05/09/2026
"शिक्षक ने अगर अभिभावकों के व्यवहार से तंग आकर परहेज़ कर लिया, तो शिक्षा का अलख जगाएगा कौन?"
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आज विद्यालयों में एक ऐसी परिस्थिति धीरे-धीरे जन्म ले रही है, जहाँ शिक्षक बच्चे की छोटी-सी गलती सुधारने से पहले भी कई बार सोचने को मजबूर हो जाता है। उसे डर रहता है कि कहीं उसकी डाँट, समझाइश या अनुशासनात्मक कदम को अभिभावक गलत अर्थ में न लें और बात संवाद से निकलकर शिकायत, आरोप या धमकी तक न पहुँच जाए।
निस्संदेह, बच्चे के साथ अनुचित व्यवहार स्वीकार्य नहीं है और किसी भी शिकायत को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। लेकिन हर डाँट अपमान नहीं होती और हर अनुशासनात्मक प्रयास दुर्व्यवहार नहीं होता। कभी-कभी शिक्षक की सख्ती के पीछे बच्चे को रोकना नहीं, बल्कि उसे गलत दिशा में जाने से बचाना छिपा होता है।
कल्पना कीजिए, यदि बार-बार के आरोपों और अभिभावकों के आक्रामक व्यवहार से आहत होकर शिक्षक यह तय कर ले कि अब वह किसी बच्चे की गलती नहीं बताएगा, किसी अनुशासनहीनता पर नहीं टोकेगा और किसी बच्चे को सुधारने का जोखिम नहीं उठाएगा—तो विद्यालय में क्या बचेगा? शिक्षक अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित हो सकता है और बच्चे के व्यवहार, संस्कार और चरित्र निर्माण का महत्वपूर्ण पक्ष उपेक्षित होने लगेगा।
फिर वही सवाल हमारे सामने खड़ा होगा—
जब शिक्षक ही डरकर परहेज़ करने लगेगा, तो बच्चों को सही और गलत का अंतर कौन समझाएगा? उन्हें अनुशासन कौन सिखाएगा? और शिक्षा का वह अलख कौन जगाएगा, जो केवल किताबों से नहीं बल्कि शिक्षक के मार्गदर्शन से प्रज्वलित होता है?
अभिभावक और शिक्षक को आमने-सामने खड़ा करने से सबसे अधिक नुकसान बच्चे का होता है। दोनों का उद्देश्य एक ही है—बच्चे का बेहतर भविष्य। इसलिए किसी घटना पर तत्काल आक्रोश या धमकी के बजाय पहले शिक्षक की बात सुनना, परिस्थिति को समझना और फिर मिलकर समाधान निकालना अधिक उचित है।
शिक्षक से सवाल कीजिए, लेकिन सम्मान के साथ।
शिकायत कीजिए, लेकिन सत्य की पड़ताल के बाद।
बच्चे का पक्ष लीजिए, लेकिन उसकी हर गलती का बचाव मत कीजिए।
क्योंकि शिक्षक और अभिभावक जब एक-दूसरे से भयभीत होंगे, तो बच्चा दिशाहीन होगा; लेकिन जब दोनों एक-दूसरे का सम्मान और सहयोग करेंगे, तभी शिक्षा का दीप जलता रहेगा और संस्कारों की रोशनी अगली पीढ़ी तक पहुँचेगी।