30/12/2025
क्या आप जानतें है कि –
हमारे देश में हेल्थ इंश्योरेंस भी इंश्योरेंस कंपनियों द्वारा पॉलिसी होल्डर्स के क्लेम रिलीज होने के समय तरह तरह के हथकंडे अपना कर तगड़ा स्कैम किया जा रहा है।
लोगों को लगता है कि हेल्थ इंश्योरेंस मुश्किल समय में सुरक्षा देता है। लेकिन हकीकत यह है कि असली परेशानी अस्पताल से निकलने के बाद शुरू होती है, जब क्लेम फाइल किया जाता है। पॉलिसी बेचते समय जो भरोसा दिया जाता है, वही भरोसा क्लेम के समय धीरे-धीरे टूटने लगता है।
कई मामलों में मरीजों के बिल ₹50,000 से ₹5,00,000 तक होते हैं। पॉलिसी लेते समय या अस्पताल में भर्ती होने से पहले एजेंट कहता है कि सब कवर हो जाएगा और चिंता की कोई बात नहीं है। इसी भरोसे पर लोग इलाज करवाते हैं, लेकिन बाद में पता चलता है कि कहानी कुछ और ही है।
सबसे पहले डॉक्यूमेंट का खेल शुरू होता है। कभी कहा जाता है कि ये बीमारी क्लेम में कवर नहीं होगी, डिस्चार्ज समरी नहीं मिली, कभी बिल, कभी डॉक्टर का नोट। हर बार जब मांगा गया कागज़ दे दिया जाता है, तो कोई नया बहाना सामने आ जाता है। इसका मकसद यह नहीं होता कि जानकारी चाहिए – बल्कि यह होता है कि ग्राहक थक जाए।
जब आखिरकार क्लेम प्रोसेस होता है, तो पूरा पैसा नहीं दिया जाता। उदाहरण के लिए, ₹80,000 के बिल पर ₹50,000 ही रिलीज़ कर दिए जाते हैं। जब पूछा जाता है कि बाकी ₹30,000 क्यों काटे गए, तो जवाब मिलता है कि “उस अमाउंट का प्रूफ नहीं मिला।” कुछ दिन बाद वही कंपनी कहती है कि पहले गलत अमाउंट कोट हो गया था और असली अमाउंट कुछ और है।
फिर “मेडिकल नेसेसिटी” का तर्क शुरू होता है। अटेंडेंट के लिए लिए गए बेड, नर्सिंग चार्ज या कुछ दवाओं पर सवाल उठा दिए जाते हैं – जैसे वे इलाज का हिस्सा ही न हों। स्पष्टीकरण देने के बाद भी हफ्तों तक कोई जवाब नहीं आता, और फिर कहा जाता है कि “वो डॉक्यूमेंट एक्सेप्ट नहीं हुआ, फिर से भेजिए।”
इस पूरी प्रक्रिया में एजेंट, जो पॉलिसी बेचते समय रोज फोन करता था, क्लेम के समय या तो गायब हो जाता है या सिर्फ इतना कहता है, “मैं देख रहा हूँ।” जवाबदेही कहीं नहीं होती।
यह सब एक तय पैटर्न है। कंपनियों को पता होता है कि ज़्यादातर लोग महीनों ईमेल, कॉल और शिकायतों में नहीं पड़ेंगे। वे या तो कम अमाउंट मान लेंगे या पूरी तरह छोड़ देंगे। इसी मानसिक थकान पर यह सिस्टम चलता है।
अगर आपके साथ भी ऐसा हो रहा है, तो समझिए कि आप अकेले नहीं हैं और आप गलत नहीं हैं। यह तरीका ही ऐसा बनाया गया है। लेकिन आपके पास विकल्प हैं – IRDAI, इंश्योरेंस ओम्बड्समैन और कंज़्यूमर कोर्ट। जब लोग शिकायत दर्ज करते हैं, तभी यह सिस्टम जवाब देने लगता है।
~ साभार: Corruption Intelligence Detective