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Shiv Jayanti 2026
10/03/2026

Shiv Jayanti 2026

Dosha balancing foods - अपनी प्रकृति के अनुसार कैसा हो आपका खान-पान — वात, पित्त और कफ के लिए सही डाइट - आज के समय में ब...
08/03/2026

Dosha balancing foods - अपनी प्रकृति के अनुसार कैसा हो आपका खान-पान — वात, पित्त और कफ के लिए सही डाइट - आज के समय में बहुत लोग इंटरनेट या सोशल मीडिया पर कोई भी डाइट प्लान देखकर उसे फॉलो करने लगते हैं।

लेकिन सच यह है कि एक ही तरह का डाइट प्लान हर व्यक्ति के लिए सही नहीं हो सकता। आयुर्वेद के अनुसार हर व्यक्ति की शरीर प्रकृति अलग होती है, इसलिए उसका खान-पान भी उसी के अनुसार होना चाहिए।

जब शरीर में वात, पित्त या कफ इन तीनों दोषों में से कोई भी बढ़ जाता है, तब अलग-अलग तरह के लक्षण और समस्याएं दिखाई देने लगती हैं। ऐसे में अगर हम अपनी प्रकृति और दोष के अनुसार भोजन चुनते हैं, तो शरीर को संतुलन में रखना काफी आसान हो जाता है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में भी इस विषय में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि किस दोष में किस तरह का भोजन लाभदायक होता है।

अब विस्तार से समझते हैं कि वात, पित्त और कफ प्रकृति वाले लोगों को किस तरह का खान-पान अपनाना चाहिए।

वात दोष बढ़ा हुआ कैसे पहचानें
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि शरीर में वात दोष बढ़ा हुआ है या नहीं। आयुर्वेद में वात के मुख्य गुणों में रूक्ष (सूखापन), लघु और चल गुण बताए गए हैं।

जब शरीर में वात बढ़ता है तो कुछ खास लक्षण दिखाई देने लगते हैं, जैसे

त्वचा और बालों में अत्यधिक रूखापन
कब्ज या कठोर मल की समस्या
जोड़ों में दर्द या चलने पर कटकट की आवाज
वजन बढ़ाने में कठिनाई
मन में चंचलता और बहुत ज्यादा विचार
नींद कम आना या बेचैनी

इन लक्षणों से समझा जा सकता है कि शरीर में वात दोष बढ़ा हुआ है।

वात दोष में कैसा होना चाहिए खान-पान
आयुर्वेद के अनुसार वात दोष को संतुलित करने के लिए स्निग्ध यानी चिकनाई वाला आहार बहुत जरूरी होता है।

आजकल कई लोग जीरो-ऑयल कुकिंग को हेल्दी मानकर तेल-घी पूरी तरह बंद कर देते हैं। लेकिन अगर आपकी प्रकृति वात की है, तो ऐसा करना आपके लिए नुकसानदायक हो सकता है।

तिल का तेल और घी
वात दोष को शांत करने के लिए तिल का तेल सबसे अच्छा माना गया है। इसमें स्निग्धता होती है और इसकी तासीर भी गर्म होती है, जो वात के ठंडे और सूखे गुण को संतुलित करती है।

हल्के गर्म पानी में 1–2 चम्मच तिल का तेल मिलाकर लिया जा सकता है
या भोजन में तिल के तेल का उपयोग किया जा सकता है
अगर तेल पसंद नहीं है तो देसी गाय का घी भी एक अच्छा विकल्प है।
दाल, रोटी या चावल के साथ घी का सेवन करें
दिन में 2–3 चम्मच घी लिया जा सकता है

इससे शरीर में स्निग्धता बढ़ती है और वात संतुलित रहता है।

वात में कौन से स्वाद ज्यादा लेने चाहिए
आयुर्वेद में छह स्वाद बताए गए हैं
मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय

वात दोष को कम करने के लिए इनमें से तीन स्वाद ज्यादा लाभदायक माने गए हैं

मधुर (मीठा)
अम्ल (खट्टा)
लवण (नमकीन)

मीठे स्वाद वाले पदार्थ
दूध, घी, मक्खन
मुनक्का, खजूर, अंजीर
गुड़ और मिश्री

खट्टे स्वाद वाले पदार्थ
आंवले का अचार
नींबू
अनार

नमकीन स्वाद
हल्की नमकीन चीजें भी वात को संतुलित करने में मदद करती हैं।

इसके अलावा भोजन गर्म और सुपाच्य होना चाहिए, क्योंकि वात प्रकृति में पाचन कभी तेज और कभी धीमा हो सकता है।

मिलेट्स का सेवन वात में कितना सही
आजकल मिलेट्स जैसे ज्वार और बाजरा काफी लोकप्रिय हो गए हैं। लेकिन हर व्यक्ति के लिए इनका रोजाना सेवन सही नहीं होता।
मिलेट्स में रूखापन होता है। इसलिए अगर शरीर में पहले से ही वात बढ़ा हुआ है, तो इनका अधिक सेवन वात को और बढ़ा सकता है।

हालांकि सर्दियों में बाजरे का सीमित सेवन किया जा सकता है।
अगर बाजरे की रोटी खाते हैं तो उसमें तिल, घी और थोड़ा गुड़ मिलाकर लेना बेहतर रहता है।

पित्त दोष बढ़ा हुआ कैसे पहचानें
अब बात करते हैं पित्त दोष की।

पित्त के मुख्य गुण हैं उष्ण (गर्मी) और तीक्ष्णता। इसलिए जिन लोगों में पित्त ज्यादा होता है, उन्हें शरीर में गर्मी महसूस होती है।
पित्त बढ़ने पर ये लक्षण दिखाई दे सकते हैं

शरीर में गर्मी या जलन
ज्यादा पसीना और पसीने में दुर्गंध
त्वचा संबंधी समस्याएं
बाल जल्दी सफेद होना
स्किन एलर्जी या रैशेज
हाथ-पैरों के तलवों में जलन
पेशाब में जलन

महिलाओं में पित्त बढ़ने पर मासिक धर्म में ज्यादा रक्तस्राव या जल्दी-जल्दी पीरियड आने की समस्या भी हो सकती है।

पित्त दोष में कैसा होना चाहिए खान-पान
पित्त को संतुलित करने के लिए ठंडे और शांत करने वाले आहार लाभदायक होते हैं।

घी और दूध
पित्त को कम करने के लिए गाय का घी बहुत उपयोगी माना जाता है।

दाल, रोटी या चावल के साथ घी लें
रात को सोने से पहले गर्म दूध में एक चम्मच घी मिलाकर भी लिया जा सकता है

दूध भी पित्त को शांत करने में मदद करता है।

नारियल तेल और मक्खन
अगर शुद्ध घी उपलब्ध न हो तो कोल्ड प्रेस नारियल तेल भी उपयोग किया जा सकता है।
सफेद मक्खन में मिश्री मिलाकर लेना भी पित्त को कम करने में मदद करता है।

मुनक्का और अंजीर
8–10 काले मुनक्के रात में भिगोकर सुबह लें
अंजीर भी भिगोकर लिया जा सकता है

ये दोनों वात और पित्त को संतुलित करने में सहायक होते हैं।

ठंडी तासीर वाले पदार्थ
आंवले का मुरब्बा
गुलकंद
ठंडी तासीर वाले फल

पित्त में कौन से स्वाद लेने चाहिए
पित्त दोष को कम करने के लिए तीन स्वाद विशेष रूप से लाभदायक बताए गए हैं

कषाय (कसेला)
तिक्त (कड़वा)
मधुर (मीठा)

उदाहरण के लिए

करेले की सब्जी
नीम के पत्ते
मीठे फल

इनका सेवन पित्त को संतुलित करने में मदद करता है।

कफ प्रकृति वाले लोगों की पहचान
कफ प्रकृति वाले लोगों की शारीरिक बनावट अक्सर मजबूत होती है। इनका वजन थोड़ा ज्यादा रहने की संभावना होती है।

इनमें कुछ सामान्य लक्षण देखे जा सकते हैं

वजन जल्दी बढ़ना
सुस्ती और आलस्य
नींद ज्यादा आना
बार-बार सर्दी-खांसी
भूख और प्यास कम लगना
कफ प्रकृति में पाचन अग्नि भी धीमी होती है।

कफ दोष में कैसा होना चाहिए खान-पान
कफ बढ़ने पर ऐसे भोजन लेने चाहिए जिनमें रूखापन और गर्म तासीर हो।

भुना हुआ भोजन
भुना हुआ या हल्का ड्राई फूड कफ वालों के लिए अच्छा रहता है।
अनाज को हल्का भूनकर इस्तेमाल करें
जौ की रोटी या मिलेट्स का सेवन करें

मसालेदार और गर्म तासीर वाले पदार्थ
कफ कम करने के लिए ये चीजें मददगार होती हैं

अदरक
लहसुन
काली मिर्च
दालचीनी

ये मसाले पाचन अग्नि को भी बढ़ाते हैं।

कफ के लिए शहद का सेवन
आयुर्वेद में कफ दोष को कम करने के लिए शहद उपयोगी माना गया है।
लेकिन शहद का सेवन सही तरीके से करना जरूरी है।
गर्म पानी में शहद मिलाकर नहीं लेना चाहिए
पहले पानी उबालकर ठंडा कर लें
फिर उसमें शहद मिलाकर सेवन करें

कफ कम करने वाले स्वाद
कफ को कम करने के लिए तीन स्वाद विशेष रूप से बताए गए हैं

कटु (तीखा)
तिक्त (कड़वा)
कषाय (कसेला)

त्रिकटु चूर्ण
त्रिकटु चूर्ण भी कफ कम करने में मदद करता है। इसमें होते हैं

सोंठ
काली मिर्च
पिप्पली

इसे गर्म पानी या शहद के साथ लिया जा सकता है।

कफ में उपवास भी फायदेमंद
अगर शरीर में कफ ज्यादा बढ़ गया है तो लघु उपवास या फास्टिंग भी लाभदायक हो सकती है।

जैसे

दिन में केवल एक समय भोजन
बाकी समय हल्का आहार या उपवास
लेकिन अगर शरीर में वात या पित्त ज्यादा है तो फास्टिंग से बचना चाहिए।

Conclusion
इस तरह आयुर्वेद हमें यह सिखाता है कि हर व्यक्ति का शरीर अलग होता है और उसी के अनुसार खान-पान भी अलग होना चाहिए।

अगर हम अपनी प्रकृति यानी वात, पित्त और कफ को समझकर भोजन का चुनाव करें, तो न केवल पाचन बेहतर होता है बल्कि कई बीमारियों से भी बचाव किया जा सकता है।

छोटे-छोटे बदलाव जैसे सही स्वाद का चयन, सही समय पर भोजन और अपनी प्रकृति के अनुसार आहार लेने से शरीर को लंबे समय तक स्वस्थ रखा जा सकता है।

क्या आपको लगता है कि आपके शरीर में वात, पित्त या कफ ज्यादा है

Curd and Kapha - दही गर्म है, फिर भी कफ क्यों बढ़ाता है कन्फ्यूजन क्लियर करते हैं - कुछ समय पहले दही पर एक POST डाला था,...
24/02/2026

Curd and Kapha - दही गर्म है, फिर भी कफ क्यों बढ़ाता है कन्फ्यूजन क्लियर करते हैं - कुछ समय पहले दही पर एक POST डाला था, उसमें बताया गया था कि दही का स्वभाव गर्म माना गया है। उस पर कमेंट आया – “अगर दही गर्म है तो यह कफ कैसे बढ़ा देता है गर्म चीज तो कफ कम करनी चाहिए”

यही पॉइंट बहुत लोगों को समझ में नहीं आता। इसलिए इस पोस्ट में इस पूरे विषय को थोड़ा डीटेल में समझते हैं।

पहले समझिए – कफ है क्या
आयुर्वेद कहता है कि हमारा शरीर पंचमहाभूतों से बना है – आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी।

इनमें से जल और पृथ्वी का मेल जो बनाता है, वही कफ है।
अगर आप पानी और मिट्टी मिलाते हैं तो क्या बनता है कीचड़। भारी, गीला, चिपचिपा। यही कफ का बेसिक नेचर है।

कफ के गुण क्या हैं

गुरु (भारी)
शीत (ठंडा)
स्निग्ध (चिकना)
स्थिर
मंद

यानी ठंडा और चिकना – ये इसके मुख्य गुण हैं।

सिर्फ “गरम-ठंडा” से बात पूरी नहीं होती
अक्सर लोग सोचते हैं कि अगर कफ ठंडा है तो उसे ठीक करने के लिए गर्म चीज दे दो। बात इतनी सिंपल नहीं है।

आयुर्वेद में इलाज का एक बड़ा सिद्धांत है – गुण चिकित्सा। यानी बीमारी के गुण समझो और फिर उसके उलटे गुण वाली चीज दो।

अब ध्यान से समझिए

वात भी ठंडा होता है, लेकिन उसका गुण रूक्ष (सूखा) है।
कफ भी ठंडा होता है, लेकिन उसका गुण स्निग्ध (चिकना) है।

दोनों ठंडे हैं, लेकिन एक सूखा है और दूसरा चिकना। यही फर्क समझना जरूरी है।

वात और कफ का अंतर
वात = ठंडा + सूखा
कफ = ठंडा + चिकना

अगर वात बढ़ा है, तो हमें क्या देना चाहिए
गर्म + चिकना। ताकि सूखापन कम हो और ठंडक भी संतुलित हो जाए।

लेकिन अगर कफ बढ़ा है, तो हमें क्या चाहिए
गर्म + रूखा। ताकि चिकनापन और भारीपन कम हो।

यहीं पर लोग गलती कर देते हैं। वे सिर्फ “गर्म” देख लेते हैं, बाकी गुण भूल जाते हैं।

अब आते हैं दही पर
दही का स्वभाव आयुर्वेद में उष्ण (गर्म) माना गया है। लेकिन उसके साथ एक और महत्वपूर्ण गुण है – वह स्निग्ध यानी चिकना है।
अब सोचिए, कफ पहले से ही चिकना और भारी है। अगर आप दही खाते हैं, तो वह भले ही गर्म हो, लेकिन उसका चिकनापन कफ को और बढ़ा देगा।

यानी, दही का स्निग्ध गुण कफ के स्निग्ध गुण को सपोर्ट करेगा। नतीजा कफ और जमा होगा।
इसीलिए कई लोगों को दही खाने के बाद बलगम, सर्दी, नाक बंद, या गले में कफ बढ़ जाता है।

ऋतु का उदाहरण समझिए
सर्दियों में शरीर में कफ जमा होता है। फिर जैसे ही वसंत ऋतु आती है और हल्की गर्मी बढ़ती है, तो वही जमा हुआ कफ पिघलने लगता है।
इस समय सर्दी-खांसी, एलर्जी ज्यादा क्यों होती है क्योंकि जमा हुआ कफ पिघलकर बाहर आना शुरू करता है।

अगर इसी समय आप दही जैसी स्निग्ध चीजें खाएंगे, तो कफ को और सपोर्ट मिलेगा।

तो कफ में क्या देना चाहिए
अगर कफ बढ़ा हुआ है, तो सिर्फ गर्म नहीं, बल्कि गर्म और रूखा चाहिए।

उदाहरण के लिए

काली मिर्च
सूखी अदरक
हरड़
शहद
गौमूत्र आधारित औषधियां (चिकित्सकीय सलाह से)

ये चीजें गर्म भी हैं और रूखी भी। इसलिए कफ को काटती हैं।

दही कब ठीक है
दही पूरी तरह गलत नहीं है। यह वात संबंधी रोगों में ज्यादा उपयोगी है, क्योंकि वहां सूखापन होता है।

अगर किसी को वात की समस्या है – जैसे सूखापन, कमजोरी, जोड़ों में खड़कने की आवाज – तो सीमित मात्रा में दही मदद कर सकता है।

लेकिन कफ और पित्त प्रधान व्यक्ति को सावधानी रखनी चाहिए।

अगर दही लेना ही है तो कैसे लें
अगर कफ की प्रवृत्ति है और फिर भी दही लेना है, तो उसे बैलेंस करना जरूरी है।

दही के साथ

शहद
काली मिर्च
आंवला

जैसी चीजें मिलाकर लिया जाए तो उसका प्रभाव संतुलित किया जा सकता है।

सादा दही रात में खाना, खासकर कफ प्रवृत्ति वालों के लिए, अक्सर परेशानी बढ़ा सकता है।

असली बात क्या है
सिर्फ “गरम है या ठंडा” देखकर फैसला मत कीजिए।
आयुर्वेद गुणों की भाषा में सोचता है – गुरु या लघु, स्निग्ध या रूक्ष, स्थिर या चल।
दही गर्म होते हुए भी कफ बढ़ा सकता है, क्योंकि उसका स्निग्ध और गुरु गुण कफ के गुणों से मेल खाता है।

अगर यह सिद्धांत समझ में आ गया, तो आधा आयुर्वेद क्लियर हो जाएगा।
शरीर को समझिए, गुणों को पहचानिए, और समझदारी से खाइए।

क्या आपको भी दही खाना पसंद है?

भृंगराज (Bhringraj) बालों के लिए एक बहुत ही लाभकारी आयुर्वेदिक औषधि मानी जाती है। इसे “काला तिल का तेल” या “केशराज” भी क...
19/02/2026

भृंगराज (Bhringraj) बालों के लिए एक बहुत ही लाभकारी आयुर्वेदिक औषधि मानी जाती है। इसे “काला तिल का तेल” या “केशराज” भी कहा जाता है क्योंकि यह बालों को काला, घना और मजबूत बनाने में मदद करता है। नीचे बताया गया है कि इसे बाल काले करने के लिए कैसे इस्तेमाल किया जाए 👇

🌿 भृंगराज के फायदे बालों के लिए
1. बालों को प्राकृतिक रूप से काला करने में मदद करता है।
2. बालों की जड़ों को मजबूत बनाता है।
3. डैंड्रफ (रूसी) और हेयर फॉल को कम करता है।
4. स्कैल्प में ब्लड सर्कुलेशन बढ़ाता है।
5. सफेद बालों को रोकने और झड़ने से बचाने में मदद करता है।

🧴 भृंगराज का उपयोग कैसे करें (बाल काले करने के लिए)

1. भृंगराज तेल (Bhringraj Oil) से मालिश
• बाजार से शुद्ध भृंगराज तेल लें या घर पर खुद बनाएं।
• तेल को हल्का गुनगुना करें।
• उंगलियों के पोरों से स्कैल्प में 5-10 मिनट तक मसाज करें।
• तेल को कम से कम 1-2 घंटे (या रात भर) बालों में लगा रहने दें।
• फिर हल्के हर्बल शैम्पू से धो लें।
📅 हफ्ते में 2-3 बार यह प्रक्रिया करें।

2. भृंगराज पाउडर का हेयर पैक
• 2 चम्मच भृंगराज पाउडर लें।
• उसमें आंवला पाउडर और ब्राह्मी पाउडर मिलाएं (1-1 चम्मच)।
• थोड़ा दही या नारियल तेल डालकर पेस्ट बनाएं।
• इस पेस्ट को बालों की जड़ों और लंबाई में लगाएं।
• 30–45 मिनट बाद गुनगुने पानी से धो लें।
📅 इसे हफ्ते में एक बार करें।

3. भृंगराज जूस (ताजा पत्तियों का रस)
• ताजा भृंगराज की पत्तियाँ लें और पीसकर रस निकालें।
• इस रस को स्कैल्प में लगाएं और 30 मिनट बाद धो लें।
• यह तरीका सफेद बालों को काला करने में विशेष रूप से उपयोगी है।

⚠️ सावधानियाँ
• अगर स्कैल्प बहुत संवेदनशील है, तो पहले पैच टेस्ट करें।
• शुद्ध और बिना केमिकल वाला भृंगराज तेल ही प्रयोग करें।
• नियमित उपयोग से ही प्रभाव दिखेगा — 1-2 महीने में परिणाम दिखने लगते हैं।

Ayurvedic Tridosha Treatment - वात, पित्त और कफ तीनों बिगड़ जाएं तो क्या करें?जब तीनों दोष बिगड़ जाएँ – इसे ही सन्निपात ...
06/02/2026

Ayurvedic Tridosha Treatment - वात, पित्त और कफ तीनों बिगड़ जाएं तो क्या करें?
जब तीनों दोष बिगड़ जाएँ – इसे ही सन्निपात कहते हैं - आयुर्वेद में सबसे चुनौतीपूर्ण स्थिति तब मानी जाती है जब शरीर के तीनों दोष – वात, पित्त और कफ – एक साथ असंतुलित हो जाते हैं। इस अवस्था को सन्निपात कहा जाता है।

यहीं पर लोग सबसे बड़ी गलती करते हैं। वे किसी एक दोष को ठीक करने की दवा या उपाय शुरू करते हैं और अनजाने में दूसरा दोष और ज्यादा बिगड़ जाता है।

आज हम उन्हीं आयुर्वेदिक सिद्धांतों पर आधारित पाँच ऐसे तरीकों की बात करेंगे, जिनसे तीनों दोषों को एक साथ बैलेंस किया जा सकता है और शरीर को दोबारा ट्रैक पर लाया जा सकता है।

त्रिदोष क्यों बिगड़ते हैं – असली जड़ क्या है?
आयुर्वेद के अनुसार त्रिदोष का असंतुलन तब शुरू होता है जब जठराग्नि यानी डाइजेस्टिव फायर कमजोर पड़ जाती है।
कमज़ोर अग्नि की वजह से शरीर में आम यानी टॉक्सिन्स जमा होने लगते हैं और यहीं से रोगों की चेन रिएक्शन शुरू होती है।

इसीलिए इलाज की शुरुआत हमेशा अग्नि सुधारने से होती है, दवा से नहीं।

पहला स्टेप: लंघन – शरीर को खुद को साफ करने का मौका दें
सबसे पहले तीन दिन तक सिर्फ गुनगुना पानी पिएँ और मूंग दाल की पतली खिचड़ी लें।
आयुर्वेद में इसे लंघन कहा जाता है।

लॉजिक साफ़ है – जब सिस्टम पर लोड कम होगा, तभी शरीर खुद की सफाई कर पाएगा। यह शरीर को रीसेट करने जैसा है।

क्यों पहले वात को बैलेंस करना ज़रूरी है?
आयुर्वेद का एक मूल सिद्धांत है –
“वायुना विना दोषाणां गतिर्नास्ति”
मतलब, बिना वात के पित्त और कफ हिल भी नहीं सकते।

इसलिए जब तीनों दोष बिगड़े हों, तो सबसे पहले वात को शांत करना जरूरी है।

वात संतुलन का सबसे सरल उपाय
तिल के तेल से रोज़ हल्की मालिश।
यह शरीर के सूखेपन को खत्म करता है और नर्वस सिस्टम को शांत करता है।

दूसरा स्टेप: पित्त के लिए घी क्यों ज़रूरी है?
पित्त का मतलब सिर्फ गर्मी नहीं, बल्कि ओवरएक्टिव मेटाबॉलिज़्म भी है।
देसी घी पित्त को ठंडा करता है, लेकिन अग्नि को कमजोर नहीं करता।

इसीलिए पित्त संतुलन के लिए घी को आयुर्वेद में अमृत कहा गया है।

तीसरा स्टेप: कफ के लिए शहद और मूवमेंट
कफ का नेचर है भारीपन और जड़ता।
शहद कफ को काटता है और हल्का व्यायाम कफ को जमा नहीं होने देता।

ध्यान रहे – शहद हमेशा कच्चा लें, गर्म न करें।

जब तीनों दोष बिगड़े हों, तो डाइट कैसी होनी चाहिए?
ऐसी डाइट जो न बहुत ठंडी हो, न बहुत गर्म।
आयुर्वेद इसे सामान्य आहार कहता है।

अब अपनी थाली में ये पाँच बदलाव आज से शुरू करें।

1. अनाज – हल्का लेकिन पोषक
भारी गेहूं की रोटियाँ फिलहाल कम करें।
उसकी जगह:

पुराना चावल
जौ
मूंग की दाल

मूंग दाल इकलौती ऐसी दाल है जो वात, पित्त और कफ – तीनों को बैलेंस करती है।

2. सब्ज़ियाँ – हमेशा पकी हुई
कच्चा प्याज़ बिल्कुल बंद करें। यह वात बढ़ाता है।
हमेशा पकी हुई सब्ज़ियाँ खाएँ जैसे:

लौकी
तोरई
कद्दू
परवल

ये पचने में हल्की होती हैं और सिस्टम पर बोझ नहीं डालतीं।

3. फल – हर फल आपके लिए नहीं
इस समय सबसे सुरक्षित फल हैं:

अनार
पपीता

बहुत खट्टे या बहुत मीठे फलों से अभी दूरी बनाए रखें।

4. मसाले – कम लेकिन सही
लाल मिर्च को फिलहाल रसोई से बाहर रखें।
उसकी जगह:

जीरा
धनिया
सौंफ

ये तीनों मिलकर पाचन सुधारते हैं बिना पित्त को भड़काए।

5. कुकिंग फैट – देसी घी क्यों सबसे बेस्ट है?
रिफाइंड तेल छोड़ें।
देसी घी:

वात को चिकनाई देता है
पित्त को शांत करता है
कफ को जमा नहीं होने देता

इसीलिए यह त्रिदोष संतुलन का सबसे सुरक्षित फैट है।

शुरुआत समझ नहीं आ रही? ये करें
3 से 7 दिन तक सिर्फ मूंग दाल की खिचड़ी खाएँ।
यह आपके पाचन तंत्र के लिए फैक्ट्री रिसेट जैसा काम करता है।

कुछ चीज़ें जो तीनों दोषों पर काम करती हैं
1. आंवला
इकलौता फल जो:

पित्त को ठंडा करता है
वात को शांत करता है
कफ को सुखाता है

2. गिलोय
इसे त्रिदोष शामक कहा जाता है।
यह खून साफ करती है और शरीर में बैलेंस बनाती है।

3. त्रिफला – सही तरीके से लें
रात को गुनगुने पानी से लें - वात और पित्त को बाहर निकालता है
शहद के साथ लें - कफ को काटता है

दवा ले रहे हैं लेकिन गलत खाना खा रहे हैं?
तो त्रिदोष कभी ठीक नहीं होंगे।

इन विरुद्ध आहार से बचें:
दूध के साथ नमक या खट्टे फल
रात में दही
ठंडा पानी
ठंडा पानी वात और कफ को तुरंत बिगाड़ देता है।

समय का पालन – आयुर्वेद का सबसे अनदेखा नियम
रात 10 बजे तक सो जाएँ
सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठें
रोज़ 15 मिनट अनुलोम-विलोम या नाड़ी शोधन करें

यह प्राण वायु को संतुलित करता है और तीनों दोषों को स्थिर करता है।

Conclusion
त्रिदोष को बैलेंस करने के लिए:

पाचन सुधारें
आंवला और गिलोय को शामिल करें
विरुद्ध आहार से बचें

त्रिदोष का इलाज धैर्य माँगता है, लेकिन सही दिशा में किया गया प्रयास शरीर को स्थायी संतुलन देता है।

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01/01/2026
Datta Jayanti 🙏
05/12/2025

Datta Jayanti 🙏

05/12/2025
If you want the day fresher or more energetic, start with green tea.Sometimes a simple change in mindset makes all the d...
30/11/2025

If you want the day fresher or more energetic, start with green tea.
Sometimes a simple change in mindset makes all the difference. Don't look at 'drinking green tea' as a boring activity. Instead look at it from a health perspective and take a short break from work and drink green tea. So you get used to drinking green tea every day. Helps you lose weight.
And there are many green tea sashes available in the market, but what is the need when you drink chemical sashes and Ayurveda👇👇🌿🌿🌿

Literature:
1/2 liter water
1 spoon body shape
1 spoon of cumin
1 spoon of fenugreek
1/2 spoon ova
1 small piece of ginger
2 standing little jaggery
Basil leaves🌿

Boil water: Take a water in a pot and let it boil well.
👇👇👇
Wear ingredients: Put body shape, fenugreek, ova, jul, basil and cumin.
👇👇👇
Let it boil: Let this mixture boil on a dull ache for 5 minutes, so all extracts mix in water.
👇👇👇
Dip it: Dip ready-made tea in a cup.
👇👇👇
Drink hot: drink this tea while it's hot. You can squeeze some honey or lemon for taste.

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