14/04/2026
चौपाल अप्रैल 2026
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चौपाल .....
भारत के कुछ पूरों पट्टनों पर
नीचे अनेक शहरों की यादगार इमारतों के चित्र बने थे। बहुत पुराने रेलवे टिकट का स्वरूप…. माज़रा पल्ले पङा नहीं। इस तरह का टिकट भेजा था इस बार अशोक बिंदल जी ने…. और हमने भी सोचा.. वो क्या कहते हैं। हां सरप्राइज…तो ‘सरप्राइज’ का आनंद ही लिया जाए। जाना तो तय है और चौपाल की यात्राएं हमेशा यादगार होती ही हैं, उस दिन की यात्रा ऐसी खुशगवार व ज्ञानवर्धक होगी इसका अंदाजा नहीं था।
भगवान भास्कर ने ठान ली थी कि रविवार की तपती दोपहर कोई अपने आरामगाह से बाहर न निकले….. किंतु चौपाल का जादू जबर था… सो दूर-दूर से आ जुटे थे सब भवंस के उस जाने पहचाने सुशीतल सभागृह में।
स्वर साम्राज्ञी आशा भोंसले के महाप्रयाण से वातावरण गमज़दा तो था।
संचालन की बागडोर अतुल तिवारी ने अपने हाथ में ली और आशा जी के विषय में श्रद्धांजलि स्वरुप कुछ शब्द कहे। यूनुस खान ने बातों और अनिका अग्रवाल ने गीतों के जरिए आशा जी को याद किया। आशा भोंसले की यात्रा मजबूत कदमों से आगे बढ़ कर अप्रतिम मुकाम हासिल करने की यात्रा रही। मौन खड़े होकर, महान शख्सियत को श्रद्धांजली दी गई। संभवत यह पहली स्मृति सभा होगी आशा जी के लिए। भवंस कल्चरल सेंटर के ललित भाई ने कार्यक्रमों की जानकारी दी ।
यात्रा अभियान के कप्तान अतुल तिवारी जी ने कार्यक्रम आरंभ करते हुए कहा कि– ‘बुद्ध’ कहते हैं- सुख नाम की मंजिल पर पहुंचने का कोई रास्ता नहीं है… रास्ता ही सुख है और यात्रा आनंद। यात्रा के संदर्भ में ‘सुकरात’ कहते हैं यदि तुमने यात्राएँ नहीं की तो तुम मूर्ख हो। चौपाल की यात्रा शुरू हुई तिवारी जी से और उन्होंने स्टेशन चुना ‘काशी’, जो सबसे पुरातन व जीवित शहर है। बहुत सुंदर कविता से अपना वक्तव्य शुरू किया…
बनारस में बैठी है गंगा की धारा
ऋचाओं की गूंज योग निद्रा की शांति
तिलस्म काशी का बड़ा अद्भुत
तिवारी जी जब बोलते हैं तो उन्हें सुन लेने का प्रलोभन इतना बङा होता है कि मैं तो क्या.. मेरी कलम भी लिखना भूल जाती है। अपने विषय को इंतिहाई हद तक प्रभावी बना देने का हुनर साधा है उन्होंने… बोले कि- पुराने शहर तो रोम और एथेंस भी है किंतु हमारी काशी जैसा कोई नहीं, भारत का आध्यात्मिक केंद्र है काशी.. और काशी की जानकारी देने के लिए उन्होंने अपनी ज्ञान की गठरी खोली और लुटाने लगे अशर्फियाँ …सारे श्रोता सांस रोक कर उन्हें सुन रहे थे।
उनके बाद आए कल्याण सुंदरेश्वर वे हंस कर बोले कि –अतुल जी ने अपनी बात बड़ी सलीके से कही है पर मैं जरा सा बेतरतीब हो सकता हूँ…. पर नहीं… लाजवाब रहे वे… अपनी जन्मभूमि और ननिहाल मद्रास की बातें बङी बेतकल्लुफी से धारा प्रवाह कहते चले गए कि वहां बैठा प्रत्येक शख्स अपने बचपन में की गई मामा-बाड़ी की यात्रा पर निकल पड़ा। मामा- भांजे के आत्मीय रिश्ते का उन्होंने जो निष्कलुष चित्र खींचा कि हम सब एक बारगी शकुनी और कंस मामा की कहानी भी बिसरा बैठे। कल्याण ने यहाँ तक कहा कि– वो शहर ही मेरा सगा मामा था।
अब सुंदरेश्वर ले चले अपनी कर्मभूमि कोलकाता…बोले –हावड़ा ब्रिज और उसकी दुल्हन गंगा शाश्वत रिश्ते में जुड़े हैं, सचमुच यह उपमा तो सुनी -पढ़ी नहीं थी कभी। कल्याण की नानी ने कहा था मद्रास से कोलकाता जाते वक्त कि – तुम कलकत्ता जैसे आलसी और अस्त व्यस्त मत बन जाना। कल्याण कहते हैं कोलकाता ने मेरी परवरिश की है इस शहर का कास्मोपोलिटन होना मजबूरी नहीं फितरत है। यह शहर धीमा जरूर है ट्राम तरह…. सब शहर बदलते हैं पर कोलकाता नहीं बदलता। लोग बुढ़ा जाते हैं पर यह शहर तो पहले से ही बुजुर्ग ही था। कुछ-कुछ शहर आज सोचते हैं कल कर डालते हैं किंतु कोलकाता तो बस सोचता ही रह जाता है। कोलकाता छः छः नोबेल विजेताओं की जन्मभूमि है। मेरा इससे मतभेद तो है पर मोहब्बत बेशुमार है।
अतुल जी ने कहा कि- हमारी जिंदगी भी एक किताब है यदि हमने यात्राएं नहीं की तो यूं समझें कि हमने इस किताब का सिर्फ एक सफा ही पढा है। चौपाल के लोग अनिका अग्रवाल के सरस कंठ के माधुर्य से परिचित हैं किंतु वे बहुत अच्छा लिख और उसे बड़ी खूबसूरती से मंच पर प्रस्तुत भी कर लेती है यह जानकारी नहीं थी। उन्होंने अपनी जन्मभूमि इंदौर तथा कर्मभूमि मुंबई की बात बड़ी ही रोचकता से रखी -मुझे एक शहर ने जन्म दिया तो दूसरे ने तराशा। इंदौर मेरा प्रिय शहर है जन्मभूमि है जो मुझसे कोई सवाल नहीं करती और मुंबई… उसने मुझे अपने आप से मिलवाया, संघर्ष करना सिखाया, समय की कीमत समझाई इसलिए मेरा कहना है कि कर्म भूमि से बेशक प्यार करो उसे अपनाओ भी किंतु अपनी मातृभूमि को कभी मत भूलो। जन्मभूमि मां की गोद होती है।
यूनुस खान अपने शहर जबलपुर की यात्रा पर ले चले बोले कि- मेरा शहर बहुत अक्खड़ है किंतु वहां नारियल जैसे लोग बसते हैं। वहां गलती किसी की भी हो पर जिसने कुटाई पहले कर दी वही सही माना जाता है। एक समय जबलपुर केंद्र रहा ठगी का, आलम ऐसा की अंग्रेजों को उनसे निपटने के लिए अलग से विभाग बनाना पड़ा। गड़ा गोंडवाना, त्रिपुरी इसके पुराने नाम है। दरअसल जबाली ऋषि के कारण इसका नाम जबलपुर पड़ा, और फिर युनुस जी जबरदस्त किस्सागो है, श्रोताओं को लुभाने जैसी कद्दावर आवाज भी नेमत की तरह मिली है। आनंद बक्शी, प्रेमनाथ, रघुवीर यादव, के के नायकर, हरिशंकर परसाई, और यहां के सबसे बड़े कृषि विश्वविद्यालय तक ले चले अपने साथ। यात्रा हो और खाने की बात ना हो यह तो हो नहीं सकता था तो जबलपुर की विश्व प्रसिद्ध खोए की जलेबी का रसभीना जिक्र किया और बोले की पुण्य सलिला सदा नीरा नर्मदा नदी भारत की संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है यहां के कबूलिया व ददरिया लोकगीत बहुत मशहूर है, यह ओशो का शहर भी है और 81 योगिनियों का भेड़ाघाट और बंदरखोदनी के बिना जबलपुर की बात ही अधूरी रहेगी। वहां का ‘विवेचना नाट्य समूह’ जो प्रतिवर्ष दो नाट्य समारोह आयोजित करता है।
तिवारी जी ने सुभद्रा कुमारी चौहान के बसंत पर लिखी पंक्तियां गुनगुनायी यह वो समय था जब जलियाँवाला बाग का जलजला आ चुका था, तब सुभद्रा कुमारी चौहान लिखती है ‘बसंत’ नाम की कविता-
हे प्रिय ऋतु राज तुम धीरे से आना।
यह शोक स्थान है यहां शोर मत मचाना
पुणे से आई वेदैही ने अपने शहर पुणे पर बात शुरू करते ही कहा कि –मेरा शहर नहीं बदलता है
गहन शोध के साथ उन्होंने अपनी बात खूब विस्तार से आधिकारिक तौर से रखी। आज का विषय शहरों की यात्रा था उन्होंने पुणे की यात्रा के साथ व्यतीत हो चुके अतीत की यात्रा करवा दी। सातवीं नवीं सदी पीछे ले जाकर…फिर 1919 से शुरू हुई बात को बहुत ही ऐतिहासिक तथ्यों के साथ सिलसिलेवार रखते चले जाना अभिभूत करता गया। वे कहती हैं कि हम शास्त्र वाले लोग हैं यदि यह पुणे वासी कोई दावा करते भी है तो सही करते हैं। गजानन अभियंकर के वाङे से शुरू हुई बात पेशवाओं के समय तक आती है। नाना साहब फङनवीस, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, रमाबाई रानाडे तक पहुंची और सही कहा उन्होंने नारी शिक्षा व सम्मान की अलख पुणे में जैसी जगाई इन महान विभूतियों ने, उसी का परिणाम है कि वहां आज शिक्षा का जगरमगर करता उजास हर जगह देखा जा सकता है। यहाँ तक की वहाँ एक रिक्शा वाला भी कुसुमाग्रज की कविताएँ सुना सकता है, वो पूरा अखबार रोज पढता है।अपनी बात सख्ती से रखना हर पुणेवासी जानता है। यह शहर बगावतियों का भले हो किंतु यहां प्रखर तत्ववाद चलता है। कलाओं में भी शास्त्रीयता होनी जरूरी है, ‘एवरीथिंग क्लासिकल’। हमारे यहां खानपान कुछ भी प्रसिद्ध नहीं हैं क्योंकि हमारा मन तो कभी खान-पान में रमा ही नहीं, हमें तो वाद- विवाद में रस आता है, पढ़ने में आनंद आता है, और तुकाराम का जिक्र किए बिना पुणे की बात अधूरी होगी।
बात यात्रा की थी संयोग से कजाकिस्तान की एक युवती आईग्राम सभागृह में थी। अपनी प्यारी सी बेटी सूफिया को गोद में लिए हुए बड़ी सहजता से मंच पर आई और बहुत ही अच्छी हिंदी में बोली कि- मैं नॉनस्टॉप बात कर सकती हूं इतनी ढेर सी बातें मेरे अंदर भरी है। मैं 16 साल से भारत में हूं। सेंट्रल एशिया के बीच एक छोटा सा शहर आर्कलिक अक्षु AKSU हैl जहां सभी तरह के खनिज बहुतायत से होते हैं और हर जगह के लोग आते हैं। हमारा शहर मैग्नेट जैसा है। आईग्रीम ने बड़े पते की बात कही कि कभी कभी छोटा शहर बड़े मौके दे देता है। उन्होंने अपने शहर की एंबेसी में काम शुरू किया और एक डांस ग्रुप बनाया। इंडियन एंबेसी की तरफ से उन्हें इंडिया आने का मौका मिला। वे दिल्ली आईं तो उन्हें लगा कि किसी पिछले जन्म में जरूर यहीं जन्मी थी। यहां के लोग बहुत अच्छे हैं। वे सोलह साल से भारत में पढ़ाई कर रही हैं। बेंगलुरु में योग सीखा। लॉकडाउन के समय केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा में हिंदी पढ़ने का मौका मिला।
इंदौर से आई मेघा ने मुंबई पर बड़े खूबसूरत अंदाज में ‘शहर का शोर’ नाम से कविता सुनाई ।
तेज तेज रहो तेज नहीं तो मत रहो
यहां सभी व्यस्त हैं जिंदगी से त्रस्त हैं
और उसके बाद अपनी जन्मभूमि इंदौर पर भी कविता के रूप में ही अपने भाव व्यक्त किये–
दुनिया चांद पर है
अब भी विवाद नाम पर है
मेरा महबूब चाँद था
मैं शर्मा वो खान था
बच्ची से दिखने वाली मेघा की कविता के शब्द कटु सच्चाई और मारक अर्थो से भरे थे और उसका पढ़ने का अंदाज बेहद प्यारा था। आज की यात्रा अपने गंतव्य पर पहुंच चुकी थी लेकिन ऐसी ही और यात्राओं की इच्छा जगा कर।
--- श्रीमती निर्मला जी डोसी