Chaupaal

Chaupaal साहित्य, कला और संस्कृति की चौपाल !!!

चौपाल अप्रैल  2026                            बस्ती बस्ती नगर नगर              घूमें देखें इंडियन शहरचौपाल   ..... भारत ...
14/04/2026

चौपाल अप्रैल 2026


बस्ती बस्ती नगर नगर
घूमें देखें इंडियन शहर

चौपाल .....
भारत के कुछ पूरों पट्टनों पर

नीचे अनेक शहरों की यादगार इमारतों के चित्र बने थे। बहुत पुराने रेलवे टिकट का स्वरूप…. माज़रा पल्ले पङा नहीं। इस तरह का टिकट भेजा था इस बार अशोक बिंदल जी ने…. और हमने भी सोचा.. वो क्या कहते हैं। हां सरप्राइज…तो ‘सरप्राइज’ का आनंद ही लिया जाए। जाना तो तय है और चौपाल की यात्राएं हमेशा यादगार होती ही हैं, उस दिन की यात्रा ऐसी खुशगवार व ज्ञानवर्धक होगी इसका अंदाजा नहीं था।

भगवान भास्कर ने ठान ली थी कि रविवार की तपती दोपहर कोई अपने आरामगाह से बाहर न निकले….. किंतु चौपाल का जादू जबर था… सो दूर-दूर से आ जुटे थे सब भवंस के उस जाने पहचाने सुशीतल सभागृह में।
स्वर साम्राज्ञी आशा भोंसले के महाप्रयाण से वातावरण गमज़दा तो था।
संचालन की बागडोर अतुल तिवारी ने अपने हाथ में ली और आशा जी के विषय में श्रद्धांजलि स्वरुप कुछ शब्द कहे। यूनुस खान ने बातों और अनिका अग्रवाल ने गीतों के जरिए आशा जी को याद किया। आशा भोंसले की यात्रा मजबूत कदमों से आगे बढ़ कर अप्रतिम मुकाम हासिल करने की यात्रा रही। मौन खड़े होकर, महान शख्सियत को श्रद्धांजली दी गई। संभवत यह पहली स्मृति सभा होगी आशा जी के लिए। भवंस कल्चरल सेंटर के ललित भाई ने कार्यक्रमों की जानकारी दी ।
यात्रा अभियान के कप्तान अतुल तिवारी जी ने कार्यक्रम आरंभ करते हुए कहा कि– ‘बुद्ध’ कहते हैं- सुख नाम की मंजिल पर पहुंचने का कोई रास्ता नहीं है… रास्ता ही सुख है और यात्रा आनंद। यात्रा के संदर्भ में ‘सुकरात’ कहते हैं यदि तुमने यात्राएँ नहीं की तो तुम मूर्ख हो। चौपाल की यात्रा शुरू हुई तिवारी जी से और उन्होंने स्टेशन चुना ‘काशी’, जो सबसे पुरातन व जीवित शहर है। बहुत सुंदर कविता से अपना वक्तव्य शुरू किया…
बनारस में बैठी है गंगा की धारा
ऋचाओं की गूंज योग निद्रा की शांति
तिलस्म काशी का बड़ा अद्भुत
तिवारी जी जब बोलते हैं तो उन्हें सुन लेने का प्रलोभन इतना बङा होता है कि मैं तो क्या.. मेरी कलम भी लिखना भूल जाती है। अपने विषय को इंतिहाई हद तक प्रभावी बना देने का हुनर साधा है उन्होंने… बोले कि- पुराने शहर तो रोम और एथेंस भी है किंतु हमारी काशी जैसा कोई नहीं, भारत का आध्यात्मिक केंद्र है काशी.. और काशी की जानकारी देने के लिए उन्होंने अपनी ज्ञान की गठरी खोली और लुटाने लगे अशर्फियाँ …सारे श्रोता सांस रोक कर उन्हें सुन रहे थे।
उनके बाद आए कल्याण सुंदरेश्वर वे हंस कर बोले कि –अतुल जी ने अपनी बात बड़ी सलीके से कही है पर मैं जरा सा बेतरतीब हो सकता हूँ…. पर नहीं… लाजवाब रहे वे… अपनी जन्मभूमि और ननिहाल मद्रास की बातें बङी बेतकल्लुफी से धारा प्रवाह कहते चले गए कि वहां बैठा प्रत्येक शख्स अपने बचपन में की गई मामा-बाड़ी की यात्रा पर निकल पड़ा। मामा- भांजे के आत्मीय रिश्ते का उन्होंने जो निष्कलुष चित्र खींचा कि हम सब एक बारगी शकुनी और कंस मामा की कहानी भी बिसरा बैठे। कल्याण ने यहाँ तक कहा कि– वो शहर ही मेरा सगा मामा था।

अब सुंदरेश्वर ले चले अपनी कर्मभूमि कोलकाता…बोले –हावड़ा ब्रिज और उसकी दुल्हन गंगा शाश्वत रिश्ते में जुड़े हैं, सचमुच यह उपमा तो सुनी -पढ़ी नहीं थी कभी। कल्याण की नानी ने कहा था मद्रास से कोलकाता जाते वक्त कि – तुम कलकत्ता जैसे आलसी और अस्त व्यस्त मत बन जाना। कल्याण कहते हैं कोलकाता ने मेरी परवरिश की है इस शहर का कास्मोपोलिटन होना मजबूरी नहीं फितरत है। यह शहर धीमा जरूर है ट्राम तरह…. सब शहर बदलते हैं पर कोलकाता नहीं बदलता। लोग बुढ़ा जाते हैं पर यह शहर तो पहले से ही बुजुर्ग ही था। कुछ-कुछ शहर आज सोचते हैं कल कर डालते हैं किंतु कोलकाता तो बस सोचता ही रह जाता है। कोलकाता छः छः नोबेल विजेताओं की जन्मभूमि है। मेरा इससे मतभेद तो है पर मोहब्बत बेशुमार है।

अतुल जी ने कहा कि- हमारी जिंदगी भी एक किताब है यदि हमने यात्राएं नहीं की तो यूं समझें कि हमने इस किताब का सिर्फ एक सफा ही पढा है। चौपाल के लोग अनिका अग्रवाल के सरस कंठ के माधुर्य से परिचित हैं किंतु वे बहुत अच्छा लिख और उसे बड़ी खूबसूरती से मंच पर प्रस्तुत भी कर लेती है यह जानकारी नहीं थी। उन्होंने अपनी जन्मभूमि इंदौर तथा कर्मभूमि मुंबई की बात बड़ी ही रोचकता से रखी -मुझे एक शहर ने जन्म दिया तो दूसरे ने तराशा। इंदौर मेरा प्रिय शहर है जन्मभूमि है जो मुझसे कोई सवाल नहीं करती और मुंबई… उसने मुझे अपने आप से मिलवाया, संघर्ष करना सिखाया, समय की कीमत समझाई इसलिए मेरा कहना है कि कर्म भूमि से बेशक प्यार करो उसे अपनाओ भी किंतु अपनी मातृभूमि को कभी मत भूलो। जन्मभूमि मां की गोद होती है।

यूनुस खान अपने शहर जबलपुर की यात्रा पर ले चले बोले कि- मेरा शहर बहुत अक्खड़ है किंतु वहां नारियल जैसे लोग बसते हैं। वहां गलती किसी की भी हो पर जिसने कुटाई पहले कर दी वही सही माना जाता है। एक समय जबलपुर केंद्र रहा ठगी का, आलम ऐसा की अंग्रेजों को उनसे निपटने के लिए अलग से विभाग बनाना पड़ा। गड़ा गोंडवाना, त्रिपुरी इसके पुराने नाम है। दरअसल जबाली ऋषि के कारण इसका नाम जबलपुर पड़ा, और फिर युनुस जी जबरदस्त किस्सागो है, श्रोताओं को लुभाने जैसी कद्दावर आवाज भी नेमत की तरह मिली है। आनंद बक्शी, प्रेमनाथ, रघुवीर यादव, के के नायकर, हरिशंकर परसाई, और यहां के सबसे बड़े कृषि विश्वविद्यालय तक ले चले अपने साथ। यात्रा हो और खाने की बात ना हो यह तो हो नहीं सकता था तो जबलपुर की विश्व प्रसिद्ध खोए की जलेबी का रसभीना जिक्र किया और बोले की पुण्य सलिला सदा नीरा नर्मदा नदी भारत की संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है यहां के कबूलिया व ददरिया लोकगीत बहुत मशहूर है, यह ओशो का शहर भी है और 81 योगिनियों का भेड़ाघाट और बंदरखोदनी के बिना जबलपुर की बात ही अधूरी रहेगी। वहां का ‘विवेचना नाट्य समूह’ जो प्रतिवर्ष दो नाट्य समारोह आयोजित करता है।

तिवारी जी ने सुभद्रा कुमारी चौहान के बसंत पर लिखी पंक्तियां गुनगुनायी यह वो समय था जब जलियाँवाला बाग का जलजला आ चुका था, तब सुभद्रा कुमारी चौहान लिखती है ‘बसंत’ नाम की कविता-
हे प्रिय ऋतु राज तुम धीरे से आना।
यह शोक स्थान है यहां शोर मत मचाना

पुणे से आई वेदैही ने अपने शहर पुणे पर बात शुरू करते ही कहा कि –मेरा शहर नहीं बदलता है
गहन शोध के साथ उन्होंने अपनी बात खूब विस्तार से आधिकारिक तौर से रखी। आज का विषय शहरों की यात्रा था उन्होंने पुणे की यात्रा के साथ व्यतीत हो चुके अतीत की यात्रा करवा दी। सातवीं नवीं सदी पीछे ले जाकर…फिर 1919 से शुरू हुई बात को बहुत ही ऐतिहासिक तथ्यों के साथ सिलसिलेवार रखते चले जाना अभिभूत करता गया। वे कहती हैं कि हम शास्त्र वाले लोग हैं यदि यह पुणे वासी कोई दावा करते भी है तो सही करते हैं। गजानन अभियंकर के वाङे से शुरू हुई बात पेशवाओं के समय तक आती है। नाना साहब फङनवीस, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, रमाबाई रानाडे तक पहुंची और सही कहा उन्होंने नारी शिक्षा व सम्मान की अलख पुणे में जैसी जगाई इन महान विभूतियों ने, उसी का परिणाम है कि वहां आज शिक्षा का जगरमगर करता उजास हर जगह देखा जा सकता है। यहाँ तक की वहाँ एक रिक्शा वाला भी कुसुमाग्रज की कविताएँ सुना सकता है, वो पूरा अखबार रोज पढता है।अपनी बात सख्ती से रखना हर पुणेवासी जानता है। यह शहर बगावतियों का भले हो किंतु यहां प्रखर तत्ववाद चलता है। कलाओं में भी शास्त्रीयता होनी जरूरी है, ‘एवरीथिंग क्लासिकल’। हमारे यहां खानपान कुछ भी प्रसिद्ध नहीं हैं क्योंकि हमारा मन तो कभी खान-पान में रमा ही नहीं, हमें तो वाद- विवाद में रस आता है, पढ़ने में आनंद आता है, और तुकाराम का जिक्र किए बिना पुणे की बात अधूरी होगी।
बात यात्रा की थी संयोग से कजाकिस्तान की एक युवती आईग्राम सभागृह में थी। अपनी प्यारी सी बेटी सूफिया को गोद में लिए हुए बड़ी सहजता से मंच पर आई और बहुत ही अच्छी हिंदी में बोली कि- मैं नॉनस्टॉप बात कर सकती हूं इतनी ढेर सी बातें मेरे अंदर भरी है। मैं 16 साल से भारत में हूं। सेंट्रल एशिया के बीच एक छोटा सा शहर आर्कलिक अक्षु AKSU हैl जहां सभी तरह के खनिज बहुतायत से होते हैं और हर जगह के लोग आते हैं। हमारा शहर मैग्नेट जैसा है। आईग्रीम ने बड़े पते की बात कही कि कभी कभी छोटा शहर बड़े मौके दे देता है। उन्होंने अपने शहर की एंबेसी में काम शुरू किया और एक डांस ग्रुप बनाया। इंडियन एंबेसी की तरफ से उन्हें इंडिया आने का मौका मिला। वे दिल्ली आईं तो उन्हें लगा कि किसी पिछले जन्म में जरूर यहीं जन्मी थी। यहां के लोग बहुत अच्छे हैं। वे सोलह साल से भारत में पढ़ाई कर रही हैं। बेंगलुरु में योग सीखा। लॉकडाउन के समय केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा में हिंदी पढ़ने का मौका मिला।

इंदौर से आई मेघा ने मुंबई पर बड़े खूबसूरत अंदाज में ‘शहर का शोर’ नाम से कविता सुनाई ।
तेज तेज रहो तेज नहीं तो मत रहो
यहां सभी व्यस्त हैं जिंदगी से त्रस्त हैं
और उसके बाद अपनी जन्मभूमि इंदौर पर भी कविता के रूप में ही अपने भाव व्यक्त किये–
दुनिया चांद पर है
अब भी विवाद नाम पर है
मेरा महबूब चाँद था
मैं शर्मा वो खान था
बच्ची से दिखने वाली मेघा की कविता के शब्द कटु सच्चाई और मारक अर्थो से भरे थे और उसका पढ़ने का अंदाज बेहद प्यारा था। आज की यात्रा अपने गंतव्य पर पहुंच चुकी थी लेकिन ऐसी ही और यात्राओं की इच्छा जगा कर।

--- श्रीमती निर्मला जी डोसी

चौपाल श्री अमृतलाल जी नागर पर15 मार्च 2026 , रविवार, भंवस
17/03/2026

चौपाल श्री अमृतलाल जी नागर पर
15 मार्च 2026 , रविवार, भंवस

*14 दिसम्बर की चौपाल के रंग लघु कथाओं और दादरा ठुमरी के संग*((स्थल: कविता गुप्ता जी का कवितांगन))जाने माने मंच संचालक व ...
18/12/2025

*14 दिसम्बर की चौपाल के रंग
लघु कथाओं और दादरा ठुमरी के संग*
((स्थल: कविता गुप्ता जी का कवितांगन))
जाने माने मंच संचालक व व्यंग्यकार श्री सुभाष काबरा जी के जीवंत मंच संचालन में यज्ञ शर्माजी के सुपुत्र उन्मेष जी ने यज्ञ जी की रचनाओं से शुभारंभ किया,तो बड़ौदा के मिथिलेश बारिया जी ने अपने वनलाइनरो से खूब समां बांधा। आदरणीया कविता गुप्ता ने खलिल जिब्रान की बेहतरीन रचनाएं पढ़ीं और अशोक बिंदल जी ने इब्ने इंशा की। मुझे हरिशंकर परसाईजी जी की रचनाएं पढ़ने का अवसर मिला और विनीता यादव ने शरद जोशी जी की रचनाओं का पाठ किया। मधुबाला शुक्ल जी ने मीनू त्रिपाठी की एक पुरस्कृत रचना पढ़ी तो अभिनेता राजेन्द्र गुप्ता जी ने नेहरू पर एक रचना पढ़कर सभा को ऊंचाईयों तक पहुंचा दिया।
दूसरे सत्र में अनिका अग्रवाल,पायल मलिक और विदुषी रंजना रतनजी ने दादरा ठुमरी की वो चुनिंदा रचनाएं सुनाईं,जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर गई।
आबिद सुरती जी और प्रेम जनमेजय जी , दीप्ति मिश्र जी सहित शहर के अनेक साहित्य प्रेमियों का सानिध्य बहुत सुखद रहा।

आदरणीय सुभाष काबरा जी की रिपोर्ट

चौपाल, 16 नवम्बर 2025सलिल चौधरी जन्मशती कार्यक्रमसलिल चौधरी भारतीय संस्कृति, सिनेमा और साहित्य के एक बेहद महत्वपूर्ण हस्...
24/11/2025

चौपाल, 16 नवम्बर 2025
सलिल चौधरी जन्मशती कार्यक्रम

सलिल चौधरी भारतीय संस्कृति, सिनेमा और साहित्य के एक बेहद महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं. इसलिये भी के आज़ादी से पूर्व और बाद में भी कैसे उन्होने अपनी रचनात्मक्ता को केवल मनोरंजन तक ही सीमित ना रखते हुए सामाजिक जन-चेतना का माध्यम बनाया

16 नवम्बर की भवंस कॉलेज में आयोजित चौपाल की यह शाम पूरी तरह सलिल चौधरी की सौ वर्ष की सांस्कृतिक यात्रा को समर्पित थी। कार्यक्रम की संकल्पना और संयोजन, मुंबई की शर्मिष्ठा बसु ने जयपुर के पवन झा के साथ किया। सलिल दा के व्यक्तित्व की कल्पना करें तो एक शांत कुलीन सा चेहरा, बेचैन निगाहें जिनमें रचनात्मकता की अनहद गहराई नजर आती थी।

अस्वस्थता के कारण पवन झा कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो सके। उनके स्थान पर बेंगलुरु से आए गौरव शर्मा और पुणे से आए कल्याण सुंदरेश्वरम ने बेहद खूबसूरती से पूरे कार्यक्रम में सूत्रधार के रूप में संचालन संभाला। दोनों की तैयारी और प्रस्तुति से स्पष्ट था कि वे सलिल दा के संगीत को कितनी गहराई से जानते और महसूस करते हैं। जैसे उनके भीतर यह संगीत पहले से ही बसा हुआ था।

प्रारंभिक जीवन और प्रभाव

सलिल चौधरी का जन्म 19 नवम्बर 1925 को बंगाल के चौबीस परगना के एक छोटे से गाँव में हुआ। उनके पिता असम के चाय बागानों में काम करते थे। बागान के लोकगीत, प्रकृति की ध्वनियाँ और आसपास का लोकसंगीत बचपन में ही सलिल दा के भीतर उतरता चला गया। यही वातावरण उनकी प्रतिभा को आकार दे रहा था।

परिवार में भी कला का वातावरण था। चचेरे भाई निखिल चौधरी मूक फिल्मों के लिए थियेटर में ऑरकेस्ट्रा का संचालन करते थे, और बालक सलिल ने अपनी संगीत यात्रा की शुरुआत इसी ग्रुप के साथ बहुत से किस्म के वाद्यों को बजाने के साथ प्रारम्भ की।

स्वतंत्रता आंदोलन, मजदूर संघर्ष और जनगीतों की गूँज ने युवा सलिल के भीतर सामाजिक चेतना जगाई। सलिल दा के पिता , डॉक्टर ज्ञानेंद्र ने उस वक्त ब्रिटिश ऑफिसर के अन्याय का जमकर प्रतिकार किया था,उसका असर सलिल दा पर भी था कॉलेज में पहुँचते ही उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी जॉइन की और IPTA से जुड़कर जनसंवेदना वाले गीत और धुनें रचीं। बंगाली सिनेमा में कोरस के प्रयोग को उन्होंने नई दिशा दी।

संगीत यात्रा की शुरुआत

सत्येन बोस की एक बंगाली फिल्म परिबर्तन से उन्हें पहला अवसर मिला, वह भी कठिन परिस्थितियों में और उनके सिनेमा के लिये रचे पहले गीत का रेयर वीडियो कार्यक्रम में प्रस्तुत किया गया। कई बार क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण उन्हें अंडरग्राउंड रहकर काम करना पड़ा।

वरिष्ठ संगीतकार कुलदीप सिंह ने सलिल दा की वाद्य-प्रतिभा और IPTA के दौर की यादें साझा कीं। कुलदीप जी सलिल दा का गीत गुनगुनाते बोले कि इप्टा के प्रणेता सलिल दा पर हमें गर्व है और सलिल दा के अनेक वाद्यों कोआधिकारिक रूप से बजाने की अर्हता तथा वायलिन बजाने की घटना का जिक्र किया कि किस तरह वायलिन बजा कर उन्होंने भीड़ इकट्ठी कर ली।



मंच पर उनकी युवा शिष्य मंडली ने जन चेतना के स्वरों के सलिल चौधरी के इप्टा और यूथ कॉयर के लिये संयोजित बेहद विशिष्ट कॉयर गीतों की झड़ी से बेहतरीन प्रस्तुति दी जिसे ऑडिटोरियम मे उपस्थित दर्शकों की बहुत सारी वाहवाही मिली| साथ में समय समय पर दोनो संचालकों ने दुर्लभ तथ्य बताए जिनसे प्रस्तुति और समृद्ध होती गई।

फिल्म संगीत में योगदान

सलिल दा की संगीत यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब 1953 में महान फ़िल्मकार बिमल रॉय ने सलिल चौधरी की कहानी रिक्शावाला पे फ़िल्म बनानेका निर्णय किया और फ़िल्म में संगीत्के लिये सलिल चौधरी मुम्बई का बुलावा भेजा. वो फ़िल्म थी कालजयी दो बीघा ज़मीन, जो भारतीय सिनेमा के इतिहास में मह्त्वपूर्ण मिल का पत्थर बनी. ‘आर.के. फ़िल्म्स’ की ‘जागते रहो’ में ‘जागो मोहन प्यारे’ उनके संगीत का महत्वपूर्ण पड़ाव था।

अभिजीत घोषाल, शर्मिष्ठा बसु, उद्भव ओझा, राजा सेवक, और चौपाल में पहली बार प्रस्तुति दे रही पावनी पांडेय और पूजा ठक्कर ने उनकी यात्रा को आरंभ से अंत तक गीतों के सिलसिले में पिरोया। मंच के दोनों ओर साजिंदों ने कार्यक्रम को नई ऊँचाई दी। तबले पर कौशिक बसु, ढोलक पर जंयतो भट्टाचार्य, पैड पर विशाल मोहिते, की-बोर्ड पर मानस चौधरी और ऋषिकेश राधेकर तथा गिटार पर ऋषि सिंह थे। संगीत संयोजन अशोक पंवार ने संभाला।

यह भी बताया गया कि सलिल दा जहाँ जाते, वहाँ की ध्वनियाँ, स्थानीय सुर और संस्कृति अपने गीतों में समाहित कर लेते। इसी कारण उनके संगीत में बंगाली, असमी, कोंकणी और कई अन्य क्षेत्रों की सुगंध मिलती है।

‘मधुमति’ और शैलेंद्र से संबंध

1958 की ‘मधुमति’ भारतीय सिनेमा के श्रेष्ठ एल्बमों में से एक मानी जाती है। यहाँ धुन पहले बनी, शब्द बाद में लिखे गए, जैसे ‘आजा रे परदेसी’। शैलेंद्र और सलिल दा का रिश्ता गहरा था। कार्यक्रम में शैलेंद्र की बेटी अमला शैलेंद्र मजूमदार विशिष्ट अतिथि के तौर पर दुबई से आईं थीं । जिन्हें बचपन में सलिल चौधरी को अपने पिता के साथ करीब से देखने का मौका मिला और ताउम्र सलिल चौधरी का परिवार उनके परिवार समान ही रहा। उन्होंने बताया कि सलिल दा के गीतों में हर शब्द अर्थपूर्ण होता था और यह भी कि दोनों ने मिलकर एक प्रसिद्ध लावणी रची थी – ‘मुंबई नगरी बहुत पुरानी’।

नासा के वैज्ञानिक और फ़िल्मकार डॉं. वेदव्रत पेन ने संगीत और गणित के बीच सुंदर समानता की बात कही और अपनी प्रस्तुति में सलिल चौधरी के गीतों के सुरीले स्वर भी साझा किये|

इसके बाद छोटी बच्ची अंतरा गुहा ने ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाये’ हिन्दी और बंगाली में गाकर माहौल को और मधुर बना दिया। और फ़िल्म आनन्द के गीतों की इस मनमोहक प्रस्तुति में उनके साथ थे चौपाल के दो वरिष्ठ और विशिष्ट स्वर उद्भव ओझा और राजा सेवक।

अनसुनी फिल्में और विविधता

सलिल दा ने चार सौ से अधिक गीत और कविताएँ लिखीं। कुछ फिल्मों के गाने लोकप्रिय हुए, भले फिल्में रिलीज नहीं हुईं, जैसे ‘बल्लभपुर की लोककथा’ पे आधारित बासु भट्टाचार्या की फ़िल्म ’आनन्द महल’ जिसका बेहद खूबसूरत गीत चौपाल के चिर-परिचित और लोकप्रिय गायक अभिजीत घोषाल ने प्रस्तुत किया । 1970 के दशक में जब फिल्म संगीत पर अन्य रुझान हावी थे, उस समय ‘रजनीगंधा’ और ‘छोटी सी बात’ के उनके गीत अलग ही चमक लिए हुए थे| राजा सेवक ने का गाया रजनीगंधा फूल तुम्हारे और पावनी पांडे का गाया ‘ना जाने क्यूं’ सलिलदा के साथ साथ लता जी को भी एक बेहतरीन श्रद्धांजली थी। उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं में भी बहुत काम किया और बैकग्राउंड म्यूजिक में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका मानना था कि संगीत में प्रेरणा कहीं से भी ली जा सकती है क्योंकि यह किसी की बपौती नहीं होती। इस संदर्भ में कई गीत सुनाए गए। सभी गायकों ने मिलकर हृदयनाथ मंगेशकर की प्रसिद्ध मराठी रचना मी डोलकर राजा की प्रस्तुति भी दी जिसका बंगाली गीत सलिल चौधरी ने लिखा था

समापन की झलक

साढ़े चार घंटे की इस चौपाल को यादगार बनाने में सबसे बड़ा योगदान दिया शर्मिष्ठा बसु ने, जिन्होने तीन महीने से ज्यादा की मेहनत से इस शाम को जीवंत बना दिया, वो गानों का चयन हो या कलाकारों का. इस चौपाल की एक खास याद ये भी रही के जब शर्मिष्ठा ने सलिल दा की खोई फ़िल्म संगत के बेहद खूबसूरत गीत ’कान्हा बोले ना’ को गीत के रेयर वीडियो के साथ प्रस्तुत किया तो पता लगा के फ़िल्म की नायिका कजरी दर्शकों के बीच में ही उपस्थित हैं। शर्मिष्ठा ने अपनी पति प्रसिद्ध तबला वादक कौशिक बसु के साथ जब फ़िल्म परिवार का दुएट ’जा तोसे नहीं बोलूं कन्हैया प्रस्तुत किया तो हॉल दर्शकों की तालियों से गूंज उठा। गौरव शर्मा और कल्याण के द्वारा साझा मज़ेदार जानकारी ने भी दर्शकों को चकित किया और सलिल चौधरी की रचना यात्रा के कई अनूठे पहलुओं से अवगत कराया ।

उद्भव ओझा ने अपने मस्त अंदाज़ में सलिल चौधरी के कॉमिक गीत प्रस्तुत कर शाम को एक अलग ही रंग में रंग दिया. कुएं में कूद के मर जाना, और फिर राजा और अभीजीत के साथ गुलज़ार सब की पहली फ़िल्म मेरे अपने का ’हाल चाल ठीक ठाक है’ प्रस्तुत कर सभागार में सबके चेहरों पर हंसी ला दी।

कार्यक्रम के अंत में सलिल दा के कॉमिक गीतों पर भी चर्चा हुई और फिर सभी कलाकारों ने एक साथ ‘बिछुआ डँस गयो रे’ प्रस्तुत किया। पूरा सभागार सुर और ताल में डूबा रहा। SP जैन सभागार का वातावरण देर रात तक संगीत से गूंजता रहा।

खचाखच भरे सभागार में सलिल चौधरी के प्रशंसक लगातार ताल के साथ ताल और राग के साथ राग मिलाकर सरस सिंफनी रच रहे थे और संगीत की स्वर लहरियाँ उस दिन न केवल एसपी जैन सभागार बल्कि समूचे परिसर को आंदोलित करती प्रतीत हो रही थी। शाम 4:15 पर प्रारंभ हुआ कार्यक्रम रात 9 बजे समाप्त हुआ। संगीत वर्षा में सराबोर दर्शक, सलिल चौधरी के भारतीय संगीत में योगदान के बारे में नई जानकारी से समृद्ध होकर उन गीतों को गाते हुए इस अनिच्छा की भावना से घर की ओर लौटे के जैसे इस शाम का अन्त हो ही नहीं. चौपाल की कई यादगार शामों में सलिल चौधरी के नाम की ये शाम भी जुड़ गई।

– निर्मला डोसी
9322496620

Thank You! For making     Chaupaal a memorable one..
17/11/2025

Thank You! For making Chaupaal a memorable one..

चौपाल जुलाई --2025रिपोर्ट  :: निर्मला डोसीNirmala Doshi एक तहज़ीब की आवाज है उर्दू पिछले कई दिनों से महाराष्ट्र में भाषा...
15/07/2025

चौपाल जुलाई --2025
रिपोर्ट :: निर्मला डोसी
Nirmala Doshi

एक तहज़ीब की आवाज है उर्दू

पिछले कई दिनों से महाराष्ट्र में भाषाओं को लेकर बचकाना घमासान मचा हुआ है।सारी खींचातानी भाषा प्रेम की नहीं, राजनीति प्रेरित है इसे सब जानते हैं और ऐसे ही घनघोर विप्लवी समय में चौपाल अपनी मासिक गोष्टी उर्दू भाषा पर आयोजित करती है। प्रतिरोध दर्ज करवाने प्रतिबोध देने की चौपाल की अपनी शिष्ट और शालीन शैली रही है
‘समझने वाले समझ गए ना समझे वो अनाड़ी है ‘
हाँ तो जुलाई की वो शाम बड़ी खुशनुमा रही। सुबह से ही भगवान भास्कर बादलों की ओट में छुपे बैठे थे। घनघोर बारिश की संभावना दिख रही थी। रविवार छुट्टी का दिन भी था और शाम को भारत इंग्लैंड का क्रिकेट मैच का प्रलोभन भी कुछ कम नहीं था इस पर भी बड़ी संख्या में श्रौता भागते भीगते उपस्थित थे। विषय ही ऐसा था और चौपाल यादगार होगी यह सब बखूबी जानते थे क्योंकि सभी चौपाली उर्दू भाषा की समृद्धि से न केवल परिचित हैं बल्कि जबरदस्त शैदाई भी हैं। हुआ भी वही…. मन भरा ही नहीं तब संयोजक महोदय अशोक बिंदल को घोषणा करने पड़ी कि अगली चौपाल भी उर्दू पर होगी।
संचालन अतुल तिवारी के सधे हाथों में था जो स्वयं लखनऊ से हैं और उर्दू के जानकार भी हैं। कार्यक्रम का प्रारंभ गुलज़ार साहब के विडियो से हुआ।
गुलज़ार साहब ने बगुले के पंखों जैसी सुफेद शफ्फाक पोषाक धारे अपने भव्य व्यक्तित्व के साथ कशिश भरी खनकती आवाज में उर्दू पर एक नज़्म पेश की और यकीन मानें पाठकों ! आठ दस पंक्तियों की उस एक नज़्म में हर दिल अजीज उर्दू भाषा का पूरा ज्योगराफिया बयां करके सिद्ध कर दिया कि कम शब्द ख़र्च करके बोरी भर अहसास व्यक्त कर देने का हुनर जानते हैं वे, और इसलिए ही उनका कहा एक- एक लफ्ज़ कालजयी होता जा रहा है।
ये कैसा इश्क़ है उर्दू ज़बाँ का
मज़ा घुलता है लफ़्ज़ों का ज़बाँ पर
कि जैसे पान में महँगा क़िमाम घुलता है

ये कैसा इश्क़ है उर्दू ज़बाँ का
नशा आता है उर्दू बोलने में
गिलौरी की तरह हैं मुँह लगी सब इस्तेलाहें
लुत्फ़ देती है, हलक़ छूती है उर्दू तो, हलक़ से जैसे मय का घोंट उतरता है

बड़ी अरिस्टोकरेसी है ज़बाँ में
फ़क़ीरी में नवाबी का मज़ा देती है उर्दू
अगरचे मअनी कम होते हैं उर्दू में
अल्फ़ाज़ की इफ़रात होती है
मगर फिर भी, बुलंद आवाज़ पढ़िए तो बहुत ही मोतबर लगती हैं बातें

कहीं कुछ दूर से कानों में पड़ती है अगर उर्दू
तो लगता है कि दिन जाड़ों के हैं खिड़की खुली है, धूप अंदर आ रही है
अजब है ये ज़बाँ, उर्दू
कभी कहीं सफ़र करते अगर कोई मुसाफ़िर शेर पढ़ दे 'मीर', 'ग़ालिब' का
वो चाहे अजनबी हो, यही लगता है वो मेरे वतन का है

बड़ी शाइस्ता लहजे में किसी से उर्दू सुन कर
क्या नहीं लगता कि एक तहज़ीब की आवाज़ है, उर्दू

जावेद सिद्दीकी साहब ने अनेक नामचीन फिल्मों तथा नाटकों में पटकथा तथा संवाद लेखन किया है और तमाम विशिष्ट पुरस्कारों तथा सम्मानों से नवाजे जा चुके हैं। उन्होंने उर्दू के जन्म की कहानी विस्तार से बताते हुए कहा कि– उर्दू का जन्म भारत की धरती पर बारहवीं सदी से पंद्रहवीं सदी के बीच हुआ। ये वो समय था जब भारत पर विदेशी हमलावरों के हमले निरंतर होते रहे। उनकी सेनाओं में आमतौर पर फारसी, तुर्की, अरबी, उज़्बेक,तुर्केमनी,कजाखी,किरगिज,पश्तो,दारी,बलूची,पामीरी,नूरिस्तानी,ताज़िक आदि भाषाएं बोलने वाले सैनिक शामिल होते गए। युद्ध में भारतीय राजाओं को हराने के बाद सेनाएं भारत में रह गई तब उन सैनिकों को स्थानीय लोगों से मिलना- जुलना, खरीददारी के लिए मेल-जोल रखना शुरू हुआ और इस कारण स्थानीय पंजाबी, कौशुर, डोगरी, रुहेलखंडी, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, अवधी आदि देशज भाषाओं के शब्दों के मेल से से जो नई भाषा जन्मी उसे उर्दू पुकारा गया।

उर्दू शब्द मूलतः तुर्की भाषा का शब्द है। कालांतर में उर्दू में कविताएं भी लिखी जाने लगी। पंडित चंद्रभान बरहमन को उर्दू का पहला कवि माना जाता है जिन्होंने बाजार में बोली जाने वाली जन- भाषाओं में कविताएं लिखनी शुरू की। इसके बाद तो उर्दू में लिखने का जैसे फैशन ही चल पड़ा और बाद में मीर ,अनीश, ग़ालिब जैसे महाकवि हुए।
सन् सैंतालीस में पाकिस्तान का जन्म हुआ। इस देश की अपनी कोई भाषा नहीं थी तो उन्होंने उर्दू को अपनी राष्ट्रभाषा बनाया। दरअसल भारत के लिए यह फख्र करने की बात होनी चाहिए कि उसकी जमीन पर जन्मी भाषा को पड़ोसी मुल्क ने राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया है।
जावेद सिद्दीकी साहब की उर्दू की पुस्तक ‘खाके’ पर एक पूरी चौपाल हुई थी। ख़ाके नामामूली शख्सियतों के रेखा चित्रों की एक शानदार पुस्तक है जिसका हिंदी में अनुवाद ‘रोशनदान नाम से हुआ है। सिद्दीकी साहब ने नरम व संजीदा लहजे में अपने पैतृक गांव रामपुर से मुंबई आने की बात कहते हुए कहा कि- मुंबई में उन्हें बाहें फैला कर माँ की तरह समेट लिया
यह मुंबई अनाथों के सिर पर हाथ रखती है
गरीबों को रोजी-रोटी देती है
टैलेंट हो तो आंखों पर बैठाती है
उर्दू इसी मुल्क की बेटी है जो खड़ी बोली से बनी है। दिल्ली से आगरा तक बोली जाती है और इसे बोलने वाले समूचे भारत में है। इस भाषा का दामन बहुत बड़ा है जिसमें हर लफ्ज़ समा सकता है यहां तक की अंग्रेजी भी। दूसरी जबानों में यह खूबी नहीं है। किसी भी शब्द को रद्दोबदल किए बिना जस का तस अपना लेना उर्दू की खूबी है जो उसे ज्यादा विस्तार देती है। जावेद साहब ने बड़ी गहरी बात कही की उर्दू जिद (रिजिडियस) की कायल नहीं है यह उर्दू का सूफी स्वभाव है। जुर्म यह हुआ इसे मुसलमानों की भाषा कह दिया गया जो सरासर गलत था। कृष्णचंदर ,फिराक फिर प्रेमचंद जैसे अनेक लेखकों ने इसी भाषा में लिखा।उर्दू में जोड़ने की अद्भुत लियाकत है इस जबान को अपनाने में हमें ऐतराज़ क्यों होना चाहिए। उर्दू में लामहसूस मौसिकी है।कलम किसी जानकार के हाथ में हो तो लफ्ज़ लफ्ज़ नहीं रहते सुर बन जाते हैं।

प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना 1936 में हुई ‘प्रलेस’ ने बहुत से हीरे दिए हिंदुस्तान को उसमें नियाज़ हैदर एक थे जो बोहेमियन किस्म के आदमी थे बड़े ज़हीन थे। खाके पुस्तक में एक रेखा चित्र इन्हीं नियाज़ हैदर साहब पर लिखा हुआ है शीर्षक है ‘एक बंजारा’ जिसे पढ़ा सिद्दीकी साहब के फरजंद समीर सिद्दीकी ने।
श्रोताओं के लिए तय करना मुश्किल था कि वह रेखाचित्र कमाल का था या फिर कमाल पढ़ने वाले ने किया। समूचे सभागृह में सन्नाटा ऐसा पसरा कि किसी ने पहलू तक नहीं बदला। अलबत्ता नियाज़ हैदर की जीवन शैली पर ठहाके जरूर लगे। वह चमत्कार कलम का था या कँठ का…. बहरहाल जो भी घटा वह अजूबा रहा। पिता के लिखे लफ़्ज़ों को पुत्र ने उतनी ही शिद्दत से अपनी गुरु गंभीर आवाज में पढ़ कर जीवंत कर दिया उस बोहेमियन शायर को।
अब चौपाल के नियमित गायक अभिजीत घोषाल ने गुलजार साहब की कंपोजिशन से शुरू किया।
तुम्हारे गम की डली उठाकर जुबान पर रख ली देखो मैंने…….. गम की डली को जुबान पर रखने का काम गुलजार के अतिरिक्त किसी और के वश का है भी नहीं। ऐसी अद्भुत नई नकोरी कल्पना वही कर सकते हैं। उसके बाद अभिजीत ने कुछ अपनी कंपोजिशन भी पेश की–
उम्मीद है पानी पानी ख्वाब है रेज़ा रेज़ा
झीनी हो रही मेरी चदरिया शायद रूठा है रंगरेज़ा
तबले पर कौशिक दा और की- बोर्ड पर प्रतीक भाई ने खूब संगत की।
अतुल जी ने अकबर इलाहाबादी का परिचय देते हुए बताया की उनका पूरा नाम सैयद अकबर हुसैन रिज़वी था, उन्होंने ‘गांधीनामा’ नाम की ग़ज़ल उस वक्त लिखी थी जब गांधीजी प्रसिद्ध भी नहीं हुए थे।अकबर इलाहाबादी पर बोलने के लिए स्कॉलर, हिस्टोरियन, शायर, सिक्कों पर शोध करने वाले संजय गर्ग आए। जिन्होंने लोकप्रिय शायर अकबर इलाहाबादी के बारे में बोलते हुए कहा कि उर्दू शायरी में पहले हास्य व्यंग्य के छोटे-छोटे पौधे लगाए थे कुछ शायरों ने, किंतु इलाहाबादी ने उस सरजमीं को जोत करके पूरी खेती ही कर दी। यह भाषा इबारत में भले आसान लगे किंतु मानी में मुश्किल तो है, और अकबर इलाहाबादी ने उर्दू में नए-नए मानी निकाले,अब तक जिन्हें मजाकिया शायरों के तौर पर जानते थे उन्हें बड़ा मकाम दिया और वे मज़ाहिया शायर कहलान लगे। उन्होंने कहा कि अकबर इलाहाबादी ने सामाजिक, सियासी, मज़हबी, दकियानूसी विषयों पर बेशुमार लिखा है।गुलाम अली ने गायी यह नज़्म…
हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो पी ली है
संजय गर्ग ने अकबर इलाहाबादी के अनेक किस्से और उनकी शायरी पर दिलचस्प बातें बताई।अपनी बेबाकी के लिए कहते हैं।
एक बुरी शै है अकबर
जो दिल में आए कह देता हूँ
तारिक हमीद ने शौकत थानवी का लिखी ‘बे’ नाम की हास्य नाटिक प्रस्तुत की जो उन्होंने लॉकडाउन के दौरान तैयार की थी। इस छोटी सी नाटिका में बाकमाल अदाकारी दिखाई कलाकार ने और जिसका मूल स्वर अंधविश्वास था कि ‘बे’ शब्द अपसकुनी है उससे बचो, उनसे कहा गया। लाख कोशिशों के बाद भी ‘ब’ बचना चाह कर भी वे बच नहीं पाए। अंत में लुप्त होती भाषाओं की तरफ इशारा करते हुए तारिक हमीद बोले कि-
वीरान है मेरा घर इस तरह दोस्तों
कॉलेज में जैसे कोई उर्दू क्लास हो
इस बात पर अतुल तिवारी ने कहा कि हमारे सामने हजारों बोलियां मर रही है और उनके लुप्त होने के कारण अलग-अलग है। अशोक स्तंभ जैसे राजकीय चिन्ह पर क्या लिखा है 150 वर्ष पहले तक हमें पता तक नहीं था क्योंकि हम वो लिपि जानते ही नहीं थे। उस लिपि को ना कोई पढ़ने वाला था और ना समझने वाला था। सिंधु घाटी में मिले अवशेषों की भाषा आज तक नहीं पढ़ी जा सकी है। उर्दू का मसला दूसरा है। कभी उर्दू जबान तो सुलह का पयाम थी।
दिल्ली में रहने वाले मशहूर साहित्य पत्रकार टीवी फिल्में कविताएं और अनेक क्षेत्रों में कार्यरत आलोक श्रीवास्तव विशेष रूप से चौपाल के लिए दिल्ली से आए। अपनी प्रभावी वक्तत्व शैली का परिचय देते हुए बेहद दुर्लभ जानकारियां दी और अमीर खुसरो कबीर के उम्दा कलाम पेश किये। पेंगुइन पब्लिकेशन से आयी उनकी दूसरी पुस्तक ‘आसान’ की मुंहदिखाई किसी वजह से नहीं हो सकी। इससे पहले ‘आमीन
आ चुकी है।उर्दूपर बोले कि
बात करो तो लफ्जों से भी खुशबू आती है
लगता है उसे लड़की को भी उर्दू आती है
हमने भी तो दिल जीते मीठे लफ्जों से
हम कायस्थों को भी थोड़ी उर्दू आती है’
फिर बोले आलोक कि
पॉलिटिक्स में जितनी पॉलिटिक्स नहीं है
उतनी अदब में पॉलिटिक्स है
अंत में चौपाल पर कहा कि–
जो हमें तुम में हुई मोहब्बत तो देखो कैसा हुआ उजाला मोहब्बतें कोई दुकां नहीं है वतन नहीं है मकां नहीं है
इस तरह उर्दू की शीरीं चाशनी से सरोबार चौपाली अगले महीने की खुशगवार आस के साथ विदा हुए ।

चौपाल 15 जून 2025       चौपाल को लगा अठाईसवाँपंद्रह जून के दिन सुबह से ही  काले कज़रारे बादलों ने सूरज को अपनी ओट में ले...
17/06/2025

चौपाल
15 जून 2025
चौपाल को लगा अठाईसवाँ
पंद्रह जून के दिन सुबह से ही काले कज़रारे बादलों ने सूरज को अपनी ओट में ले रखा था और घनघोर बरस रहे थे। ऐसे खूबसूरत दिन घर से निकलने का आनंद क्या होता है चौपाली बखूबी जानते हैं और इसीलिए ही खचाखच भरा था भवंस कॉलेज का सभागृह। चौपाल की वर्षगांठ मनाने तो पहुँचना ही था भले आंधी हो या तूफान, उस दिन आगुंतकों में युवा श्रोताओं से ज्यादा उम्र दराज़ लोग थे कदाचित वे चौपाल को आशीर्वाद देने आए थे।
भवंस कालेज के भव्य केंपस में नहाए- धोए, हरे रंग के वस्त्र धारे सारे पेड़- पौधे जोर-जोर से गर्दन हिलाकर आगुंतकों का स्वागत कर रहे थे।

कार्यक्रम का संचालन करने के लिए अतुल तिवारी कमर कसे तैयार थे। सुभाष काबरा की ताज़ा तरीन व्यंग्य रचना से शुरुआत हुई। अभिजीत घोषाल भी आज के लिए नई तैयारी करके आए थे। शबरी और राम- कथा में संगीत के मोती पिरोकर बेहद सुंदर प्रस्तुति दी। मनजीत सिंह कोहली ने एक शानदार कविता पेश की और राजेंद्र गुप्ता ने नरेश सक्सेना की विख्यात कविता ‘चंबल एक नदी का नाम’ को इतने भावपूर्ण तरीके से पढ़ा कि कविता अपने पूरे अर्थ के साथ श्रोताओं के कलेजे में ठक् से जाकर बजी। अक्षरों का क्षरण कभी होता नहीं पर उन्हें जीवंत कर देने का हुनर जानते हैं गुप्ता जी। वे स्वयं कविता के मर्म में उतने गहरे उतर जाते हैं जितना कि उसका रचयिता लिखने के वक्त उतरता होगा।

उस दिन ‘फादर्स डे’ था इसलिए यूनुस खान ने अपनी जानकारियोँ का पिटारा खोला तथा अनेक लोकप्रिय फिल्मी बाप- बेटों की जोड़ियों का इतिहास खंगाल डाला जो सबके लिए नया और दिलचस्प था।

पुष्पा भारती जी को शाॅल व पुष्प गुच्छ देकर कविता गुप्ता तथा बिंदल जी ने सम्मान किया तथा उनको जन्मदिन की शुभकामनाएं दी। वे इस स्नेह से गदगद हो गई और उन्होंने अपने जन्मदिन पर उपहार स्वरूप मिलने वाली भारती जी की कविताएँ सुनाईं ।
लोकप्रिय संगीतकार कुलदीप जी और उनकी होनहार शिष्य मंडली अब मंँच पर थी। वे हारमोनियम पर और शंकर नंदी तबले पर, फिर तो बाहर मेघ बरस रहे थे और सभागृह में झड़ी लग गई दुष्यंत कुमार ,नज़ीर अकबराबादी ,कबीर ओर मीरा के कालजयी गीतों की। उनकी तैयार की हुई कंपोजिशन पर पूरा सभागृह झूमते हुए संगत कर रहा था।
यह संयोग ही था कि चौपाल के सताईस वर्षों पर लिखे रिपोर्ताज की पुस्तक ‘चौपाल एक रंग अनेक’ (संकलनकर्ता निर्मला डोसी) पिछले सप्ताह ही आई है। यकीनन पुस्तक के भाग्य में ऐसे गुणी लोगों के हाथों का पारस स्पर्श पाना बदा था।

मंच पर पुष्पा भारती, जावेद सिद्दीकी, आबिद सुरती, राजेंद्र गुप्ता, अशोक बिंदल, अतुल तिवारी, कविता गुप्ता, ललित भाई शाह, कुलदीप सिंह, लट्टू भाई जी, निर्मला डोसी और शिप्रा भाटी की गरिमामय उपस्थिति से मँच समृद्ध हुआ।पुस्तक का खूबसूरत आवरण बनाने वाली उदयपुर की शिप्रा भाटी स्वयं उदयपुर से आईंं।
निर्मला डोसी ने पुस्तक लिखने की वजह पर प्रकाश डाला तथा चौपाल का सताईस वर्षों का लेखा जोखा विस्तार से पेश किया।

उन्हें चौपाल की बैठकों के रिपोर्ताज को पुस्तक के स्वरूप में लाने का विचार अखबार की एक खबर पढ कर आया। एक जनवरी 2023 में एक खबर छपती है कि ‘रूदाद- ए -अंजुमन- नाम की एक पुस्तक ‘लोकमित्र प्नकाशन’ से आई है।
दरअसल ‘रूदाद-ए- अंजुमन’ मुंबई के लेखकीय समाज और उसके जलसों पर लिखी किताब है। जो प्रगतिशील लेखक संघ की मुंबई शाखा के क्रिया-कलापों का कमाल का मंजर प्रस्तुत करती है।

किसी गोष्टी या साहित्यिक समारोह में जो कहा जाता है वह सिर्फ गिनती के श्रोताओं तक ही रह जाता है, जबकि वे तमाम बातें लिपिबद्ध हो जाए तो लाखों पाठकों तक पहुंचती है और वे दस्तावेज़ ऐतिहासिक बन जाते हैं और यही बात इस पुस्तक को लिखवाने का केंद्र बिंदु बनी, उन्होंने चौपाल के सताईस वर्षों की रिपोर्ताज के रूप में उपलब्ध सामग्री को संकलित करके पुस्तक का स्वरूप दिया और कहा कि इसका मोल समय की तुला पर चढ़ कर ही तय होगा फिलहाल तो इसे लिख कर संरक्षित कर लिया है क्योंकि लिखा हुआ रह जाता है बाकी सब है जाता है।
जावेद सिद्दीकी साहब ने भी ‘रूदाद-ए- अँजुमन’ पर कहा कि किस तरह प्रलेस की मुंबई इकाई सर्वाधिक सक्रिय थी और यहाँ देश के शीर्ष संस्कृति कर्मी जुड़ते थे और उन्हीं की कड़ी कसौटी पर रचनाएं चढ़ती थी और धार पाया करती। उन्होंने कामना की कि वैसा ही माहौल फिर से बनाए जाने की जरूरत है।

विश्वनाथ सचदेव जी की दो कविताओं ने बड़े पशो-पेश में डाल दिया कि उनका अनुशासन प्रिय पत्रकार का रूप ज्यादा प्रखर है या फिर संवेदनशील कवि का कद ज्यादा बड़ा है।यकीनन उन्होंने वक्त भले ज्यादा पत्रकारिता को दिया होगा मगर लोकप्रियता तो एक कविता पढ़कर ही जुटा लेते हैं फिर उस दिन तो दो गजब की कविताएं अपनी धीर गंभीर मुद्रा में पढ़कर रग-रेशे को झनझना दिया। पहली कविता
‘नहीं गया मैं लौटकर कभी टोबा टेकसिंह’
मंटो की कहानी ‘टोबा टेकसिंह की याद दिलाने के लिए काफी थी और दूसरी सामायिक कविता ‘साझा सच’ को तो बार-बार पढ़ा जाना और पढ़ाया जाना जरूरी है आज के विकट समय में।
बड़ी सहजता से कवि पूछते हैं कि
तब मैं ना था
तब तुम ना थे
बस हम थे
जो मेरा था वह तेरा था
इतनी सी सरल बात को समझाना और समझना कितना मुश्किल हो गया है।
चार घंटे से ज्यादा धूनी रमा कर बैठे श्रोता भूल गए थे कदाचित कि इन बरसते मेघों में ही उन्हें घर भी जाना है और इस सभागृह को खाली भी करना है।
संगीत से चौपाल के समापन की परंपरा का निर्वहन करते हुए अनिका अग्रवाल का शर्मिष्ठा बसु ने ‘चश्मेंबद्दूर’ का ‘कहां से आए बदरा’ तथा ‘गुड्डी’ फिल्म का ‘बोले रे पपिहरा’ सुना कर कार्यक्रम को संपन्न किया। इस तरह चौपाल के अट्ठाईसवें में प्रवेश का दिन यादगार गया।
निर्मला डोसी

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