Himalayan Youth and Yoga Foundation

Himalayan Youth and Yoga Foundation We motivate Youth with yoga and the teachings of Swami Vivekananda ji in all aspects for society general. ..!! Youths are the key of our society

We promote Youth personality and stress management through yogasana competitions ,workshops and seminars. [email protected]

11/07/2026
06/07/2026
महान विचारक, युगद्रष्टा, ओजस्वी वक्ता और भारतीय संस्कृति के अमर प्रतीक, करोड़ों युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद ...
04/07/2026

महान विचारक, युगद्रष्टा, ओजस्वी वक्ता और भारतीय संस्कृति के अमर प्रतीक, करोड़ों युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद जी की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।
Himalayan Youth and Yoga Foundation
HIMALAYAN YOGIS
Himachal Yoga Association

02/07/2026

Our Founder - Director Raman Kumar Yog Acharya ji Honoured by VC Panjab University, Chandigarh on 21st june 2026 on the occasion of 12th International day of yoga .

Himalayan Youth and Yoga Foundation

02/07/2026

Our Founder Director Raman Kumar Yog Acharya honoured by. V C panjab university chandigarh

30/06/2026

Himalayan yogis Director Yogacharya Raman kumar ji deliver a yoga talk on 21st june 2026 with Brahma Kumaris Chandigarh on the occasion of 12th international day of yoga

30/01/2025

भारत को जम्बूद्वीप क्यों कहा जाता हैं?

भारत को जम्बूद्वीप के नाम से भी जाना जाता हैं लेकिन कई लोगों को अब तक यह जानकारी नहीं हैं कि आखिर “भारत को जम्बूद्वीप क्यों कहा जाता हैं”। संस्कृत भाषा में जम्बूद्वीप का मतलब है जहां “जंबू के पेड़” उगते हैं। प्राचीन समय में भारत में रहने वाले लोगों को जम्बूद्वीपवासी कहा जाता था।

जम्बूद्वीप शब्द का प्रयोग चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने के लिए भी किया था, जिसका प्रमाण इतिहास में मिलता हैं. यहाँ हम आपको बताने जा रहे हैं कि भारत को जम्बूद्वीप क्यों कहा जाता हैं।

जम्बूद्वीप का मतलब:

एक ऐसा द्वीप जो क्षेत्रफल में बहुत बड़ा होने के साथ-साथ, इस क्षेत्र में पाए जाने वाले जम्बू के वृक्ष और फलों की वजह से विश्वविख्यात था।

जम्बूद्वीप प्राचीन समय में वही स्थान था जहाँ पर अभी भारत हैं. अतः भारत को जम्बूद्वीप कहा जाता हैं. भारत वर्ष, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, तिब्बत, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, मालद्वीप। कुछ शोधों के अनुसार जम्बूद्वीप एक पौराणिक महाद्वीप है। इस महाद्वीप में अनेक देश हैं। भारतवर्ष इसी महाद्वीप का एक देश है।

जम्बूद्वीप हर तरह से सम्पन्नता का प्रतीक हैं। देवी- देवताओं से लेकर ऋषि मुनियों तक ने इस भूमि को चुना था क्योंकि यहाँ पर नदियाँ, पर्वत और जंगल हर तरह का वातावरण एक ही देश में देखने को मिलता था‌।

हमारा देश एक कर्मप्रधान देश है और यहाँ जो जो जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही फल मिलता है, सदियों से भारत के लोग इस व्यवस्था को मानते रहे हैं। जम्बूद्वीप एक ऐसा विस्तृत भूभाग हैं जिसमें आर्यावर्त, भारतवर्ष और भारतखंडे आदि शामिल हैं।

जम्बुद्वीप के सम्बन्ध में मुख्य बातें:

[1] जम्बूद्वीप को “सुदर्शन द्वीप” के रूप में भी जाना जाता है।

[2] प्राचीन समय में यहाँ पर जामुन के पेड़ बहुतायात में पाए जाते थे, इसलिए यह भूभाग जम्बूद्वीप के नाम से जाना जाने लगा।

[3] विष्णुपुराण में लिखा हैं कि जम्बू के पेड़ पर लगने वाले फल हाथियों जितने बड़े होते थे ,जब भी वह पहाड़ों से गिरते तो उनके रस की नदी बहने लगती थी। इस नदी को जम्बू नदी से भी जाना जाता था। इस नदी का पानी पिने वाले जम्बूद्वीपवासी थे।

[4] मार्कण्डेय पुराण के अनुसार जम्बूद्वीप उत्तर और दक्षिण में कम और मध्य भाग में ज्यादा था जिसे इलावर्त या मेरुवर्ष से जाना जाता था।

[5] जम्बूद्वीप की तरफ से बहने वाली नदी को जम्बू नदी के नाम से जाना जाता है।

[6] जब भी घर में पूजा-पाठ होता हैं तब मंत्र के साथ जम्बूद्वीपे, आर्याव्रते, भारतखंडे, देशांतर्गते,अमुकनगरे या अमुकस्थाने फिर उसके बाद नक्षत्र और गोत्र का नाम आता है।

[7] रामायण में भी जम्बूद्वीप का वर्णन मिलता हैं।

[8] जम्बू (जामुन) नामक वृक्ष की इस द्वीप पर अधिकता के कारण इस द्वीप का नाम जम्बू द्वीप रखा गया था।

[9] जम्बूद्वीप के नौ खंड थे जिनमें इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भारत, हरि, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय आदि शामिल हैं।

[10] जम्बूद्वीप में 6 पर्वत थे जिनमें हिमवान, हेमकूट, निषध, नील, श्वेत और श्रृंगवान आदि।

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15/06/2023

सुंदरकांड पढ़ते हुए 25 वें दोहे पर थोड़ा रुक गया । तुलसीदास ने सुन्दर कांड में, जब हनुमान जी ने लंका मे आग लगाई थी, उस प्रसंग पर लिखा है -

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।

अर्थात : जब हनुमान जी ने लंका को अग्नि के हवाले कर दिया तो --
भगवान की प्रेरणा से उनपचासों पवन चलने लगे।
हनुमान जी अट्टहास करके गर्जे और आकार बढ़ाकर आकाश से जा लगे।

मैंने सोचा कि इन उनचास मरुत का क्या अर्थ है ? यह तुलसी दास जी ने भी नहीं लिखा। फिर मैंने सुंदरकांड पूरा करने के बाद समय निकालकर 49 प्रकार की वायु के बारे में जानकारी खोजी और अध्ययन करने पर सनातन धर्म पर अत्यंत गर्व हुआ। तुलसीदासजी के वायु ज्ञान पर सुखद आश्चर्य हुआ, जिससे शायद आधुनिक मौसम विज्ञान भी अनभिज्ञ है ।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि *वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है*। अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है, लेकिन उसका रूप बदलता रहता है, जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वायु और समान वायु, लेकिन ऐसा नहीं है।

दरअसल, जल के भीतर जो वायु है उसका वेद-पुराणों में अलग नाम दिया गया है और आकाश में स्थित जो वायु है उसका नाम अलग है। अंतरिक्ष में जो वायु है उसका नाम अलग और पाताल में स्थित वायु का नाम अलग है। नाम अलग होने का मतलब यह कि उसका गुण और व्यवहार भी अलग ही होता है। इस तरह वेदों में 7 प्रकार की वायु का वर्णन मिलता है।

ये 7 प्रकार हैं- 1.प्रवह, 2.आवह, 3.उद्वह, 4. संवह, 5.विवह, 6.परिवह और 7.परावह।

1. प्रवह : पृथ्वी को लांघकर मेघमंडलपर्यंत जो वायु स्थित है, उसका नाम प्रवह है। इस प्रवह के भी प्रकार हैं। यह वायु अत्यंत शक्तिमान है और वही बादलों को इधर-उधर उड़ाकर ले जाती है। धूप तथा गर्मी से उत्पन्न होने वाले मेघों को यह प्रवह वायु ही समुद्र जल से परिपूर्ण करती है जिससे ये मेघ काली घटा के रूप में परिणत हो जाते हैं और अतिशय वर्षा करने वाले होते हैं।

2. आवह : आवह सूर्यमंडल में बंधी हुई है। उसी के द्वारा ध्रुव से आबद्ध होकर सूर्यमंडल घुमाया जाता है।

3. उद्वह : वायु की तीसरी शाखा का नाम उद्वह है, जो चन्द्रलोक में प्रतिष्ठित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध होकर यह चन्द्र मंडल घुमाया जाता है।

4. संवह : वायु की चौथी शाखा का नाम संवह है, जो नक्षत्र मंडल में स्थित है। उसी से ध्रुव से आबद्ध होकर संपूर्ण नक्षत्र मंडल घूमता रहता है।

5. विवह : पांचवीं शाखा का नाम विवह है और यह ग्रह मंडल में स्थित है। उसके ही द्वारा यह ग्रह चक्र ध्रुव से संबद्ध होकर घूमता रहता है।

6. परिवह : वायु की छठी शाखा का नाम परिवह है, जो सप्तर्षिमंडल में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध हो सप्तर्षि आकाश में भ्रमण करते हैं।

7. परावह : वायु के सातवें स्कंध का नाम परावह है, जो ध्रुव में आबद्ध है। इसी के द्वारा ध्रुव चक्र तथा अन्यान्य मंडल एक स्थान पर स्थापित रहते हैं।

इन सातो वायु के सात सात गण हैं जो निम्न जगह में विचरण करते हैं

ब्रह्मलोक, इंद्रलोक, अंतरिक्ष, भूलों की पूर्व दिशा, भूलोक की पश्चिम दिशा, भूलोक की उत्तर दिशा और भूलोक कि दक्षिण दिशा। इस तरह
7 ×7=49 कुल 49 मरुत हो जाते हैं जो देव रूप में विचरण करते रहते हैं।

है ना अद्भुत ज्ञान। हम अक्सर रामायण, भगवद् गीता पढ़ तो लेते हैं परंतु उनमें लिखी छोटी-छोटी बातों का गहन अध्ययन करने पर अनेक गूढ़ एवं ज्ञानवर्धक बातें ज्ञात होती हैं।
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🙏🏻🚩 जय श्री राम🙏🏻

29/05/2023

*हनुमान जी का कर्ज़ा* ‼️🕉️

*अयोध्या से हनुमान जी विदाई के समय पर लगा प्रश्न चिन्ह पढ़िए पूरी कथा*

✒️ राम जी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो कुछ दिन पश्चात राम जी ने विभीषण, जामवंत, सुग्रीव और अंगद आदि को अयोध्या से विदा कर दिया /,

👉 तो सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में विदा करेंगे ,

☀️ लेकिन राम जी ने हनुमान जी को विदा ही नहीं किया //,

अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात है कि सब गए परन्तु अयोध्या से हनुमान जी नहीं गये ,

🎯 अब दरबार में कानाफूसी शुरू हुई कि हनुमान जी से कौन कहे जाने के लिए, तो सबसे पहले माता सीता जी की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमान जी चले जायें /,

✒️ माता सीता बोलीं मै तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक-एक दिन एक-एक कल्प के समान बीत रहा था /,

☝️ वो तो हनुमान जी थे, जो प्रभु मुद्रिका ले के गये, और धीरज बंधवाया कि...!

✒️ *कछुक दिवस जननी धरु धीरा /,*
✨ *कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा //,*

☝️ *निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं /,*
✨ *तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहि• //,*

🌹 मैं तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जाने के लिए, आप किसी और से बुलावा लो /,

✒️ अब बारी आई लखन जी की। तो लक्ष्मण जी ने कहा, मै तो लंका के रणभूमि में वैसे ही मरणासन्न अवस्था में पड़ा था ! पूरा राम दल विलाप कर रहा था //,

☝️ *प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर /,*
✨ *आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस //,*

ये तो जो खड़ा है, वो हनुमान जी का लक्ष्मण है ! मैं कैसे बोलूं, किस मुंह से बोलूं कि हनुमान जी अयोध्या से चले जाएं //,

✒️ अब बारी आयी भरत जी की। अरे! भरत जी तो इतना रोये, कि राम जी को अयोध्या से निकलवाने का कलंक तो वैसे ही लगा है मुझ पे, हनुमान जी का सब मिलके और लगवा दो /,

और दूसरी बात ये कि...!

☝️ *बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना /,*
✨ *अधम कवन जग मोहि समाना //,*

मैंने तो नंदीग्राम में ही अपनी चिता लगा ली थी, वो तो हनुमान जी थे जिन्होंने आकर ये खबर दी कि...!

👏 *रिपु रन जीति सुजस सुर गावत /,*
✨ *सीता सहित अनुज प्रभु आवत //,*

मैं तो बिल्कुल न बोलूं हनुमान जी से अयोध्या छोड़कर चले जाओ, आप किसी और से बुलवा लो /,

🐚 अब बचा कौन..? सिर्फ शत्रुघ्न भैया, जैसे ही सब ने उनकी तरफ देखा, तो शत्रुघ्न भैया बोल पड़े...!

✒️ मैंने तो पूरी रामायण में कहीं नहीं बोला, तो आज ही क्यों बुलवा रहे हो, और वो भी हनुमान जी को अयोध्या से निकलने के लिए ,?,

जिन्होंने ने माता सीता, लखन भैया, भरत भैया सब के प्राणों को संकट से उबारा हो, किसी अच्छे काम के लिए कहते बोल भी देता ! मै तो बिल्कुल भी न बोलूं //,

☀️ *अब बचे तो मेरे राघवेन्द्र सरकार ,* ☀️

👏 माता सीता ने कहा प्रभु ! आप तो तीनों लोकों के स्वामी हो, और देखती हूं आप हनुमान जी से सकुचाते हैं, और आप खुद भी कहते हो कि...!

☝️ *प्रति उपकार करौं का तोरा /,*
✨ *सनमुख होइ न सकत मन मोरा //,*

🙏 आखिर आप के लिए क्या अदेय है प्रभु !

✒️ राघव जी ने कहा, देवी क़र्ज़दार जो हूं, हनुमान जी का, इसीलिए तो ...?

👉 *सनमुख होइ न सकत मन मोरा ,*

☝️ *देवी ! हनुमान जी का कर्ज़ा उतारना आसान नहीं है, इतनी सामर्थ राम में नहीं है, जो "राम नाम" में है //,* ✨

🎯 " क्योंकि " कर्ज़ा उतारना भी तो बराबरी का ही पड़ेगा न...! यदि सुनना चाहती हो तो सुनो - हनुमान जी का कर्ज़ा कैसे उतारा जा सकता है ...?, 〽️

☝️ *पहले हनुमान विवाह करें,*
*लंकेश हरें इनकी जब नारी /,*

✨ *मुंदरी लै रघुनाथ चले,*
*निज पौरुष लांघि अगम्य जे वारी //,*

👉 *आयि कहें, सुधि सोच हरें,*
*तन से, मन से होई जाएं उपकारी /,*

👏 *तब रघुनाथ चुकायि सकें,*
*ऐसी हनुमान की दिव्य उधारी //,*

☝️ देवी ! इतना आसान नहीं है, हनुमान जी का कर्ज़ा चुकाना। मैंने ऐसे ही नहीं कहा था कि...!

🐚 *"सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं "* 〽️

✒️ मैंने बहुत सोच विचार कर कहा था ! लेकिन यदि आप कहती हो तो कल राज्य सभा में बोलूंगा कि हनुमान जी भी कुछ मांग लें /,

दूसरे दिन राज्य सभा में सब एकत्र हुए, सब बड़े उत्सुक थे कि हनुमान जी क्या मांगेंगे, और राम जी क्या देंगे //,

राघव जी ने कहा ! हनुमान सब लोगों ने मेरी बहुत सहायता की और मैंने, सब को कोई न कोई पद दे दिया /,

विभीषण और सुग्रीव को क्रमशः लंका और किष्कन्धा का राजपद, अंगद को युवराज पद। तो तुम भी अपनी इच्छा बताओ...?

✒️ हनुमान जी बोले ! प्रभु आप ने जितने नाम गिनाए, उन सब को एक एक पद मिला है, और आप कहते हो...!

👏 *तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना*

👉 तो फिर यदि मैं दो पद मांगू तो..?

🎯 सब लोग सोचने लगे बात तो हनुमान जी भी ठीक ही कह रहे हैं //,

☝️ राम जी ने कहा ! ठीक है, मांग लो /,

सब लोग बहुत खुश हुए कि आज हनुमान जी का कर्ज़ा चुकता हो जायेगा /,

👉 हनुमान जी ने कहा ! प्रभु जो पद आप ने सबको दिए हैं, उनके पद में राजमद हो सकता है, तो मुझे उस तरह के पद नहीं चाहिए, जिसमें राजमद की शंका हो //,

☀️ तो फिर...! आप को कौन सा पद चाहिए ?

👉 हनुमान जी ने राम जी के दोनों चरण पकड़ लिए, प्रभु ..! हनुमान को तो बस यही दो पद चाहिए //,

👏 *हनुमत सम नहीं कोउ बड़भागी /,*
✨ *नहीं कोउ रामचरण अनुरागी //,*

🐚 यह प्रेरक प्रसंग भी किसी ने भेजा है, रामायण की कथा से !
पढ़ कर मन शांत , प्रसन्न हो उठता है !!

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🕉️🐚‼️ *जय श्री राम* ‼️🐚🕉️

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