14/07/2026
आयोजित काव्य गोष्ठी की संक्षिप्त आख्या/रिपोर्ट---
काव्य गोष्ठी " स्थापना दिवस "
(उत्तराखंड पर्वतीय रचनाकार मंच )
उत्तराखंड पर्वतीय रचनाकार मंच (साहित्य एवं लोक संस्कृति संगम)के तत्वाधान में मंच के स्थापना दिवस/प्रथम वर्षगांठ के अवसर पर 'उत्तराखंड गौरव 'थीम आधारित काव्य गोष्ठी का आयोजन दिनांक13 जुलाई '26(सोमवार) को रात्रि 8:00बजे से 10:30बजे तक ऑनलाईन गूगल मीट पर किया गया.काव्य गोष्ठी के मुख्य अतिथि श्री सुनील पाठक (अध्यक्ष अंतर्राष्ट्रीय इतिहास एवं संस्कृति परिषद) जी मंचासीन रहे।मंच संस्थापिका हेमा आर्या 'शिल्पी ' जी सहित मंच अध्यक्ष/संरक्षक गिरीश तिवारी जी'ओम', उपाध्यक्ष हेम चंद्र जी, सलाहकार नीलम नेगी उपस्थित रहे, आमंत्रित रचनाकारों में उमा तिवारी,विनीता खाती,डॉ संतोष कुमार कांडपाल,हेमा जोशी' स्वाति', हेम चंद्र सक्लानी,मीना जोशी,रेनु बिष्ट,योगेश गहतोड़ी,पुष्पा नौटियाल,डॉ मुरली मनोहर भट्ट,सुरेश कुमार मनमौजी,डॉ सुमन पांडे,संगीता मीना सहित अन्य अनेक श्रोतागण उपस्थित रहे।गोष्ठी का सुंदर संचालन हेमा आर्या' ' शिल्पी' द्वारा किया गया...
* काव्य गोष्ठी चूँकि मंच के स्थापना दिवस पर 'उत्तराखंड गौरव ' विशेष थी अतः सभी के द्वारा उसी विषय से संबंधित रचनाएँ व गीत काव्य हिंदी गढ़वाली व कुमाउनी भाषाओं में प्रस्तुत किये।सिद्धि विनायक गणेश जी को प्रथम निमंत्रित करते हुए ,विद्यादायिनी माँ सरस्वती के वंदन तथा स्वागत गीत द्वारा अभिनंदन के साथ काव्य गोष्ठी का पारंपरिक शुभारंभ किया गया।
* मंच संचालन करते हुए हेमा आर्या जी ने सर्वप्रथम मंच के स्थापना दिवस की बधाई दी साथ ही अवगत कराया की 13 जुलाई 2025 को मंच की विधिवत स्थापना की गई थी,मंच की एक वर्ष की साहित्यिक यात्रा ,स्थापना के मौलिक उद्देश्य,वर्तमान प्रगति एवं भावी प्रयासों,योजनाओं पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने सभी का स्वागत व आभार व्यक्त किया.यह भी अवगत कराया कि शीघ्र ही मंच द्वारा लोक भाषाओं कुमाउनी,गढ़वाली,जौनसारी पर आधारित एक साझा काव्य संग्रह उत्तराखंड त्रिवेणी ( विरासत के स्वर्णिम पृष्ठ) का प्रकाशन किया जा रहा है जिसके मुख पृष्ठ का गोष्ठी में विमोचन भी किया गया।
रेनू बिष्ट जी ने गढ़वाली भाषा में श्री गणेश की स्तुति के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ किया--
* गणपति गणेश पैलि त्वेकैं ही मनुलौं
दयाप्तों मां सबन पैलि पूजा तेरि करूँलौ..
उमा तिवारी जी द्वारा सरस्वती वंदना से गोष्ठी का पारंपरिक शुभारंभ हुआ --
* हे माँ सरस्वती जै जै जय हो माँ वंदन है अभिनंदन है माँ
आज हमारे आंगन में माँ शुभ दिन सुंदर आया है
आकर के इस पावन दिन को वीणा से झंकृत कर दो माँ..
हेमा आर्या जी द्वारा स्वागत गीत द्वारा सभी आमंत्रित अतिथियों व उपस्थित रचनाकारों का औपचरिक स्वागत अभिनंदन किया ---
* हो गया है प्रफुल्लित पटल आज ये
आ गई है घडी मधुर मंगलम्, कर रहे हैं आपका
स्वागतम् स्वागतम्....
* मुख्य अतिथि सुनील पाठक जी ने सभी मंच सदस्यों को स्थापना दिवस की बधाई व शुभकामनाएं प्रेषित की तथा अपने प्रबुद्ध संबोधन में उत्तराखंड देवभूमि का वैदिक/अनादि काल से हिमालय से संबंध होने की बात कही,जिसे देवों ने अपना निवास बनाया उन्होंने उत्तराखंड के साहित्यिक,सांस्कृतिक,ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व् व योगदान पर ज्ञानवर्धक चर्चा की।ऐसी देवभूमि जहाँ स्वामी विवेकानंद जी जैसे महान पुरुष को समाधिस्थ होने का अनुभव हुआ,जहाँ बद्री केदार,गंगोत्री,जमुनोत्री जैसे परम धाम स्थित हैं,विश्व के सबसे बड़े साहित्यिक /धार्मिक अवदान/योगदान (ग्रंथ महाभारत रचना)की विषय वस्तु हिमालयी क्षेत्रों की रही है, कालिदास जी द्वारा भी हिमालय का वर्णन किया गया है।साहित्यिक क्षेत्र में उन्होंने शैलेश मटियानी जी,सुमित्रानंदन पंत जी,शिवानी आदि अन्य अनेक विश्व प्रसिद्ध साहित्यकारों के व्यक्तितव्/कृतित्व का संबंध भी उत्तराखंड से होने को संदर्भित किया।उन्होंने कहा कि देवभूमि उत्तराखंड का अपना एक समृद्ध इतिहास है ,अंत में "कवियों को सुनना अपने आप में एक आनंद होता है' वक्तव्य के साथ उन्होंने सभी प्रस्तुत रचनाओं की प्रशंसा की व मंच के पल्लवित पुष्पित होने की शुभेच्छा की ..
* अंत में मंच संस्थापिका हेमा आर्या 'शिल्पी' जी ने कार्यक्रम से जुड़ने व अपना अमूल्य समय देने हेतु मुख्य अतिथि व सभी उपस्थित रचनाकारों का धन्यवाद ज्ञापित किया.भविष्य में भी मंच द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में अपनी सतत /सक्रिय सहभागिता हेतु अनुरोध व उत्तराखंड के लोक पर्व 'हरेले' की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ अपना काव्य प्रस्तुत किया के समापन की औपचारिक घोषणा की...
👉 कुछ सुंदर भजनों व काव्यपाठ की झलकियाँ---
(मुखड़ा पंक्तियाँ )
* हिम किरीट में देवों का यह भव्य स्वरूप
कल कल करती सरिताएं बहती....
उत्तराखंड के वीर बांकुरे करते रण में हुन्कार्
जय जय जय उत्तराखंड.....
--- हेमा जोशी 'स्वाति'
* सदा भवानी दायिनी गौरी पूज्य गणेश
रक्षा कीजो तीनों देवा ब्रह्मा विष्णु महेश...
* धन्य मेरि जनमभूमि धन्य छ गढ़वाल
यक्खि मेरि देवभूमि.....
-- पुष्पा नौटियाल
* जहाँ हिम से मंडित शिखरों की पर्वत मालाएं हैं
सब सरिताओं की बहती निर्मल धाराएं हैं
जहाँ बुग्यालों में धरती माँ का अभिनंदन होता है
चरणों में जहाँ मधुर स्वरों में गुंजन होता है....
-- हेम चंद्र सक्लानी
* आया जैसे ही महीना जून मिलता सबको यहाँ सुकून
नौनिहाल की किलकारी सबकी आवाज पर होती भारी...
--- डॉ संतोष कुमार कांडपाल
* जहाँ चमड़े की जूतियों के साथ उभरे होते थे
आज टेढ़ी पगडंडियों पर कदमों के निशान किंतु
आज पगडंडी मेढों के कच्चे रास्तों से होकर वो सफर
सड़क से गुजरता है...
-- संगीता मीना
* मानव जीवन जहाँ हिमालय मौन खड़ा है
पर्वतीय होना सरल नहीं तपना पड़ता रोज
प्रथम वर्षगांठ के अवसर पर मेरा शुभ वंदन...
--- योगेश गहतोड़ी
* हरी भरी वादियों में बसा है मेरा सुंदर सा चंपावत शहर
नमन वंदन है उस मातृभूमि को मेरी जिसमे निवास है गोल्यू देव का..
-- बीना जोशी
* विचरण करते जहाँ मस्ती में पशु पक्षी सुबह और शाम
बिछ जाती धरती माँ पर हरी भरी चादर वन ही तो है इसका नाम..
--- सुरेश कुमार' मनमौजी'
* धन्य धन्य है मेरी उत्तराखंड की नारी तू कभी न हारी
तूने बंजर खेत उपजाए पशुपालन तूने ही पनपाये
वन जंगल तूने ही बचाये हर कार्य पहाड़ों में तूने ही निभाए...
-- डॉ विनीता खाती
* उत्तराखंड की पावन धरती जन जन की है बाधा हरती
वीरों की यह कर्मभूमि है हर घर में है शहीद यहाँ
त्याग और तपस्या बसते हैं घर घर में यहाँ....
-- उमा तिवारी
* सुनो कविता कुछ कहती है कहती हूँ कि
मै जैसा चाहती थी उत्तराखंड वैसा बन तो नहीं पाया
तूने मेरे घिंगारू, किल्मोड़ी, बुरांश काफल
विकास के नाम पर सबको काट डाला....
-- डॉ सुमन पांडे
* चौमास्, ईजा आज तो यो डांण काण हौल में छुप गए
रात भर बारिश के बाद आज तो द्वि कदम लै नि दिखि रौ...
--- गिरीश त्रिपाठी 'ओम'
* उत्तराखंड मै रूणी छां हम पहाड़ म दरबार छू
कुमाऊ छु हमरि जनमभूमि और हमर घरबार
लोग कुनि कुमैया और पहाड़ि हमरि पछ्याण छू
यां हुनि हमर सपन साकार योई हमरि मातृभूमि छू...
--- नीलम नेगी
* वीरों की अमर गाथाओं और स्वाभिमान लिखिये
देवभूमि की लोक परंपराओं का बखान लिखिये...
-- हेमा आर्या' शिल्पी'
फोटो संकलन /आख्या/ रिपोर्ट प्रस्तुति -- नीलम नेगी