03/02/2023
मजदूर मसीहा स्व.जार्ज फर्नाडीज की पुण्यतिथि पर खास !
जार्ज के संघर्ष को भी रखें याद : शिवगोपाल मिश्रा
नई दिल्ली, 29 जनवरी। वैसे तो हम सभी भारतीय रेल के कर्मचारियों के लिए 8 मई 1974 का दिन गर्व का दिन है। आज रेलकर्मी हर साल बोनस हासिल करते है, लेकिन ज्यादातर कर्मचारियों को ये पता ही नहीं है कि आखिर इस बोनस के लिए कितना संघर्ष हुआ और कितने लोगों ने शहादत दी और मजदूर मसीहा स्व. जार्ज फर्नाडीज का इसमें कितनी अहम भूमिका रही। बोनस के लिए 8 मई 74 के दिन हमेशा याद रखा जाएगा ! अब इस ऐतिहासिक हड़ताल को लगभग 47 साल बीत चुके है, इस दौरान लगभग सभी हड़ताली कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इसलिए जरूरी है कि आज जार्ज साहब की पुण्यतिथि पर इतिहास के पन्नों को पलटा जाए और अपने नेताओं के संघर्ष को याद किया जाए। संघर्ष को याद करने के साथ ही उन्हें भी बेनकाब किया जाना चाहिए, जिन्होंने सरकार के साथ मिलकर हड़ताल को कमजोर करने की साजिश की।
आपको ये जानना भी जरूरी है कि पहले हमारे ट्रैकमैन साथी कैजुअल में भर्ती होते थे और केजुअल में ही सेवानिवृत्त तक हो जाते थे, उन्हें रिटायर होने के बाद कोई सुविधा तक नहीं मिलती थी। आज हालात बदल चुके है, वजह साफ है, क्योंकि हमारी अगुवाई आँल इंडिया रेलवे मेन्स फैडरेशन जैसे मजबूत लीडरशिप के हांथों में है, 1974 में भारतीय रेल में लगभग 20 लाख कर्मचारी कार्यरत थे, जबकि ट्रेनों की संख्या काफी कम थी, आज मात्र 12.50 लाख कर्मचारी है और 22 हजार ट्रेनों के जरिए रोजाना ढाई करोड़ लोगों को देश के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं। विपरीत हालातों में रेलकर्मचारी दोगुने जोश और हिम्मत से काम करते हैं। हालांकि देश में जब भी युद्ध के हालात बने है, रेलकर्मचारियों ने न सिर्फ सैन्यकर्मियों को उनके गन्तव्य तक पहुंचाने का काम किया, बल्कि गोला बारुद और हथियार तक सीमा पर पहुंचाने में भी हम पीछे नहीं रहे। जब कोरोना के कहर से दुनिया कराह रही है, देश ही नहीं पूरी दुनिया में लाँक डाउन था, और लोग घरों में कैद हो गए थे, तब भी हमारे 10 लाख से ज्यादा रेल कर्मचारी अपने काम पर रहे । किसी राज्य में खाद्यान का संकट न हो जाए, कहीं दवा, फल और सब्जी की कमी न हो जाए, वो काम हमारे रेल कर्मचारी कर रहे थे। इसके बाद भी हमेशा से ही भारतीय रेल कर्मचारियों पर सरकार की नजर टेढ़ी रही है। आज हम सभी रेलकर्मचारियो को पुरानी पेंशन योजना की बहाली के एक मंच पर आना पड़ा है, और सरकार से संघर्ष के हालात बन गए है !
1974 की हड़ताल के बारे में सोशलिस्ट नेता रघु ठाकुर जो उस हड़ताल के दौरान जेल भी गए, उन्होंने अपने संस्मरण में इस हड़ताल के बारे में विस्तार से लिखा है। उनका कहना है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी लोकतंत्र को अपने अनुकूल बनाए रखना चाहती थी, इसीलिए हड़ताल की नोटिस पर भारत सरकार ने वार्ता के बजाय टकराव का रास्ता चुना । इस हड़ताल की अगुवाई कर रहे स्व. जार्ज फर्नाडीस को गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल में भेज दिया गया । देश में रेल कर्मचारियों पर और उनके समर्थकों पर दमन शुरू कर दिया गया। लाखों कर्मचारियों को नौकरी से बाहर कर हजारों कर्मचारियों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया । बड़े - बड़े जनसंगठनों के कर्मचारियों को भयभीत करने के लिए और घुटना टेक कराने के लिए उनके आवासों को घेरा और रेलवे कालोनियों की बिजली काट दी गई, पानी की आपूर्ति बंद कर दी गई तथा पुलिस के माध्यम से उन्हें और उनके बच्चों को मकान खाली करने को मजबूर किया गया। सैकड़ों कर्मचारियों के घरों का सामान सड़कों पर फेंक दिया गया । रेलवे के इलाकों को सेना के हवाले कर दिया गया ! तानाशाही और दमन क्या हो सकता है इसका पूर्वाभ्यास इस हड़ताल के तोड़ने में नजर आने लगा था। आपको जानकर खुशी होगी कि इस हड़ताल के परिणामस्वरूप ही अस्थाई रेल कर्मचारियों को स्थाई करने की प्रक्रिया शुरू हुई तथा रेलवे ने यह निर्णय किया कि कोई गेंगमेन अब हटाया नही जायेगा । इस हड़ताल ने समूचे देश के मजदूरों और कर्मचारियों में एक आत्मविश्वास और संघर्ष का जज्बा पैदा किया था। कई लाख लोग जिन्हें नौकरी से निकाला गया था या जिन्हे नौकरी से हटा दिया गया था, वे लगभग 3 वर्ष तक बगैर वेतन के संघर्ष और पीड़ा के दिन गुजारते रहे और 1977 में कांग्रेस सरकार के पतन के बाद जब जनता पार्टी की सरकार बनी तभी उन सबको काम पर वापस लिया गया ।
आपको पता होना चाहिए कि स्व. जार्ज फर्नाडीस के नेतृत्व में ही रेल हड़ताल शुरू हुई, स्व. फर्नांडीस उस समय सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष थे, साथ ही रेल मजदूरों के सबसे बड़े संगठन ऑल इंडिया रेलवे मेन्स फेडरेशन के अध्यक्ष भी थे । फर्नाडीस ने पहल कर देश के अन्य रेल कर्मचारियों के संगठनों को इकट्ठा कर राष्ट्रीय समन्वय समिति का गठन किया और कई माह तक रेल कर्मचारियों के हड़ताल का मांग पत्र तैयार करने के बाद हड़ताल को संगठित करने का अभियान भी चलाया था । यह रेल हड़ताल देश की एक ऐसी बेमिसाल हड़ताल थी जिसने समूचे देश के मजदूर आंदोलन और भारतीय राजनीति के ऊपर विशेष प्रभाव डाला।
अपने संस्मरण में सोशलिस्ट नेता ने कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी उस वक्त कहा था कि ’बोनस इस द डेफर्ड वेज’ और इसी सिंद्धांत के आधार पर रेल कर्मचारियों के संगठन ने बोनस की मांग की थी। रेल संगठनों की मांग थी कि उस समय के जो अस्थाई रेल कर्मचारी थे, उन्हे भी स्थाई किया जाए । स्व. फर्नांडीस और रेल मजदूर संगठनों का यह आंकलन था कि रेल कर्मचारियों की सारी मांगे पूरी करने पर भारत सरकार पर मुश्किल से 200 करोड़ का बोझ आएगा, जबकि रेल हड़ताल को तोड़ने के ऊपर भारत सरकार ने इससे दस गुनी राशि अनुमानतः दो हजार करोड़ रूपये खर्च किए थे।
सोशलिस्ट नेता स्व. ठाकुर को भी 8 मई 1974 को सागर रेलवे स्टेशन से सैकड़ों रेल कर्मचारियों के साथ गिरफ्तार किया गया ! नेशनल रेलवे मजदूर यूनियन सागर के अध्यक्ष समेत कुछ अन्य लोगों को भी उनके साथ गिरफ्तार किया गया था। इन रेल कर्मचारियों को सरकार ने सागर जेल में रखा था , परन्तु स्व. ठाकुर को कुछ अन्य नेताओं के साथ भोपाल जेल स्थानांतरित कर दिया गया । भोपाल में भी सैकड़ों रेल कर्मचारी जेल में पहले से थे।
दरअसल 1971 में श्रीमति इंदिरा गॉंधी को लोकसभा के चुनाव में विशाल बहुमत मिला था और फिर बंग्लादेश के स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में निर्माण के बाद श्रीमति इंदिरा गॉंधी की लोकप्रियता चरम पर थी । स्व. ललित नारायण मिश्र, भारत के रेल मंत्री थे और स्व. इंदिरा गॉंधी ने रेल हड़ताल को उन्हे हटाये जाने के षड़यंत्र के रूप में देख रही थीं, उनके सूचना स्रोतों ने उन्हे यह समझाया था कि अगर उन्होंने रेल कर्मचारियों की मांगे मान ली तो देश में कर्मचारियों की बगावत की एक नई श्रंखला शुरू हो जायेगी । वैंसे भी अपने अंहकारी स्वभाव और लोकप्रियता के मद में उन्हे यह गवारा नही था कि उन्हे कोई चुनौती दे ।
इस दौरान स्व. जार्ज फर्नांडीस ने जेल से अपने साथियों को पत्र लिखकर आगाह किया था और कहा था ’’ दिस इस ड्रेस रिहर्सल ऑफ फासिस्म’’ । हड़ताली कर्मचारी भोपाल की जेल में रात को रेल के इंजनों की आवाज सुनते थे और रेल कर्मचारी मन में भयभीत होते थे कि लगता है रेल हड़ताल टूट गई है, भयभीत होकर कर्मचारी काम पर वापस आ गये है इसलिये गाड़ियों की आवाज सुनाई पड़ रही है. परन्तु सच्चाई यह थी कि रेल कर्मचारियों के संकल्प को तोड़ने के लिये सरकार टेरीटोरियल आर्मी के चालकों से कुछ इंजनों को चलवाती थी ताकि कर्मचारी और उनके परिवार के लोग घबराकर हड़ताल तोड़ दें। लगभग 15 दिन से भी अधिक यह हड़ताल चली और 1975 के आपातकाल की पृष्ठभूमि इस हड़ताल ने लिख दी, समूचे देश ने आंतरिक सुरक्षा कानून ’’मीसा’’ का पहला स्वाद इस हड़ताल में चखा था ।
1974 की यह रेल हड़ताल न केवल देश की बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी हड़ताल थी, जिसने देश की सत्ता को हिला दिया था। अब इस हड़ताल को लगभग 47 वर्ष होने को हैं. इन 47 वर्षों में अनेकों प्रकार के राजनैतिक बदलाव आये हैं परन्तु इस रेल हड़ताल ने जिन बुनियादी बातों को लेकर लकीर खींची थी, वे अब भी यथावत है । इस हड़ताल के दौरान कितने ही रेल कर्मचारी दवा के अभाव में मौत के शिकार हो गए, देश के अनेक रेलवे स्टेशनों पर पुलिस ने गोलियाँ चलाई और मजदूर मारे गए।
आज देश में एक बार फिर ऐसे हालात बनाए जा रहे हैं, जिससे मजदूरों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। पहले पुरानी पेंशन को खत्म कर न्यू पेंशन स्कीम लाई गई, जिससे कर्मचारियों में भारी गुस्सा है, अब भारतीय रेल के निजीकरण की साजिश की जा रही है। आँल इंडिया रेलवे मेन्स फैडरेशन के महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा लगातार सरकार के संपर्क में है, उन्होंने सरकार को साफ कर दिया है कि मजदूर विरोधी नीतियों से कर्मचारियों में भारी आक्रोश है, सरकार की दोषपूर्ण नीतियों की वजह से अगर 1974 की ऐतिहासिक हड़ताल की पुनरावृत्ति हो जाए तो इससे इनकार नहीं किया जा सकता। श्री मिश्रा ने कहाकि सरकार ने एक बार फिर ऐसे हालात पैदा किए देश के केंद्रीय कर्मचारियों , राज्य कर्मचारियों और शिक्षको में भारी रोष है , मुद्दा वही की पुरानी पेंशन की बहाली हो ! 2004 में बंद हुए पुरानी पेंशन की माँग को लेकर सरकारी कर्मचारी आंदोलित है !
महेन्द्र श्रीवास्तव
फोन 9140369128