Tejaswi shankracharya sewa samiti

Tejaswi shankracharya sewa samiti Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Tejaswi shankracharya sewa samiti, Non-Governmental Organization (NGO), 951/1, Madhav Puram, Meerut City.

तेजस्वी शंकराचार्य सेवा समिति का उद्देश्य, 12A/80G/आयकर मुक्त
सत्ता कुटी वानप्रस्थ आश्रम, शिकारपुर मुजफ्फरनगर,(वानप्रस्थ, गुरुकुल, गौशाला )
चैरिटेबल डिस्पेंसरी,(मेडिकल कैंप,फ्री मेडिसिन)
कन्याओ की शादी, संतों की सेवा,समाज सेवा ज्ञान का प्रकाश करना,

माता लक्ष्मी को प्रिय वस्तुएं:​फूल​माता लक्ष्मी को कमल का फूल सबसे अधिक प्रिय है। कमल का फूल कीचड़ में खिलकर भी पवित्र रह...
14/09/2025

माता लक्ष्मी को प्रिय वस्तुएं:
​फूल
​माता लक्ष्मी को कमल का फूल सबसे अधिक प्रिय है। कमल का फूल कीचड़ में खिलकर भी पवित्र रहता है, जो शुद्धता और धन की देवी का प्रतीक है। इसके अलावा, माता को ये फूल भी अर्पित किए जा सकते हैं:
​गुलाब का फूल
​गेंदे का फूल
​चमेली का फूल
​गुड़हल का फूल
​फल
​माता लक्ष्मी को फल चढ़ाते समय यह ध्यान रखें कि वे फल मीठे और ताजा होने चाहिए। उन्हें ये फल प्रिय हैं:
​नारियल: इसे श्रीफल भी कहा जाता है, जो शुभता का प्रतीक है।
​सिंघाड़ा: यह जल में उगने वाला एक फल है, जो देवी को प्रिय है।
​श्रीफल (बेल): यह भी एक महत्वपूर्ण फल है जो देवी लक्ष्मी को अर्पित किया जाता है।
​अनार
​सेब
​केला
​कमल ककड़ी
​भोग
​माता लक्ष्मी को भोग में सात्विक और मीठी चीजें चढ़ाई जाती हैं। इनमें से कुछ प्रमुख भोग ये हैं:
​खीर: चावल और दूध से बनी खीर लक्ष्मी जी को बहुत प्रिय है।
​बताशे: बताशे, मखाने और मिठाइयाँ खासकर दिवाली की पूजा में अर्पित की जाती हैं।
​केसरी भात: केसर और चावल से बना मीठा भात भी देवी को चढ़ाया जाता है।
​हलवा
​मिठाई (जैसे लड्डू, बर्फी)
​मखाना
​पनीर की मिठाई
​भोग लगाते समय प्रसाद में तुलसी का पत्ता नहीं डालना चाहिए, क्योंकि तुलसी विष्णु जी को प्रिय है, लक्ष्मी जी को नहीं।

1. पहला उपाय : परिवार के सभी सदस्यों से बराबरमात्रा में सिक्के इकट्ठे करके उन्हें मंदिर में दान करें। मतलब यह कि यदि आप ...
08/09/2025

1. पहला उपाय : परिवार के सभी सदस्यों से बराबर
मात्रा में सिक्के इकट्ठे करके उन्हें मंदिर में दान करें। मतलब यह कि यदि आप अपनी जेब से 10 का सिक्का ले रहे हैं तो घर के अन्य सभी सदस्यों से भी 10-10 के सिक्के एकत्रित करने उसे मंदिर में दान कर दें। यदि आपके दादाजी हैं तो उनके साथ जाकर दान करें। यह दान गुरुवार को करें

2. दूसरा उपाय : 16 दिनों तक लगातार कौए,
चिढ़िया, कुत्ते और गाय को रोटी खिलाते रहना चाहिए। उक्त चारों में से जो भी समय पर मिल जाए उसे रोटी खिलाते रहें।

3. तीसरा उपाय : 16 दिनों तक लगातार सुबह और
शाम घर में संध्यावंदन के समय कर्पूर जलाएं और गुड़ में घी मिलाकर उसकी धूप दें।

4. चौथा उपाय : पीपल या बरगद के वृक्ष में जल
चढ़ाते रहना चाहिए। केसर का तिलक लगाते रहना चाहिए। विष्णु भगवान के मंत्र जाप, श्रीमद्भागवत गीता का पाठ करने से पितृदोष चला जाता है। एकादशी के व्रत रखना चाहिए कठोरता के साथ।

5. पांचवां उपाय : पितृ पक्ष में प्रतिदिन नियमित रूप
से पवित्र नदी में स्नान करके पितरों के नाम पर तर्पण करना चाहिए। इसके लिए पितरों को जौ, काला तिल और एक लाल फूल डालकर दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके जल अर्पित करना चाहिए। पितरों के लिए किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध तथा तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं।

6. छठवां उपाय : पितृ पक्ष के दौरान पिंडदान भी
किया जाता है। पितृ पक्ष में पिंडदान का भी महत्व है। सामान्य विधि के अनुसार पिंडदान में चावल, गाय का दूध, घी, गुड़ और शहद को मिलाकर पिंड बनाए जाते हैं और उन्हें पितरों को अर्पित किया जाता है। यह पिंडदान भी कुछ प्रकार का होता है। धार्मिक मान्यता है कि चावल से बने पिंड से पितर लंबे समय तक संतुष्ट रहते हैं।

7. सातवां उपाय : श्राद्ध में पंचबलि कर्म किया जाता
है। अर्थात पांच जीवों को भोजन दिया जाता है। बलि का अर्थ बलि देने नहीं बल्कि भोजन कराना भी होता है। श्राद्ध में गोबलि, श्वान बलि, काकबलि, देवादिबलि और पिपलिकादि कर्म किया जाता है। पितृ पक्ष के दौरान कोओं को प्रतिदिन खाना डालना चाहिए। मान्यता है कि हमारे पूर्वज कौवों के रूप में धरती पर आते हैं। इसके बाद ही ब्राह्मण भोज कराए

🌹नवग्रह व शरीर उत्पत्ति में उनके प्रभाव.....ग्रहस्तु व्यापितं सर्व जगदेत्चराचरम।। यह चराचर जगत् ग्रहों से ही व्याप्त है।...
06/09/2025

🌹नवग्रह व शरीर उत्पत्ति में उनके प्रभाव.....

ग्रहस्तु व्यापितं सर्व जगदेत्चराचरम।।

यह चराचर जगत् ग्रहों से ही व्याप्त है। ग्रहों का असर मानव शरीर की उत्पत्ति में किस प्रकार कार्य करता है आईये इसी विषय पर जानने का प्रयत्न करें।

जैसा कि हम जानतें है कि मानव की उत्पत्ति माँ के गर्भ में करीब नौ महीनों व कुछ दिनों की यात्रा के उपरान्त होती है और इस जीव उत्पत्ति की यात्रा में सातों ग्रहों की भूमिका पूर्ण रूप से होती है। राहू-केतु छाया ग्रहों को छोड़कर।

🌹शुक्रग्रह ..

➡️गर्भधारण के प्रथम महीने पर आधिपत्य शुक्र ग्रह का होता है। उस महीने गर्भ में वीर्य में स्थित शुक्राणु, स्त्री के डिंबाण में अवस्थित रज से मिलकर अण्डे का रूप लेता है। ज्योतिष में वीर्य का नैसर्गिक कारक शुक्र ग्रह होता है।

🌹मंगलग्रह ....

➡️इसी प्रकार द्वितीय महीने पर मंगल ग्रह का आधिपत्य होता है। मंगल एक अग्नि तत्व ग्रह है जिसका कार्य अण्डे को माँस के पिण्ड में परिवर्तित करना होता है। अग्नि तत्व के कारण माता के शरीर में पित्त प्रकृत्ति स्वभाविक रूप से बढती है और गर्भस्थ महिलाओं को उल्टी, चक्कर व बेचैनी के लक्षण परिलक्षित होने लगते है।

🌹बृहस्पतिग्रह ....

➡️इसी क्रम में बृहस्पति ग्रह तृतीय महीने पर अपना आधिपत्य ग्रहण करता है जिसके फलस्वरूप वह मांस का लोथडा पुरुष और स्त्री लिंग के जीव के रूप में परिवर्तित होता है। चूंकी बृहस्पति ग्रह जल तत्व ग्रह है इसके परिणाम स्वरूप पित्त में कमी आती है और द्वितिय माह के लक्षण समाप्त हो एक अन्दरूनी खुशी का एहसास होता है और गर्भस्थ महिला गर्भ को पूर्ण रूप से अनुभव करने लगती है।

🌹सूर्यग्रह .....

➡️माँस के पिण्ड को आकार और आधार प्रदान करने के लिए हड्डियों का नैसर्गिक कारक सूर्य का आधिपत्य चतुर्थ मास में लक्षित होता है। उस माँस रूपी पिण्ड (जीव) के अन्दर हड्डियाँ बन जाती है और शरीर लगभग पूर्णता की ओर अग्रसर होने लगता है।

🌹चन्द्रमाग्रह ..

➡️पंचम माह पर चन्द्रमा का आधिपत्य होता है और जैसा कि ज्योतिष में चन्द्रमा तरल पदार्थ, जल, रक्त प्रवाह इत्यादि का नैसर्गिक कारक होता है। इस माह में शरीर नसों, नाडियों व माँसपेशियों से परिपूर्ण हो जाता है।

🌹शनिग्रह ..

➡️ग्रहों की इस व्यवस्था के क्रम में छठे महीनें शनि का पूर्ण आधिपत्य गर्भस्थ शिशु पर होता है। शनि अपने नैसर्गिक कार्यकत्व के अनुरूप शिशु के शरीर में बाल उत्पन्न करता है साथ ही शिशु के शरीर का रंग गोरे, काले व साँवले का निर्धारण इसी माह शनि के द्वारा होता है।

🌹बुधग्रह .....

➡️सातवें महीनें गर्भस्थ शिशु पर बुध ग्रह का पूर्ण प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। बुध बुद्धि का सामान्य कारक है और गर्भ में पल रहे शिशु को बुद्धि उपलब्ध करवाता है और गर्भस्थ शिशु पर माता के आचार विचार का प्रभाव पडना शुरू हो जाता है। अतः इन दिनों के बाद से माता की सोच, चिन्ता व आचरण आने वाले शिशु की बुद्धि का निर्माण करतें है। जैसा कि हम जानते है महाभारत काल में अभिमन्यु ने गर्भ में ही चक्रव्यूह तोडना सीख लिया था।

🌹लग्नेश .....

➡️आंठवें महीने का आधिपत्य गर्भस्थ की माँ का लग्नेश होता है इस वजह से माँ का स्वास्थ्य का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पूर्ण रूप से पडता है। आठवें महीने में बहुत सावधानी बरतने की जरूरत होती है। यदि आठवें महीनें में माँ का लग्नेश पीडित हो जाये तो गर्भपात की संभावना बढ जाती है और शिशु की मृत्यु तक हो सकती है। इसी वजह से सांतवें महीने का शिशु जन्म लेने पर बच सकता है परन्तु आठवें महीनें का शिशु यदि जन्म ले तो बचने की संभावना कम होती है।

🌹चन्द्रमा .....

➡️नौवें महीनें का अधिपती होने का भार फिर से चन्द्रमा उठाता है और अपनी प्रकृत्ति के अनुसार गर्भ के अन्दर पेट में इतना पानी उत्पन्न करता है कि शिशु जिसमें तैर सके और आराम से जन्म ले सकने मे समर्थ हो जाए।

🌹सूर्य....

➡️नौ महीने के बाद गर्भ पर सूर्य का आधिपत्य होता है तथा सूर्य अपनें स्वाभाविक अग्नि तत्व प्रभाव से पेट में गर्मी पैदा कर शिशु को माता के शरीर से अलग कर देता है। वह जिन माँसपेशियों से जकडा होता है, उनसे छूट जाता है और इस मृत्युलोक में जन्म प्राप्त करता है।

➡️इस प्रकार मानव नौ महीनें में ग्रहों के असर को लेकर देह धारण करता है। जन्म के वक्त आसमान के ग्रहों की स्थिति अर्थात अपनी जन्मकुण्डली के अनुसार इन ग्रहों के द्वारा बनाये जीवन पथ पर अपने विवेक व कर्म द्वारा सुख व तकलीफ हासिल करता हुआ अग्रसर होता है।

//  #नवार्ण_मंत्र_महत्व: #एवं_जप_विधि //•••••••••••••••••••••••••••••माता भगवती जगत् जननी दुर्गा जी की साधना-उपासना के क...
30/08/2025

// #नवार्ण_मंत्र_महत्व: #एवं_जप_विधि //
•••••••••••••••••••••••••••••
माता भगवती जगत् जननी दुर्गा जी की साधना-उपासना के क्रम में, नवार्ण मंत्र एक ऐसा महत्त्वपूर्ण महामंत्र है। नवार्ण अर्थात नौ अक्षरों का इस नौ अक्षर के महामंत्र में नौ ग्रहों को नियंत्रित करने की शक्ति है, जिसके माध्यम से सभी क्षेत्रों में पूर्ण सफलता प्राप्त की जा सकती है और भगवती दुर्गा का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है यह महामंत्र शक्ति साधना में सर्वोपरि तथा सभी मंत्रों-स्तोत्रों में से एक महत्त्वपूर्ण महामंत्र है। यह माता भगवती दुर्गा जी के तीनों स्वरूपों माता महासरस्वती, माता महालक्ष्मी व माता महाकाली की एक साथ साधना का पूर्ण प्रभावक बीज मंत्र है और साथ ही माता दुर्गा के नौ रूपों का संयुक्त मंत्र है और इसी महामंत्र से नौ ग्रहों को भी शांत किया जा सकता है।

नवार्ण मंत्र - || ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे ||
〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
नौ अक्षर वाले इस अद्भुत नवार्ण मंत्र में देवी दुर्गा की नौ शक्तियां समायी हुई है। जिसका सम्बन्ध नौ ग्रहों से भी है।

ऐं = सरस्वती का बीज मन्त्र है ।
ह्रीं = महालक्ष्मी का बीज मन्त्र है ।
क्लीं = महाकाली का बीज मन्त्र है ।

इसके साथ नवार्ण मंत्र के प्रथम बीज ” ऐं “ से माता दुर्गा की प्रथम शक्ति माता शैलपुत्री की उपासना की जाती है, जिस में सूर्य ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।

नवार्ण मंत्र के द्वितीय बीज ” ह्रीं “ से माता दुर्गा की द्वितीय शक्ति माता ब्रह्मचारिणी की उपासना की जाती है, जिस में चन्द्र ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।

नवार्ण मंत्र के तृतीय बीज ” क्लीं “ से माता दुर्गा की तृतीय शक्ति माता चंद्रघंटा की उपासना की जाती है, जिस में मंगल ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।

नवार्ण मंत्र के चतुर्थ बीज ” चा “ से माता दुर्गा की चतुर्थ शक्ति माता कुष्मांडा की उपासना की जाती है, जिस में बुध ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।

नवार्ण मंत्र के पंचम बीज ” मुं “ से माता दुर्गा की पंचम शक्ति माँ स्कंदमाता की उपासना की जाती है, जिस में बृहस्पति ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।

नवार्ण मंत्र के षष्ठ बीज ” डा “ से माता दुर्गा की षष्ठ शक्ति माता कात्यायनी की उपासना की जाती है, जिस में शुक्र ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।

नवार्ण मंत्र के सप्तम बीज ” यै “ से माता दुर्गा की सप्तम शक्ति माता कालरात्रि की उपासना की जाती है, जिस में शनि ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।

नवार्ण मंत्र के अष्टम बीज ” वि “ से माता दुर्गा की अष्टम शक्ति माता महागौरी की उपासना की जाती है, जिस में राहु ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।

नवार्ण मंत्र के नवम बीज ” चै “ से माता दुर्गा की नवम शक्ति माता सिद्धीदात्री की उपासना की जाती है, जिस में केतु ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।

नवार्ण मंत्र साधना विधी:-
〰〰〰〰〰〰〰
विनियोग:
`````````````````
ll ॐ अस्य श्रीनवार्णमंत्रस्य ब्रम्हाविष्णुरुद्राऋषय: गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छंन्दांसी, श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी- महासरस्वत्यो देवता:, ऐं बीजम, ह्रीं शक्ति:, क्लीं कीलकम श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो प्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ll

विलोम बीज न्यास:-
```````````````````````
ॐ च्चै नम: गूदे ।
ॐ विं नम: मुखे ।
ॐ यै नम: वाम नासा पूटे ।
ॐ डां नम: दक्ष नासा पुटे ।
ॐ मुं नम: वाम कर्णे ।
ॐ चां नम: दक्ष कर्णे ।
ॐ क्लीं नम: वाम नेत्रे ।
ॐ ह्रीं नम: दक्ष नेत्रे ।
ॐ ऐं ह्रीं नम: शिखायाम ॥

(विलोम न्यास से सर्व दुखो का नाश होता
है,संबन्धित मंत्र उच्चारण की साथ दहीने
हाथ की उँगलियो से संबन्धित स्थान पे स्पर्श कीजिये)

ब्रम्हारूप न्यास:-
```````````````````````
ॐ ब्रम्हा सनातन: पादादी नाभि पर्यन्तं मां पातु ॥
ॐ जनार्दन: नाभेर्विशुद्धी पर्यन्तं नित्यं मां पातु ॥
ॐ रुद्र स्त्रीलोचन: विशुद्धेर्वम्हरंध्रातं मां पातु ॥
ॐ हं स: पादद्वयं मे पातु ॥
ॐ वैनतेय: कर इयं मे पातु ॥
ॐ वृषभश्चक्षुषी मे पातु ॥
ॐ गजानन: सर्वाड्गानी मे पातु ॥
ॐ सर्वानंन्द मयोहरी: परपरौ देहभागौ मे पातु ॥

( ब्रम्हारूपन्यास से सभी मनोकामनाये पूर्ण
होती है, संबन्धित मंत्र उच्चारण की साथ
दोनों हाथो की उँगलियो से संबन्धित स्थान पे स्पर्श कीजिये )

ध्यान मंत्र:-
〰〰〰
खड्गमं चक्रगदेशुषुचापपरिघात्र्छुलं भूशुण्डीम शिर:
शड्ख संदधतीं करैस्त्रीनयना सर्वाड्ग भूषावृताम ।
नीलाश्मद्दुतीमास्यपाददशकां सेवे महाकालीकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधु कैटभम ॥

माला पूजन:-
〰〰〰〰
जाप आरंभ करने से पूर्व ही इस मंत्र से माला का पुजा कीजिये,इस विधि से आपकी माला भी चैतन्य हो जाती है.

“ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नंम:’’

ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिनी ।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव ॥
ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृहनामी दक्षिणे
करे । जपकाले च सिद्ध्यर्थ प्रसीद मम सिद्धये ॥
ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देही देही सर्वमन्त्रार्थसाधिनी साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा।

अब आप चैतन्य माला से नवार्ण मंत्र का जाप करे-

नवार्ण मंत्र :-
〰〰〰
ll ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ll

नवार्ण मंत्र की सिद्धि 9 दिनो मे 1,25,000 मंत्र जाप से होती है,परंतु आप ऐसे नहीं कर सकते है तो रोज 1,3,5,7,11,21… इत्यादि माला मंत्र जाप भी कर सकते है, इस विधि से सारी इच्छाये पूर्ण होती है, दुख कम होते है और धन की वसूली भी सहज ही हो जाती है। हमे शास्त्र के हिसाब से यह सोलह प्रकार के न्यास देखने मिलती है जैसे ऋष्यादी, कर, हृदयादी, अक्षर, दिड्ग, सारस्वत, प्रथम मातृका, द्वितीय मातृका, तृतीय मातृका, षडदेवी, ब्रम्हरूप, बीज मंत्र , विलोम बीज, षड, सप्तशती ,शक्ति जाग्रण न्यास और बाकी के 8 न्यास गुप्त न्यास नाम से जाने जाते है,इन सारे न्यासो का अपना एक अलग ही महत्व होता है,उदाहरण के लिये शक्ति जाग्रण न्यास से माँ सुष्म रूप से साधको के सामने शीघ्र ही आ जाती है और मंत्र जाप की प्रभाव से प्रत्यक्ष होती है और जब माँ चाहे किसी भी रूप मे क्यू न आये हमारी कल्याण तो निच्छित ही कर देती है।

आप नवरात्री एवं अन्य दिनो मे भी इस मंत्र का जाप कर सकते है। मंत्र जाप काली हकीक माला अथवा रुद्राक्ष माला से ही किया करे।

विशेष:-नवार्ण मंत्र का जप योग्य गुरु से नवाक्षरी दीक्षा के बाद ही फलित होता है ऐसी शास्त्र आज्ञा है।
〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

29/08/2025

आप सभी से अनुरोध है कि तेजस्वी शंकराचार्य सेवा समिति के पेज फॉलो करें और अपने मित्रों को इनवाइट करें
🙏🙏

https://www.facebook.com/profile.php?id=61556312733750

तेजस्वी शंकराचार्य सेवा समिति का उद्देश्य, 12A/80G/आयकर मुक्त
सत्ता कुटी वानप्रस्थ आश्रम, शिकारपुर मुजफ्फरनगर,(वानप्रस्थ, गुरुकुल, गौशाला )
चैरिटेबल डिस्पेंसरी,(मेडिकल कैंप,फ्री मेडिसिन)
कन्याओ की शादी, संतों की सेवा,समाज सेवा ज्ञान का प्रकाश करना,

23/08/2025

तरक्कियों की दौड़ में उसी का जोर चल गया, बना के रास्ता जो भीड़ से निकल गया।

🌹🕉️ॐ🕉️🌹🙏🏼मंत्रों का अधिपति "ओउ्म्" का स्वरूप🙏🏼🌹ओ३म् (ॐ) या ओंकार का नामान्तर प्रणव है। यह ईश्वर का वाचक है। ईश्वर के साथ...
13/08/2025

🌹🕉️ॐ🕉️🌹

🙏🏼मंत्रों का अधिपति "ओउ्म्" का स्वरूप🙏🏼

🌹ओ३म् (ॐ) या ओंकार का नामान्तर प्रणव है। यह ईश्वर का वाचक है। ईश्वर के साथ ओंकार का वाच्य-वाचक-भाव सम्बन्ध नित्य है, सांकेतिक नहीं। संकेत नित्य या स्वाभाविक संबंध को प्रकट करता है। सृष्टि के आदि में सर्वप्रथम ओंकाररूपी प्रणव का ही स्फुरण होता है। तदनंतर सात करोड़ मंत्रों का आविर्भाव होता है। इन मंत्रों के वाच्य आत्मा के देवता रूप में प्रसिद्ध हैं। ये देवता माया के ऊपर विद्यमान रह कर मायिक सृष्टि का नियंत्रण करते हैं। इन में से आधे शुद्ध मायाजगत् में कार्य करते हैं और शेष आधे अशुद्ध या मलिन मायिक जगत् में। इस एक शब्द को ब्रह्मांड का सार माना जाता है, 16 श्लोकों में इसकी महिमा वर्णित है।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹ब्रह्मप्राप्ति के लिए निर्दिष्ट विभिन्न साधनों में प्रणवोपासना मुख्य है। मुण्डकोपनिषद् में लिखा है:🙏🏼

🌹प्रणवो धनु:शरोह्यात्मा ब्रह्मतल्लक्ष्यमुच्यते।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥
कठोपनिषद में यह भी लिखा है कि आत्मा को अधर अरणि और ओंकार को उत्तर अरणि बनाकर मंथन रूप अभ्यास करने से दिव्य ज्ञानरूप ज्योति का आविर्भाव होता है। उसके आलोक से निगूढ़ आत्मतत्व का साक्षात्कार होता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी ओंकार को एकाक्षर ब्रह्म कहा है। मांडूक्योपनिषत् में भूत, भवत् या वर्तमान और भविष्य–त्रिकाल–ओंकारात्मक ही कहा गया है। यहाँ त्रिकाल से अतीत तत्व भी ओंकार ही कहा गया है। आत्मा अक्षर की दृष्टि से ओंकार है और मात्रा की दृष्टि से अ, उ और म रूप है। चतुर्थ पाद में मात्रा नहीं है एवं वह व्यवहार से अतीत तथा प्रपंचशून्य अद्वैत है। इसका अभिप्राय यह है कि ओंकारात्मक शब्द ब्रह्म और उससे अतीत परब्रह्म दोनों ही अभिन्न तत्व हैं।🙏🏻🙏🏼🙏🏼

🌹वैदिक वाङ्मय के सदृश धर्मशास्त्र, पुराण तथा आगम साहित्य में भी ओंकार की महिमा सर्वत्र पाई जाती है। इसी प्रकार बौद्ध तथा जैन सम्प्रदाय में भी सर्वत्र ओंकार के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति देखी जाती है। प्रणव शब्द का अर्थ है– प्रकर्षेणनूयते स्तूयते अनेन इति, नौति स्तौति इति वा प्रणव:।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹प्रणव का बोध कराने के लिए उसका विश्लेषण आवश्यक है। यहाँ प्रसिद्ध आगमों की प्रक्रिया के अनुसार विश्लेषण क्रिया का कुछ दिग्दर्शन कराया जाता है। ओंकार के अवयवों का नाम है–अ, उ, म, बिन्दु, अर्धचंद्र रोधिनी, नाद, नादांत, शक्ति, व्यापिनी या महाशून्य, समना तथा उन्मना। इनमें से अकार, उकार और मकार ये तीन सृष्टि, स्थिति और संहार के सपादक ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र के वाचक हैं। प्रकारांतर से ये जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति तथा स्थूल, सूक्ष्म और कारण अवस्थाओं के भी वाचक हैं। बिन्दु तुरीय दशा का द्योतक है। प्लुत तथा दीर्घ मात्राओं का स्थितिकाल क्रमश: संक्षिप्त होकर अंत में एक मात्रा में पर्यवसित हो जाता है। यह ह्रस्व स्वर का उच्चारण काल माना जाता है। इसी एक मात्रा पर समग्र विश्व प्रतिष्ठित है। विक्षिप्त भूमि से एकाग्र भूमि में पहुँचने पर प्रणव की इसी एक मात्रा में स्थिति होती है। एकाग्र से निरोध अवस्था में जाने के लिए इस एम मात्रा का भी भेद कर अर्धमात्रा में प्रविष्ट हुआ जाता है। तदुपरांत क्रमश: सूक्ष्म और सूक्ष्मतर मात्राओं का भेद करना पड़ता है। बिन्दु अर्धमात्रा है। उसके अनंतर प्रत्येक स्तर में मात्राओं का विभाग है। समना भूमि में जाने के बाद मात्राएँ इतनी सूक्ष्म हो जाती हैं कि किसी योगी अथवा योगीश्वरों के लिए उसके आगे बढ़वा संभव नहीं होता, अर्थात् वहाँ की मात्रा वास्तव में अविभाज्य हो जाती है। आचार्यो का उपदेश है कि इसी स्थान में मात्राओं को समर्पित कर अमात्र भूमि में प्रवेश करना चाहिए। इसका थोड़ा सा आभास मांडूक्य उपनिषद् में मिलता है।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹बिन्दु मन का ही रूप है। मात्राविभाग के साथ-साथ मन अधिकाधिक सूक्ष्म होता जाता है। अमात्र भूमि में मन, काल, कलना, देवता और प्रपंच, ये कुछ भी नहीं रहते। इसी को उन्मनी स्थिति कहते हैं। वहाँ स्वयंप्रकाश ब्रह्म निरंतर प्रकाशमान रहता है।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹योगी संप्रदाय में स्वच्छन्द तंत्र के अनुसार... ओंकारसाधना का एक क्रम प्रचलित है। उसके अनुसार "अ" समग्र स्थूल जगत् का द्योतक है और उसके ऊपर स्थित कारणजगत् का वाचक है मकार। कारण सलिल में विधृत, स्थूल आदि तीन जगतों के प्रतीक अ, उ और म हैं। ऊर्ध्व गति के प्रभाव से शब्दमात्राओं का मकार में लय हो जाता है। तदनंतर मात्रातीत की ओर गति होती है। म पर्यत गति को अनुस्वार गति कहते हैं। अनुस्वार की प्रतिष्ठा अर्धमात्रा में विसर्गरूप में होती है। इतना होने पर मात्रातीत में जाने के लिए द्वार खुल जाता है। वस्तुत: अमात्र की गति बिंदु से ही प्रारंभ हो जाती है।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹तंत्र शास्त्र में इस प्रकार का मात्राविभाग नौ नादों की सूक्ष्म योगभूमियां के नाम से प्रसिद्ध है। इस प्रसंग में यह स्मरणीय है कि बिंदु अशेष वेद्यों के अभेद ज्ञान का ही नाम है और नाद अशेष वाचकों के विमर्शन का नाम है। इसका तात्पर्य यह है कि अ, उ और म प्रणव के इन तीन अवयवों का अतिक्रमण करने पर अर्थतत्व का अवश्य ही भेद हो जाता है। उसका कारण यह है कि यहाँ योगी को सब पदार्थो के ज्ञान के लिए सर्वज्ञत्व प्राप्त हो जाता है एवं उसके बाद बिंदुभेद करने पर वह उस ज्ञान का भी अतिक्रमण कर लेता है। अर्थ और ज्ञान इन दोनों के ऊपर केवल नाद ही अवशिष्ट रहता है एवं नाद की नादांत तक की गति में नाद का भी भेद हो जाता है। उस समय केवल कला या शक्ति ही विद्यमान रहती है। जहाँ शक्ति या चित् शक्ति प्राप्त हो गई वहाँ ब्रह्म का प्रकाशमान होना स्वत: ही सिद्ध है।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹इस प्रकार प्रणव के सूक्ष्म उच्चारण द्वारा विश्व का भेद होने पर विश्वातीत तक सत्ता की प्राप्ति हो जाती है। स्वच्छंद तंत्र में यह दिखाया गया है कि ऊर्ध्व गति में किस प्रकार कारणों का परित्याग होते होते अखंड पूर्णतत्व में स्थिति हो जाती है। "अ" ब्रह्मा का वाचक है; उच्चारण द्वारा हृदय में उसका त्याग होता है। "उ" विष्णु का वाचक हैं; उसका त्याग कंठ में होता है तथा "म" रुद्र का वाचक है ओर उसका त्याग तालुमध्य में होता है। इसी प्रणाली से ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि तथा रुद्रग्रंथि का छेदन हो जाता है। तदनंतर बिंदु है, जो स्वयं ईश्वर रूप है अर्थात् बिंदु से क्रमश: ऊपर की ओर वाच्यवाचक का भेद नहीं रहता। भ्रूमध्य में बिंदु का त्याग होता है। नाद सदाशिवरूपी है। ललाट से मूर्धा तक के स्थान में उसका त्याग करना पड़ता है। यहाँ तक का अनुभव स्थूल है। इसके आगे शक्ति का व्यापिनी तथा समना भूमियों में सूक्ष्म अनुभव होने लगता है। इस भूमि के वाच्य शिव हैं, जो सदाशिव से ऊपर तथा परमशिव से नीचे रहते हैं। मूर्धा के ऊपर स्पर्शनुभूति के अनंतर शक्ति का भी त्याग हो जाता है एवं उसके ऊपर व्यापिनी का भी त्याग हो जाता है। उस समय केवल मनन मात्र रूप का अनुभव होता है। यह समना भूमि का परिचय है। इसके बाद ही मनन का त्याग हो जाता है। इसके उपरांत कुछ समय तक मन के अतीत विशुद्ध आत्मस्वरूप की झलक दीख पड़ती है। इसके अनंतर ही परमानुग्रहप्राप्त योगी का उन्मना शक्ति में प्रवेश होता है।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹इसी को परमपद या परमशिव की प्राप्ति समझना चाहिए और इसी को एक प्रकार से उन्मना का त्याग भी माना जा सकता है। इस प्रकार ब्रह्मा से शिवपर्यन्त छह कारणों का उल्लंघन हो जाने पर अखंड परिपूर्ण सत्ता में स्थिति हो जाती है।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹नानक क्यों कहते हैं ...
गुरु नानक जी का शब्द एक ओंकार सतनाम बहुत प्रचलित तथा शत्प्रतिशत सत्य है। एक ओंकार ही सत्य नाम है। राम, कृष्ण सब फलदायी नाम ओंकार पर निहित हैं तथा ओंकार के कारण ही इनका महत्व है। बाँकी नामों को तो हमने बनाया है परंतु ओंकार ही है जो स्वयंभू है तथा हर शब्द इससे ही बना है। हर ध्वनि में ओउ्म शब्द होता है।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹महत्व तथा लाभ ...
ओउ्म तीन शब्द 'अ' 'उ' 'म' से मिलकर बना है जो त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा त्रिलोक भूर्भुव: स्व: भूलोक भुव: लोक तथा स्वर्ग लोक का प्रतीक है।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹लाभ ..….
पद्माशन में बैठ कर इसका जप करने से मन को शांति तथा एकाग्रता की प्राप्ति होती है, वैज्ञानिकों तथा ज्योतिषियों को कहना है कि ओउ्म तथा एकाक्षरी मंत्र[4] का पाठ करने में दाँत, नाक, जीभ सब का उपयोग होता है जिससे हार्मोनल स्राव कम होता है तथा ग्रंथि स्राव को कम करके यह शब्द कई बीमारियों से रक्षा तथा शरीर के सात चक्र (कुंडलिनी) को जागृत करता है।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹विवेचना ....
तस्य वाचकः प्रणवः
उस ईश्वर का वाचक प्रणव 'ॐ' है।
अक्षरका अर्थ जिसका कभी क्षरण न हो। ऐसे तीन अक्षरों— अ उ और म से मिलकर बना है ॐ। माना जाता है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्डसे सदा ॐ की ध्वनी निसृत होती रहती है। हमारी और आपके हर श्वास से ॐ की ही ध्वनि निकलती है। यही हमारे-आपके श्वास की गति को नियंत्रित करता है। माना गया है कि अत्यन्त पवित्र और शक्तिशाली है ॐ। किसी भी मंत्र से पहले यदि ॐ जोड़ दिया जाए तो वह पूर्णतया शुद्ध और शक्ति-सम्पन्न हो जाता है। किसी देवी-देवता, ग्रह या ईश्वर के मंत्रों के पहले ॐ लगाना आवश्यक होता है, जैसे, श्रीराम का मंत्र — ॐ रामाय नमः, विष्णु का मंत्र — ॐ विष्णवे नमः, शिव का मंत्र — ॐ नमः शिवाय, प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि ॐ से रहित कोई मंत्र फलदायी नहीं होता, चाहे उसका कितना भी जाप हो। मंत्र के रूप में मात्र ॐ भी पर्याप्त है। माना जाता है कि एक बार ॐ का जाप हज़ार बार किसी मंत्र के जाप से महत्वपूर्ण है। ॐ का दूसरा नाम प्रणव (परमेश्वर) है। "तस्य वाचकः प्रणवः" अर्थात् उस परमेश्वर का वाचक प्रणव है। इस तरह प्रणव अथवा ॐ एवं ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। ॐ अक्षर है इसका क्षरण अथवा विनाश नहीं होता।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹छान्दोग्योपनिषद् में ऋषियों ने गाया है -...
ॐ इत्येतत् अक्षरः (अर्थात् ॐ अविनाशी, अव्यय एवं क्षरण रहित है।)
ॐ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का प्रदायक है। मात्र ॐ का जप कर कई साधकों ने अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर ली। कोशीतकी ऋषि निस्संतान थे, संतान प्राप्तिके लिए उन्होंने सूर्यका ध्यान कर ॐ का जाप किया तो उन्हे पुत्र प्राप्ति हो गई।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹गोपथ ब्राह्मण ग्रन्थ में उल्लेख है कि जो "कुश" के आसन पर पूर्व की ओर मुख कर एक हज़ार बार ॐ रूपी मंत्र का जाप करता है, उसके सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹सिद्धयन्ति अस्य अर्थाः सर्वकर्माणि च।।
श्रीमद्भागवत् में ॐ के महत्व को कई बार रेखांकित किया गया है। इसके आठवें अध्याय में उल्लेख मिलता है कि जो ॐ अक्षर रूपी ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ शरीर त्याग करता है, वह परम गति प्राप्त करता है।🙏🏻🙏🏼🙏🏼

🌹ॐ अर्थात् ओउम् तीन अक्षरों से बना है, जो सर्व विदित है। अ उ म्। "अ" का अर्थ है आर्विभाव या उत्पन्न होना, "उ" का तात्पर्य है उठना, उड़ना अर्थात् विकास, "म" का मतलब है मौन हो जाना अर्थात् "ब्रह्मलीन" हो जाना। ॐ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और पूरी सृष्टि का द्योतक है। ॐ में प्रयुक्त "अ" तो सृष्टि के जन्म की ओर इंगित करता है, वहीं "उ" उड़ने का अर्थ देता है, जिसका मतलब है "ऊर्जा" सम्पन्न होना। किसी ऊर्जावान मंदिर या तीर्थस्थल जाने पर वहाँ की अगाध ऊर्जा ग्रहण करने के बाद व्यक्ति स्वप्न में स्वयं को आकाश में उड़ता हुआ देखता है। मौन का महत्व ज्ञानियों ने बताया ही है। अंग्रजी में एक उक्ति है — "साइलेंस इज़ सिल्वर ऍण्ड ऍब्सल्यूट साइलेंस इज़ गोल्ड"। श्री गीता जी में परमेश्वर श्रीकृष्ण ने मौन के महत्व को प्रतिपादित करते हुए स्वयं को मौनका ही पर्याय बताया है —🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹मौनं चैवास्मि गुह्यानां...
"ध्यान बिन्दुपनिषद्" के अनुसार ॐ मन्त्र की विशेषता यह है कि पवित्र या अपवित्र सभी स्थितियों में जो इसका जप करता है, उसे लक्ष्य की प्राप्ति अवश्य होती है। जिस तरह कमल-पत्र पर जल नहीं ठहरता है, ठीक उसी तरह जप-कर्ता पर कोई कलुष नहीं लगता।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹🌹तैत्तिरीयोपनिषद शिक्षावल्ली अष्टमोऽनुवाकः में ॐ के विषय में कहा गया हैः-
ओमिति ब्रह्म । ओमितीदँसर्वम् । ओमित्येतदनुकृतिर्हस्म वा अप्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति । ओमिति सामानि गायन्ति ।
ओँशोमिति शस्त्राणि शँसन्ति । ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति । ओमिति ब्रह्मा प्रसौति । ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति ।
ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति ब्रह्मैवोपाप्नोति ॥ १ ॥🌹🌹

🌹अर्थातः- ॐ ही ब्रह्म है। ॐ ही यह प्रत्यक्ष जगत् है। ॐ ही इसकी (जगत की) अनुकृति है। हे आचार्य! ॐ के विषय में और भी सुनाएँ। आचार्य सुनाते हैं। ॐ से प्रारम्भ करके साम गायक सामगान करते हैं। ॐ-ॐ कहते हुए ही शस्त्र रूप मन्त्र पढ़े जाते हैं। ॐ से ही अध्वर्यु प्रतिगर मन्त्रों का उच्चारण करता है। ॐ कहकर ही अग्निहोत्र प्रारम्भ किया जाता है। अध्ययन के समय ब्राह्मण ॐ कहकर ही ब्रह्म को प्राप्त करने की बात करता है। ॐ के द्वारा ही वह ब्रह्म को प्राप्त करता है।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹🌹सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति
तपाँसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदँ संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥कठोपनिषद🌹🌹

🌹अर्थातः- सारे वेद जिस पद का वर्णन करते हैं, समस्त तपों को जिसकी प्राप्ति के साधक कहते हैं, जिसकी इक्षा से (मुमुक्षुजन) ब्रह्मचर्य का पालन करते है, उस पद को मैं तुमसे संक्षेप में कहता हूँ। ॐ यही वह पद है।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹🌹ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं
सामभिर्यत्तत्कवयो वेदयन्ते।
तमोंकारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान्
यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति॥प्रश्नोपनिषद🌹🌹

🌹अर्थातः- साधक ऋग्वेद द्वारा इस लोक को, यजुर्वेद द्वारा आन्तरिक्ष को और सामवेद द्वारा उस लोक को प्राप्त होता है जिसे विद्वजन जानते हैं। तथा उस ओंंकाररूप आलम्बन के द्वारा ही विद्वान् उस लोक को प्राप्त होता है जो शान्त, अजर, अमर, अभय एवं सबसे पर (श्रेष्ठ) है।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹🌹प्रणवो धनुः शरो ह्यात्माब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।
अप्रमत्तेनवेद्धव्यं शरवत्तन्मयोभवेत॥मुण्डकोपनिषद्🌹🌹

🌹अर्थातः- प्रणव धनुषहै, (सोपाधिक) आत्मा बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है। उसका सावधानी पूर्वक बेधन करना चाहिए और बाण के समान तन्मय हो जाना चाहिए।।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹🌹ओमित्येतदक्षरमिदंसर्व तस्योपव्याख्यानं भूत,
भवभ्दविष्यदिति सर्वमोंंकार एव।
यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकार एव॥माण्डूक्योपनिषद🌹🌹

🌹अर्थातः-ॐ यह अक्षर ही सब कुछ है। यह जो कुछ भूत, भविष्यत् और वर्तमान है उसी की व्याख्या है; इसलिये यह सब ओंकार ही है। इसके सिवा जो अन्य त्रिकालातीत वस्तु है वह भी ओंकार ही है।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹🌹सोऽयमात्माध्यक्षरमोंकारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति।।माण्डूक्योपनिषद् 🌹🌹

🌹वह यह आत्मा ही अक्षर दृष्टि से ओंंकार है; वह मात्राओं का विषय करके स्थित है। पाद ही मात्रा है और मात्रा ही पाद है; वे मात्रा अकार, उकार और मकार हैं।🙏🏼🙏🏼

🌹सनातन धर्म ही नहीं, भारत के अन्य धर्म-दर्शनों में भी ॐ को महत्व प्राप्त है। बौद्ध-दर्शन में "मणिपद्मेहुम" का प्रयोग जप एवं उपासना के लिए प्रचुरता से होता है। इस मंत्र के अनुसार ॐ को "मणिपुर" चक्र में अवस्थित माना जाता है। यह चक्र दस दल वाले कमल के समान है। जैन दर्शन में भी ॐ के महत्व को दर्शाया गया है। महात्मा कबीर र्निगुण सन्त एवं कवि थे। उन्होंने भी ॐ के महत्व को स्वीकारा और इस पर "साखियाँ" भी लिखीं —
ओ ओंकार आदि मैं जाना।
लिखि औ मेटें ताहि ना माना ॥
ओ ओंकार लिखे जो कोई।
सोई लिखि मेटणा न होई ॥🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹गुरु नानक ने ॐ के महत्वको प्रतिपादित करते हुए लिखा है —

ओम सतनाम कर्ता पुरुष निभौं निर्वेर अकालमूर्त
यानी ॐ सत्यनाम जपनेवाला पुरुष निर्भय, बैर-रहित एवं "अकाल-पुरुष के" सदृश हो जाता है।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

🌹🌹"ॐ" ब्रह्माण्ड का नाद है एवं मनुष्य के अन्तर में स्थित ईश्वर का प्रतीक🌹🌹🌹हरःहरःमहादेव🌹🌹

मुक्ति शरीर त्यागने के बाद जीव की चार गतियां -----(१)   सद्योमुक्ति(२)   क्रममुक्ति अर्थात्  उत्तरायण-गति अर्थात् देवयान...
30/07/2025

मुक्ति
शरीर त्यागने के बाद जीव की चार गतियां -----

(१) सद्योमुक्ति

(२) क्रममुक्ति अर्थात् उत्तरायण-गति अर्थात् देवयान-मार्ग ।

(३) पितृयान-मार्ग अर्थात् दक्षिणायन-गति

(४) जायस्व-म्रियस्व गति

इन चारों गतियों का वर्णन वेदों , उपनिषदों तथा पुराणादिकों में पाया जाता है , उन्हीं के आधार पर यहां लिखते हैं ===

(१) सद्योमुक्ति == जीवन-मुक्त सिद्ध-महात्मा , ब्रह्मविद्-वरिष्ठ अपने जीवनकाल में ही अनेक जन्मों के सञ्चित शुभ-कर्मों को ब्रह्मज्ञान-रूपी अग्नि से भस्म कर देते हैं , अतः ब्रह्म-साक्षात्कार के अनन्तर होने वाले जीवन-यात्रा-निर्वाह सम्बन्धी कर्मों में आसक्ति-ममता न होने के कारण इन कर्मों का फल उन्हें नहीं मिलता , प्रारब्ध-कर्मों को वे भोगकर क्षीण कर देते हैं ।

प्रारब्ध-सञ्चित-क्रियमाण तीन कर्मों के फलस्वरूप तथा स्थूल-सूक्ष्म-कारण तीन शरीरों के माध्यम से ही जीव पुनर्जन्म को प्राप्त करता है , अतः ऐसे जीवन-मुक्त-महात्मा जब स्थूल-शरीर छोड़ते हैं , तो तीनों कर्मों के नष्ट हो जाने पर भीतर के सूक्ष्म-कारण शरीर को त्याग कर किसी दूसरे लोक या शरीर में नहीं जाते , तत्काल वहीं , उसी समय मुक्त हो जाते हैं ।

जैसे घटाकाश का आकाश घड़ा फूटने पर महाकाश में लीन होता है , वैसे ये महात्मा ब्रह्म में लीन हो जाते हैं ।

वेद में कहा है ---- "न स पुनरावर्तते , अनावृत्ति शब्दात्"

गीता में भी भगवान् कहते हैं ---- "यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ।"

(२) देवयान-गति == इसे उत्तरायण-मार्ग भी कहते हैं , यह योगियों के लिए है , सर्व-साधारण जीवों के लिए नहीं ।

यहां काल से तात्पर्य है --- जो योगी ध्यान-धारणा-समाधि के द्वारा ब्रह्मानुभूति के अनन्तर शरीर त्यागते हैं , वे दिन-रात्रि , शुक्ल पक्ष - कृष्ण पक्ष , उत्तरायण व दक्षिणायन कभी भी शरीर त्यागें , उनके सूक्ष्म-कारण शरीर को ज्योति तथा दिन के अभिमानी देवता ले जाते हैं और वह शुक्ल-पक्ष के अभिमानी देवता को सौंपते है ।

उसके अभिमानी देवता उत्तरायण के छः महीनों के अभिमानी देवता को सौंपते हैं , उससे उनके शरीर को वर्ष का अभिमानी देवता लेता है , वर्ष का अभिमानी देवता सूर्य-मण्डल में ले जाता है , वहां से वह चन्द्र-मण्डल को प्राप्त करता है , चन्द्रमा से विद्युत को प्राप्त करता है , वहां से अमानव-पुरुष ब्रह्म को प्राप्त करता है ------ यह देवयान-मार्ग है , इसको प्राप्त होने वाला योगी पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता है -------- ऐसा बृहदारण्यकोपनिषद् के छठवें अध्याय के दूसरे ब्राह्मण के पन्द्रहवें मन्त्र में आया है ।

मूल मन्त्र इस प्रकार है ---- "ते य एवमेतद्विदुर्ये चामी अरण्ये श्रद्धां सत्यमुपासते तेऽर्चिरभिसंभवन्ति ।
अर्चिषोऽहः ।
अह्न आपूर्यमाणपक्षम् ।
आपूर्यमाणपक्षाद्यान् षण्मासानुदङ्ङादित्य एति ।
मासेभ्यो देवलोकम् ।
देवलोकादादित्यम् ।
आदित्याद्वैद्युतम् ।
तान् वैद्युतान् पुरुषो मानस एत्य ब्रह्मलोकान् गमयति ।
ते तेषु ब्रह्मलोकेषु पराः परावतो वसन्ति ।
तेषां न पुनरावृत्तिः ॥ " 【बृह. ६,२.१५】

देवयान-गति ऐसे ब्रह्मवेत्ताओं की गति है , जिनको पूर्ण-ब्रह्म का बोध हो चुका है किन्तु ब्रह्मलोक का सुख भोगने के अनन्तर ब्रह्मलोक से मुक्त होना चाहते हैं , उन योगियों को ब्रह्मलोक के भोग के अनन्तर ब्रह्मलोक से मुक्ति मिलती है ।

इन औपनिषदिक-मन्त्रों में कहे गये दिन-पक्ष-मास का अर्थ काल नहीं है , किन्तु काल के अभिमानी देवताओं से इनका तात्पर्य है ।

इसी बात को भगवान् ने गीता के आठवें अध्याय के तेइसवें व चौबीसवें श्लोक में कहा है -----

"यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ।।"

अर्थ = हे अर्जुन ! जिस काल में (यहाँ काल शब्द से मार्ग समझना चाहिए, क्योंकि आगे के श्लोकों में भगवान ने इसका नाम 'सृति', 'गति' ऐसा कहा है।) शरीर त्याग कर गए हुए योगीजन तो वापस न लौटने वाली गति को और जिस काल में गए हुए वापस लौटने वाली गति को ही प्राप्त होते हैं, उस काल को अर्थात दोनों मार्गों को कहूँगा । 【२३】

जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि-अभिमानी देवता हैं, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल पक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं । 【२४】

अब यहां कुछ लोग शंका करते हैं कि उपनिषद् तथा गीता में पक्ष आदि से काल का ही ज्ञान होता है , क्योंकि यदि काल के अभिमानी देवता होते , तो भीष्म-पितामह दक्षिणायन में शरीर छोड़ने वाले थे , किन्तु उन्होंने पिता के वरदान तथा योगशक्ति के प्रभाव से उत्तरायण की प्रतीक्षा की , यदि समय का प्रतिबन्ध न होता तो उत्तरायण की प्रतीक्षा न करते , इससे काल सिद्ध होता है !

तो इसका उत्तर है ---- भीष्म-पितामह पूर्व जन्म में आठ वसुओं में अन्तिम द्यु नामक वसु थे ।

वशिष्ठ जी का इन वसुओं को शाप था , क्योंकि ये आठों भाई वशिष्ठ जी की नन्दिनी गऊ चुराकर ले जा रहे थे , पता चलने पर वशिष्ठ जी उनके पीछे पड़ गये , सात वसु तो भागने में सफल हुये किन्तु अन्तिम आठवें वसु पकड़ में आ गये ।

गुरु वशिष्ठ जी ने सात वसुओं को शाप दिया कि अगले जन्म में तुम्हारी माता के हाथों ही मृत्यु होगी , आठवें वसु से कहा 'तुम दीर्घजीवी होवोगे तथा इच्छामृत्यु होगी' , वही आठवें वसु दूसरे जन्म में देवव्रत हुये ।

इनको गुरु वशिष्ठ जी तथा पिता शान्तनु जी का स्वेच्छा-मृत्यु का वरदान था , अतः उन्होंने काल की प्रतीक्षा की ------ यह कथा महाभारत के आदिपर्व के सम्भव उपपर्व में आई है ।

अतः उत्तरायण काल का योगी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता , युक्त-योगी जब भी चाहें दिन में या रात्रि में , शुक्ल-पक्ष में या कृष्ण-पक्ष में , दक्षिणायन में या उत्तरायण में ------ कभी भी शरीर त्यागें , उन पर काल का प्रभाव नहीं पड़ता , किन्तु शुक्ल-दक्षिण-उत्तरायण आदि के देवता उनको देवलोक में ले जाते हैं ।

यदि दिन- शुक्ल पक्ष- उत्तरायण आदि का नियम होता तो दिन - शुक्ल पक्ष - उत्तरायण आदि में भू-मण्डल में न जाने कितने अरबों-खरबों जीव शरीर त्यागते हैं , उन सबकी भी मुक्ति हो जानी चाहिए, अतः यह नियम देवयान वाले योगीयों के लिए है , सर्व-साधारण के लिए नहीं ----- यह सिद्ध हुआ ।

(३) पितृयान-मार्ग == बृहदारण्यकोपनिषद् के ही छठें अध्याय में दूसरे ब्राह्मण के सोहलवें मन्त्र में दक्षिणायन-मार्ग से जाने वाले योगियों के विषय में कहा है------

"अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकाञ्जयन्ति ते धूममभिसंभवन्ति ।
धूमाद्रात्रिम् ।
रात्रेरपक्षीयमाणपक्षम् ।
अपक्षीयमाणपक्षाद्यान् षण्मासान् दक्षिणादित्य एति ।
मासेभ्यः पितृलोकम् ।
पितृलोकाच्चन्द्रम् ।
ते चन्द्रं प्राप्यान्नं भवन्ति ।
तांस्तत्र देवा यथा सोमं राजानमाप्यायस्वापक्षीयस्वेत्येवमेनांस्तत्र भक्षयन्ति ।
तेषां यदा तत्पर्यवैत्यथेममेवाकाशमभिनिष्पद्यन्ते ।
आकाशाद्वायुम् ।
वायोर्वृष्टिम् ।
वृष्टेः पृथिवीम् ।
ते पृथिवीं प्राप्यान्नं भवन्ति ।
ते पुनः पुरुषाग्नौ हूयन्ते ततो योषाग्नौ जायन्ते ।
लोकान् प्रत्युथायिनस्त एवमेवानुपरिवर्तन्ते ।
अथ य एतौ पन्थानौ न विदुस्ते कीटाः पतङ्गा यदिदं दन्दशूकम् ॥" 【बृ ६,२.१६】

अर्थात् जो सकाम भाव से यज्ञ-दान-तपस्या से लोकों को जीतते हैं , वे शरीर त्यागने के अनन्तर धुएं के रूप में प्राप्त होते हैं , धूम से रात्रि , रात्रि से कृष्ण-पक्ष , कृष्ण-पक्ष से दक्षिणायन का महीना ।

इन छः मासों से पितृलोक को , पितृलोक से चन्द्र-मण्डल को प्राप्त करते हैं , वहां पर बहुत काल तक सुख भोगते हैं, (पुण्य क्षीण होने पर) भाफ , भाफ से कुहरा , कुहरे से बादल , बादल से जल के बूंदों द्वारा अन्न होते हैं ।

वहां पर जैसे देवता सोम का पान करते हैं , वैसे ही देवता उसको खाते हैं , वहां से वह आकाश को प्राप्त करता है , आकाश से वायु में आता है , वायु से वर्षा में आता है , वर्षा से पृथ्वी में अन्न-जल-रस को प्राप्त करता है , अन्न-जल के रूप में भावी पिता के पेट में होता है ।

यदि कच्चा अन्न या फल टूटकर गिर जाता है , तो अन्तराल में नष्ट हो जाता है , यदि उस अन्न आदि को ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी , संन्यासी या नपुंसक सेवन करता है , या ऊसर में गिरता है तो भी नष्ट हो जाता है ।

यदि पुरुष सेवन करता है , तो पुरुष के पेट की अग्नि में आता है , पिता के पेट की अग्नि में २८ दिन पकने के बाद क्रमानुसार रक्त-मांस-अस्थि-मेद-मज्जा के अनन्तर वीर्य के रूप में होता है ।

पिता द्वारा माता के पेट की अग्नि में आता है , उसमें नौ महीने रहकर पुरुष होता है ।

तद्-तद् अन्न-फल आदि को कोई पशु-पक्षी भक्षण करता है , तो पशु-पक्षी का या कीट-पतंग-खटमल आदि का जन्म होता है ।

पुरूष द्वारा स्त्री के शरीर में रहने के बाद पुरुष के रुप में जन्म लेकर मनुष्य शरीर में आता है ----- इस बात को संक्षेप में भगवान् ने गीता के आठवें अध्याय के पच्चीसवें श्लोक में कहते हैं --

"धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥"

अर्थात् = जिस मार्ग में धूमाभिमानी देवता है, रात्रि अभिमानी देवता है तथा कृष्ण पक्ष का अभिमानी देवता है और दक्षिणायन के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गया हुआ सकाम कर्म करने वाला योगी उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले गया हुआ चंद्रमा की ज्योत को प्राप्त होकर स्वर्ग में अपने शुभ कर्मों का फल भोगकर वापस आता ह ।

(४) जायस्व-म्रियस्व मार्ग == यह गति सर्व-साधारण जीवों की है , जो मनुष्य शरीर प्राप्त करके सामान्य रूप से तीन प्रकार के शुभ-अशुभ तथा मिश्रित कर्म करते हैं , वे शरीर त्यागने के बाद शुभ-कर्मों से सुख-प्रधान देव शरीर प्राप्त करते हैं ।

जो पाप करते हैं , वे नरक भोगने के लिए यातनामय देह प्राप्त करते हैं , उसके बाद चौरासी लाख योनियों को प्राप्त करते हैं तथा जो मिले-जुले कर्म करते हैं , वह मनुष्य शरीर प्राप्त करते हैं ------ यह सर्व-साधारण का मार्ग है ।

Address

951/1, Madhav Puram
Meerut City
250002

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Tejaswi shankracharya sewa samiti posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share