दी। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, यह दुर्घटना अस्पताल में उपचार के दौरान घटी, लेकिन उनकी मृत्यु के आस-पास की परिस्थितियां आज भी रहस्य बनी हुई हैं। कई जांचों और अन्वेषणों ने इस आधिकारिक कहानी पर सवाल उठाए हैं। कुछ लोग मानते हैं कि बोस जी विमान दुर्घटना में जीवित रह सकते थे और उन्होंने खुद को गुमनाम किया।

उनकी मृत्यु के बाद भी, उनकी रहस्यमय छवि और योगदान भारतीयों के दिलों में जीवित हैं। जैसा कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, “स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने अपनी जान दी है और वह उन कठिनाइयों से बच गए हैं, जिनका सामना बहादुर सैनिकों को अंत में करना पड़ता है।”

नेताजी का भारत के लिए दृष्टिकोण

नेताजी सुभाष चंद्र बोस केवल एक सैनिक नहीं थे; वे एक दूरदर्शी नेता थे, जिन्होंने स्वतंत्र और सशक्त भारत की परिकल्पना की। उनका मानना था कि कोई भी लोकतंत्र तब तक भारत को स्वतंत्र नहीं कर सकता जब तक उसमें एक मजबूत और सक्षम सरकार न हो। उन्होंने महिला सशक्तिकरण, धर्मनिरपेक्षता और एक ऐसे राज्य की बात की जो सभी नागरिकों के कल्याण के लिए कार्य करे।
नेताजी के प्रसिद्ध शब्द— “स्वतंत्रता तब तक महत्व नहीं रखती जब तक इसमें गलतियाँ करने की स्वतंत्रता न हो,” “स्वतंत्रता दी नहीं जाती, वह छीनी जाती है,” और “अगर मृत्यु मेरे पद पर आती है, तो मेरी आत्मा सेना के साथ रहेगी और हर मुश्किल का सामना करेगी,” उनके देश के प्रति अडिग प्रतिबद्धता और संघर्ष की मिसाल हैं।

एक महान नेता को श्रद्धांजलि

उनकी पुण्यतिथि पर हम सुभाष चंद्र बोस को केवल एक नेता के रूप में ही नहीं, बल्कि एक संघर्ष, साहस और बलिदान के प्रतीक के रूप में याद करते हैं। उनका जीवन एक ऐसा उदाहरण है, जो यह दर्शाता है कि किसी भी बाधा को पार किया जा सकता है, यदि हमारा उद्देश्य सही हो। उनका यह संघर्ष, जो निरंतर कठिनाइयों और चुनौतियों से भरा था, हमें यह याद दिलाता है कि स्वतंत्रता की कीमत क्या होती है।

नेताजी का प्रेरणा देने वाला संदेश आज भी हम सबके लिए है, और हम उनके सिद्धांतों को जीवन में उतारने का संकल्प लें। जैसा कि उन्होंने कहा था, “राजनीतिक सौदेबाजी का राज यह है कि आप उससे कहीं ज्यादा ताकतवर दिखें जितना आप वास्तव में हैं।” नेताजी के लिए वास्तविक ताकत उनके निडर विश्वास में थी, जो हमेशा भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ा रहा।

आइए, हम आज इस महान सपूत को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यह संकल्प लें कि हम ऐसे भारत के निर्माण के लिए काम करेंगे जो उनके द्वारा देखे गए आदर्शों को साकार करे, स्वतंत्रता, समानता और न्याय का भारत। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की धरोहर यह सिखाती है कि वास्तविक स्वतंत्रता कभी नहीं दी जाती, वह केवल छीनी जाती है।
#नेताजी_सुभाष_चंद्र_बोस

*⛳जय भारत🌞वन्दे मातरम्*⛳*🪂 संस्कृति अपनी एकचिरन्तन*🪂                                                                    ...
17/08/2026

*⛳जय भारत🌞वन्दे मातरम्*⛳
*🪂 संस्कृति अपनी एकचिरन्तन*🪂

*ससुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम्।*
*जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम्।।135।।*

*इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः।*
*वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च।।136।।*

(विष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्)

*श्रीकृष्ण शरणं मम*
*ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय*
*🌼सुप्रभात जय श्रीराधेकृष्ण 🌼*

अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के प्रतीक को शत्-शत् नमन! 🫡🇮🇳आज 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के महानायक, 'पूना हॉर्स' के क...
17/08/2026

अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के प्रतीक को शत्-शत् नमन! 🫡🇮🇳आज 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के महानायक, 'पूना हॉर्स' के कमांडिंग ऑफिसर और परमवीर चक्र (मरणोपरांत) से सम्मानित लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुरजोरजी तारापोरे की जयंती है।फिलौरा के ऐतिहासिक टैंक युद्ध में घायल होने के बावजूद उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया। उनके नेतृत्व में भारतीय सेना ने दुश्मन के कई टैंकों को नेस्तनाबूद कर दिया। उनका अदम्य साहस, अद्वितीय नेतृत्व और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान हर भारतीय को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।आइए, भारत मां के इस वीर सपूत को उनकी जयंती पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करें।जय हिन्द! 🇮🇳✨

🎼 स्वर-साधक पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जी की जयंती पर शत-शत नमन! 🙏एक दुर्घटना में अपनी आँखों की रोशनी खोने के बावजूद, ...
17/08/2026

🎼 स्वर-साधक पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जी की जयंती पर शत-शत नमन! 🙏एक दुर्घटना में अपनी आँखों की रोशनी खोने के बावजूद, उन्होंने संगीत की अलख जगाई। पंडित जी ने न केवल शास्त्रीय संगीत को रूढ़िवादिता से मुक्त किया, बल्कि इसे समाज में एक सम्मानित स्थान भी दिलाया।उनकी प्रमुख देन:🏛️ संगीत शिक्षा के लिए 'गंधर्व महाविद्यालय' की स्थापना की।📝 संगीत की स्वरलिपि (Notation System) तैयार की।🕊️ स्वाधीनता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी की सभाओं में भजन गाए।आइए, आज हम इस महान विभूति को याद करें और भारतीय संगीत की इस समृद्ध विरासत पर गर्व करें। 🇮🇳🎵

18 अगस्त/जन्म-दिवसअपराजेय नायक पेशवा बाजीरावछत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने भुजबल से एक विशाल भूभाग मुगलों से मुक्त करा लि...
17/08/2026

18 अगस्त/जन्म-दिवस

अपराजेय नायक पेशवा बाजीराव

छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने भुजबल से एक विशाल भूभाग मुगलों से मुक्त करा लिया था। उनके बाद इस ‘स्वराज्य’ को सँभाले रखने में जिस वीर का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान रहा, उनका नाम था बाजीराव पेशवा।

बाजीराव का जन्म 18 अगस्त, 1700 को अपने ननिहाल ग्राम डुबेर में हुआ था। उनके दादा श्री विश्वनाथ भट्ट ने शिवाजी महाराज के साथ युद्धों में भाग लिया था। उनके पिता बालाजी विश्वनाथ छत्रपति शाहू जी महाराज के महामात्य (पेशवा) थे। उनकी वीरता के बल पर ही शाहू जी ने मुगलों तथा अन्य विरोधियों को मात देकर स्वराज्य का प्रभाव बढ़ाया था।

बाजीराव को बाल्यकाल से ही युद्ध एवं राजनीति प्रिय थी। जब वे छह वर्ष के थे, तब उनका उपनयन संस्कार हुआ। उस समय उन्हें अनेक उपहार मिले। जब उन्हें अपनी पसन्द का उपहार चुनने को कहा गया, तो उन्होंने तलवार को चुना। छत्रपति शाहू जी ने एक बार प्रसन्न होकर उन्हें मोतियों का कीमती हार दिया, तो उन्होंने इसके बदले अच्छे घोड़े की माँग की। घुड़साल में ले जाने पर उन्होंने सबसे तेज और अड़ियल घोड़ा चुना। यही नहीं, उस पर तुरन्त ही सवारी गाँठ कर उन्होंने अपने भावी जीवन के संकेत भी दे दिये।

चौदह वर्ष की अवस्था में बाजीराव प्रत्यक्ष युद्धों में जाने लगे। 5,000 फुट की खतरनाक ऊँचाई पर स्थित पाण्डवगढ़ किले पर पीछे से चढ़कर उन्होंने कब्जा किया। कुछ समय बाद पुर्तगालियों के विरुद्ध एक नौसैनिक अभियान में भी उनके कौशल का सबको परिचय मिला। इस पर शाहू जी ने इन्हें ‘सरदार’ की उपाधि दी। दो अप्रैल, 1720 को बाजीराव के पिता विश्वनाथ पेशवा के देहान्त के बाद शाहू जी ने 17 अपै्रल, 1720 को 20 वर्षीय तरुण बाजीराव को पेशवा बना दिया। बाजीराव ने पेशवा बनते ही सर्वप्रथम हैदराबाद के निजाम पर हमलाकर उसे धूल चटाई।

इसके बाद मालवा के दाऊदखान, उज्जैन के मुगल सरदार दयाबहादुर, गुजरात के मुश्ताक अली, चित्रदुर्ग के मुस्लिम अधिपति तथा श्रीरंगपट्टनम के सादुल्ला खाँ को पराजित कर बाजीराव ने सब ओर भगवा झण्डा फहरा दिया। इससे स्वराज्य की सीमा हैदराबाद से राजपूताने तक हो गयी। बाजीराव ने राणो जी शिन्दे, मल्हारराव होल्कर, उदा जी पँवार, चन्द्रो जी आंग्रे जैसे नवयुवकों को आगे बढ़ाकर कुशल सेनानायक बनाया।

पालखिण्ड के भीषण युद्ध में बाजीराव ने दिल्ली के बादशाह के वजीर निजामुल्मुल्क को धूल चटाई थी। द्वितीय विश्वयुद्ध में प्रसिद्ध जर्मन सेनापति रोमेल को पराजित करने वाले अंग्रेज जनरल माण्टगोमरी ने इसकी गणना विश्व के सात श्रेष्ठतम युद्धों में की है। इसमें निजाम को सन्धि करने पर मजबूर होना पड़ा। इस युद्ध से बाजीराव की धाक पूरे भारत में फैल गयी। उन्होंने वयोवृद्ध छत्रसाल की मोहम्मद खाँ बंगश के विरुद्ध युद्ध में सहायता कर उन्हें बंगश की कैद से मुक्त कराया। तुर्क आक्रमणकारी नादिरशाह को दिल्ली लूटने के बाद जब बाजीराव के आने का समाचार मिला, तो वह वापस लौट गया।

सदा अपराजेय रहे बाजीराव अपनी घरेलू समस्याओं और महल की आन्तरिक राजनीति से बहुत परेशान रहते थे। जब वे नादिरशाह से दो-दो हाथ करने की अभिलाषा से दिल्ली जा रहे थे, तो मार्ग में नर्मदा के तट पर रावेरखेड़ी नामक स्थान पर गर्मी और उमस भरे मौसम में लू लगने से मात्र 40 वर्ष की अल्पायु में 28 अपै्रल, 1740 को उनका देहान्त हो गया। उनकी युद्धनीति का एक ही सूत्र था कि जड़ पर प्रहार करो, शाखाएं स्वयं ढह जाएंगी। पूना के शनिवार बाड़े में स्थित महल आज भी उनके शौर्य की याद दिलाता है।

आचार्य चरक जयंती आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान के महान प्रणेता महर्षि चरक के जन्मोत्सव के रूप में प्रतिवर्ष हिन्दू पंचांग के...
17/08/2026

आचार्य चरक जयंती आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान के महान प्रणेता महर्षि चरक के जन्मोत्सव के रूप में प्रतिवर्ष हिन्दू पंचांग के अनुसार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि (नाग पंचमी) को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में यह जयंती 17 अगस्त को है।

चरक संहिता के रचनाकार: आचार्य चरक ने प्राचीन चिकित्सा ग्रंथ 'अग्निवेश तंत्र' को संशोधित और परिमार्जित कर विश्व प्रसिद्ध 'चरक संहिता' की रचना की।आयुर्वेद के स्तंभ: यह ग्रंथ आयुर्वेद के दो मूल आधारों में से एक है। इसमें रोग निदान, शरीर रचना, औषधि विज्ञान और चिकित्सा के नैतिक सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन है।त्रिदोष सिद्धांत: उन्होंने शरीर के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए वात, पित्त और कफ (त्रिदोष) के संतुलन पर जोर दिया।जयंती का महत्वआयुर्वेद संस्थानों में उत्सव: इस दिन देश भर के आयुर्वेदिक चिकित्सा महाविद्यालयों और संस्थानों में विशेष कार्यक्रम, सेमिनार और श्लोक उच्चारण प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है।संस्कृति और स्वास्थ्य का संदेश: यह दिन प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति के संरक्षण, अनुसंधान और उसके holistic (समग्र) दृष्टिकोण को याद करने का अवसर प्रदान करता है।




स्वतंत्र भारत के निर्माण के लिए भारत-माता के कितने शूरवीरों ने हंसते-हंसते अपने प्राणों का उत्सर्ग किया था, उन्हीं महान्...
17/08/2026

स्वतंत्र भारत के निर्माण के लिए भारत-माता के कितने शूरवीरों ने हंसते-हंसते अपने प्राणों का उत्सर्ग किया था, उन्हीं महान् शूरवीरों में ‘अमर शहीद मदन लाल ढींगरा’ का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है। अमर शहीद मदन लाल ढींगरा महान् देशभक्त, धर्मनिष्ठ क्रांतिकारी थे। उन्होंने भारत माँ की आज़ादी के लिए जीवन-पर्यन्त अनेक प्रकार के कष्ट सहन किए, परन्तु अपने मार्ग से विचलित न हुए और स्वाधीनता प्राप्ति के लिए फाँसी पर झूल गए।

मदन लाल ढींगरा का जन्म सन् 1883 में पंजाब में एक संपन्न हिंदू परिवार में हुआ था। उनके पिता सिविल सर्जन थे और अंग्रेज़ी रंग में पूरे रंगे हुए थे; परंतु माताजी अत्यन्त धार्मिक एवं भारतीय संस्कारों से परिपूर्ण महिला थीं। उनका परिवार अंग्रेजों का विश्वासपात्र था। जब मदन लाल को भारतीय स्वतंत्रता सम्बन्धी क्रान्ति के आरोप में लाहौर के एक विद्यालय से निकाल दिया गया, तो परिवार ने मदन लाल से नाता तोड़ लिया। मदन लाल को एक लिपिक के रूप में, एक तांगा-चालक के रूप में और एक कारखाने में श्रमिक के रूप में काम करना पड़ा। वहाँ उन्होंने एक यूनियन (संघ) बनाने का प्रयास किया; परंतु वहां से भी उन्हें निकाल दिया गया। कुछ दिन उन्होंने मुम्बई में भी काम किया। अपनी बड़े भाई से विचार विमर्श कर वे सन् 1906 में उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैड गये, जहां 'यूनिवर्सिटी कॉलेज' लंदन में यांत्रिक प्रौद्योगिकी में प्रवेश लिया। इसके लिए उन्हें उनके बड़े भाई एवं इंग्लैंड के कुछ राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं से आर्थिक सहायता मिली।

सावरकर का सान्निध्य
लंदन में वह विनायक दामोदर सावरकर और श्याम जी कृष्ण वर्मा जैसे कट्टर देशभक्तों के संपर्क में आए। सावरकर ने उन्हें हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया। ढींगरा 'अभिनव भारत मंडल' के सदस्य होने के साथ ही 'इंडिया हाउस' नाम के संगठन से भी जुड़ गए जो भारतीय विद्यार्थियों के लिए राजनीतिक गतिविधियों का आधार था। इस दौरान सावरकर और ढींगरा के अतिरिक्त ब्रिटेन में पढ़ने वाले अन्य बहुत से भारतीय छात्र भारत में खुदीराम बोस, कनानी दत्त, सतिंदर पाल और कांशीराम जैसे देशभक्तों को फाँसी दी गई।
आज उनकी बलिदान दिवस पर कोटि कोटि नमन्
#मदनलाल_ढींगरा

अमृतलाल नागर जी की जयंती पर सादर नमन! 🙏हिंदी साहित्य के आकाश में अपनी लेखनी से अमिट छाप छोड़ने वाले महान उपन्यासकार अमृत...
16/08/2026

अमृतलाल नागर जी की जयंती पर सादर नमन! 🙏हिंदी साहित्य के आकाश में अपनी लेखनी से अमिट छाप छोड़ने वाले महान उपन्यासकार अमृतलाल नागर जी की आज जयंती है। उन्होंने न केवल सामाजिक विसंगतियों पर करारी चोट की, बल्कि इतिहास और लोक-जीवन को भी बेहद खूबसूरती से पन्नों पर उतारा।

उनकी प्रमुख कृतियाँ:🌟 मानस का हंस (तुलसीदास जी के जीवन पर आधारित)🌟 खंजन नयन (सूरदास जी के जीवन पर आधारित)🌟 बूँद और समुद्र🌟 अमृत और विष आइए, आज के दिन उनकी कालजयी रचनाओं को याद करें और हिंदी साहित्य के प्रति उनके योगदान को नमन करें। ✍️📚

*🚩--आज का पंचांग--🚩* *अद्य श्री ब्रह्मणो, द्वितीये परार्धे श्री श्वेत वराह कल्पे, वैवस्वत  मन्वन्तरे,  अष्टाविंशति-तमे, ...
16/08/2026

*🚩--आज का पंचांग--🚩*

*अद्य श्री ब्रह्मणो, द्वितीये परार्धे श्री श्वेत वराह कल्पे, वैवस्वत मन्वन्तरे, अष्टाविंशति-तमे, युग चतुष्के कलियुगे, कलि प्रथम चरणे सिद्धार्थी* (विक्रमी सम्वत) *पराभव* (शक सम्वत) नाम संवत्सरे

*युगाब्द* 5128
*विक्रमी संवत्* 2083
*शिवशके* 352-53
*शके* 1948
*अयन* दक्षिणायन
*ऋतु* वर्षा
*मास* श्रावण
*पक्ष* शुक्ल
*नक्षत्र* चित्रा, स्वाती
*योग* शुभ, शुक्ल
*करण* बालव, कौलव,
तैतिल
*तिथि* पञ्चमी
*वार* सोमवार
*तदनुसार* 17 अगस्त, 2026

*दिन विशेष*
नाग पञ्चमी, ऋक्-शुक्ल-यजु श्रावणी, शिवमुष्टि-चावल, महालक्ष्मी स्थापना-पूजन, कालिया मर्दन दिन, अगस्त्य दर्शन, सिंहेऽर्क, सिंह संक्रान्ति, सूर्य मघा में वाहन मोर
*जन्मदिवस*
1. उपन्यासकार अमृतलाल नागर
2. पत्रकार प्रचारक वीरेश्वर द्विवेदी
*बलिदान दिवस*
1. वजीर राम सिंह पठानिया
2. महान् देशभक्त, धर्मनिष्ठ क्रान्तिकारी मदनलाल ढींगरा
*पुण्यतिथि*
1. क्रान्तिकारी पुलिन बिहारी दास
2. माउण्टेन मैन दशरथ मांझी
3. वात्सल्य की प्रतिमूर्ति उषाताई चाटी
*जन्मदिवस/जयन्ती*
1.
*आज का दिन सबके लिए मंगलमय हो* 🌹🙏🕉️🙏🌹

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