Khidmat E Awadh Foundation "Sultanpur"

Khidmat E Awadh Foundation "Sultanpur" Social welfare

23/09/2026

अभी तक जो भी जनप्रतिनिधि नेतागण एवं गणमान्य लोग इस तेज आवाज डीजे को कम करने की मुहिम में शामिल नहीं हुए हैं, उनसे विनती है कि वो इस मुहिम मे शामिल होकर समाज की भलाई के लिए आगे बढ़ें...

अभी तक जिन लोगों ने सहयोग किया और इस सामाजिक बुराई को मिटाने की मुहिम में आगे आए हैं।
उन्हें भी #ससम्मान_सदैव याद रखा जाएगा।
एक कदम भलाई के लिए...
#ख़िदमत_ए_अवध_फाऊंडेशन

खामोशी से जारी है एक खूबसूरत सफर #ख़िदमत_ए_अवध_फाऊंडेशन बिना किसी शोर-शराबे के, निरंतर अपनी मेहनत और जिम्मेदारी के साथ स...
12/09/2026

खामोशी से जारी है एक खूबसूरत सफर
#ख़िदमत_ए_अवध_फाऊंडेशन बिना किसी शोर-शराबे के, निरंतर अपनी मेहनत और जिम्मेदारी के साथ समाज मे #एकता, #समानता, #सेवा और #शिक्षा की अलख जगाने का प्रयास कर रहा है।
#सुलतानपुर के कुछ साथी फाऊंडेशन के बैनर तले सुलतानपुर व ्षेत्र के लोगों को फाऊंडेशन से जोड़कर एकता, समानता व समाज मे भाईचारा बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

हमारा मकसद सिर्फ लोगों को जोड़ना ही नहीं, बल्कि उनके भीतर जागरूकता और समर्पण की चाह, आत्मविश्वास और आगे बढ़ने का हौसला पैदा करना है।

शायद हमारी आवाज़ बहुत दूर तक न पहुँचे,
शायद हमारी मेहनत की चर्चा हर जगह न हो…
लेकिन अगर हमारे लोगों मे एकता, समानता व सेवा भाव की रोशनी पहुँच रही है, तो हमारी खामोश मेहनत सार्थक है।

#ख़िदमत_ए_अवध_फाऊंडेशन
बिना दिखावे के एकता, समानता, सेवा व शिक्षा के लिए निरंतर प्रयास करता रहेगा।
क्योंकि बदलाव हमेशा शोर से नहीं,
कभी-कभी खामोशी से की गई मेहनत से भी आता है।

जागरूकता व समर्पण ही वह रास्ता है, जो लोगों को सामाजिक कामयाबी की मंज़िल तक ले जाता है।
Team
"SULTANPUR"

अब्दुल कादिर खांन
सुरहुरपुर, दोस्तपुर - सुलतानपुर

कुछ सीख किताबों और स्कूलों मे मिलती है, कुछ दुनियावी जिंदगी मे, और कुछ ऐसे "शिक्षकों" से जिनकी सीख हमेशा साथ रहती है...स...
05/09/2026

कुछ सीख किताबों और स्कूलों मे मिलती है, कुछ दुनियावी जिंदगी मे, और कुछ ऐसे "शिक्षकों" से जिनकी सीख हमेशा साथ रहती है...
सभी शिक्षकों को शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाई
🤝💐💐💐🤝

 #सुलतानपुर की मिट्टी से निकलकर आज हममें से हजारों लोग  #मुम्बई_ठाणे_नवी_मुम्बई  #पालघर और  #पुणे जैसे शहरों मे शिक्षा, ...
30/08/2026

#सुलतानपुर की मिट्टी से निकलकर आज हममें से हजारों लोग #मुम्बई_ठाणे_नवी_मुम्बई #पालघर और #पुणे जैसे शहरों मे शिक्षा, नौकरी, व्यवसाय और अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रहे हैं।
अगर सुलतानपुर से जुड़े हर व्यक्ति की ताकत एक-दूसरे के साथ जुड़ जाए?
इसी सोच के साथ हमारा प्रयास है कि मुम्बई के आस-पास या #हिन्दुस्तान के किसी भी शहर मे रहने वाले सुलतानपुर के सभी छात्रों, शिक्षकों, युवाओं, व्यवसायियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पेशेवरों और सम्मानित नागरिकों को एक मंच #ख़िदमत_ए_अवध_फाऊंडेशन से जोड़ा जाए।
आप सभी से अपने संपर्क सूत्र साझा करने की विनती है।
Team :

अब्दुल कादिर खांन
सुरहुरपुर, दोस्तपुर - सुलतानपुर

भाई-बहन के अटूट रिश्ते, प्यार और विश्वास का प्रतीक 'रक्षाबंधन' की आप सभी को अनन्त शुभकामनाएं! ​"कच्चे धागों से बंधा यह व...
28/08/2026

भाई-बहन के अटूट रिश्ते, प्यार और विश्वास का प्रतीक 'रक्षाबंधन' की आप सभी को अनन्त शुभकामनाएं!

​"कच्चे धागों से बंधा यह विश्वास, भाई-बहन का पवित्र रिश्ता है खास"। 💖✨

​"बचपन की वो खट्टी-मीठी नोकझोंक और जिंदगीभर का अटूट साथ, भाई-बहन का रिश्ता होता है दुनिया में सबसे खास"।
रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं! 👫🌟

 #कोई_संस्था_बनाने_का_मकसद_क्या_होता_हैकिसी भी जिले या क्षेत्र की अपनी एक संस्था बनाना कोई गलत बात नहीं है।  #सुलतानपुर_...
24/08/2026

#कोई_संस्था_बनाने_का_मकसद_क्या_होता_है
किसी भी जिले या क्षेत्र की अपनी एक संस्था बनाना कोई गलत बात नहीं है।
#सुलतानपुर_वासियों व ्षेत्र के लोगों ने #ख़िदमत_ए_अवध_फाऊंडेशन के नाम से जो संस्था बनाई हैं, उसका बुनियादी मकसद अपने सुलतानपुर व अवध क्षेत्र के लोगों को इकट्ठा करना, उनकी समस्या को समझना और उसका हल निकालना व उनके लिए मिल-जुल कर काम करना है।
किसी भी संस्था का मकसद लोगों को एक प्लेटफॉर्म पर जमा करके एकता-भाईचारा और समाज की भलाई के लिए काम करना है।

#संस्था_अपने_लोगों_के_लिए_क्या_काम_कर_सकती_है
1.शिक्षा के क्षेत्र मे काम
बच्चों और नौजवानों को शिक्षा के लिए जागरूक करना, गरीब बच्चों की फीस और किताबों में मदद करना, स्कॉलरशिप का व्यवस्था करना और बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए हौसला देना संस्था के जिम्मेदार लोगों की अहम जिम्मेदारी हो सकती है।

2.गरीब व जरूरतमंद की मदद
अगर कोई गरीब परिवार है, किसी के घर बीमारी है, कोई बेरोजगार है या किसी जरूरतमंद को आर्थिक मदद की जरूरत है, तो संस्था उसके लिए आगे आ सकती है।
मकसद यह होना चाहिए कि कोई भी जरूरतमंद शख्स खुद को अकेला महसूस न करे।

3. रोजगार और कारोबार में मदद
नौजवानों को रोजगार के मौके बताना, हुनर सीखने के लिए प्रेरित करना व ट्रेनिंग दिलाना, कारोबार शुरू करने वालों की रहनुमाई करना और सरकारी योजनाओं की जानकारी देना भी संस्था का अहम काम हो सकता है।

4. एकता और भाईचारा
लोगों में अगर किसी बात को लेकर गलतफहमी या आपसी मतभेद हो जाए तो संस्था के जिम्मेदारान का काम उसे बढ़ाना नहीं, बल्कि दोनों पक्षों को बैठाकर बातचीत और मशवरे के जरिए से सुलझाना चाहिए।
संस्था को लोगों को जोड़ने का काम करना चाहिए, तोड़ने का नहीं।

5. समाजिक मसलों का हल
अगर शिक्षा, रोजगार, कारोबार, गरीबी या दूसरी समाजी परेशानियां हैं तो जिम्मेदारान उसका जायजा लेकर शत-प्रतिशत हल करें।
सिर्फ जलसे, मीटिंग और बयानबाजी करना संस्था का मकसद नहीं होना चाहिए, बल्कि जमीनी सतह पर काम करना उसकी असल पहचान होनी चाहिए।

6. नौजवानों की रहनुमाई
किसी भी काम को अंजाम देने मे नौजवानों का बहुत अहम किरदार होता है। नौजवानों को सिर्फ सियासत या नारेबाजी तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उन्हें शिक्षा, रोजगार, कारोबार, हुनर, खेल और समाज-सेवा की तरफ लाना चाहिए।

7.लोगों की जरूरतों का सही जायजा
एक अच्छी संस्था के जिम्मेदारान को यह मालूम होना चाहिए कि उनके जिले या क्षेत्र मे कितने बच्चे तालीम हासिल कर रहे हैं, कितने बच्चे पढ़ाई छोड़ चुके हैं, कितने नौजवान बेरोजगार हैं और कितने परिवार आर्थिक तौर पर कमजोर हैं।
जब मसले की सही जानकारी होगी, तभी उसके हल के लिए सही योजना बनाई जा सकती है।
8.संस्था को क्या नहीं करना चाहिए?
धार्मिक व राजनीतिक नफरत पैदा करने, गरीब-अमीर में फर्क करने या चंद लोगों की निजी जागीर बनने से बचना चाहिए।
बल्कि उसका मकसद होना चाहिए:
“समाज की भलाई, तरक्की, लेकिन पूरे समाज और पूरी इंसानियत के सम्मान के साथ।”

#आखिर_में_सबसे_अहम_बात
सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “अलग से संस्था क्यों बनाई गई”
असल सवाल यह होना चाहिए कि “संस्था किस मकसद से बनाई गई और समाज की भलाई के लिए कर क्या रही है?”
अगर संस्था का मकसद गरीबों की मदद, बच्चों की शिक्षा, नौजवानों को रोजगार, आपस मे एकताऔर समाज की भलाई व तरक्की है, तो ऐसी संस्था जिले व क्षेत्रीय लोगों के लिए एक बेहतरीन और फायदेमंद प्लेटफॉर्म साबित हो सकती है।
जब हर गांव, जिला व क्षेत्र अपनी-अपनी संस्था के जरिए अपने लोगों की भलाई और तरक्की के लिए काम करेगा, तो इसका फायदा सिर्फ कुछ लोगों को ही नहीं बल्कि पूरे समाज को पहुंचेगा।
#अब्दुल_कादिर_खांन
सुरहुरपुर, दोस्तपुर, सुलतानपुर

🇮🇳 खिदमत-ए-अवध फाउंडेशन की ओर से 80वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। 🇮🇳आइए, इस पावन अवसर पर हम देश की एकता, अखं...
15/08/2026

🇮🇳 खिदमत-ए-अवध फाउंडेशन की ओर से 80वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। 🇮🇳
आइए, इस पावन अवसर पर हम देश की एकता, अखंडता, भाईचारे और इंसानियत की सेवा का संकल्प लें।
देश की तरक्की में अपना योगदान दें,
और समाज में मोहब्बत, अमन और सद्भाव को बढ़ावा दें। 🤝❤️
🇮🇳 जय हिंद! जय भारत! 🇮🇳
खिदमत-ए-अवध फाउंडेशन
“इंसानियत की सेवा, समाज की तरक्की।” 🌿

09/08/2026

Dr. Sakil Khan Sahab
Kaithawa, Dostpur, Sultanpur

"मैं कमाता नहीं हूं, धमाता नहीं हूं… इसलिए कभी किसी के काम नहीं आया। लेकिन आज… मैं काम आया।" 🌀ये शब्द हैं शान खान के, जि...
09/08/2026

"मैं कमाता नहीं हूं, धमाता नहीं हूं… इसलिए कभी किसी के काम नहीं आया। लेकिन आज… मैं काम आया।" 🌀

ये शब्द हैं शान खान के, जिनकी एक छोटी-सी बात ने लाखों लोगों के दिल को छू लिया।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन के दौरान शान खान का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। इस वीडियो में उनका एक वाक्य—"हम भी आ गए…"—लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया।

देखते ही देखते शान खान सोशल मीडिया पर छा गए। लेकिन सवाल ये है कि आखिर शान खान कौन हैं और उनकी कहानी क्या है?

शान खान का परिवार मूल रूप से #उत्तर_प्रदेश के #सुलतानपुर का रहने वाला है। हालांकि शान का जन्म गुजरात के सूरत में हुआ, जहां उनके पिता काम के सिलसिले में रहते थे।

उनके पिता मोहम्मद हकीक बादल खान किसान होने के साथ एक छोटी-सी दुकान भी चलाते रहे हैं, जबकि उनकी मां राजमुलनिशा गृहिणी हैं। चार भाई-बहनों में शान सबसे बड़े हैं।

शान बचपन से ही सेरेब्रल पाल्सी नाम की शारीरिक दिव्यांगता के साथ जीवन जी रहे हैं। लेकिन उनकी हिम्मत ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और ग्रेजुएशन तक की शिक्षा पूरी की।

शान बताते हैं कि बचपन में लोग उन्हें "लल्ला" कहकर चिढ़ाते थे। कई बार उन्हें ये तक सुनना पड़ा कि वह किसी काम के नहीं हैं। ये बातें उन्हें अंदर से जरूर तोड़ती थीं, लेकिन शायद इन्हीं मुश्किलों ने उन्हें और मजबूत बनाया।

फिर आया वो दिन, जब वह जंतर-मंतर पर छात्रों के समर्थन में पहुंचे।

वहां उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि वह भी किसी के काम आ सकते हैं, समाज के लिए कुछ कर सकते हैं।

और शायद यही एहसास उनकी उस एक लाइन में नजर आया—

"हम भी आ गए…"

उनका वीडियो वायरल हुआ तो देशभर से लोगों का प्यार मिलने लगा। सोशल मीडिया पर उनके फॉलोअर्स तेजी से बढ़े और उनकी संघर्ष की कहानी कई लोगों तक पहुंचने लगी।

वायरल होने से पहले शान की कोई निश्चित आमदनी नहीं थी और वह अपने परिवार पर निर्भर थे। लेकिन अब सोशल मीडिया उनके लिए एक नई उम्मीद बनकर सामने आया है। वह कंटेंट क्रिएशन के जरिए खुद को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

दिलचस्प बात ये है कि आज कई लोग शान की मशहूर लाइन "हम भी आ गए" का इस्तेमाल करके अपने बिज़नेस और प्रोडक्ट्स का प्रमोशन करवा रहे हैं। इससे शान को भी कमाई का एक जरिया मिल रहा है।

एक वक्त था जब लोग कहते थे कि "ये किसी काम के नहीं हैं।"

और आज वही शान अपनी एक आवाज से लाखों लोगों तक पहुंच रहे हैं।

शान खान की कहानी हमें यही सिखाती है कि किसी इंसान की काबिलियत का फैसला उसकी कमजोरी देखकर नहीं किया जा सकता।

आप शान खान की कहानी के बारे में क्या सोचते हैं?

क्या आपको लगता है कि सोशल मीडिया ने उन्हें अपनी पहचान बनाने का एक नया मौका दिया है?

अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए। ❤️

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