22/03/2026
मनुष्य ईश्वर की अनमोल रचना , पुण्य कर्म की निधि संजोए -- रघुवंश जी
16 लोगों ने लिया नशा मुक्ति का संकल्प
बड़ी संख्या में वितरित हुए वस्त्र, साड़ी सूट एवं चश्मे
260 मरीज और 50 सेवक हुए उपस्थित
परमार्थ न्यास में रघुवंश महाराज जी पधारे आपने यहाँ पूजा में शामिल होकर रामचरित मानस पाठ भक्तमाल कथा रामरक्षास्तोत्र पाठ का श्रवण किया तथा परमार्थ न्यास के सभी सेवकों द्वारा की जा रही निःस्वार्थ सेवा का स्वरूप देखकर ह्रदय से प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा कि अपनी बनायी हुई वस्तुओं को हम बना सकते हैं और बिगाड़ सकते हैं। परन्तु ईश्वर निर्मित वस्तुओं को हम न बना सकते हैं और न नष्ट ही कर सकते हैं। हम जल से बर्फ और मिट्टी से ईंट बना सकते हैं और उन्हें बिगाड़ भी सकते हैं, परन्तु जल और मिट्टी को न हम बना सकते हैं और न नष्ट ही कर सकते हैं। जब अपने विचार से हम उन्हें नष्ट हुआ समझते हैं उस समय भी वास्तव में वे नष्ट नहीं होते। केवल उनका रूपान्तर ही हो जाता है। हमारी यह असमर्थता ही उस सर्वसमर्थ के अस्तित्व को सिद्ध करती है। हमारी सामर्थ्य और शक्ति का हास हर समय होता रहता है, किन्तु ईश्वर की शक्ति न तो कभी घटती है और न नष्ट ही होती है। ईश्वर सदा-सर्वदा एकरस रहता है। हमारी असमर्थता और लघुता इसी से प्रकट होती है कि निरन्तर अनेकानेक साधन करने पर ही हमें सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं और वे भी बहुत परिमित। सम्पूर्ण सिद्धियों की प्राप्ति तो हम कर ही नहीं सकते। हम सृष्टि कभी नहीं रच सकते, सर्वव्यापक कभी नहीं हो सकते और पूर्ण विधि को कभी नहीं जान सकते। हम कितने ही कुशल क्यों न हो दूसरा व्यक्ति हमारे कार्यों में दोष निकाल सकता है, किन्तु ईश्वर के कार्यों में कोई दोष नहीं निकाल सकता। ईश्वर की अनमोल निधि हे मनुष्य की रचना। इस रचना में ही ऊपर नीचे जाने के रास्ते हे। ऊपर के रास्ते में पुण्य कर्म प्रभु चरणों में पहुंचाते हे वही पाप कर्म 84 लाख योनियों में उन्हें कटवाते हे । अतः प्रभु की अनमोल रचना को बेइज्जत मत कीजिए।