29/05/2021
*तीन गुरु*
*(पटना में श्री गुरुदेव का प्रवचन)*
*गतांक से आगे भाग ३*
*जब उस प्रभु की छटा क्षण-मात्र के लिए सामने आती है तो उस समय वह आत्म-विभोर हो जाता है और जब वह लोप हो जाती है तब वह छटपटाने लगता है और उसके दिल में एक टीस पैदा हो जाती है। उसका चंद्रमुख देखते ही सांसारिक वस्तुएं तुच्छ मालूम पड़ने लगती हैं। उसके अंदर इतनी व्याकुलता बढ़ जाती है कि वह उनके लिए प्राण देने के लिए भी तैयार हो जाता है। भगवान तो यही देखता है कि कितनी तड़प हमारे लिए इसके अन्दर है, कितना यह प्यार कर सकता है, कितना कष्ट उठा सकता है। जब इस व्याकुलता की अंतिम स्थिति आ जाती है तब वह हमारे सामने आ जाता है। लेकिन आपने तो अभी उसके बाहरी स्वरूप को देखा है, उसके पास कितनी शक्तियां हैं, कितना ज्ञान है इत्यादि यह भी आपको जानना है कि गुरु की जरूरत इसलिए पड़ती है कि वह अविद्या को दूर कर इस विद्या का ज्ञान कराएं। अध्यात्म विद्या के भी तीन गुरु होते हैं। एक गुरु वह होता है जो मनुष्य को कर्म करने के लिए इस तरफ झुकाता है, दूसरा गुरु वह होता है जो उपासना के साधन में लगाता है, और तीसरा गुरु वह होता है जो पूर्ण और यथार्थ ज्ञान करा देता है। जैसे-जैसे लड़का पढ़ता जाता है वैसे वैसे उसको दूसरा गुरु करना पड़ता है। हाईस्कूल के पास करने के बाद उसे कॉलेज में जाना पड़ता है और इस प्रकार से बराबर ही उसे गुरु बदलने की जरूरत होती है। जो विषय एक गुरु पढ़ा सकता है वह दूसरा गुरु नहीं पढ़ा सकता है। जो गुरु जितना जानता है उतने तक शिष्य को पहुंचा देता है और उसको दूसरे गुरु के पास भेज देता है। जो आखिरी गुरु होता है वही आत्म-ज्ञान कराता है, इस प्रकार से अध्यात्म विद्या पढ़ने के लिए तीन गुरु करने की आवश्यकता होती है। जो गुरु थोड़ा जानते हैं वह आपको आगे नहीं बढ़ा सकते हैं, वे दूसरे गुरु करने की सलाह दे देते हैं। जो चीजें व्यवहार में हैं वहीं परमार्थ में भी हैं। भगवान राम ने भी तीन गुरु किए थे। उनके पहले गुरु थे वशिष्ठ, दूसरे विश्वामित्र और तीसरे अगस्त जी थे। मनुष्य तीन भागों में बटा हुआ है, शरीर, मन, और आत्मा और सबसे सबमें कुछ शक्तियां मौजूद हैं। जैसे शरीर में चलने फिरने और देखने इत्यादि की शक्ति भरी हुई है। उसके बाद मन की शक्ति है। मन की शक्ति बहुत जबरदस्त होती है। इसी मन को कालिया नाग कहा गया है, आपको इसी कालिया नाग को नाथ कर आगे