SiyaRam-Official

SiyaRam-Official Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from SiyaRam-Official, Nonprofit Organization, Shree Ram Mandir, Meerut City.

03/04/2026

श्रीरामचरित मानस (अयोध्याकाण्ड)

।। कौसल्या सुनयना-संवाद, श्री सीताजी का शील ।।

दोहा :

* लखनु रामु सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु।
गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु॥282॥

भावार्थ:-कौसल्याजी ने दुःख भरे हृदय से कहा- श्री राम, लक्ष्मण और सीता वन में जाएँ, इसका परिणाम तो अच्छा ही होगा, बुरा नहीं। मुझे तो भरत की चिन्ता है॥282॥

चौपाई :

* ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी॥
राम सपथ मैं कीन्हि न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ॥1॥

भावार्थ:-ईश्वर के अनुग्रह और आपके आशीर्वाद से मेरे (चारों) पुत्र और (चारों) बहुएँ गंगाजी के जल के समान पवित्र हैं। हे सखी! मैंने कभी श्री राम की सौगंध नहीं की, सो आज श्री राम की शपथ करके सत्य भाव से कहती हूँ-॥1॥

* भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई॥
कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे॥2॥

भावार्थ:-भरत के शील, गुण, नम्रता, बड़प्पन, भाईपन, भक्ति, भरोसे और अच्छेपन का वर्णन करने में सरस्वतीजी की बुद्धि भी हिचकती है। सीप से कहीं समुद्र उलीचे जा सकते हैं?॥2॥

* जानउँ सदा भरत कुलदीपा। बार बार मोहि कहेउ महीपा॥
कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ। पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ॥3॥

भावार्थ:-मैं भरत को सदा कुल का दीपक जानती हूँ। महाराज ने भी बार-बार मुझे यही कहा था। सोना कसौटी पर कसे जाने पर और रत्न पारखी (जौहरी) के मिलने पर ही पहचाना जाता है। वैसे ही पुरुष की परीक्षा समय पड़ने पर उसके स्वभाव से ही (उसका चरित्र देखकर) हो जाती है॥3॥

* अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा॥
सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी॥4॥

भावार्थ:-किन्तु आज मेरा ऐसा कहना भी अनुचित है। शोक और स्नेह में सयानापन (विवेक) कम हो जाता है (लोग कहेंगे कि मैं स्नेहवश भरत की बड़ाई कर रही हूँ)। कौसल्याजी की गंगाजी के समान पवित्र करने वाली वाणी सुनकर सब रानियाँ स्नेह के मारे विकल हो उठीं॥4॥

दोहा :

* कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि।
को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि॥283॥

भावार्थ:-कौसल्याजी ने फिर धीरज धरकर कहा- हे देवी मिथिलेश्वरी! सुनिए, ज्ञान के भंडार श्री जनकजी की प्रिया आपको कौन उपदेश दे सकता है?॥283॥

चौपाई :

* रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई॥
रखिअहिं लखनु भरतु गवनहिं बन। जौं यह मत मानै महीप मन॥1॥

भावार्थ:-हे रानी! मौका पाकर आप राजा को अपनी ओर से जहाँ तक हो सके समझाकर कहिएगा कि लक्ष्मण को घर रख लिया जाए और भरत वन को जाएँ। यदि यह राय राजा के मन में (ठीक) जँच जाए,॥1॥

* तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सोचु भरत कर भारी॥
गूढ़ सनेह भरत मन माहीं। रहें नीक मोहि लागत नाहीं॥2॥

भावार्थ:-तो भलीभाँति खूब विचारकर ऐसा यत्न करें। मुझे भरत का अत्यधिक सोच है। भरत के मन में गूढ़ प्रेम है। उनके घर रहने में मुझे भलाई नहीं जान पड़ती (यह डर लगता है कि उनके प्राणों को कोई भय न हो जाए)॥2॥

* लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी॥
नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि॥3॥

भावार्थ:-कौसल्याजी का स्वभाव देखकर और उनकी सरल और उत्तम वाणी को सुनकर सब रानियाँ करुण रस में निमग्न हो गईं। आकाश से पुष्प वर्षा की झड़ी लग गई और धन्य-धन्य की ध्वनि होने लगी। सिद्ध, योगी और मुनि स्नेह से शिथिल हो गए॥3॥

* सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ॥
देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनि उठी सप्रीती॥4॥

भावार्थ:-सारा रनिवास देखकर थकित रह गया (निस्तब्ध हो गया), तब सुमित्राजी ने धीरज करके कहा कि हे देवी! दो घड़ी रात बीत गई है। यह सुनकर श्री रामजी की माता कौसल्याजी प्रेमपूर्वक उठीं-॥4॥

#श्रीरामचरितमानस

03/04/2026

Ram Ram Sita Ram Ram Ram Sita Ram Ram Ram Sita Ram Ram Ram Sita Ram Ram Ram Sita Ram Ram Ram Sita Ram

02/04/2026

*☘️ जयश्री सीताराम ☘️*
श्री रामचरितमानस
{अयोध्या कांड}

🔸
दोहा-:
रामु सँकोची प्रेम बस भरत सप्रेम पयोधि।
बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि॥

भावार्थ-:
श्री रामचंद्रजी संकोची और प्रेम के वश हैं और भरतजी प्रेम के समुद्र हैं। बनी-बनाई बात बिगड़ना चाहती है, इसलिए कुछ छल ढूँढकर इसका उपाय कीजिए॥217॥

🔸
बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने।
सहसनयन बिनु लोचन जाने॥
मायापति सेवक सन माया।
करइ त उलटि परइ सुरराया॥

भावार्थ-:
इंद्र के वचन सुनते ही देवगुरु बृहस्पतिजी मुस्कुराए। उन्होंने हजार नेत्रों वाले इंद्र को (ज्ञान रूपी) नेत्रोंरहित (मूर्ख) समझा और कहा- हे देवराज! माया के स्वामी श्री रामचंद्रजी के सेवक के साथ कोई माया करता है तो वह उलटकर अपने ही ऊपर आ पड़ती है॥1॥

🔸
तब किछु कीन्ह राम रुख जानी।
अब कुचालि करि होइहि हानी।
सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ।
निज अपराध रिसाहिं न काऊ॥

भावार्थ-:
उस समय (पिछली बार) तो श्री रामचंद्रजी का रुख जानकर कुछ किया था, परन्तु इस समय कुचाल करने से हानि ही होगी। हे देवराज! श्री रघुनाथजी का स्वभाव सुनो, वे अपने प्रति किए हुए अपराध से कभी रुष्ट नहीं होते॥2॥

🔸
जो अपराधु भगत कर करई।
राम रोष पावक सो जरई॥
लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा।
यह महिमा जानहिं दुरबासा॥

भावार्थ-:
पर जो कोई उनके भक्त का अपराध करता है, वह श्री राम की क्रोधाग्नि में जल जाता है। लोक और वेद दोनों में इतिहास (कथा) प्रसिद्ध है। इस महिमा को दुर्वासाजी जानते हैं॥3॥

🔸
भरत सरिस को राम सनेही।
जगु जप राम रामु जप जेही॥

भावार्थ-:
सारा जगत्‌ श्री राम को जपता है, वे श्री रामजी जिनको जपते हैं, उन भरतजी के समान श्री रामचंद्रजी का प्रेमी कौन होगा?॥4॥

🕉️
जयश्री सीताराम

02/04/2026
Jai Shree Ram
02/04/2026

Jai Shree Ram

01/04/2026

*🕉️ जयश्री सीताराम 🕉️*
{श्री रामचरितमानस}
अयोध्या कांड
🔸
दोहा-:
किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात।
तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात॥

भावार्थ-:
बादल छाया किए जा रहे हैं, सुख देने वाली सुंदर हवा बह रही है। भरतजी के जाते समय मार्ग जैसा सुखदायक हुआ, वैसा श्री रामचंद्रजी को भी नहीं हुआ था॥216॥

🔸
जड़ चेतन मग जीव घनेरे।
जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे॥
ते सब भए परम पद जोगू।
भरत दरस मेटा भव रोगू॥

भावार्थ-:
रास्ते में असंख्य जड़-चेतन जीव थे। उनमें से जिनको प्रभु श्री रामचंद्रजी ने देखा, अथवा जिन्होंने प्रभु श्री रामचंद्रजी को देखा, वे सब (उसी समय) परमपद के अधिकारी हो गए, परन्तु अब भरतजी के दर्शन ने तो उनका भव (जन्म-मरण) रूपी रोग मिटा ही दिया। (श्री रामदर्शन से तो वे परमपद के अधिकारी ही हुए थे, परन्तु भरत दर्शन से उन्हें वह परमपद प्राप्त हो गया)॥1॥

🔸
यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं।
सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं॥
बारक राम कहत जग जेऊ।
होत तरन तारन नर तेऊ॥

भावार्थ-:
भरतजी के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है, जिन्हें श्री रामजी स्वयं अपने मन में स्मरण करते रहते हैं। जगत्‌ में जो भी मनुष्य एक बार 'राम' कह लेते हैं, वे भी तरने-तारने वाले हो जाते हैं॥2॥

🔸
भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता।
कस न होइ मगु मंगलदाता॥
सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं।
भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं॥

भावार्थ-:
फिर भरतजी तो श्री रामचंद्रजी के प्यारे तथा उनके छोटे भाई ठहरे। तब भला उनके लिए मार्ग मंगल (सुख) दायक कैसे न हो? सिद्ध, साधु और श्रेष्ठ मुनि ऐसा कह रहे हैं और भरतजी को देखकर हृदय में हर्ष लाभ करते हैं॥3॥

🔸
देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू।
जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू॥
गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई।
रामहि भरतहि भेंट न होई॥

भावार्थ-:
भरतजी के (इस प्रेम के) प्रभाव को देखकर देवराज इन्द्र को सोच हो गया (कि कहीं इनके प्रेमवश श्री रामजी लौट न जाएँ और हमारा बना-बनाया काम बिगड़ जाए)। संसार भले के लिए भला और बुरे के लिए बुरा है (मनुष्य जैसा आप होता है जगत्‌ उसे वैसा ही दिखता है)। उसने गुरु बृहस्पतिजी से कहा- हे प्रभो! वही उपाय कीजिए जिससे श्री रामचंद्रजी और भरतजी की भेंट ही न हो॥4॥

🕉️
जयश्री सीताराम

01/04/2026
01/04/2026
Jai Shree Ram Jai Hanuman
01/04/2026

Jai Shree Ram Jai Hanuman

31/03/2026

यह चौपाई गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस के सुंदरकांड से ली गई है। यह उस अत्यंत भावुक क्षण का वर्णन है जब हनुमान जी लंका की अशोक वाटिका में माता सीता को भगवान श्री राम का संदेश सुनाते हैं।
⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️
🟠चौपाई:🟠
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही।
मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥
🟡भावार्थ:🟡
हनुमान जी के मुख से प्रभु श्री राम का विरह संदेश और उनके प्रेम भरे वचन सुनते ही माता वैदेही (सीता जी) प्रेम में इतनी मग्न हो गईं कि उन्हें अपने शरीर की सुध-बुध भी नहीं रही।
⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️
व्याख्या और गहराई:
🟠 अनन्य प्रेम: यहाँ 'मगन प्रेम' शब्द माता सीता की पराकाष्ठा वाली भक्ति और प्रेम को दर्शाता है। भगवान का संदेश उनके लिए केवल सूचना नहीं, बल्कि साक्षात प्रभु का सानिध्य पाने जैसा था।
🟠 विदेह अवस्था: सीता जी का एक नाम 'वैदेही' है (जनक पुत्री होने के कारण, और जो देह के बंधनों से ऊपर हो)। तुलसीदास जी यहाँ शब्द चमत्कार दिखाते हैं कि 'वैदेही' (जो पहले से देह की सुध से परे हैं) प्रभु का संदेश सुनकर वास्तव में अपनी देह को पूरी तरह भूल गईं।
🟠 विरह और मिलन का संगम: लंबे समय से वियोग झेल रही माता सीता को जब राम जी की कुशलता और उनके प्रेम का प्रमाण मिलता है, तो उनकी सारी पीड़ा एक दिव्य आनंद में बदल जाती है।
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
यह चौपाई भक्त और भगवान के बीच के उस संबंध को स्पष्ट करती है जहाँ प्रेम इतना प्रगाढ़ होता है कि बाहरी संसार और स्वयं का अस्तित्व भी विलीन हो जाता है।
जय श्री राम 🙏 जय जय सियाराम 🙏

Address

Shree Ram Mandir
Meerut City
250001

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when SiyaRam-Official posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share