24/08/2026
बनारस में दो ही चीजें अमर हैं—एक बाबा विश्वनाथ की कृपा और दूसरा यहाँ के ठगों की जुबान। लंका चौराहे की एक छोटी सी चाय की दुकान पर कुल्हड़ का धुआँ उड़ रहा था। दुकान के मालिक, मंगरू, खौलते दूध में चीनी ऐसे फेंक रहे थे जैसे कोई जुआरी आखिरी दांव लगा रहा हो।
तभी वहाँ आगमन हुआ दयानंद प्रसाद का। दयानंद प्रसाद जी शरीर से बनारसी सांड और दिमाग से साक्षात चाणक्य के कलयुगी अवतार थे। कंधे पर जरीदार गमछा, माथे पर त्रिपुंड, और मुँह में कम से कम तीन बनारसी पान ठुसे हुए। उनके साथ उनका चेला था—'कटुआ'। कटुआ का असली नाम क्या था, यह तो खुद उसकी माँ भी भूल चुकी थी, लेकिन बनारस की गलियों में उसकी पहचान एक ऐसे उस्ताद की थी जो बहती गंगा से पानी चुरा ले।
"उस्ताद! आज बोहनी नहीं हुई है। जेब में बस चार अठन्नी बची हैं, वो भी खिसक रही हैं," कटुआ ने चाय की चुस्की लेते हुए धीरे से कहा।
दयानंद प्रसाद ने पान की पीक को दूर सड़क पर एक सटीक निशाने के साथ फेंका और मुस्कुराए। "अरे कटुआ, बनारस में रहकर जो पैसे की चिंता करे, वो बनारसी कैसा? सामने देख, आज की ताजी मछली आ रही है।"
सामने से एक महाशय चले आ रहे थे। सूट-बूट, आँखों पर महँगा चश्मा, और हाथ में चमचमाता हुआ सूटकेस। चेहरे पर 'मैं बहुत अमीर हूँ और मुझे लूटना बेहद आसान है' वाला भाव साफ चमक रहा था। यह थे दिल्ली के डब्बू जी, जो बनारस में 'सांस्कृतिक पर्यटन' करने आए थे।
दयानंद प्रसाद ने कटुआ को आँख मारी। खेल शुरू हो चुका था।
दयानंद प्रसाद डब्बू जी के रास्ते में आ खड़े हुए। उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं, हाथ हवा में उठाए और जोर से बुदबुदाए, "ॐ ह्रीं क्लीं... अरे! साक्षात लक्ष्मीपुत्र के दर्शन हो गए!"
डब्बू जी ठिठक गए। "मुझे कह रहे हैं आप?"
"और नहीं तो किसे भाई साहब!" दयानंद प्रसाद ने उनके पैर छूने का नाटक किया। "आपके माथे पर जो रेखा है, वो सीधे कुबेर के खजाने से आ रही है। लेकिन... उफ, एक भारी दोष है।"
"दोष? कैसा दोष?" डब्बू जी घबरा गए। दिल्ली वाले चाहे जितने आधुनिक बन जाएं, 'दोष' शब्द सुनते ही उनकी पैंट द्ढीली हो जाती है।
"आपके घर के उत्तर-पूर्व कोने में एक अदृश्य प्रेत का वास है, जो आपके सारे पैसे को धीरे-धीरे खा रहा है," दयानंद प्रसाद ने बेहद गंभीर होकर कहा।
कटुआ बीच में कूदा, "अरे महाराज! इनका उद्धार बस एक ही चीज कर सकती है। वही... जो आप गुप्त रूप से रखते हैं।"
"नहीं कटुआ! वो दिव्य वस्तु मैं किसी ऐरे-गैरे को नहीं दे सकता," दयानंद प्रसाद ने नाटक को आगे बढ़ाया।
डब्बू जी अब पूरी तरह जाल में फंस चुके थे। "प्लीज महाराज, बताइए! मैं कुछ भी खर्च करने को तैयार हूँ।"
दयानंद प्रसाद ने जेब से एक छोटी सी, साधारण कांच की शीशी निकाली, जिसमें मटमैला पानी भरा था। "यह साधारण पानी नहीं है बाबूजी। यह मणिकर्णिका घाट के ठीक बीचोबीच से, आधी रात को, जब तांत्रिक जागते हैं, तब निकाला गया 'महा-गंगाजल' है। इसे घर के कोने में छिड़क दो, प्रेत तो क्या, यमराज भी रास्ता बदल लेंगे।"
"इसकी कीमत?" डब्बू जी ने जेब टटोली।
"हम साधु-संत कीमत नहीं लेते बाबू। बस इस शीशी को सुरक्षित रखने का 'पात्र-दान' दे दो। केवल ग्यारह हजार रुपये।"
डब्बू जी ने बिना सोचे-समझे ग्यारह हजार रुपये दयानंद प्रसाद के हाथ में थमाए, शीशी ली और ऐसे भागे जैसे प्रेत उनके पीछे ही पड़ गया हो।
डब्बू जी के जाते ही दयानंद प्रसाद ने रुपयों को गिना और मंगरू चाय वाले से कहा, "मंगरू! दो स्पेशल मलाई मार के चाय लाओ। और सुनो, नल का पानी जरा साफ भरा करो, शीशी में रेत नीचे बैठ गई थी!"
पैसा हाथ में आते ही दयानंद प्रसाद और कटुआ के पर निकल आए। उन्होंने तय किया कि अब छोटा-मोटा काम नहीं, बल्कि बड़ा हाथ मारना है। इस बार उनका ठिकाना बना अस्सी घाट।
घाट पर इन दिनों विदेशी सैलानियों की भरमार थी। दयानंद प्रसाद ने गेरुए रंग का एक आलीशान सिल्क का कुर्ता सिलवाया। कटुआ को 'इंटरनेशनल पीआर मैनेजर' का पद दिया गया। उन्होंने घाट के एक कोने में आसन जमाया और बोर्ड लगा दिया: "परम पूज्य स्वामी दयानंद प्रसाद महाराज — पास्ट लाइफ रिग्रेशन एंड मोक्ष एक्सपर्ट।"
अंग्रेजों को 'मोक्ष' शब्द से बड़ा लगाव होता है। वे इसे कोई नया योगासन समझते हैं।
शाम होते ही एक गोरी मेम, जिसका नाम जेसिका था, उनके आश्रम (जो कि वास्तव में एक किराये की चटाई थी) पर आई। जेसिका भारतीय अध्यात्म की तलाश में अपनी नौकरी छोड़कर आई थी।
"ओह बाबा! मुझे इंटरनल पीस चाहिए। शांति कहाँ मिलेगी?" जेसिका ने टूटी-फूटी हिंदी और अंग्रेजी मिलाकर पूछा।
दयानंद प्रसाद ने आँखें मूंद लीं और अंग्रेजी झाड़ना शुरू किया—जो उन्होंने दूरदर्शन के पुराने समाचारों से सीखी थी। "यस, यस... पीस! योर लास्ट बर्थ... तुम पिछले जन्म में भारत की एक महान रानी थी। झाँसी की रानी की चचेरी बहन!"
जेसिका की आँखें फटी की फटी रह गईं। "रियली? ओ माय गॉड!"
"हाँ, लेकिन तुमने उस जन्म में एक गरीब ब्राह्मण को दान देने से मना कर दिया था। इसीलिए इस जन्म में तुम्हें शांति नहीं मिल रही है," कटुआ ने तुरंत अपनी स्क्रिप्ट जोड़ी।
"मुझे क्या करना होगा?" जेसिका ने रोते हुए पूछा।
"कुछ नहीं। बस उस पाप का प्रायश्चित करना होगा। हमारे पास एक 'मोक्ष पास' है। इसे लेने के बाद तुम्हें सीधे स्वर्ग में वीआईपी एंट्री मिलेगी," दयानंद प्रसाद ने धीमे से कहा।
जेसिका ने तुरंत अपना आईफोन और पांच सौ डॉलर निकाल कर उस्ताद के चरणों में रख दिए। दयानंद प्रसाद ने उसे एक तुलसी की सूखी माला थमा दी और कहा, "गो एंड चेंट—हरे रामा, हरे कृष्णा, नो टेंशन, ईट समोसा।"
जेसिका धन्य होकर चली गई। घाट पर मौजूद दूसरे मल्लाह यह सब देख रहे थे। एक ने हंसकर कहा, "पंडित जी, नरक में गरम तेल की कड़ाही आपका इंतजार कर रही है।"
दयानंद प्रसाद ने मुस्कुराकर कहा, "अरे भाई, कड़ाही तक पहुँचने में अभी बहुत समय है। तब तक बनारस की कचौड़ी-जलेबी का आनंद लिया जाए!"
कहते हैं कि हर शेर का एक सवा शेर होता है। दयानंद प्रसाद की ख्याति जब पूरे बनारस में फैलने लगी, तो 'गोदौलिया' के एक और नामी ठग, 'चिकना उस्ताद' के कान खड़े हुए। चिकना उस्ताद का नियम था—वो सिर्फ बनारसियों को ठगता था, क्योंकि बाहर वालों को ठगने में उसे अपना अपमान लगता था।
चिकना ने दयानंद प्रसाद को मात देने की योजना बनाई। वह भेष बदलकर भोलानाथ के पास पहुँचा।
"महाराज! मैं एक बहुत बड़ा संकट में हूँ। मेरे पास पूर्वजों का दिया हुआ एक गुप्त खजाना है—सोने के सिक्के। लेकिन वो शापित हैं। जो भी उन्हें छूता है, वो अंधा हो जाता है। मुझे कोई ऐसा पावन पुरुष चाहिए जो अपनी दिव्य शक्ति से उस सोने को पवित्र कर दे। मैं आधा सोना उसे दे दूँगा।" चिकना ने रोने का नाटक किया।
दयानंद प्रसाद के मन में लड्डू फूटा। ग्यारह हजार और पांच सौ डॉलर भूलकर उनकी आँखें सोने के सिक्कों पर टिक गईं।
"बेटा, तुम सही जगह आए हो। तुम्हारी निष्ठा देखकर मेरी दिव्य शक्तियां जाग उठी हैं। लाओ, कहाँ है वो सोना?"
चिकना ने एक भारी मटका सामने रख दिया। मटके के ऊपर लाल कपड़ा बंधा था। "महाराज, इसे अभी मत खोलना। आज रात बारह बजे, जब श्मशान की हवा चले, तभी इसका कपड़ा हटाना। नहीं तो अनर्थ हो जाएगा।"
चिकना मटका छोड़कर चला गया। दयानंद प्रसाद और कटुआ की उत्सुकता का ठिकाना नहीं था। वे रात के बारह बजने का इंतजार भी नहीं कर सके। जैसे ही शाम के सात बजे और घाट थोड़ा सूना हुआ, उन्होंने मटके का कपड़ा हटा दिया।
अंदर सोने के सिक्के चमक रहे थे! दयानंद प्रसाद ने खुशी से एक सिक्का उठाया। लेकिन जैसे ही उन्होंने उसे दांत से दबाकर चेक किया, उनका मुँह पीला पड़ गया।
वह सोना नहीं था। वो पीतल के वो सिक्के थे जो दिवाली के दिनों में खिलौने की दुकानों पर पांच रुपये के सौ मिलते हैं। और मटके के नीचे एक चिट्ठी लिखी थी:
"उस्ताद, गुरु गुरु ही रहता है और चेला चेला। गंगाजल बेचने वाले को पीतल मुबारक! — तुम्हारा चिकना।"
कटुआ अपना सिर पकड़कर बैठ गया। "उस्ताद! हमारा पोपट हो गया। चिकना ने हमें हमारी ही धरती पर ठग लिया!"
दयानंद प्रसाद शांत थे। उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उन्होंने पान चबाया और बोले, "कटुआ, बनारसी ठग कभी हारता नहीं है। वो बस अगले दांव की तैयारी करता है।"
अगले ही दिन, दयानंद प्रसाद ने चिकना के इलाके यानी गोदौलिया में एक नई दुकान किराए पर ली। दुकान के बाहर बोर्ड लगा: "विश्व प्रसिद्ध लॉटरी ऑफिस — एक के बदले दस। चिकना उस्ताद के विशेष सौजन्य से।"
दयानंद प्रसाद ने पूरे बाजार में यह अफवाह फैला दी कि चिकना उस्ताद को एक गुप्त खजाना मिला है (वही पीतल वाला मटका) और अब चिकना उस खजाने को आम जनता में बांट रहा है। जो भी चिकना के नाम पर एक सौ रुपये जमा करेगा, उसे कल एक हजार मिलेंगे।
गोदौलिया की जनता टूट पड़ी। लोग चिकना के घर के बाहर लाइन लगा कर खड़े हो गए।
"चिकना भाई! हमारे पैसे दस गुना करो! हमें पता है तुम्हें खजाना मिला है!"
चिकना परेशान हो गया। वह चिल्लाया, "अरे कौन सा खजाना? मुझे कोई खजाना नहीं मिला!"
लेकिन जनता कहाँ मानने वाली थी? भीड़ उग्र होने लगी। लोग उसके घर के बर्तन तक उठाने लगे।
तभी दयानंद प्रसाद वहाँ पुलिस की वर्दी (जो उन्होंने नाटक कंपनी से किराए पर ली थी) पहनकर पहुँचे। उन्होंने चिकना को भीड़ से निकाला और एक कोने में ले गए।
"देख चिकना, अगर इस भीड़ से बचना है, तो जो पांच सौ डॉलर और ग्यारह हजार तुमने कल हमारी इज्जत के बदले छीने थे, वो वापस करो। और साथ ही इस दुकान का हर्जाना भी दो, नहीं तो यह पब्लिक तुम्हें यहीं मणिकर्णिका पहुँचा देगी," दयानंद प्रसाद ने मूंछों पर ताव देते हुए कहा।
चिकना हाथ जोड़कर रो पड़ा। उसने तुरंत अपने सारे असली पैसे निकाले और दयानंद प्रसाद के पैरों में रख दिए। "माफ कर दो उस्ताद! आपके पैर कहाँ हैं? मैं भूल गया था कि बनारस की हवा में ही ठगी घुली हुई है।"
शाम की भव्य गंगा आरती शुरू हो चुकी थी। शंख और डमरू की आवाज से पूरा बनारस गूंज रहा था। घाटों पर दीयों की रोशनी ऐसे तैर रही थी जैसे आसमान के तारे जमीन पर उतर आए हों।
दयानंद प्रसाद और कटुआ घाट की सीढ़ियों पर बैठे थे। उनकी जेबें गरम थीं और दिल बिल्कुल हल्का।
"उस्ताद, आज तो मजा आ गया। लेकिन एक बात बताओ, यह ठगी का धंधा हम कब तक करेंगे? कभी पाप का घड़ा भरेगा नहीं क्या?" कटुआ ने दार्शनिक अंदाज में पूछा।
दयानंद प्रसाद ने गंगा जी की तरफ देखा, अपने दोनों हाथ जोड़े और बोले, "अरे मूर्ख! हम किसी का पेट नहीं काटते। हम तो बस इस दुनिया के लालची लोगों को एक सबक सिखाते हैं कि 'लोभ पापस्य कारणम्'। हम ठग नहीं हैं, हम तो कलयुग के समाज सुधारक हैं जो बिना फीस के लोगों का वहम दूर करते हैं।"
दोनों जोर से हँसे। दयानंद प्रसाद ने कटुआ की पीठ थपथपाई।
"चलो कटुआ, आरती खत्म होने वाली है। अब कोई नया 'भक्त' ढूंढते हैं, क्योंकि बनारस की रात अभी शुरू हुई है और यहाँ कभी कोई भूखा नहीं सोता!"
दोनों भीड़ में गुम हो गए, और पीछे छूट गई सिर्फ गंगा की लहरें और बनारस की वो मस्तमौला हवा, जो हर आने वाले से धीरे से कहती है—"भैया, संभल के रहना, यह बनारस है...❤️🌻
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