Major Ram Kumar Sharma Parmarth Nyas

Major Ram Kumar Sharma Parmarth Nyas This is an absolutely free multi specialty hospital where top doctors and social workers are providing treatment free of cost to underprivileged patients.

मनुष्य ईश्वर की अनमोल रचना , पुण्य कर्म की निधि संजोए -- रघुवंश जी          16 लोगों ने लिया नशा मुक्ति का संकल्प    बड़ी...
22/03/2026

मनुष्य ईश्वर की अनमोल रचना , पुण्य कर्म की निधि संजोए -- रघुवंश जी
16 लोगों ने लिया नशा मुक्ति का संकल्प
बड़ी संख्या में वितरित हुए वस्त्र, साड़ी सूट एवं चश्मे
260 मरीज और 50 सेवक हुए उपस्थित
परमार्थ न्यास में रघुवंश महाराज जी पधारे आपने यहाँ पूजा में शामिल होकर रामचरित मानस पाठ भक्तमाल कथा रामरक्षास्तोत्र पाठ का श्रवण किया तथा परमार्थ न्यास के सभी सेवकों द्वारा की जा रही निःस्वार्थ सेवा का स्वरूप देखकर ह्रदय से प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा कि अपनी बनायी हुई वस्तुओं को हम बना सकते हैं और बिगाड़ सकते हैं। परन्तु ईश्वर निर्मित वस्तुओं को हम न बना सकते हैं और न नष्ट ही कर सकते हैं। हम जल से बर्फ और मिट्टी से ईंट बना सकते हैं और उन्हें बिगाड़ भी सकते हैं, परन्तु जल और मिट्टी को न हम बना सकते हैं और न नष्ट ही कर सकते हैं। जब अपने विचार से हम उन्हें नष्ट हुआ समझते हैं उस समय भी वास्तव में वे नष्ट नहीं होते। केवल उनका रूपान्तर ही हो जाता है। हमारी यह असमर्थता ही उस सर्वसमर्थ के अस्तित्व को सिद्ध करती है। हमारी सामर्थ्य और शक्ति का हास हर समय होता रहता है, किन्तु ईश्वर की शक्ति न तो कभी घटती है और न नष्ट ही होती है। ईश्वर सदा-सर्वदा एकरस रहता है। हमारी असमर्थता और लघुता इसी से प्रकट होती है कि निरन्तर अनेकानेक साधन करने पर ही हमें सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं और वे भी बहुत परिमित। सम्पूर्ण सिद्धियों की प्राप्ति तो हम कर ही नहीं सकते। हम सृष्टि कभी नहीं रच सकते, सर्वव्यापक कभी नहीं हो सकते और पूर्ण विधि को कभी नहीं जान सकते। हम कितने ही कुशल क्यों न हो दूसरा व्यक्ति हमारे कार्यों में दोष निकाल सकता है, किन्तु ईश्वर के कार्यों में कोई दोष नहीं निकाल सकता। ईश्वर की अनमोल निधि हे मनुष्य की रचना। इस रचना में ही ऊपर नीचे जाने के रास्ते हे। ऊपर के रास्ते में पुण्य कर्म प्रभु चरणों में पहुंचाते हे वही पाप कर्म 84 लाख योनियों में उन्हें कटवाते हे । अतः प्रभु की अनमोल रचना को बेइज्जत मत कीजिए।

चराचर की सेवा व महत्वाकांक्षाओं का त्याग ईश्वरानुसंधान की कुंजी -- प्रोफेसर सुभाष शर्मा              16 लोगों ने लिया नश...
13/03/2026

चराचर की सेवा व महत्वाकांक्षाओं का त्याग ईश्वरानुसंधान की कुंजी -- प्रोफेसर सुभाष शर्मा
16 लोगों ने लिया नशा मुक्ति का संकल्प
बड़ी संख्या में वितरित हुए वस्त्र, साड़ी सूट एवं चश्मे
256 मरीज और 46 सेवक हुए उपस्थित
परमार्थ न्यास में प्रोफेसर सुभाष शर्मा जी पधारे आपने यहाँ पूजा में शामिल होकर रामचरित मानस पाठ भक्तमाल कथा रामरक्षास्तोत्र पाठ का श्रवण किया तथा परमार्थ न्यास के सभी सेवकों द्वारा की जा रही निःस्वार्थ सेवा का स्वरूप देखकर ह्रदय से प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा कि केवल आत्म-साक्षात्कार प्राप्त ब्रह्मज्ञानी सिद्ध पुरुष ही अपनी प्राणशक्ति को दूसरों में संचारित कर सकते हैं या उनके रोगों को अपने शरीर में ला सकते हैं। कोई साधारण मनुष्य इस यौगिक पद्धति का अवलम्बन नहीं कर सकता; क्योंकि अस्वस्थ शरीर गहरे ध्यान के लिये बाधा बनता है। हिन्दू शास्त्र कहते हैं कि अपने शरीर को स्वस्थ रखना मनुष्य का अनिवार्य कर्त्तव्य है. अन्यथा उसका मन भगवत्-ध्यान में एकाग्र नहीं रह सकता। तथापि अति बलशाली मन सभी शारीरिक बाधाओं को पार कर ईश्वर-साक्षात्कार को प्राप्त हो सकता है। अनेक सन्तों ने अपने रोगों की और कोई ध्यान न देकर अपने ईश्वरानुसंधान में सफलता प्राप्त की है। सेंट फ्रान्सिस स्वयं गम्भीर रोगों से ग्रस्त होने के बावजूद दूसरे लोगों का रोगनिवारण करते थे और मृत लोगों को फिर से जिंदा भी कर देते थे। एक ऐसे भारतीय संत को थे जिनका आधा शरीर कभी फोडों से भरा हुआ था। उनका मधुमेह रोग इतना उग्र था कि वे लगातार पन्द्रह मिनट से अधिक स्थिर नहीं बैठ सकते थे। वे अठारह घंटों तक पद्मासन में समाधि लगाकर बैठने लगे। और तीन साल पूरे होते-होते उन्होंने ईश्वर के अनंत प्रकाश को अपने भीतर जगमगाते पाया। उसके वैभव के आनन्द में मग्न होकर वे अपने शरीर को भूल गये। बाद में ईश्वर की दया से उनका शरीर पूर्णतः स्वस्थ हो गया था।" रोग-निवारण की एक ऐतिहासिक घटना भारत में मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक बाबर (१४८३-१५३०) से सम्बन्धित है। उसका बेटा हुमायूँ चिंताजनक रूप से बीमार हो गया। बाबर ने अत्यंत व्यथित हृदय के निश्चय के साथ प्रार्थना की कि बेटे का रोग उस पर आ जाये और बेटे को जीवन-दान मिल जाये। हुमायूँ ठीक हो गया और बाबर उसी क्षण बीमार होकर बाद में उसी रोग से मर गया । समस्त मानवजाति की निःस्वार्थ सेवा तथा व्यक्तिगत संबंधों एवं महत्वाकांक्षाओं के त्याग के आदर्श के कारण अधिकांश स्वामी गण भारत में और कभी-कभी विदेशों में भी सक्रिय रूप से मानवतावादी एवं शैक्षणिक कार्यों में लग जाते हैं।

अहंभाव निवृत बिना उपदेश की गंगा का अवतरण कैसे -- सत्य प्रकाश महाराजडॉ अनिल जैन भिंड ने दिया 10000 रुपए का दानन्यास की बि...
06/03/2026

अहंभाव निवृत बिना उपदेश की गंगा का अवतरण कैसे -- सत्य प्रकाश महाराज
डॉ अनिल जैन भिंड ने दिया 10000 रुपए का दान
न्यास की बिटिया के विवाह पर हनुमान जी की भेट, साड़ी सुहाग का सामान, चांदी के बिछिया, 21000 रुपए पहुंचाए
पंडित प्रोफेसर रामअवतार शर्मा परमात्मा के दिन स्वरूप के सच्चे सेवक थे
18 लोगों ने लिया नशा मुक्ति का संकल्प
बड़ी संख्या में वितरित हुए वस्त्र, साड़ी सूट एवं चश्मे
267 मरीज और 42 सेवक हुए उपस्थित
परमार्थ न्यास में सत्य प्रकाश महाराज जी पधारे आपने यहाँ पूजा में शामिल होकर रामचरित मानस पाठ भक्तमाल कथा रामरक्षास्तोत्र पाठ का श्रवण किया तथा परमार्थ न्यास के सभी सेवकों द्वारा की जा रही निःस्वार्थ सेवा का स्वरूप देखकर ह्रदय से प्रसन्नता प्रकट करते हुए साथ ही सभी सेवकों को दी शुभकामनाएं एवं एवं साधुवाद देते हुए कहा कि यदि मनुष्यको आत्मनिरीक्षण द्वारा अपनी गलती समझ में आने लगे तो समझना चाहिए कि अब उसका सौभाग्य-सूर्य उदय होने वाला है और मार्ग मिलने में विलम्ब नहीं है। धर्म की स्थिति यह है कि उसका निवास छाती पर, वक्षःस्थल पर रहता है। इसी तरह अधर्म का निवास पीठ पर है। यह पौराणिक व्यवस्था है। मनुष्य को अपना अधर्म नहीं दीखता, किन्तु धर्म दीखता है। अधर्म दीखना, गलती मालूम पड़ना बड़ा कठिन है। अर्जुन को स्पष्ट मालूम पड़ता है कि मेरे अन्दर अज्ञान आ गया है। और धर्म के सम्बन्ध में मेरा ज्ञान भटक गया है। हम कभी ऐसा अन्तर्निरीक्षण करते हैं? नहीं करते हैं तो करना चाहिए। यही मानवता है, मानव धर्म है। यदि आत्म निरीक्षण करने पर भी आपकी समझ में कर्त्तव्याकर्त्तव्य न आता हो तो जो आपसे बड़े हैं, उनकी सलाह लीजिये, उनसे पूछिये, वे आपको बतायेंगे।
इसीलिए अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं-'जो मेरे लिए श्रेयस्कर हो, वह मुझे बताइये। इस प्रकार अपने बड़े-बूढ़ों की सलाह लेना, उनके बताये रास्ते पर चलना, उन्होंने इतने वर्षों तक जो संसार का अनुभव प्राप्त किया है, उससे लाभ उठाना मनुष्यका धर्म है। अब देखो, उपदेश की बात! उपदेश ग्रहण करनेके लिए भी एक योग्यता चाहिए! अर्जुन कहता है-मैं तुम्हारी शरण में हूँ, मैं तुम्हारा शिष्य हूँ। मुझे अनुशिष्ट बनाओ। जिससे शिक्षा लेनी हो, उससे थोड़ा छोटा होना पड़ता है।
परन्तु केवल मन या वाणी से गुरु या बड़े-बूढ़ों की शरण में जाने पर भी पुराने संस्कार सहसा मिट नहीं जाते, पहले का निश्चय तुरन्त कट नहीं जाता। उसके लिए समझने-समझाने की जरूरत पड़ती है।

मनुष्य का किया कर्म ही प्रारब्ध बनाता है -- त्रिलोकी नाथ जीपरमार्थ न्यास के मार्गदर्शक प्रोफेसर पंडित राम अवतार शर्मा का...
24/02/2026

मनुष्य का किया कर्म ही प्रारब्ध बनाता है -- त्रिलोकी नाथ जी
परमार्थ न्यास के मार्गदर्शक प्रोफेसर पंडित राम अवतार शर्मा का हुआ गोलोक गमन, सभी ने दी श्रद्धांजलि
चित्रकूट में इस सप्ताह में हुआ 124 मरीजों का उपचार। अभी तक दो साल में सबसे ज्यादा
नेत्रहीन महेश जाटव का ऐेम्स में होगा उपचार
अमावस्या पर मंगलवार को चित्रकूट में होगा भंडारा
16 लोगों ने लिया नशा मुक्ति का संकल्प
बड़ी संख्या में वितरित हुए वस्त्र, साड़ी सूट एवं चश्मे
248 मरीज और 38 सेवक हुए उपस्थित
परमार्थ न्यास में त्रिलोकी नाथ जी महाराज पधारे आपने यहाँ पूजा में शामिल होकर रामचरित मानस पाठ भक्तमाल कथा रामरक्षास्तोत्र पाठ का श्रवण किया तथा परमार्थ न्यास के सभी सेवकों द्वारा की जा रही निःस्वार्थ सेवा का स्वरूप देखकर ह्रदय से प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा कि कर्म करने से ही मनुष्य की गति होती है। कर्म को बिना मनुष्य इस पृथ्वी पर कुछ भी हासिल नहीं कर सकता है। मनुष्य का फर्ज है कर्म करना और उसके कर्मों का फल ही उसे अच्छे या बुरे परिणाम के रूप में मिलता है। मनुष्य के लिए कर्म ही उसकी पूजा है क्योंकि वह अपने कर्मों से ही प्रभू के द्वारा जाना जाता है।
मनुष्य जैसा कर्म करता है वैसा ही फल भोगता है। वस्तुत: मनुष्य के द्वारा किया गया कर्म ही प्रारब्ध बनता है। इसे यूं समझें कि किसान जो बीज खेत में बोता है, उसे ही फसल के रूप में वह बाद में काटता है। भगवान श्रीकृष्ण गीता में स्वयं कहते हैं कि कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बगैर नहीं रह सकता है। आज के परिवेश में विचार किए जाने की आवश्यकता यह है कि क्या हम क्षण-प्रतिक्षण, दिन-प्रतिदिन जो कर्म कर रहे हैं, वह हमें जीवन में ऊंचाई की तरफ ले जा रहे हैं या फिर इस संदर्भ में कहीं लापरवाही हमें नीचे तो नहीं गिरा रही है? हम अच्छे कर्मो के सहारे स्वर्ग में जा सकते हैं और बुरे के द्वारा नरक में। मानव के पास ही प्रभु ने शक्ति प्रदान की है कि अपने अच्छे कर्मों के सहारे वह जीवन नैया को पार लगा सके। ये अच्छे कर्म बनते है परमार्थ, परोपकार,परहित,परसेवा से आपके कर्म जब दीन दुखियों की सेवा में बदल जाते है तो कर्म सार्थक हो जाता है और वही प्रभु चरणों में अर्पण करने योग्य है।

पुण्यों में परोपकार, दानों में अभयदान सर्वश्रेष्ठ -- चंबल संभागायुक्त शर्मापरमार्थ न्यास की सेवा अनुकरणीय -- जी एस टी के...
19/02/2026

पुण्यों में परोपकार, दानों में अभयदान सर्वश्रेष्ठ -- चंबल संभागायुक्त शर्मा
परमार्थ न्यास की सेवा अनुकरणीय -- जी एस टी के अपीलेंट ट्रिब्यूनल न्यायिक सदस्य श्री उपेंद्र सिंह जी
राठी स्टील ने दिया चाय वितरण हेतु केटल
18 लोगों ने लिया नशा मुक्ति का संकल्प
बड़ी संख्या में वितरित हुए वस्त्र, साड़ी सूट एवं चश्मे
260 मरीज और 40 सेवक हुए उपस्थित
परमार्थ न्यास में चंबल संभागायुक्त शर्मा की पत्नी श्री मति सुषमा शर्मा पधारे आपने यहाँ पूजा में शामिल होकर रामचरित मानस पाठ भक्तमाल कथा रामरक्षास्तोत्र पाठ का श्रवण किया तथा परमार्थ न्यास के सभी सेवकों द्वारा की जा रही निःस्वार्थ सेवा का स्वरूप देखकर ह्रदय से प्रसन्नता प्रकट करते हुए साथ ही सभी सेवकों को दी शुभकामनाएं एवं एवं साधुवाद देते हुए कहा कि मनुष्य के लिये माधव ही भव सागर को पार करने एक मात्र मार्ग हैं माधव की प्रसन्नता हेतु जो भक्तिपूर्वक दान, जप, हवन और स्नान आदि शुभकर्म किये जाते हैं. उनका पुण्य अक्षय तथा सौ करोड़ गुना अधिक होता है। जिस प्रकार देवताओंमें विश्वात्मा भगवान् नारायणदेव श्रेष्ठ हैं जैसे जप करने योग्य मन्त्रों में गायत्री सबसे उत्कृष्ट है उसी प्रकार नदियों में गंगाजी का स्थान सबसे ऊँचा है। जैसे सम्पूर्ण स्त्रियों में पार्वती, तपने वालोंमें सूर्य, लाभों में आरोग्यलाभ, मनुष्यों में ब्राह्मण, पुण्यों में परोपकार विद्याओं में वेद, मन्त्रों में प्रणव, ध्यानों में आत्मचिन्तन, तपस्याओं में सत्य और स्वधर्म-पालन, शुद्धियों में आत्मशुद्धि, दानों में अभयदान तथा गुणोंbमें लोभका त्याग ही सबसे प्रधान माना गया है, अन्धकार का अन्त सूर्य के उदयसे तथा पुण्यों का अन्त दूसरों की बुराई और चुगली करने से होता है। कार्तिक मास में जब सूर्य तुला राशि पर स्थित हों, उस समय जो स्नान दान आदि पुण्य कार्य किया जाता है, उसका पुण्य कई गुना अधिक होता है। माघ मास में जब मकर राशि पर सूर्य हों तो कार्तिक की अपेक्षा बो हजार गुना उत्तम फल देता है और वैशाख मास में संक्रान्ति होने पर माघ से भी सौ गुना अधिक पुण्य होता है। वे ही मनुष्य पुण्यात्मा और धन्य हैं, जो प्रातःकाल स्नान करके विधि-विधानसे भगवान् लक्ष्मीपति की पूजा करते हैं। सबेरे का स्नान, यज्ञ, दान, उपवास, हविष्य-भक्षण तथा ब्रह्मचर्य का पालन, सत्य भाषण, समस्त चराचर में माधव के दर्शन एवं उनकी निष्काम सेवा ये महान् पातकों का नाश करनेवाले हैं। कलियुग में परोपकार की महिमा गुप्त नहीं रह पायेगी; क्योंकि इसका माहात्य अश्वमेध यज्ञके अनुष्ठानसे भी बढ़कर है।

मुक्त हवा में सांस लेने वाले हर व्यक्ति को सेवा देना कर्तव्य -- मार्कण्डेय दासइनर व्हील क्लब ने नशा मुक्ति कार्यक्रम में...
11/02/2026

मुक्त हवा में सांस लेने वाले हर व्यक्ति को सेवा देना कर्तव्य -- मार्कण्डेय दास
इनर व्हील क्लब ने नशा मुक्ति कार्यक्रम में हिस्सा लिया अध्यक्षा श्रीमती महेश्वरी सहित सदस्य हुए उपस्थित
लक्ष्मी जी को मिला निशुल्क दांतों का सेट
प्रोफेसर रामावतार शर्मा जी ने 91वर्ष पूर्ण होने पर किया सेवा भंडारा
16 लोगों ने लिया नशा मुक्ति का संकल्प
बड़ी संख्या में वितरित हुए वस्त्र, साड़ी सूट एवं चश्मे
256 मरीज और 45 सेवक हुए उपस्थित
परमार्थ न्यास में मार्कण्डेय दास जी महाराज पधारे आपने यहाँ पूजा में शामिल होकर रामचरित मानस पाठ भक्तमाल कथा रामरक्षास्तोत्र पाठ का श्रवण किया तथा परमार्थ न्यास के सभी सेवकों द्वारा की जा रही निःस्वार्थ सेवा का स्वरूप देखकर ह्रदय से प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा कि सच्चे भक्त को यह दिव्य अनुभव अवश्य होता है। उसकी अत्यंत तीव्र लालसा ईश्वर को इस प्रकार खींचने लगती है कि ईश्वर उसका प्रतिकार नहीं कर सकता। उस चुम्बकीय उत्कंठा से सृष्टिपति विराट् दर्शन के रूप में साधक की चेतना की सीमा में खिंच आते हैं।जो लोग इस जगत् के लिये उपयोगी होते हैं, वे किसी दूसरे जगत् की शोभा बनते हैं, "जब तक तुम इस मुक्त हवा का श्वास ले रहे हो तब तक बदले में कृतज्ञतापूर्वक सेवा देना तुम्हारा कर्त्तव्य है। केवल जो समाधि की श्वासरहित अवस्था में प्रतिष्ठित हो गया हो, वही जगत् के कर्त्तव्यों से मुक्त है "औषधियों की अपनी सीमाएँ हैं; दिव्य संजीवनी प्राणशक्ति की कोई सीमा नहीं। विश्वास रखो तो तुम स्वस्थ और बलवान हो जाओगे।"तुम्हें जिस किसी भी वस्तु को इच्छा हो, उसके लिये जब प्रार्थना करोगे, और विश्वास रखोगे कि वह तुम्हें मिल जायेगी तो सचमुच वह तुम्हें मिल ही जायेगी।" ईश्वर से एकात्म हुए सिद्ध पुरुष अपनी दैवी उपलब्धियों को अपने उन्नत शिष्यों में संचारित करने में समर्थ होते हैं,

स्वतंत्र इच्छा शक्ति प्रभु भक्ति से दूरी बनाती है -- निर्मलयानन्द जीडीप फ्रीजर से प्राप्त हुई 2050 की धनराशिअमावस्या भंड...
04/02/2026

स्वतंत्र इच्छा शक्ति प्रभु भक्ति से दूरी बनाती है -- निर्मलयानन्द जी
डीप फ्रीजर से प्राप्त हुई 2050 की धनराशि
अमावस्या भंडारे में शामिल सेवकों का किया सम्मान
18 लोगों ने लिया नशा मुक्ति का संकल्प
बड़ी संख्या में वितरित हुए वस्त्र, साड़ी सूट एवं चश्मे
260 मरीज और 40 सेवक हुए उपस्थित परमार्थ न्यास में निर्मलयानन्द जी महाराज पधारे आपने यहाँ पूजा में शामिल होकर रामचरित मानस पाठ भक्तमाल कथा रामरक्षास्तोत्र पाठ का श्रवण किया तथा परमार्थ न्यास के सभी सेवकों द्वारा की जा रही निःस्वार्थ सेवा का स्वरूप देखकर ह्रदय से प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा कि हिन्दू शास्त्र बताते हैं कि मनुष्य इस विशिष्ट पृथ्वी की ओर इसीलिये आकृष्ट होता है कि एक के बाद एक जन्म में वह उन अनगिनत तरीकों को अधिकाधिक पूर्णता के साथ सीख सके, जिनके द्वारा आत्मा भौतिक परिस्थितियों में अपने दिव्यत्व को व्यक्त कर सकती है और उन पर अपने प्रभुत्व को प्रकट कर सकती है। इसमें कोई सन्देह ही नहीं कि ईश्वर की पृथ्वीवासी संतानें दारिद्र्य, रोग और आत्मा के अज्ञान से मुक्त विश्व-सभ्यता को स्थापित करने के लिये प्रयत्न करती हैं तो ईश्वर को इससे अत्यंत प्रसन्नता होती है। अपनी आत्मा की शक्ति को भूल जाना (स्वतन्त्र इच्छाशक्ति के दुरूपयोग का परिणाम) ही अन्य सभी दुःखों का मूल कारण है। "समाज" के नाम जो बुराइयाँ मढ़ दी जाती हैं, उनके लिये वस्तुतः प्रत्येक मनुष्य को दोषी पाया जा सकता है।। रामराज्य पहले प्रत्येक हृदय में प्रकट होना चाहिये, तब वह समाज में फैलेगा, क्योंकि आंतरिक सुधार होने पर बाह्य सुधार अपने आप ही होते हैं। जो मनुष्य अपने आपको सुधार लेगा, वह हज़ारों को सुधार देगा। हमारी जीवन शैली,हमारा आचरण ही हमारे उत्थान या पतन का कारण बनेगा । और जो पतित हुए हैं, वे विवेक हीन, अपवित्र आचरण के कारण ही पतित हुए हैं, और स्वर्ग से सीधे सबसे घोर नरक में गिरे हैं। यह गिरना भी कैसा, परमानन्द की उच्च अवस्था से सीधे दुःख की गहरी गर्त में।" जिस दिव्य लीला की योजना के कारण स्थूल जगत अस्तित्व में आया है, उस योजना में स्रष्टा और सृष्ट जीव के बीच आदान-प्रदान निहित है। जो एकमात्र भेंट मानव स्रष्टा को प्रदान कर सकता है, वह है प्रेम एवं निष्काम सेवा। यह स्रष्टा की असीम कृपा की अंतहीन वर्षा कराने के लिये काफी है। "तुमने मुझे और प्रकृति को खूब लूटा है। अपनी उपज का दशमांश इस भंडार में लाओ ताकि मेरे घर में खाद्य उपलब्ध रहे, और अभी यदि मैं तुम लोगों के लिये स्वर्ग के झरोखे न खोल दूँ

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