20/05/2026
मौलाना कमाल शाह की मस्जिद और इतिहास : सच और झूठ
लेखक: मोहम्मद अज़ीमुल्लाह सिद्दीकी
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धार की जामा मस्जिद (मौलाना कमाल मौला मस्जिद) मामले में गैर-मुस्लिमों को पूजा का अधिकार देते हुए मुसलमानों के अधिकार को अस्वीकार कर दिया। अदालत ने अपने निर्णय में एएसआई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) की वर्तमान सर्वे रिपोर्ट को आधार बनाया, जबकि वर्ष 2003 की एएसआई रिपोर्ट इससे भिन्न थी।
मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक वातावरण में, जब राज्य सरकार स्वयं इस स्थल को मंदिर बताने के पक्ष में दिखाई देती हो, तब यह प्रश्न भी उठता है कि एक सरकारी संस्था होने के नाते एएसआई सरकार के दृष्टिकोण से अलग होकर किस सीमा तक स्वतंत्र राय दे सकती है।
आलोचकों का कहना है कि हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक साक्ष्यों और अन्य पहलुओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया तथा एएसआई रिपोर्ट पर पूर्ण भरोसा करते हुए हिंदू पक्ष के दावे को स्वीकार कर लिया। अदालत ने पूजा स्थल अधिनियम 1991 (Places of Worship Act) के लागू होने को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि यह स्थल एएसआई अधिनियम के तहत संरक्षित स्मारक है, इसलिए इस पर पूजा स्थल अधिनियम लागू नहीं होगा। अदालत ने उस प्रावधान का हवाला दिया जिसमें कहा गया है कि एएसआई के संरक्षण में आने वाले स्मारक इस कानून के दायरे से बाहर होंगे।
हालाँकि इस पर यह आपत्ति भी उठाई जा रही है कि यदि एएसआई के संरक्षण में आने वाली धार्मिक इमारतें पूजा स्थल अधिनियम से बाहर मानी जाएँगी, तो इस कानून की उपयोगिता और प्रभावशीलता ही संदिग्ध हो जाएगी। इस कानूनी पहलू पर गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता है।
दूसरी ओर वर्तमान एएसआई सर्वे पर भी अनेक प्रश्न उठाए गए हैं। आलोचकों के अनुसार यह सर्वे प्रक्रिया और पद्धति दोनों दृष्टियों से त्रुटिपूर्ण और भ्रामक था। एएसआई विशेषज्ञ अब्दुस्समद खान ने एएसआई के अतिरिक्त महानिदेशक आलोक त्रिपाठी को एक विस्तृत पत्र लिखकर सर्वे की कार्यप्रणाली पर गंभीर आपत्तियाँ दर्ज की थीं। उनके अनुसार सर्वे शुरू होने की न तो पूर्व सूचना दी गई और न ही जिला कलेक्टर को औपचारिक रूप से सूचित किया गया।
गोपाल शर्मा किसी मुकदमे के पक्षकार न होने के बावजूद सर्वे में शामिल रहे। सर्वे एक साथ भवन के भीतर और बाहर चल रहा था, जिससे पारदर्शी निगरानी असंभव हो गई। अदालत के निर्देश के बावजूद मुस्लिम प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं रखा गया। खुदाई के कारण खतरनाक गड्ढे बन गए थे, जिनसे नुकसान या तनाव का खतरा था। 22 जनवरी 2004 की रात लगाए गए कुछ स्तंभ मस्जिद की मूल वास्तुकला से भिन्न थे, इसलिए उन्हें सर्वे का हिस्सा नहीं माना जाना चाहिए था।
ये सभी बातें सर्वे की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं। अब्दुस्समद खान ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि “यह स्थान एक मस्जिद है, मंदिर कभी नहीं था। 1307 से 1952 तक यहाँ लगातार पाँचों वक्त नमाज़ अदा होती रही।” उनके अनुसार 1952 में शिक्षा विभाग के एक सचिव ने मुसलमानों को केवल जुमे की नमाज़ तक सीमित कर दिया, जबकि अक्टूबर 1951 में एएसआई के निदेशक स्पष्ट लिख चुके थे कि मुसलमान किसी भी समय नमाज़ पढ़ सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सचिव के पास ऐसी रोक लगाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था।
मस्जिद की वास्तविकता
धार शहर के दक्षिण-पश्चिमी भाग में स्थित यह विशाल ऐतिहासिक इमारत “मौलाना कमालुद्दीन मस्जिद” के नाम से प्रसिद्ध है। यह हज़रत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह के मज़ार से सटी हुई है। मस्जिद के चारों ओर प्राचीन कब्रिस्तान भी मौजूद है, जहाँ अनेक सूफी संत और विद्वान दफ्न हैं। धार कभी मालवा सल्तनत की राजधानी हुआ करता था।
इतिहास में उल्लेख मिलता है कि जब सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर विजय प्राप्त की, उस समय हज़रत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती उसी स्थान पर निवास करते थे। सुल्तान उनके श्रद्धालुओं में से था। विजय की खुशी में उसने यहाँ एक भव्य जामा मस्जिद के निर्माण का आदेश दिया। मस्जिद के साथ विशाल प्रांगण, कुआँ, बरामदे और विद्यार्थियों तथा यात्रियों के लिए कमरे भी बनाए गए।
यह विशाल निर्माण केवल दो वर्षों में पूरा कर लिया गया, जिसके कारण बाद में इसमें मरम्मत की आवश्यकता पड़ी। बाद में दिलावर खान गौरी ने 1392–1393 ईस्वी में इसकी मरम्मत कराई। मस्जिद के द्वार पर लगे शिलालेख में इसका उल्लेख मिलता है कि सुल्तान मुहम्मद तुगलक के सूबेदार दिलावर खान गौरी ने इस मस्जिद का पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार कराया।
मस्जिद का पूर्वी द्वार अत्यंत भव्य है। इसके दोनों ओर विशाल बरामदे हैं तथा उत्तर और दक्षिण की दीवारों के साथ लंबे गलियारे बने हुए हैं। पूरी मस्जिद लाल पत्थरों से निर्मित है। बीच में विशाल आँगन है, जिसके केंद्र में प्राचीन हौज़ के अवशेष आज भी मौजूद हैं।
मस्जिद की मूल इमारत अत्यंत विशाल और कलात्मक है। मध्य भाग में “संग-ए-मूसा” लगा हुआ है, जबकि मिंबर और मक़सूरा अपनी प्राचीनता और स्थापत्य सौंदर्य के कारण विशेष महत्व रखते हैं।
उस काल में मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली के सुल्तान थे और दिलावर खान गौरी मालवा के सूबेदार के रूप में कार्यरत थे।
स्थापत्य शैली और भ्रम
इस इमारत की स्थापत्य शैली मूलतः भारतीय है। चौदहवीं शताब्दी की अनेक इमारतें स्थानीय भारतीय कारीगरों द्वारा बनाई गई थीं, जो मेहराब, गुम्बद और मीनारों की इस्लामी शैली से पूर्णतः परिचित नहीं थे। इसलिए प्रारंभिक इस्लामी इमारतों में स्थानीय हिंदू स्थापत्य का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
बाद में चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दी में भारतीय और ईरानी स्थापत्य के मेल से एक नई शैली विकसित हुई, जिसे तुगलकी या पठान शैली कहा गया। मुगल काल में यही कला और अधिक विकसित होकर पूर्ण मुगल स्थापत्य के रूप में सामने आई।
कौन थे हज़रत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती?
हज़रत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह फारूकी वंश से संबंध रखते थे और उनका वंश लगभग पच्चीस पीढ़ियों के माध्यम से हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु तक पहुँचता है। उनका परिवार हज़रत बाबा फरीदुद्दीन गंज-ए-शकर के खानदान से संबंधित था।
उनके पिता हज़रत शेख बायज़ीद पंजाब से दिल्ली आए और हज़रत निजामुद्दीन औलिया की सेवा में रहने लगे। इसी आध्यात्मिक वातावरण में मौलाना कमालुद्दीन की परवरिश हुई। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा अपने पिता से प्राप्त की, क़ुरआन हिफ्ज़ किया और बाद में हज़रत महबूब-ए-इलाही से बैअत लेकर ख़िलाफ़त प्राप्त की।
हज़रत निजामुद्दीन औलिया ने उन्हें मालवा के लोगों के धार्मिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए भेजा। विभिन्न स्थानों पर तपस्या और साधना के बाद वे धार पहुँचे, जहाँ उनके बड़े भाई मौलाना ग़ियासुद्दीन पहले से मौजूद थे।
उन्होंने धार में रहकर शिक्षा, इस्लामी प्रचार और समाज सुधार का महान कार्य किया। कुछ ही समय में हजारों लोग उनके चरित्र, आध्यात्मिकता और शिक्षाओं से प्रभावित होने लगे। लगभग इकतालीस वर्षों तक उन्होंने धार में धार्मिक मार्गदर्शन का कार्य किया। स्थानीय राजा और अमीर भी उनका सम्मान करते थे।
उनके निधन के बाद उनका मज़ार जामा मस्जिद धार के दक्षिणी कोने में सुंदर गुम्बद के नीचे बनाया गया, जो आज भी श्रद्धा का केंद्र है।
क्या “भोजशाला” का दावा ऐतिहासिक है?
कुछ हिंदू समूह इस जामा मस्जिद को “भोजशाला” बताते हैं और दावा करते हैं कि यह राजा भोज की संस्कृत पाठशाला थी। नगर पालिका द्वारा भी इस नाम की पट्टिका लगाई गई है। किंतु इस दावे के समर्थन में कोई ठोस ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
इतिहासकारों के अनुसार वास्तविक भोजशाला शहर के दक्षिणी भाग में किसी तालाब के किनारे स्थित थी, जहाँ उसके कुछ अवशेष पाए जाते हैं। धार के इतिहास में “भोज” नाम के तीन राजाओं का उल्लेख मिलता है, लेकिन इनमें से किसी के बारे में भी इस स्थान पर भोजशाला निर्माण का विश्वसनीय प्रमाण नहीं मिलता।
इसके विपरीत यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती चिश्तिया सिलसिले से जुड़े थे, जो हिंदू-मुस्लिम सद्भाव और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। यह कल्पना करना कठिन है कि ऐसे सूफी संत किसी तोड़े गए मंदिर पर बनी इमारत में निवास करते।
सरस्वती मूर्ति का विवाद
कथित “भोजशाला विवाद” में एक प्रमुख दावा उस मूर्ति को लेकर किया जाता है जिसे कुछ लोग सरस्वती की मूर्ति बताते हैं। लेकिन इस दावे का खंडन स्वयं ब्रिटिश उच्चायोग के एक आधिकारिक पत्र में किया गया था।
11 फरवरी 2003 को भारत में तत्कालीन ब्रिटिश उच्चायुक्त सर रॉब यंग ने मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को पत्र लिखकर स्पष्ट किया था कि ब्रिटिश म्यूज़ियम में रखी मूर्ति वास्तव में सरस्वती की नहीं, बल्कि जैन देवी अंबिका की है।
पत्र में लिखा गया था कि 1920 के दशक में “रूपम” पत्रिका में प्रकाशित एक अधूरे शिलालेख के आधार पर यह गलतफहमी फैली। बाद में 1980 के दशक में शोधकर्ता डॉ. कीर्त मांकुडी ने पूरा शिलालेख प्रकाशित किया, जिससे वास्तविकता स्पष्ट हो गई।
सर रॉब यंग ने स्पष्ट लिखा कि “ब्रिटिश म्यूज़ियम में मौजूद मूर्ति जैन देवी अंबिका की है।” उन्होंने यह भी बताया कि मूर्ति के साथ उपस्थित बच्चा और शेर, दोनों जैन देवी अंबिका के प्रतीक हैं, न कि सरस्वती के।
इस प्रकार “सरस्वती मूर्ति” का पूरा कथानक एक ऐतिहासिक भ्रम पर आधारित प्रतीत होता है।
क्या संस्कृत शिलालेख मंदिर का प्रमाण हैं?
मस्जिद में मौजूद कुछ संस्कृत शिलालेखों और प्राचीन पत्थरों के आधार पर यह दावा किया जाता है कि मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर बनाई गई। किंतु इतिहासकारों का कहना है कि मध्यकालीन भारत में पुराने पत्थरों और स्थापत्य सामग्री का पुनः उपयोग (spolia) एक सामान्य परंपरा थी। केवल स्तंभों या शिलालेखों की उपस्थिति से यह सिद्ध नहीं होता कि वहाँ मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी।
मालवा सल्तनत और धार्मिक सहिष्णुता
मालवा के पठान सुल्तान धार्मिक सहिष्णुता, न्यायप्रियता और उदारता के लिए प्रसिद्ध थे। हिंदुओं और मुसलमानों के साथ समान व्यवहार किया जाता था। जैन समुदाय को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त थी और अनेक जैन विद्वानों को राजकीय संरक्षण मिला।
लगभग डेढ़ सौ वर्षों के मालवा सल्तनत के इतिहास में किसी मंदिर को तोड़े जाने का कोई प्रामाणिक प्रमाण नहीं मिलता। हिंदू और मुस्लिम समाज के बीच परस्पर सौहार्द और सहयोग की परंपरा विद्यमान थी।
धार का सूफी और आध्यात्मिक विरासत
धार और उसके आसपास आज भी अनेक सूफी संतों के मज़ार मौजूद हैं। चालीस शहीदों के मज़ार, हज़रत अब्दुल्लाह शाह चंगाल, मौलाना ग़ियासुद्दीन, मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती, शाह आलम चिश्ती, मखदूम नासिरुद्दीन शाह अब्दाल और अन्य अनेक संतों की दरगाहें आज भी लोगों की आस्था का केंद्र हैं।
चिश्तिया, कादरिया, सुहरवर्दिया और अन्य सूफी सिलसिलों के बुजुर्गों ने मालवा में प्रेम, भाईचारे, सहिष्णुता और मानवता का संदेश फैलाया। उनके आध्यात्मिक प्रभाव से धार लंबे समय तक ज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिकता का महत्वपूर्ण केंद्र बना रहा।
धार भारत के प्राचीनतम नगरों में गिना जाता है, जिसकी सभ्यता और संस्कृति का इतिहास लगभग ढाई हजार वर्ष पुराना माना जाता है। यह भूमि आज भी अपने सूफी विरासत, आध्यात्मिक परंपरा और सांस्कृतिक सहअस्तित्व के कारण विशेष महत्व रखती है।