28/07/2026
राज्य का प्रथम धर्म प्रजा का संरक्षण है न कि प्रजा को ऐसे वर्गो में बाटना जिनकी पहचान ही उनके अधिकारों का आधार बन जाए। समाज में अनेक दोष होते हैं। कुछ समय के साथ मिटते हैं, कुछ को नीति से मिटाना पड़ता है। परंतु कोई भी नीति तभी तक श्रेष्ठ कहलाती है, जब तक वह रोग का उपचार करे, स्वयं रोग का स्थायी कारण न बन जाए।
जाति मनुष्य के मन में जन्म लेती है, राजपत्र में नहीं। यदि किसी के मन में अहंकार है, तो वह बिना किसी कानून के भी भेदभाव करेगा और यदि किसी के भीतर समता का भाव है, तो वह बिना किसी आदेश के भी सबके साथ न्याय करेगा। अतः यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि केवल कानून बदल देने से मनुष्य का चित्त बदल जाता है। कानून व्यवस्था स्थापित कर सकता है। परंतु सद्भाव का निर्माण शिक्षा, संस्कार और न्यायपूर्ण आचरण से होता है।
यदि राज्य किसी ऐतिहासिक अन्याय का उपचार करना चाहता है, तो उसका उद्देश्य ऐसा समाज बनाना होना चाहिए जहा एक दिन उस उपचार की आवश्यकता ही समाप्त हो जाए। जो उपाय अस्थायी रूप से बनाया गया हो, उसका मूल्यांकन समय समय पर होना चाहिए। अन्यथा नीति साधन न रहकर स्वयं लक्ष्य बन जाती है। और तब समाज का प्रत्येक वर्ग अपने को पीड़ित तथा दूसरे को विशेषाधिकार प्राप्त मानने लगता है।
ऐसी स्थिति राज्य की शक्ति नहीं, उसकी चुनौती होती है।
यह भी स्मरण रहे कि किसी मनुष्य का मूल्य उसके जन्म से नहीं, उसके गुण, परिश्रम और आचरण से आँका जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति केवल अपने कुल के कारण सम्मान चाहता है तो वह अयोग्य है। और यदि कोई केवल दूसरे के कुल के कारण उसका तिरस्कार करता है, तो वह भी नीति से विमुख है। न्याय का तराजू जन्म नहीं, पात्रता और वास्तविक आवश्यकता को देखना चाहिए।
राजा का कर्तव्य किसी एक वर्ग को प्रसन्न करना नहीं, सम्पूर्ण राज्य में विश्वास स्थापित करना है। जहाँ एक वर्ग को लगे कि उसके साथ अन्याय हो रहा है और दूसरा वर्ग स्वयं को सदैव संदेह की दृष्टि से देखा जाए। वहाँ सामाजिक एकता दुर्बल पड़ती है। विभाजित समाज बाहरी शत्रु से पहले भीतर के अविश्वास से पराजित होता है।
अतः यदि जातिवाद का अंत करना है, तो केवल कानूनों पर विवाद पर्याप्त नहीं होगा। विद्यालयों में समता का संस्कार, समाज में पारस्परिक सम्मान, प्रशासन में निष्पक्षता और नीतियों की समय समय पर निष्पक्ष समीक्षा यही वह मार्ग है जिससे समाज स्थायी शांति प्राप्त कर सकता है। राज्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी नागरिक की पहचान उसके जन्म से पहले उसके नागरिक होने के अधिकार से हो।
नीति का अंतिम लक्ष्य यह नहीं कि लोग अपने अपने वर्गों की विजय का उत्सव मनाए। नीति का लक्ष्य यह है कि एक दिन किसी को अपने जन्म की नहीं, केवल अपने कर्म की पहचान बतानी पड़े। वही राज्य दीर्घायु होता है जहा न्याय सबको दिखाई देता है और अवसर पर सबका विश्वास बना रहता है।
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