01/07/2025
"वीर अब्दुल हमीद — जो न होते, तो पंजाब न होता"
ज़रा याद करो क़ुर्बानी...
आज उसी शेर-ए-वतन का जन्मदिन है — परमवीर चक्र विजेता शहीद अब्दुल हमीद — जिनकी जान की क़ीमत पर आज पंजाब हमारे पास है, अमृतसर हमारा है, और लुधियाना की गलियों में तिरंगा लहरा रहा है।
लेकिन अफ़सोस — न प्रधानमंत्री ने याद किया,
न विपक्ष के नेता बोले,
न किसी चैनल ने हेडलाइन चलाई।
आज का दिन सिर्फ नेताओं के जन्मदिन की बधाइयों में गुम हो गया।
1965 का वो मंजर याद करो…
जब पाकिस्तान अमेरिका से मिले पैटन टैंकों पर सवार होकर पंजाब को रौंदता चला आ रहा था। उस वक़्त हमारी सेना के पास न बड़े हथियार थे, न ही संसाधन। बस एक जुनून था — मातृभूमि के लिए मर मिटने का।
तभी अब्दुल हमीद सामने आए।
एक जीप और 106 मिमी की रिकॉइललेस गन के साथ — उस शख्स ने पैटन टैंकों के घमंड को चूर-चूर कर दिया।
दो दिन में 7 टैंक ध्वस्त।
असल उत्तर गांव — जहां ये जंग लड़ी गई — पाकिस्तान की टैंकों की कब्रगाह बन गया।
फिर एक गोला गिरा... और अब्दुल हमीद अमर हो गए।
9 सितंबर 1965 को, शहीद हो गए — चिथड़े उड़ गए थे, पहचान मुश्किल थी, वहीं पंजाब की मिट्टी में दफ्न कर दिए गए।
लेकिन असली शर्म की बात तो इसके बाद शुरू हुई।
जिन्होंने देश बचाया, उनका घर भूख से हारा...
उनकी पत्नी रसूलन बीवी मदद के लिए जिंदगी भर चिठ्ठियाँ लिखती रहीं — सरकारें बस बुलाकर फोटो खिंचवाती रहीं।
बेटी नजबुन सरकारी दफ्तरों में बकाया पैसे के लिए ठोकरें खाती रहीं।
दामाद अलाउद्दीन की पेंशन, एरियर, ग्रेच्युटी आज तक अधूरी पड़ी है।
बेटा अली हसन, कानपुर के अस्पताल में ऑक्सीजन न मिलने से तड़पकर मर गया।
क्या यही सिला है “भारत माँ” के लाल का?
गांव में नाम भी छीन लिया गया...
उनके नाम से बने स्कूल का नाम बदल दिया गया।
जब लोगों ने सोशल मीडिया पर विरोध किया, तब जाकर फिर से नाम वापस लिखा गया।
सोचिए...
अगर अब्दुल हमीद मुसलमान थे, तो पाकिस्तान वाले भी मुसलमान थे —
लेकिन एक ने भारत के लिए अपनी जान दी, और दूसरे ने भारत को तोड़ने की कोशिश की।
क्यों नहीं मनाया जाता उनका जन्मदिन राष्ट्रीय गौरव के तौर पर?
क्यों नहीं दी जाती उन्हें वो जगह, जो शहीद-ए-आज़म भगत सिंह या नेताजी को दी जाती है?
ख़िराज-ए-अक़ीदत...
आज हम बस इतना ही कह सकते हैं:
> "वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा…"
वीर अब्दुल हमीद को सलाम
अल्लाह उन्हें जन्नतुल फिरदौस में आला मुक़ाम दे। आमीन।
लेख : मोहम्मद जाहिद कुछ तरतीब चेंज करके