19/04/2026
🪔 अक्षय तृतीया — सच में “अक्षय” क्या है, या हम खुद को बहला रहे हैं?
आज अक्षय तृतीया है…
और हर साल की तरह आज भी एक ही शोर है
“आज सोना खरीदो… बरकत बढ़ेगी…”
ज्वेलरी शॉप्स भरी हुई हैं…
ऑनलाइन ऑफर्स चल रहे हैं…
लोग EMI पर भी गोल्ड ले रहे हैं…
लेकिन कोई ये नहीं पूछ रहा…
क्या हम सच में “बरकत” खरीद सकते हैं?
कड़वी बात है, लेकिन सच है…
अगर सोना खरीदने से बरकत आती…
तो सबसे अमीर लोग सबसे ज्यादा खुश होते।
पर असलियत क्या है?
* पैसा है… पर सुकून नहीं
* घर है… पर अपनापन नहीं
* दिखावा है… पर दिल खाली है
“अक्षय” का मतलब है — जो कभी खत्म न हो
तो ज़रा ईमानदारी से जवाब दो…
* क्या आपका खरीदा हुआ सोना कभी बिक नहीं सकता?
* क्या मुसीबत में वही सोना सबसे पहले नहीं निकलता?
फिर वो “अक्षय” कैसे हुआ?
सच तो ये है…
हमने एक आध्यात्मिक दिन को मार्केटिंग का त्योहार बना दिया है
जहाँ भावनाओं से ज्यादा ऑफर्स बिक रहे हैं
और आस्था से ज्यादा डिस्काउंट चल रहा है
सोचिए…
एक तरफ वो लोग हैं जो आज हजारों का सोना खरीद रहे हैं…
और दूसरी तरफ वो लोग हैं जो आज भी दो वक्त की रोटी के लिए लड़ रहे हैं।
अगर “अक्षय” का मतलब सच में बढ़ती हुई बरकत है…
तो क्या किसी भूखे को खाना खिलाना ज्यादा “अक्षय” नहीं है?
शायद असली अक्षय तृतीया ये नहीं है कि आप क्या खरीदते हो…
बल्कि ये है कि आप क्या देते हो
* किसी की मदद
* किसी का दर्द समझना
* बिना मतलब के अच्छा करना
ये चीज़ें कभी खत्म नहीं होतीं…
और शायद ऊपर वाला भी इसी का हिसाब रखता है… ना कि आपके गोल्ड बिल का।
आज अगर सच में कुछ “अक्षय” बनाना है…
तो अपने बैंक बैलेंस से नहीं…
अपने कर्मों से बनाइए।
सच-सच बताइए…
आपके हिसाब से अक्षय तृतीया
आस्था का दिन है…
या फिर एक और “खरीदारी का बहाना”?