Akhil Bharatiya Vanvasi Kalyan Ashram

Akhil Bharatiya Vanvasi Kalyan Ashram Akhil Bhartiya Vanvasi Kalyan Ahram is a voluntary social organisation serving for the development of

भारत के 80वे  #स्वतंत्रतादिवस की देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं...!
15/08/2026

भारत के 80वे #स्वतंत्रतादिवस की देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं...!

09/08/2026
राष्ट्रमंडल खेलों में दिलीप गावित को स्वर्णपदक !!राष्ट्रमंडल खेल 2026 में पुरुष पैरा 100 मीटर (T47) स्पर्धा में दिलीप मह...
30/07/2026

राष्ट्रमंडल खेलों में
दिलीप गावित को स्वर्णपदक !!

राष्ट्रमंडल खेल 2026 में पुरुष पैरा 100 मीटर (T47) स्पर्धा में दिलीप महादू गावित ने 10.71 सेकंड के नए गेम्स रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। वे राष्ट्रमंडल खेलों की एथलेटिक्स स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले भारत के पहले पुरुष पैरा एथलीट बन गए हैं।

वहीं मोहम्मद बासिल ने 10.83 सेकंड का समय लेकर रजत पदक जीतकर भारत का गौरव और बढ़ाया।

दिलीप महादु गावित नासिक जिले के सुरगाणा तहसील में स्थित तोरण डोंगरी गांव के निवासी है। कोंकणा जनजाति मैं जन्मे दिलीप का एक हाथ पेड़ पर से गिरने से गहरे जख्म के कारण तोड़ना पड़ा था। इसके बाद भी उन्होंने हिम्मत ना हारते हुए यह यश संपादन किया है।

दिलीप महादू गावित और मोहम्मद बासिल की यह शानदार उपलब्धि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। दोनों खिलाड़ियों को वनवासी कल्याण आश्रम की ओर से हार्दिक बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य के लिए अनंत शुभकामनाएँ। विश्वास है कि वे आगे भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का तिरंगा इसी प्रकार ऊँचा लहराते रहेंगे।

🇮🇳 जय हिंद!

कातकरी समाज के प्रथम डॉक्टरेट बने डॉ. रविंद्र भुरकुंडेमहाराष्ट्र के पालघर जिले के वाड़ा तहसील स्थित सापने गांव के निवासी...
27/07/2026

कातकरी समाज के प्रथम डॉक्टरेट बने
डॉ. रविंद्र भुरकुंडे

महाराष्ट्र के पालघर जिले के वाड़ा तहसील स्थित सापने गांव के निवासी श्री रविंद्र भुरकुंडे ने कातकरी समाज के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ते हुए पीएचडी (डॉक्टरेट) की उपाधि प्राप्त की है। वे कातकरी समाज के प्रथम व्यक्ति हैं जिन्होंने डॉक्टरेट की उपाधि अर्जित कर इस विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के लिए एक प्रेरणादायी कीर्तिमान स्थापित किया है।

मुंबई विद्यापीठ से एम.ए. की शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात उन्होंने पहले राज्य पात्रता परीक्षा (SET) उत्तीर्ण की और उसके बाद पीएचडी के लिए प्रवेश लिया। वर्षों के कठोर परिश्रम, गंभीर अध्ययन और अनुसंधान के फलस्वरूप उन्होंने "आधुनिक महाराष्ट्र का कातकरी समुदाय : एक ऐतिहासिक अध्ययन (इ.स. 1972 से 2006)" विषय पर मराठी भाषा में अपना शोधकार्य पूर्ण कर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

डॉ. रविंद्र भुरकुंडे का व्यक्तित्व केवल शैक्षणिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। उनका मूल स्वभाव सामाजिक कार्य का रहा है। कातकरी समाज के स्थानांतरित (माइग्रेंट) परिवारों के बच्चों की शिक्षा बाधित न हो, इसके लिए उन्होंने छात्रावास की स्थापना कर शिक्षा और संस्कार का महत्वपूर्ण कार्य प्रारंभ किया।

इसी सेवा-कार्य के दौरान उनका परिचय वनवासी कल्याण आश्रम से हुआ। वर्तमान में वे वनवासी कल्याण आश्रम, महाराष्ट्र की प्रांत कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में सक्रिय दायित्व निभा रहे हैं।

हाल ही में मध्य प्रदेश के करेली में संपन्न वनवासी कल्याण आश्रम की जागरण श्रेणी की बैठक में आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सत्येंद्र सिंह जी ने डॉ. रविंद्र भुरकुंडे जी को उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए सम्मानित किया।

मेधा का सम्मान और राष्ट्र निर्माण का संकल्प।झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय, रांची के शैक्षणिक भवन-4 स्थित सभागार में श्री...
21/07/2026

मेधा का सम्मान और
राष्ट्र निर्माण का संकल्प।
झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय, रांची के शैक्षणिक भवन-4 स्थित सभागार में श्रीहरि वनवासी विकास समिति संबद्ध ववनवासी कल्याण केन्द्र झारखण्ड द्वारा आयोजित "मेधावी छात्र अभिनंदन समारोह" अत्यंत गरिमामय एवं प्रेरणादायी वातावरण में संपन्न हुआ।
समारोह में झारखंड के विभिन्न जिलों से आए मेधावी छात्र-छात्राओं को उनकी उत्कृष्ट शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया गया। यह केवल प्रतिभाओं का सम्मान नहीं था, बल्कि शिक्षा, संस्कार और राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पित नई पीढ़ी के निर्माण का उत्सव था।
मुख्य अतिथि झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय के कार्यवाहक कुलपति प्रो. सारंग मेढेकर, विशिष्ट अतिथि भारत सरकार के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल श्री प्रशांत पल्लव, मुख्य वक्ता अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष मान्यवर श्री सत्येंद्र सिंह एवं कार्यक्रम की अध्यक्ष डॉ. तनुजा मुंडा की गरिमामयी उपस्थिति ने समारोह को विशेष ऊँचाई प्रदान की।
स्वागत संबोधन में समिति के मंत्री श्री शिवेंद्र लाल माणिक ने बताया कि श्रीहरि वनवासी विकास समिति आज झारखंड के 11 जिलों, 46 प्रखंडों और लगभग 2,000 गाँवों के 18,000 से अधिक विद्यार्थियों तक शिक्षा एवं संस्कार की ज्योति पहुँचा रही है। इस वर्ष संस्था के विद्यार्थियों का 98 प्रतिशत परीक्षा परिणाम गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं सतत प्रयासों का प्रमाण है।
अपने उद्बोधन में श्री प्रशांत पल्लव ने शिक्षा के क्षेत्र में समिति के उल्लेखनीय कार्यों की सराहना करते हुए समाज और कॉरपोरेट जगत से अधिक सहयोग का आह्वान किया, ताकि यह अभियान और अधिक व्यापक बन सके।
मुख्य अतिथि प्रो. सारंग मेढेकर ने कहा कि प्रतिभाओं को उचित मंच देना समाज का दायित्व है तथा झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय ऐसे प्रेरणादायी आयोजनों के लिए सदैव प्रतिबद्ध रहेगा।
मुख्य वक्ता मान्यवर श्री सत्येंद्र सिंह ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि चरित्रवान, संस्कारित और राष्ट्रनिष्ठ नागरिकों का निर्माण करना है। उन्होंने गर्व के साथ बताया कि संस्था के अनेक पूर्व विद्यार्थी आज इसरो सहित देश के प्रतिष्ठित संस्थानों, पूर्वोत्तर भारत के विकास कार्यों तथा विदेशों में अपनी प्रतिभा से भारत का गौरव बढ़ा रहे हैं।
समारोह में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को नगद पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र एवं स्मृति-चिह्न प्रदान किए गए। साथ ही वनवासी कल्याण केंद्रों से जुड़े 85 प्रतिशत या उससे अधिक अंक प्राप्त करने वाले सभी मेधावी छात्र-छात्राओं को सम्मानित किया गया। विशेष गौरव का विषय रहा कि समिति के विद्यालयों के छात्र ओम कुमार ने 98.4% अंक प्राप्त कर राज्य में पाँचवाँ स्थान अर्जित किया।
जब शिक्षा संस्कारों से जुड़ती है, तब केवल सफल विद्यार्थी नहीं, बल्कि संवेदनशील, सक्षम और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक तैयार होते हैं। यही ऐसे आयोजनों की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

 #जयजगन्नाथ भगवान जगन्नाथ औरजनजाति समाजआर्य–अनार्य का प्रचार पूर्णतः आधारहीन है। भारत का जनजातीय समाज शेष भारतीय समाज से...
16/07/2026

#जयजगन्नाथ
भगवान जगन्नाथ और
जनजाति समाज

आर्य–अनार्य का प्रचार पूर्णतः आधारहीन है। भारत का जनजातीय समाज शेष भारतीय समाज से सदियों से, युगों-युगों से जुड़ा हुआ है। इसका एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रमाण श्रीजगन्नाथ मंदिर है। चार धामों में से एक प्रमुख धाम पुरुषोत्तम धाम के आराध्य भगवान श्रीजगन्नाथ, उनके स्वरूप, पूजा-पद्धति और सेवा-परंपरा में जनजातीय समाज की सहभागिता यह सिद्ध करती है कि भगवान श्रीजगन्नाथ, श्रीबलभद्र, श्रीसुभद्रा और श्रीसुदर्शन का जनजातीय परंपराओं से अत्यंत गहरा संबंध है।

आज सम्पूर्ण हिंदू समाज जिनकी आराधना करता है, वे देवस्वरूप जनजातीय संस्कृति से भी अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं।
स्कन्द पुराण के अनुसार, श्रीजगन्नाथजी के प्रमुख सेवक ‘दइतापति’ शबरराज विश्वावसु के वंशज माने जाते हैं। कहा जाता है कि नीलगिरि की कंदराओं में विश्वावसु भगवान विष्णु की नीलमाधव रूप में उपासना करते थे। यही विश्वावसु पूर्वजन्म में ‘जरा शबर’ थे, जिन्होंने श्रीकृष्ण को बाण मारा था। जरा शबर उससे भी पूर्व जन्म में बालि-पुत्र अंगद थे, जिन्हें श्रीराम से अगले जन्म में पितृहत्या का प्रतिशोध लेने का वर प्राप्त हुआ था। इस प्रकार जनजातीय समाज का विष्णु-उपासना से संबंध तीन युगों से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।

जनजातीय समाज के पूजा-स्थलों पर प्रायः एक खंभा या स्तंभ स्थापित होता है। भगवान श्रीजगन्नाथ, श्रीबलभद्र, श्रीसुभद्रा और श्रीसुदर्शन के स्वरूप भी स्तंभाकार हैं। विशेषतः श्रीजगन्नाथ और श्रीबलभद्र की आकृतियाँ हाथों सहित स्तंभ जैसी प्रतीत होती हैं। इन चारों विग्रहों का निर्माण ‘दारु’ अर्थात् लकड़ी से किया जाता है। जनजातीय समाज में भी लकड़ी के देवस्वरूपों की पूजा की परंपरा प्रचलित है। श्रीजगन्नाथ आदि चारों विग्रह ‘व्यक्ताव्यक्त’ स्वरूप के प्रतीक माने जाते हैं, जिसका उल्लेख विभिन्न ऋषियों और दार्शनिकों ने ईश्वर के स्वरूप के संदर्भ में किया है।
‘नवकलेवर’ अर्थात नया शरीर — यह श्रीजगन्नाथ परंपरा की एक विशिष्ट व्यवस्था है। लगभग प्रत्येक बारह वर्ष में भगवान श्रीजगन्नाथ, श्रीबलभद्र, श्रीसुभद्रा और श्रीसुदर्शन की प्रतिमाओं का परिवर्तन किया जाता है। नई दारु (लकड़ी) से नई प्रतिमाएँ बनाई जाती हैं तथा पुरानी प्रतिमाओं को विधिपूर्वक भूमिगत किया जाता है। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया — जैसे दारु की खोज, उसे पुरी तक लाना, नई प्रतिमाओं का निर्माण, उनमें ब्रह्म-स्थापन तथा पुरानी प्रतिमाओं का विसर्जन एवं शुद्धि-संस्कार — का दायित्व शबर वंशज दइतापति निभाते हैं। वे इन विग्रहों की सेवा अपने परिवार के सदस्य के समान भाव से करते हैं।

श्रीमंदिर की परंपरा के अनुसार स्नान पूर्णिमा (ज्येष्ठ पूर्णिमा) से आषाढ़ पूर्णिमा तक पूजा का विशेष अधिकार दइतापति समाज को प्राप्त होता है। ज्येष्ठ पूर्णिमा से भगवान की सेवा का दायित्व वे संभालते हैं। भगवान को विशेष वेश में सजाकर स्नान मंडप तक लाना और पुनः मंदिर तक ले जाना उनका कार्य होता है। वर्ष में एक बार 108 कलशों के जल से भगवान का महाअभिषेक किया जाता है। स्नान हेतु जल-कलश लाने तथा स्नान कराने का कार्य भी दइतापति ही करते हैं।

स्नान-यात्रा के पश्चात भगवान लगभग पंद्रह दिनों तक ‘अनसर’ काल में रहते हैं, जिसे सामान्यतः भगवान के अस्वस्थ होने का समय माना जाता है। इस अवधि में औषधि देना, वस्त्र बदलना, सेवा-सुश्रुषा करना आदि सभी कार्य दइतापति समाज द्वारा किए जाते हैं।
भगवान श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा विश्वप्रसिद्ध उत्सव है। इस अवसर पर विग्रहों को सुसज्जित कर रथ पर स्थापित करना, उनके साथ रहना, गुंडिचा मंदिर तक ले जाना, वहाँ सेवा करना तथा पुनः वापसी पर मंदिर तक पहुँचाना — ये सभी कार्य दइतापति करते हैं। वापसी के बाद द्वादशी के दिन भगवान के ‘सुनावेश’ अर्थात स्वर्णाभूषण धारण कराने की प्रक्रिया भी उनकी देखरेख में संपन्न होती है। स्नान पूर्णिमा से आषाढ़ पूर्णिमा तक प्राप्त चढ़ावे का वितरण भी दइतापति समाज के मध्य होता है।

जनजातीय समाज में वर्ष में एक बार सामूहिक शिकार की परंपरा रही है, जिसे ‘वेंट’ कहा जाता है। भगवान श्रीजगन्नाथ की परंपरा में भी ‘वेंट यात्रा’ का उल्लेख मिलता है। चैत्र मास में ‘कांडा हेंगुड़ा’ उत्सव के दौरान धनुष-बाण धारण कर यह परंपरा निभाई जाती है। इन सभी तथ्यों से स्पष्ट होता है कि विशेष रूप से शबर समाज और भगवान श्रीजगन्नाथ परंपरा का संबंध अत्यंत गहरा और प्राचीन है।
अतः यह स्पष्ट है कि जनजातीय समाज पूजा, उपासना, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं की दृष्टि से शेष हिंदू समाज से कभी पृथक नहीं रहा, बल्कि वह भारतीय सनातन परंपरा का अभिन्न अंग है।

— डॉ. लक्ष्मीकांत दाश

श्रद्धेय जगदेवराम उराँव : एक प्रेरणादायी जीवन यात्रा9 फरवरी 1949 को तत्कालीन सेंट्रल प्रोविन्स एवं बरार (मध्य प्रदेश) तथ...
15/07/2026

श्रद्धेय जगदेवराम उराँव : एक प्रेरणादायी जीवन यात्रा

9 फरवरी 1949 को तत्कालीन सेंट्रल प्रोविन्स एवं बरार (मध्य प्रदेश) तथा वर्तमान छत्तीसगढ़ के जशपुर के पास कोमडो गाँव के अघनूराम के परिवार में एक बालक का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया ...जगदेवराम!@@

जगदेवराम की पढ़ाई जशपुर नगर में हुई। हाईस्कूल की पढ़ाई के समय वे संघ के संपर्क में आए। उसी समय संघ के स्वयंसेवक श्री शरद काले जी के संपर्क में आए तथा कल्याण आश्रम के कार्य से जुड़ गए। सन् 1968 में उन्होंने संघ के तृतीय वर्ष का 40 दिवसीय प्रशिक्षण नागपुर में प्राप्त किया।

1968 में जगदेवराम वनवासी कल्याण आश्रम में आ गए। उन्हें शारीरिक शिक्षा (Physical Education) हेतु शिवपुरी भेजा गया। शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे कल्याण आश्रम के विद्यालय में शारीरिक शिक्षक के रूप में कार्य करने लगे। वे शारीरिक शिक्षा के साथ-साथ संस्कृत के भी अच्छे शिक्षक थे। उनके मिलनसार स्वभाव के कारण वे विद्यार्थियों के प्रिय शिक्षक बन गए। शिक्षक के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने इतिहास विषय में एम.ए. की पढ़ाई भी पूरी की।

आपातकाल के दौरान 1975 में उन्हें रायगढ़ जेल में रखा गया। जेल से रिहा होने के बाद वे पुनः कल्याण आश्रम के कार्य में जुट गए। 1978 में कल्याण आश्रम को अखिल भारतीय स्वरूप प्राप्त होने के बाद माननीय बालासाहब देशपांडे का विभिन्न राज्यों में प्रवास प्रारंभ हुआ। उस समय श्रद्धेय बालासाहब जी ने प्रवास में सहयोगी कार्यकर्ता के रूप में जगदेवराम जी का चयन किया और वे उनके साथ भ्रमण करने लगे।

प्रारंभ से ही जगदेवराम जी का जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण था। प्रवास के समय वे केवल दो जोड़ी कपड़े, संघ की खाकी निकर और गणवेश की शर्ट लेकर ही यात्रा करते थे। इस प्रकार 1994 तक उन्होंने देश के कोने-कोने का भ्रमण किया। आगे चलकर कई बार बालासाहब जी उन्हें अकेले भी कार्यक्रमों में भेजने लगे। बालासाहब जी के मन में यह भावना थी कि जिस समाज के लिए यह कार्य चल रहा है, उसी समाज को समझने वाला और उसी समाज का व्यक्ति संगठन का नेतृत्व करे। इसी सोच के कारण उन्होंने जगदेवराम जी को अपना उत्तराधिकारी माना।

सन् 1993 में उड़ीसा के कटक में आयोजित अखिल भारतीय कार्यकर्ता सम्मेलन में श्रद्धेय बालासाहब जी ने कहा कि अब उनकी आयु हो रही हैं और संगठन का कार्यभार युवाओं को सौंपना चाहिए। इसी निर्णय के अंतर्गत जगदेवराम जी को कार्यकारी अध्यक्ष घोषित किया गया। साथ ही श्री प्रसन्न सप्रे जी को महामंत्री तथा श्री कृपा प्रसाद सिंह जी को संयुक्त महामंत्री बनाया गया।

जगदेवराम जी ने अपने प्रवास के दौरान अनेक कठिनाइयों का सामना किया। एक बार झारसुगुड़ा से मुंबई की यात्रा करते समय उन्हें तेज बुखार था। बैठने के लिए सीट नहीं मिली, इसलिए उन्होंने रेल के डिब्बे में शौचालय के पास बैठकर पूरी यात्रा की। इस प्रकार उन्होंने कठिन परिश्रम और समर्पण के साथ संगठन का कार्य किया।

श्रद्धेय बालासाहब जी के निधन के पश्चात 1995 में जगदेवराम जी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। उस समय कुछ लोगों को संदेह था कि एक वनवासी व्यक्ति इतने बड़े संगठन का नेतृत्व कैसे करेगा, लेकिन उनका उद्बोधन सुनने के बाद सभी ने उनकी सराहना की और बालासाहब जी के निर्णय की सार्थकता स्वीकार की।

इसके बाद उनका पूरे देश में व्यापक प्रवास प्रारंभ हुआ। जहाँ भी उनका स्वागत होता, वहाँ उन्हें भेंटस्वरूप प्राप्त शाल और अन्य उपहार वे वहीं कार्यकर्ताओं में बाँट देते थे। उन्होंने कल्याण आश्रम के कार्य के लिए अथक परिश्रम किया। विभिन्न कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणादायी होती थी।

वे स्वयं उराँव जनजाति से थे, किंतु केवल अपनी जाति तक सीमित नहीं रहे। उन्हें सभी जनजातियों के प्रति समान आत्मीयता और सम्मान था। वे जनजातीय भावना से ऊपर उठकर व्यापक हिन्दू समाज की भावना से ओतप्रोत थे। यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी।

श्रद्धेय जगदेवराम जी का ज्ञान अत्यंत व्यापक था और उनका चिंतन मौलिक था। इसी कारण सन् 2012 में International Centre for Cultural Studies (ICCS) द्वारा देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार में आयोजित International Conference of the Elders of Ancient Traditions में उन्हें विशेष रूप से आमंत्रित किया गया। इस सम्मेलन में University of World Ancient Traditions & Cultural Heritage, USA द्वारा उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया।

उन्हें 2011 में छत्तीसगढ़ शासन द्वारा 'आदिवासी सेवा सम्मान' प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त 'भाऊराव देवरस सेवा सम्मान' सहित अनेक सम्मान उन्हें प्राप्त हुए, किंतु इतने सम्मान मिलने के बाद भी उनमें कभी अहंकार नहीं आया। वे अत्यंत सरल, सहज और विनम्र स्वभाव के व्यक्ति थे।

जगदेवराम जी सभी कार्यकर्ताओं के सुख-दुःख की चिंता करते थे और सभी से आत्मीयता रखते थे। उन्हें प्राप्त मीसा बंदी पेंशन तथा अन्य आय का अधिकांश भाग वे कार्यकर्ताओं की सहायता, साहित्य क्रय, मंदिरों, पुजारियों तथा धार्मिक कार्यों में व्यय कर देते थे। वे निस्वार्थ सेवा की साक्षात् प्रतिमूर्ति थे।

विभिन्न ग्रंथों के गहन अध्ययन और अद्भुत स्मरणशक्ति के कारण उनके भाषण अत्यंत प्रेरणादायक होते थे। वे उच्चकोटि के वक्ता थे। संघभाव और स्वयंसेवकत्व को उन्होंने जीवनभर नहीं छोड़ा।

15 जुलाई 2020 को जिस दिन उनका निधन हुआ, उसी दिन रायपुर में कल्याण आश्रम की केंद्रीय कार्यकारिणी मंडल की बैठक थी। स्वास्थ्य खराब होने और चिकित्सकों द्वारा यात्रा से मना करने के बावजूद वे बैठक में जाने के इच्छुक थे, क्योंकि उसमें संघ के सह-सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय जी उपस्थित रहने वाले थे। उनके आग्रह को उनके घनिष्ठ सहयोगी श्री रामलाल सोनी जी ने स्वास्थ्य का हवाला देकर टाल दिया।

जीवनभर उन्होंने अपने स्वास्थ्य की परवाह किए बिना संगठन के कार्यों में स्वयं को समर्पित रखा। वे अधिकांश यात्राएँ स्लीपर श्रेणी में ही करते थे। अत्यधिक आग्रह होने पर ही कभी-कभी ए.सी. श्रेणी में यात्रा स्वीकार करते थे।

उन्होंने विवाह नहीं किया था और आजीवन वनवासी कल्याण आश्रम तथा समाज सेवा के कार्य में समर्पित रहे। वे आध्यात्मिक व्यक्ति नहीं कहलाते थे, पर उनके जीवन में आध्यात्मिकता की गहरी झलक थी। वे संत नहीं थे, किंतु संतों जैसा जीवन जीते थे; प्रचारक नहीं थे, किंतु प्रचारक से कम भी नहीं थे; गृहस्थ नहीं थे, फिर भी करोड़ों परिवारों के अपने थे।

वे श्रद्धेय बालासाहब देशपांडे तथा गहिरा गुरुजी द्वारा बताए गए मार्ग के सच्चे पथिक और निष्ठावान अनुयायी थे।

ऐसे महान समाजसेवी, प्रेरणास्रोत और आदरणीय जगदेवराम उराँव जी 15 जुलाई 2020 को पंचतत्व में विलीन हो गए। उनकी स्मृतियाँ और उनका आदर्श आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

अतुल जोग
संगठन मंत्री
अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम

पुण्यस्मरण | प्रेरणामूर्ति जगदेव राम उरांव जी(15 जुलाई 2020)"महान व्यक्तित्व कभी विदा नहीं होते, वे अपने विचारों और कार्...
15/07/2026

पुण्यस्मरण | प्रेरणामूर्ति जगदेव राम उरांव जी
(15 जुलाई 2020)

"महान व्यक्तित्व कभी विदा नहीं होते, वे अपने विचारों और कार्यों से सदैव समाज का मार्गदर्शन करते रहते हैं।"

वनवासी कल्याण आश्रम के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, जनजाति समाज के गौरव और राष्ट्रसेवा के पर्याय आदरणीय जगदेव राम उरांव जी की पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि। 🙏

उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन जनजाति समाज के उत्थान, शिक्षा, स्वाभिमान, सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय एकात्मता के लिए समर्पित कर दिया। सादगी, त्याग, तपस्या और निस्वार्थ सेवा उनके व्यक्तित्व की पहचान थी। आजीवन अविवाहित रहकर उन्होंने अपना सर्वस्व समाज और राष्ट्र को अर्पित किया।

उनका जीवन हमें प्रेरणा देता है कि—
"सेवा ही साधना है, समाज ही परिवार है और राष्ट्र सर्वोपरि है।"

आइए, उनके बताए मार्ग पर चलकर जनजाति समाज के सम्मान, स्वाभिमान और समग्र विकास के लिए स्वयं को समर्पित करने का संकल्प लें।

कोटि-कोटि नमन! 💐

#जगदेवरामउरांव #वनवासीकल्याणआश्रम #जनजातिसमाज #सेवाहीसाधना

काम छोटा नहीं, भावना बड़ी होती है।वनवासी कल्याण आश्रम के मौन साधक पूज्य झांगूल मामा की जयंती पर उन्हें विनम्र श्रद्धापूर...
10/07/2026

काम छोटा नहीं, भावना बड़ी होती है।

वनवासी कल्याण आश्रम के मौन साधक पूज्य झांगूल मामा की जयंती पर उन्हें विनम्र श्रद्धापूर्वक नमन।

रसोई का कार्य करते हुए उन्होंने लगभग पाँच दशकों तक हजारों विद्यार्थियों, कार्यकर्ताओं और अतिथियों की सेवा को ही अपनी साधना बना लिया। अपने लिए बहुत कम रखा, लेकिन अपनी बचत से अस्पताल में आने वाले मरीजों के परिजनों के लिए रहने का कक्ष बनवाकर सेवा और त्याग का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया।

झांगूल मामा का जीवन हमें सिखाता है कि सेवा में कोई काम छोटा नहीं होता। जब कार्य समर्पण, प्रेम और राष्ट्रभाव से किया जाए, तो वही साधना बन जाता है।

ऐसे मौन कर्मयोगी, त्याग और सेवा की जीवंत प्रतिमूर्ति पूज्य झांगूल मामा को उनकी जयंती पर शत-शत नमन।

#झांगूलमामा #सेवा_ही_साधना #वनवासीकल्याणआश्रम #कर्मयोग #समर्पण

Address

35, Chanchal Smruti, Oppo. Wadala Udyog Bhawan, Wadala
Mumbai
400031

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