Live Bhagavad Gita

Live Bhagavad Gita उनकी दिव्य कृपा ए.सी.भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद द्वारा अनुवाद और टीका।

*आज का श्लोक भगवद्गीता से**अध्याय 2 : गीता का सार**श्लोक 2.56*दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः |वीतरागभयक्रोधः स्...
21/10/2025

*आज का श्लोक भगवद्गीता से*

*अध्याय 2 : गीता का सार*

*श्लोक 2.56*

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः |
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते || ५६ ||

*भावार्थ*

*जो त्रय तापों के होने पर भी मन में विचलित नहीं होता अथवा सुख में प्रसन्न नहीं होता और जो आसक्ति, भय तथा क्रोध से मुक्त है, वह स्थिर मन वाला मुनि कहलाता है |*

*तात्पर्य*

मुनि शब्द का अर्थ है वह जो शुष्क चिन्तन के लिए मन को अनेक प्रकार से उद्वेलित करे, किन्तु किसी तथ्य पर न पहुँच सके | कहा जाता है कि प्रत्येक मुनि का अपना-अपना दृष्टिकोण होता है और जब तक एक मुनि अन्य मुनियों से भिन्न न हो तब तक उसे वास्तविक मुनि नहीं कहा जा सकता | न चासावृषिर्यस्य मतं न भिन्नम् (महाभारत वनपर्व ३१३.११७) किन्तु जिस स्थितधीः मुनि का भगवान् ने यहाँ उल्लेख किया है वह सामान्य मुनि से भिन्न है | स्थितधीः मुनि सदैव कृष्णभावनाभावित रहता है क्योंकि वह सारा सृजनात्मक चिन्तन पूरा कर चूका होता है वह प्रशान्त निःशेष मनोरथान्तर (स्तोत्र रत्न ४३) कहलाता है या जिसने शुष्कचिन्तन की अवस्था पार कर ली है और इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि भगवान् श्रीकृष्ण या वासुदेव ही सब कुछ हैं (वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः) वह स्थिरचित्त मुनि कहलाता है | *ऐसा कृष्णभावनाभावित व्यक्ति तीनों पापों के संघात से तनिक भी विचलित नहीं होता क्योंकि वह इन कष्टों (तापों) को भगवत्कृपा के रूप में लेता है और पूर्व पापों के कारण अपने को अधिक कष्ट के लिए योग्य मानता है और वह देखता है कि उसके सारे दुख भगवत्कृपा से रंचमात्र रह जाते हैं* | इसी प्रकार *जब वह सुखी होता है तो अपने को सुख के लिए अयोग्य मानकर इसका भी श्री भगवान् को देता है* | *वह सोचता है कि भगवत्कृपा से ही वह ऐसी सुखद स्थिति में है और भगवान् की सेवा और अच्छी तरह से कर सकता है |* और भगवान् की सेवा के लिए तो वह सदैव सहस करने के लिए सन्नद्ध रहता है | वह राग या विराग से प्रभावित नहीं होता | राग का अर्थ होता है अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए वस्तुओं को ग्रहण करना और विराग का अर्थ है ऐसी एंद्रिय आसक्ति का अभाव | *किन्तु कृष्णभावनाभावित में स्थिर व्यक्ति में न राग होता है न विराग क्योंकि उसका पूरा जीवन ही भगवत्सेवा में अर्पित रहता है* | फलतः सारे प्रयास असफल रहने पर भी वह क्रुद्ध नहीं होता | *चाहे विजय हो य न हो, कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपने संकल्प का पक्का होता है |*
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*Today's Shloka from Bhagavad Gita* *Chapter 2* : *Contents of the Gītā Summarized* *Shloka* : *2.56* duḥkheṣv anudvigna...
21/10/2025

*Today's Shloka from Bhagavad Gita*

*Chapter 2* : *Contents of the Gītā Summarized*

*Shloka* : *2.56*

duḥkheṣv anudvigna-manāḥ
sukheṣu vigata-spṛhaḥ
vīta-rāga-bhaya-krodhaḥ
sthita-dhīr munir ucyate

*Translation* :

*One who is not disturbed in mind even amidst the threefold miseries or elated when there is happiness, and who is free from attachment, fear and anger, is called a sage of steady mind.*

*Purport*:

The word muni means one who can agitate his mind in various ways for mental speculation without coming to a factual conclusion. It is said that every muni has a different angle of vision, and unless a muni differs from other munis, he cannot be called a muni in the strict sense of the term. Nāsāv ṛṣir yasya mataṁ na bhinnam (Mahābhārata, Vana-parva 313.117). But a sthita-dhīr muni, as mentioned herein by the Lord, is different from an ordinary muni. The sthita-dhīr muni is always in Kṛṣṇa consciousness, for he has exhausted all his business of creative speculation. He is called praśānta-niḥśeṣa-mano-rathāntara (Stotra-ratna 43), or *one who has surpassed the stage of mental speculations and has come to the conclusion that Lord Śrī Kṛṣṇa, or Vāsudeva, is everything* (vāsudevaḥ sarvam iti sa mahātmā su-durlabhaḥ). He is called a muni fixed in mind. *Such a fully Kṛṣṇa conscious person is not at all disturbed by the onslaughts of the threefold miseries, for he accepts all miseries as the mercy of the Lord, thinking himself only worthy of more trouble due to his past misdeeds; and he sees that his miseries, by the grace of the Lord, are minimized to the lowest.* Similarly, *when he is happy he gives credit to the Lord,* thinking himself unworthy of the happiness; he realizes that *it is due only to the Lord's grace that he is in such a comfortable condition and able to render better service to the Lord.* And, for the service of the Lord, he is always daring and active and is not influenced by attachment or aversion. Attachment means accepting things for one's own sense gratification, and detachment is the absence of such sensual attachment. But *one fixed in Kṛṣṇa consciousness has neither attachment nor detachment because his life is dedicated in the service of the Lord.* Consequently he is not at all angry even when his attempts are unsuccessful. *Success or no success, a Kṛṣṇa conscious person is always steady in his determination.

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*भगवद् गीता**अध्याय : २ : सांख्ययोग**(गीतेचे सार)**श्लोक : ५६**दु:खेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह:।**वीतरागभयक्रोध: ...
21/10/2025

*भगवद् गीता*

*अध्याय : २ : सांख्ययोग*
*(गीतेचे सार)*

*श्लोक : ५६*

*दु:खेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह:।*
*वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥ ५६॥*

दु:खेषु—त्रिविध दु:खांत; अनुद्विग्न-मना:—मनात क्षुब्धता होऊ न देता; सुखेषु—सुखामध्ये; विगत-स्पृह:—आस्था न ठेवता; वीत—पासून मुक्त; राग—आसक्ती; भय—भय; क्रोध:—आणि क्रोध; स्थित-धी:—ज्याचे मन स्थिर आहे; मुनि:—मुनी; उच्यते—म्हटले जाते.

*जो त्रिविध तापांनीही मनामध्ये विचलित होत नाही किंवा सुखामध्ये हर्षोल्हासित होत नाही आणि जो आसक्ती, भय आणि क्रोध यांपासून मुक्त झाला आहे त्याला स्थिर मन झालेला मुनी असे म्हटले जाते.*

*तात्पर्य:* मुनि शब्द दर्शवितो की, जो मानसिक तर्कवितर्कांसाठी कोणत्याही निर्णयाप्रत येण्याशिवाय आपल्या मनाला विविध प्रकारे प्रक्षुब्ध करू शकतो. असे सांगितले जाते की, प्रत्येक मुनीला वेगवेगळा दृष्टिकोण असतो आणि जोपर्यंत एक मुनी हा इतर मुनींशी मतभेद दाखवू शकत नाही तोपर्यंत खऱ्या अर्थाने त्याला मुनी म्हणता येत नाही.न चासावृषिर्यस्य मतं न भिन्नम् (महाभारत, वनपर्व ३१३.११७) पण या ठिकाणी भगवंतांनी सांगितलेला स्थितधी: मुनी हा साधारण मुनींपेक्षा वेगळा आहे. स्थितधी: मुनी हा नेहमी कृष्णभावनाभावित असतो कारण कलात्मक तर्कवितर्कांचा पूर्णपणे त्याग केलेला असतो. त्याला प्रशान्त नि:शेष मनोरथान्तर (स्तोत्र रत्न ४३) असे म्हटले जाते. म्हणजेच ज्याने मानसिक तर्कवितर्काची पातळी पार केली आहे व जो वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण हेच सर्व काही आहेत या अंतिम निर्णयाप्रत आलेला असतो (वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:). त्याला मुनी किंवा मनामध्ये दृढ झालेला असे म्हटले जाते. असा पूर्णपणे कृष्णभावनाभावित झालेला मनुष्य त्रिविध तापांच्या आघातांनी मुळीच क्षुब्ध होत नाही, कारण तो सर्व दु:खांचा भगवंतांची कृपा म्हणून स्वीकार करतो. त्याला वाटते की, आपल्या गतजन्मातील कुकर्मामुळे आपण केवळ आणखी त्रासासाठीच लायक आहोत तरीसुद्धा भगवंतांच्या कृपेने आपले कष्ट हे कमीत कमी प्रमाणात आपल्याला होत आहेत. त्याचप्रमाणे जेव्हा तो सुखी असतो तेव्हा त्याचे श्रेय तो भगवंतांना देतो. कारण त्याला वाटते की, आपण त्या सुखाला अपात्र आहोत. तो निश्‍चितपणे जाणतो की, केवळ भगवंतांच्या कृपेमुळेच अशा सुखकारक परिस्थितीत राहून आपण भगवंतांची उत्तम प्रकारे सेवा करीत आहोत. भगवंतांच्या सेवेप्रीत्यर्थ तो सदैव निर्भय आणि दक्ष असतो तसेच तो आसक्ती आणि अनासक्ती यामुळे कधीच प्रभावित होत नाही. आसक्ती म्हणजे स्वत:च्या इंद्रियतृप्तीकरिता गोष्टींचा स्वीकार करणे आणि अनासक्ती म्हणजे अशा इंद्रियासक्तीचा अभाव होय. पण जो कृष्णभावनेमध्ये दृढ असतो तो आसक्तही नाही किंवा अनासक्तही असत नाही, कारण त्याचे जीवन हे भगवत्‌सेवेमध्ये समर्पित असते. यास्तव जेव्हा त्याचे प्रयत्न अयशस्वी होतात तेव्हाही तो मुळीच क्रोधित होत नाही. यश असो अथवा अपयश, कृष्णभावनाभावित मनुष्य हा नेहमी आपल्या संकल्पामध्ये दृढ असतो.

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*आज का श्लोक भगवद्गीता से**अध्याय 2 : गीता का सार**श्लोक 2.55*श्रीभगवानुवाचप्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् |आत्...
20/10/2025

*आज का श्लोक भगवद्गीता से*

*अध्याय 2 : गीता का सार*

*श्लोक 2.55*

श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् |
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते || ५५ ||

*भावार्थ*

*श्रीभगवान् ने कहा – हे पार्थ! जब मनुष्य मनोधर्म से उत्पन्न होने वाली इन्द्रियतृप्ति की समस्त कामनाओं का परित्याग कर देता है और जब इस तरह से विशुद्ध हुआ उसका मन आत्मा में सन्तोष प्राप्त करता है तो वह विशुद्ध दिव्य चेतना को प्राप्त (स्थितप्रज्ञ) कहा जाता है |*

*तात्पर्य*

*श्रीमद्भागवत में पुष्टि हुई है कि जो मनुष्य पूर्णतया कृष्णभावनाभावित या भगवद्भक्त होता है उसमें महर्षियों के समस्त सद्गुण पाए जाते हैं,* किन्तु जो व्यक्ति अध्यात्म में स्थित नहीं होता उसमें एक भी योग्यता नहीं होती क्योंकि वह अपने मनोधर्म पर ही आश्रित रहता है | फलतः यहाँ यह ठीक ही कहा गया है कि व्यक्ति को मनोधर्म द्वारा कल्पित सारी विषय-वासनाओं को त्यागना होता है | कृत्रिम साधन से इनको रोक पाना सम्भव नहीं | किन्तु यदि कोई कृष्णभावनामृत में लगा हो तो सारी विषय-वासनाएँ स्वतः बिना किसी प्रयास के दब जाती हैं | अतः *मनुष्य को बिना किसी झिझक के कृष्णभावनामृत में लगना होगा क्योंकि यह भक्ति उसे दिव्य चेतना प्राप्त करने में सहायक होगी* | अत्यधिक उन्नत जीवात्मा (महात्मा) अपने आपको परमेश्र्वर का शाश्र्वत दास मानकर आत्मतुष्ट रहता है | ऐसे आध्यात्मिक पुरुष के पास भौतिकता से उत्पन्न भी विषय-वासना फटक नहीं पाती | वह अपने को निरन्तर भगवान् का सेवक मानते हुए सहज रूप में सदैव प्रसन्न रहता है |

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*Today's Shloka from Bhagavad Gita* *Chapter 2* : *Contents of the Gītā Summarized* *Shloka* : *2.55* śrī-bhagavān uvāca...
20/10/2025

*Today's Shloka from Bhagavad Gita*

*Chapter 2* : *Contents of the Gītā Summarized*

*Shloka* : *2.55*

śrī-bhagavān uvāca
prajahāti yadā kāmān
sarvān pārtha mano-gatān
ātmany evātmanā tuṣṭaḥ
sthita-prajñas tadocyate

*Translation* :

*The Supreme Personality of Godhead said: O Pārtha, when a man gives up all varieties of desire for sense gratification, which arise from mental concoction, and when his mind, thus purified, finds satisfaction in the self alone, then he is said to be in pure transcendental consciousness.*

*Purport*:

*The Bhāgavatam affirms that any person who is fully in Kṛṣṇa consciousness, or devotional service of the Lord, has all the good qualities of the great sages,* whereas a person who is not so transcendentally situated has no good qualifications, because he is sure to be taking refuge in his own mental concoctions. Consequently, it is rightly said herein that one has to give up all kinds of sense desire manufactured by mental concoction. Artificially, such sense desires cannot be stopped. But if one is engaged in Kṛṣṇa consciousness, then, automatically, sense desires subside without extraneous efforts. Therefore, *one has to engage himself in Kṛṣṇa consciousness without hesitation, for this devotional service will instantly help one onto the platform of transcendental consciousness* . The highly developed soul always remains satisfied in himself by realizing himself as the eternal servitor of the Supreme Lord. Such a transcendentally situated person has no sense desires resulting from petty materialism; rather, he remains always happy in his natural position of eternally serving the Supreme Lord

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*भगवद् गीता**अध्याय : २ : सांख्ययोग**(गीतेचे सार)**श्लोक : ५५**श्रीभगवानुवाच**प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।*...
20/10/2025

*भगवद् गीता*

*अध्याय : २ : सांख्ययोग*
*(गीतेचे सार)*

*श्लोक : ५५*

*श्रीभगवानुवाच*
*प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।*
*आत्मन्येवात्मना तुष्ट: स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥ ५५॥*

श्री-भगवान् उवाच—श्रीभगवान म्हणाले; प्रजहाति—त्याग करतो; यदा—जेव्हा; कामान्—इंद्रियतृप्तीच्या इच्छांचा; सर्वान्—सर्व प्रकारच्या; पार्थ—हे पार्थ; मन:-गतान्—मानसिक तर्कवितर्क; आत्मनि—आत्म्याच्या विशुद्ध अवस्थेत; एव—निश्‍चितपणे; आत्मना—पवित्र किंवा शुद्ध मनाने; तुष्ट:—तृप्त, समाधानी; स्थित-प्रज्ञ:—दिव्यावस्थेत स्थित झालेला; तदा—त्या वेळी; उच्यते—म्हटले आहे.

*श्रीभगवान म्हणाले: हे पार्था! मानसिक तर्कवितर्कामुळे उत्पन्न झालेल्या इंद्रियतृप्तीच्या सर्व प्रकारच्या इच्छांचा मनुष्य जेव्हा त्याग करतो आणि याप्रमाणे त्याचे शुद्ध झालेले मन जेव्हा केवळ आत्म्यामध्येच संतुष्ट होते तेव्हा तो स्थितप्रज्ञ अर्थात, विशुद्ध दिव्यावस्थेत स्थित झाला आहे असे म्हटले जाते.*

*तात्पर्य:* श्रीमद्भागवत स्पष्टपणे सांगते की, जो पूर्णपणे कृष्णभावनायुक्त किंवा भगवंतांच्या भक्तिपूर्ण सेवेमध्ये आहे त्याच्यामध्ये, महान ऋषींकडे आढळणारे सर्व गुण असतात. परंतु जो याप्रकारे स्थितप्रज्ञ नाही त्याच्याकडे कोणतेही चांगले गुण नाहीत. कारण तो निश्‍चितपणे स्वत:च्या मानसिक तर्कवितर्कांचा आश्रय घेत असतो. म्हणून येथे उचितपणे म्हटले आहे की, मानसिक तर्कवितर्काने निर्माण झालेल्या सर्व प्रकारच्या इंद्रियतृप्तीच्या इच्छांचा मनुष्याने त्याग करणे अत्यावश्यक आहे. इंद्रियांच्या अशा इच्छा कृत्रिम रीतीने थांबविता येत नाहीत, पण कृष्णभावनेमध्ये निमग्न झाल्याने आपोआपच सर्व इंद्रियांच्या इच्छा विशेष प्रयत्नाशिवाय कमी होतात. म्हणून मनुष्याने कोणतीही आशंका न बाळगता कृष्णभावनेमध्ये संलग्न होणे आवश्यक आहे. कारण अशी भक्तिपूर्ण सेवा त्याला तात्काळ स्थितप्रज्ञ होण्यास मदत करते. महात्मा हा निरंतर स्वत:मध्येच संतुष्ट राहतो, कारण आपण भगवंतांचे सनातन सेवक आहोत हे त्याने निश्‍चितपणे जाणलेले असते. अशा स्थितप्रज्ञ व्यक्तीला तुच्छ भौतिकतेपासून निर्माण होणाऱ्या इंद्रियकामना नसतात, किंबहुना तो आपल्या भगवंतांची नित्य सेवा करण्याच्या स्वाभाविक स्थितीमध्येच सतत आनंदी राहतो.

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19/10/2025
*आज का श्लोक भगवद्गीता से**अध्याय 2 : गीता का सार**श्लोक 2.54*अर्जुन उवाचस्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव |स्थितध...
19/10/2025

*आज का श्लोक भगवद्गीता से*

*अध्याय 2 : गीता का सार*

*श्लोक 2.54*

अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव |
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् || ५४ ||

*भावार्थ*

*अर्जुन ने कहा – हे कृष्ण! अध्यात्म में लीन चेतना वाले व्यक्ति (स्थितप्रज्ञ) के क्या लक्षण हैं? वह कैसे बोलता है तथा उसकी भाषा क्या है? वह किस तरह बैठता और चलता है?*

*तात्पर्य*

जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के विशिष्ट स्थिति के अनुसार कुछ लक्षण होते हैं उसी प्रकार कृष्णभावनाभावित पुरुष का भी विशिष्ट स्वभाव होता है – यथा उसका बोला, चलना, सोचना आदि | जिस प्रकार धनी पुरुष के कुछ लक्षण होते हैं, जिनसे वह धनवान जाना जाता है, जिस तरह रोगी अपने रोग के लक्षणों से रुग्ण जाना जाता है या कि विद्वान अपने गुणों से विद्वान जाना जाता है, उसी तरह कृष्ण की दिव्य चेतना से युक्त व्यक्ति अपने विशिष्ट लक्षणों से जाना जाता है | इन लक्षणों को भगवद्गीता से जाना जा सकता है | किन्तु सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि *कृष्णभावनाभावित व्यक्ति किस तरह बोलता है, क्योंकि वाणी ही किसी मनुष्य का सबसे महत्त्वपूर्ण गुण है* | कहा जाता है कि मुर्ख का पता तब तक नहीं लगता जब तक वह बोलता नहीं | एक बने-ठने मुर्ख को तब तक नहीं पहचाना जा सकता जब तक वह बोले नहीं, किन्तु बोलते ही उसका यथार्थ रूप प्रकट हो जाता है | *कृष्णभावनाभावित व्यक्ति का सर्वप्रमुख लक्षण यह है कि वह केवल कृष्ण तथा उन्हीं से सम्बद्ध विषयों के बारे में बोलता है* | फिर तो अन्य लक्षण स्वतः प्रकट हो जाते हैं, जिनका उल्लेख आगे किया गया है |

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*Today's Shloka from Bhagavad Gita* *Chapter 2* : *Contents of the Gītā Summarized* *Shloka* : *2.54* arjuna uvācasthita...
19/10/2025

*Today's Shloka from Bhagavad Gita*

*Chapter 2* : *Contents of the Gītā Summarized*

*Shloka* : *2.54*

arjuna uvāca
sthita-prajñasya kā bhāṣā
samādhi-sthasya keśava
sthita-dhīḥ kiṁ prabhāṣeta
kim āsīta vrajeta kim

*Translation* :

*Arjuna said: O Kṛṣṇa, what are the symptoms of one whose consciousness is thus merged in transcendence? How does he speak, and what is his language? How does he sit, and how does he walk?*

*Purport*:

As there are symptoms for each and every man, in terms of his particular situation, similarly one who is Kṛṣṇa conscious has his particular nature — talking, walking, thinking, feeling, etc. As a rich man has his symptoms by which he is known as a rich man, as a diseased man has his symptoms by which he is known as diseased, or as a learned man has his symptoms, so a man in transcendental consciousness of Kṛṣṇa has specific symptoms in various dealings. One can know his specific symptoms from the Bhagavad-gītā. *Most important is how the man in Kṛṣṇa consciousness speaks; for speech is the most important quality of any man* . It is said that a fool is undiscovered as long as he does not speak, and certainly a well-dressed fool cannot be identified unless he speaks, but as soon as he speaks, he reveals himself at once. *The immediate symptom of a Kṛṣṇa conscious man is that he speaks only of Kṛṣṇa and of matters relating to Him.* Other symptoms then automatically follow, as stated below.

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*भगवद् गीता**अध्याय : २ : सांख्ययोग**(गीतेचे सार)**श्लोक : ५४*अर्जुन उवाच*स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।**स्थि...
19/10/2025

*भगवद् गीता*

*अध्याय : २ : सांख्ययोग*
*(गीतेचे सार)*

*श्लोक : ५४*

अर्जुन उवाच
*स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।*
*स्थितधी: किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥ ५४॥*

अर्जुन: उवाच—अर्जुन म्हणाला; स्थित-प्रज्ञस्य—जो दृढ कृष्णभावनेमध्ये स्थिर झाला आहे; का—काय; भाषा—भाषा; समाधि-स्थस्य—समाधिस्थ झालेला; केशव—हे कृष्ण; स्थित-धी:—कृष्णभावनेमध्ये स्थिर झालेला; किम्—काय; प्रभाषेत—बोलतो; किम्—कसा; आसीत—राहतो; व्रजेत—चालतो; किम्—कसा.

*अर्जुन म्हणाला: हे कृष्ण, ज्याची भावना अशी समाधिस्थ झाली आहे त्याची लक्षणे काय आहेत? तो कसा आणि कोणत्या भाषेत बोलतो? तो बसतो कसा आणि चालतो कसा?*

*तात्पर्य:* ज्याप्रमाणे प्रत्येक मनुष्याच्या विशिष्ट अवस्थेत त्याची लक्षणे असतात त्याचप्रमाणे जो कृष्णभावनायुक्त असतो त्याचेही बोलणे, चालणे, विचार करणे, वाटणे इत्यादी विशिष्ट लक्षणे असतात. ज्याप्रमाणे एखादा श्रीमंत मनुष्य हा त्याच्या लक्षणावरून श्रीमंत म्हणून ओळखला जातो, ज्याप्रमाणे रोगी मनुष्य त्याच्या लक्षणावरून रोगी म्हणून ओळखला जातो किंवा ज्याप्रमाणे विद्वान मनुष्याची विशिष्ट लक्षणे असतात त्याचप्रमाणे दिव्य कृष्णभावनेमध्ये असणाऱ्या मनुष्याची त्याच्या विविध कृतींत विशिष्ट अशी लक्षणे असतात. भगवद्गीतेवरून एखादा अशा मनुष्याची विशिष्ट लक्षणे जाणू शकतो. सर्वांत महत्त्वाची गोष्ट म्हणजे कृष्णभावनेतील मनुष्य कसा बोलतो? कारण बोलणे हा मनुष्याचा सर्वांत महत्त्वपूर्ण गुण आहे. असे सांगितले जाते की, जोपर्यंत मूर्ख हा बोलत नाही तोपर्यंत त्याला आपण ओळखू शकत नाही आणि निश्‍चितपणे उत्तम वस्‍त्रे परिधान केलेला मनुष्य हा जोपर्यंत बोलत नाही तोपर्यंत त्यांच्याविषयी काही जाणता येत नाही. पण ज्याक्षणी तो बोलतो त्याचक्षणी त्याचा स्वभाव प्रकट होतो. कृष्णभावनाभावित मनुष्याचे मुख्य लक्षण म्हणजे तो केवळ श्रीकृष्णांबद्दल किंवा त्यांच्याशी संबंधित असलेल्या गोष्टींबद्दलच बोलतो. इतर लक्षणे खाली सांगितल्याप्रमाणे आपोआपच प्रकट होतात.

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*आज का श्लोक भगवद्गीता से**अध्याय 2 : गीता का सार**श्लोक 2.53*श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्र्चला |समाधावचला ब...
18/10/2025

*आज का श्लोक भगवद्गीता से*

*अध्याय 2 : गीता का सार*

*श्लोक 2.53*

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्र्चला |
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि || ५३ ||

*भावार्थ*

*जब तुम्हारा मन वेदों की अलंकारमयी भाषा से विचलित न हो और वह आत्म-साक्षात्कार की समाधि में स्थिर हो जाय, तब तुम्हें दिव्य चेतना प्राप्त हो जायेगी |*

*तात्पर्य*

‘ *कोई समाधि में है’ इस कथन का अर्थ यह होता है कि वह पूर्णतया कृष्णभावनाभावित है* अर्थात् उसने पूर्ण समाधि में ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् को प्राप्त कर लिया है | *आत्म-साक्षात्कार की सर्वोच्च सिद्धि यह जान लेना है कि मनुष्य कृष्ण का शाश्र्वत दास है और उसका एकमात्र कर्तव्य कृष्णभावनामृत में अपने सारे कर्म करना है* | कृष्णभावनाभावित व्यक्ति या भगवान् के एकनिष्ट भक्त को न तो वेदों की अलंकारमयी वाणी से विचलित होना चाहिए न ही स्वर्ग जाने के उद्देश्य से सकाम कर्मों में प्रवृत्त होना चाहिए | *कृष्णभावनामृत में मनुष्य कृष्ण के सान्निध्य में रहता है* और कृष्ण से प्राप्त सारे आदेश उस दिव्य अवस्था में समझे जा सकते हैं | ऐसे कार्यों के परिणामस्वरूप निश्चयात्मक ज्ञान की प्राप्ति निश्चित है | *उसे कृष्ण या उनके प्रतिनिधि गुरु की आज्ञाओं का पालन मात्र करना होगा |*

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*Today's Shloka from Bhagavad Gita* *Chapter 2* : *Contents of the Gītā Summarized* *Shloka* : *2.53* śruti-vipratipannā...
18/10/2025

*Today's Shloka from Bhagavad Gita*

*Chapter 2* : *Contents of the Gītā Summarized*

*Shloka* : *2.53*

śruti-vipratipannā te
yadā sthāsyati niścalā
samādhāv acalā buddhis
tadā yogam avāpsyasi

*Translation* :

*When your mind is no longer disturbed by the flowery language of the Vedas, and when it remains fixed in the trance of self-realization, then you will have attained the divine consciousness.*

*Purport*:

*To say that one is in samādhi is to say that one has fully realized Kṛṣṇa consciousness* ; that is, one in full samādhi has realized Brahman, Paramātmā and Bhagavān. *The highest perfection of self-realization is to understand that one is eternally the servitor of Kṛṣṇa and that one's only business is to discharge one's duties in Kṛṣṇa consciousness* . A Kṛṣṇa conscious person, or unflinching devotee of the Lord, should not be disturbed by the flowery language of the Vedas nor be engaged in fruitive activities for promotion to the heavenly kingdom. *In Kṛṣṇa consciousness, one comes directly into communion with Kṛṣṇa,* and thus all directions from Kṛṣṇa may be understood in that transcendental state. One is sure to achieve results by such activities and attain conclusive knowledge. *One has only to carry out the orders of Kṛṣṇa or His representative, the spiritual master.*

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