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Matrushkati.ngp अंजु द्विवेदी घोलवे
संयोजिका, मातृशक्ति विश्व हिन्दू परिषद🚩
नागपुर महानगर

15/01/2024
आज  #राम_मन्दिर निर्माण का स्वप्न पूरा हो रहा है।  #अशोक_सिंघल जी यह दिन देख नहीं सके लेकिन उन्होंने अपना पूरा जीवन राम ...
11/01/2024

आज #राम_मन्दिर निर्माण का स्वप्न पूरा हो रहा है। #अशोक_सिंघल जी यह दिन देख नहीं सके लेकिन उन्होंने अपना पूरा जीवन राम जन्मभूमि को मुक्त कराने के संघर्ष को समर्पित कर दिया था।

6 दिसंबर को बाबरी ढांचा गिरने के बाद जब उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया कुछ इस तरह से लिख कर दी थी -

"हिंदू राष्ट्र की पुन: प्रतिष्ठा का समय सन्निकट है...अपना सब कुछ समर्पण करने का समय आ गया है...

नमन महान योद्धा को।

जय श्री राम🚩

11/01/2024

मातृशक्ति, विश्व हिंदू परिषद 🚩 नागपुर द्वारा, दक्षिणामूर्ति प्रखंड, मध्य जिले में नवीन बाल संस्कार वर्ग का शुभारंभ ..!

22/10/2023

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२७ सितम्बर 1926 को आगरा में जन्में अशोक सिंघल के पिता एक सरकारी दफ्तर में कार्यरत थे। बाल अवस्था से लेकर युवावस्था तक अं...
27/09/2023

२७ सितम्बर 1926 को आगरा में जन्में अशोक सिंघल के पिता एक सरकारी दफ्तर में कार्यरत थे। बाल अवस्था से लेकर युवावस्था तक अंग्रेज शासन को देख कर बड़े हुए और उसी दौरान वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से जुड़ गये। 1942 में आरएसएस ज्वाइन करने के साथ-साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। समाज को अपना जीवन समर्पित कर चुके सिंघल ने 1950 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से मटलर्जी साइंस में इंजीनियरिंग पूरी की।

घर के धार्मिक वातावरण के कारण उनके मन में बालपन से ही हिन्दू धर्म के प्रति प्रेम जाग्रत हो गया। उनके घर संन्यासी तथा धार्मिक विद्वान आते रहते थे। कक्षा नौ में उन्होंने महर्षि दयानन्द सरस्वती की जीवनी पढ़ी। उससे भारत के हर क्षेत्र में सन्तों की समृद्ध परम्परा एवं आध्यात्मिक शक्ति से उनका परिचय हुआ। 1942 में प्रयाग में पढ़ते समय प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) ने उनका सम्पर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कराया। उन्होंने अशोक सिंघल की माता जी को संघ के बारे में बताया और संघ की प्रार्थना सुनायी। इससे माता जी ने अशोक सिंघल को शाखा जाने की अनुमति दे दी।

इंजीनियर की नौकरी करने के बजाये उन्होंने समाज सेवा का मार्ग चुना और आगे चलकर आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक बन गये। उन्होंने उत्तर प्रदेश और आस-पास की जगहों पर आरएसएस के लिये लंबे समय के लिये काम किया और फिर दिल्ली-हरियाणा में प्रांत प्रचारक बने।

*शास्त्रीय गायन में भी थे निपुण*

1947 में देश विभाजन के समय कांग्रेसी नेता सत्ता प्राप्ति की खुशी मना रहे थे; पर देशभक्तों के मन इस पीड़ा से सुलग रहे थे कि ऐसे सत्तालोलुप नेताओं के हाथ में देश का भविष्य क्या होगा? अशोक सिंघल भी उन युवकों में थे। अतः उन्होंने अपना जीवन संघ कार्य हेतु समर्पित करने का निश्चय कर लिया। बचपन से ही अशोक सिंघल की रुचि शास्त्रीय गायन में रही है। संघ के अनेक गीतों की लय उन्होंने ही बनायी है।

1948 में संघ पर प्रतिबन्ध लगा, तो अशोक सिंघल सत्याग्रह कर जेल गये। वहाँ से आकर उन्होंने बी.ई. अंतिम वर्ष की परीक्षा दी और प्रचारक बन गये। अशोक सिंघल की सरसंघचालक श्री गुरुजी से बहुत घनिष्ठता रही। प्रचारक जीवन में लम्बे समय तक वे कानपुर रहे। यहाँ उनका सम्पर्क श्री रामचन्द्र तिवारी नामक विद्वान से हुआ। वेदों के प्रति उनका ज्ञान विलक्षण था। अशोक सिंघल अपने जीवन में इन दोनों महापुरुषों का प्रभाव स्पष्टतः स्वीकार करते हैं।

*आपातकाल में सिंघल जी*

1975 से 1977 तक देश में आपातकाल और संघ पर प्रतिबन्ध रहा। इस दौरान अशोक सिंघल इंदिरा गांधी की तानाशाही के विरुद्ध हुए संघर्ष में लोगों को जुटाते रहे। आपातकाल के बाद वे दिल्ली के प्रान्त प्रचारक बनाये गये। 1981 में डा. कर्ण सिंह के नेतृत्व में दिल्ली में एक विराट हिन्दू सम्मेलन हुआ; पर उसके पीछे शक्ति अशोक सिंघल और संघ की थी। उसके बाद अशोक सिंघल को विश्व हिन्दू परिषद् के काम में लगा दिया गया।

इसके बाद परिषद के काम में धर्म जागरण, सेवा, संस्कृत, परावर्तन, गोरक्षा.. आदि अनेक नये आयाम जुड़े। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है श्रीराम जन्मभूमि मंदिर आन्दोलन, जिससे परिषद का काम गाँव-गाँव तक पहुँच गया। इसने देश की सामाजिक और राजनीतिक दिशा बदल दी। भारतीय इतिहास में यह आन्दोलन एक मील का पत्थर है। आज वि.हि.प. की जो वैश्विक ख्याति है, उसमें अशोक सिंघल का योगदान सर्वाधिक है।

*1992 का राम जन्म भूमि आंदोलन*🚩

1984 में दिल्ली के विज्ञान भवन में एक धर्म संसद का आयोजन किया गया। सिंघल इस के मुख्य संचालक थे। यहीं पर राम जन्म भूमि आंदोलन की रणनीति तय की गई। यहीं से सिंघल ने पूरा प्लान बनाना शुरू किया और कार सेवकों को अपने साथ जोड़ना शुरू किया। 1992 में बाबरी मस्ज‍िद तोड़ने वाले कार सेवकों का नेतृत्व सिंघल ने ही किया था।

सिंघल ने देश भर से 50 हजार कारसेवक जुटाये। सभी कारसेवकों ने राम जन्म भूमि पर राम मंदिर स्थापना करने की कसम देश की प्रमुख नदियों के किनारे खायी। बात अगर सिंघल की करें तो उन्होंने अयोध्या की सरयु नदी के किनाने राम लला की मूर्ति स्थापित करने का संकल्प लिया था। सिंघल ने एक इंटरव्यू में कहा था, "अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिये हमने अपना सब कुछ समर्पित कर दिया। रही बात मस्ज‍िद तोड़ने की तो हम मस्ज‍िद तोड़ने के मकसद से नहीं गये थे। उस दिन जो कुछ भी हुआ वह मंदिर के पुनरनिर्माण कार्य का एक हिस्सा था।"

*विहिप में सबसे बड़ा योगदान सिंघल का*

अशोक सिंघल परिषद के काम के विस्तार के लिए विदेश प्रवास पर जाते रहे हैं। इसी वर्ष अगस्त सितम्बर में भी वे इंग्लैंड, हालैंड और अमरीका के एक महीने के प्रवास पर गये थे। परिषद के महासचिव श्री चम्पत राय जी भी उनके साथ थे। पिछले कुछ समय से उनके फेफड़ों में संक्रमण हो गया था। इससे सांस लेने में परेशानी हो रही थी। इसी के चलते 17 नवम्बर, 2015 को दोपहर में गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में उनका निधन हुआ।

भगवान शिव, श्रीराम और कृष्ण क्यों रोये थे?     हमने ऐसे किसी भी शक्तिपुंज को अपना देवता नहीं माना जो हमें भयभीत करता हो।...
22/09/2023

भगवान शिव, श्रीराम और कृष्ण क्यों रोये थे?

हमने ऐसे किसी भी शक्तिपुंज को अपना देवता नहीं माना जो हमें भयभीत करता हो। किसी का देवत्व उसकी क्रूरता से सिद्ध नहीं होता, देवत्व करुणा से सिद्ध होता है।
भगवान शिव जब पत्नी का शव उठाये बिलख रहे होते हैं, तभी उनकी करुणा उभर कर आती है, और दिखता है कि संसार का सबसे शक्तिशाली पुरुष अंदर से कितना कोमल है। उनके भीतर की यही कोमलता सामान्य मनुष्य के अंदर यह विश्वास जगाती है कि वे कृपालु हैं, करुनानिधान हैं, और इसी कारण हम मानते हैं कि वे पूजे जाने योग्य हैं।
ऐसा केवल महाशिव के साथ नहीं है। अयोध्या की प्रजा राजकुमार भरत के साथ वन में उस महान योद्धा को वापस लाने गयी थी जिन्होंने ताड़का और सुबाहु जैसे राक्षसों का वध किया था। पर जब उन्होंने भरत से लिपट कर बिलखते राम को देखा, तो जैसे तृप्त हो गए। राम की करुणा उनके रोम रोम में बस गयी। वे राजा लाने गए थे, पर देवता लेकर लौटे! संसार को यदि वे केवल रावण वध के लिए याद होते तो वे महायोद्धा राम होते, पर सिया के लिए बहाए गए अश्रु उन्हें मर्यादापुरुषोत्तम राम बना गए। वे हमें इसी स्वरूप में अधिक प्रिय हैं।
कृष्ण की सोचिये! वे उस युग के नायक हैं जब समाज में प्रपंच बढ़ गया था। अपने युग के अधर्म को समाप्त करने के लिए कृष्ण अपने स्वभाव में कठोरता धारण करते हैं। वे किसी को क्षमा नहीं करते, सबको दंडित करते हैं। दृढ़ता ऐसी कि न्याय के लिए शस्त्र न उठाने का प्रण तोड़ देते हैं। पर वे श्रीकृष्ण भी अपने दरिद्र मित्र को देख कर द्रवित हो जाते हैं। संसार का स्वामी अपने दरिद्र सखा के साथ वह मित्रता निभाता है कि सुदामा का स्मरण होते ही जगत को भगवान श्रीकृष्ण के अश्रु दिखाई देने लगते हैं। वे अश्रु ही तो भरोसा दिलाते हैं कि वे हमारी बांह नहीं छोड़ेंगे। जो अपने भक्तों की पीड़ा देख कर रो पड़ता हो, उससे बड़ा देवता कौन हो सकता है? उससे अधिक अपना कौन हो सकता है?
तो क्या शक्ति, साहस, सामर्थ्य का कोई मूल्य नहीं? ऐसा बिल्कुल नहीं है। मूल्य है! पर संसार में उनसे अधिक शक्तिशाली कौन जिनका तीसरा नेत्र खुलते ही सबकुछ जल जाता हो? उन दो भाइयों से अधिक साहसी कौन जो अकेले ही समूचे राक्षसी साम्राज्य को समाप्त कर देने निकल पड़े थे और संसार के सबसे बलशाली योद्धा का अंत कर के लौटे? उनसे अधिक सामर्थ्य किसका जो संसार के समस्त श्रेष्ठ योद्धाओं के मध्य निहत्थे खड़े होकर भी सारे अधर्मियों का अंत कर देते हैं?
शक्ति की आराधना के लिए हमें कोई अन्य विग्रह तलाशने की आवश्यकता नहीं, भारत अलौकिक शक्तिपुंजों की संतानों का देश है। इस सभ्यता ने अतुलित बलशाली, हिमशैलाभ देहधारियों को बार बार अवतरित होते देखा है, इसीलिए शक्ति हमें भयभीत नहीं करती। हम इससे आगे बढ़कर करुणा को पूजते हैं।
हर शक्तिशाली के समक्ष शीश झुका देना अज्ञानता है। शक्ति के केंद्र में जब करुणा हो, जगतकल्याण का भाव हो, तभी वह देवत्व के रूप में स्वीकार्य होती है। पर इतना समझने के लिए सनातन होना पड़ता है।
भगवान शिव के अश्रु देवत्व की ओर से मानवता को दिया गया सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है।

चाय पर चर्चा ... राष्ट्र चिंतन विहिप  🚩मातृशक्ति नागपुर ..
20/09/2023

चाय पर चर्चा ... राष्ट्र चिंतन
विहिप 🚩मातृशक्ति नागपुर ..

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