26/09/2025
👉समाज की वास्तविक ताक़त – जनसंख्या आँकड़ों की सच्चाई और पहचान की आवश्यकता
(🖊️भैरुसिंह चौहान पत्रकार 8290079000 )
🖊️हम अक्सर यह कहते हैं कि हमारी जनसंख्या लाखों में है, हम ताक़तवर हैं, हमें राजनीति में उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, हमें पद और सम्मान मिलना चाहिए। समाज के बड़े-बड़े मंचों से आवाज़ उठती है – “हमें टिकट दो, हमें अधिकार दो, हमें बराबरी का स्थान दो।” लेकिन जब कोई हमसे यह सवाल करता है कि “आपकी वास्तविक संख्या कितनी है?”, तो हम ठोस और सही उत्तर देने में असमर्थ हो जाते हैं। यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। *आँकड़ों की कमी – सबसे बड़ा संकट*
किसी भी समाज की ताक़त केवल नारों या भाषणों में नहीं, बल्कि उसके ठोस आँकड़ों और संगठित जनशक्ति में होती है। दुर्भाग्य से जब अपने ही परिवार, वंश या आस-पड़ोस की सही गणना करने का समय आता है, तो हम असहज हो जाते हैं। हमें यह तक ठीक से ज्ञात नहीं होता कि हमारे मोहल्ले, वार्ड या गाँव में हमारे समाज के कितने घर हैं। जब यह छोटी जानकारी हमारे पास नहीं है, तो हम लाखों की गिनती कैसे सिद्ध करेंगे?
यह स्थिति केवल हमारी लापरवाही का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई गहरे कारण हैं।आपसी मनमुटाव और भेदभाव
हमारे समाज में एक-दूसरे के बीच छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव, ऊँच-नीच का भेदभाव और अमीरी-गरीबी की खाई मौजूद है।
अमीर-गरीब के आधार पर हम समाज को बाँटते हैं।
परिवार या वंश के भीतर भी हम मेल-जोल से अधिक विवादों को अहमियत देते हैं।
समाज की एकजुटता के बजाय निजी स्वार्थ और अहंकार को महत्व देते हैं।
यही कारण है कि हम एक मंच पर खड़े होकर “हम लाखों में हैं” तो कहते हैं, परंतु उसके प्रमाण नहीं दे पाते। *सरकार की जनगणना – सुनहरा अवसर*
वर्तमान समय में सरकार जनगणना का कार्य कर रही है। यह हमारे लिए एक पवित्र और ऐतिहासिक अवसर है। यदि हमने इस मौके को गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ़ नहीं करेंगी।जनगणना केवल सरकारी दस्तावेज़ नहीं होती, बल्कि यह समाज की असली ताक़त और पहचान का दर्पण होती है। यदि हम इस समय भी अपनी जाति, पहचान और सही आँकड़े दर्ज नहीं करवा पाए, तो भविष्य में जब हम अपने हक और अधिकारों की बात करेंगे, तो सरकार के पास हमारे दावे का कोई ठोस आधार ही नहीं होगा। *जाति छुपाना – अपराध और धोखा* आजकल यह देखा जा रहा है कि कुछ लोग अपनी असली जाति छिपाकर दूसरी जाति में अपना नाम दर्ज करवा देते हैं। ऐसा करने वाले सोचते हैं कि उन्हें व्यक्तिगत लाभ मिल जाएगा। लेकिन सच्चाई यह है कि यह कार्य केवल समाज के साथ धोखा नहीं है, बल्कि यह सरकार की नज़रों में भी अपराध है। यदि आप अपनी जाति छिपाते हैं, तो आप अपनी आने वाली पीढ़ी का भविष्य अंधकारमय बना रहे हैं। समाज की संख्या कृत्रिम रूप से कम होती जाती है, और जब अधिकारों का बँटवारा होता है, तो हमारी गिनती कम होने के कारण हमें हमारा हक नहीं मिल पातासमाज के बुद्धिजीवियों की भूमिका इस कार्य में समाज के बुद्धिजीवी वर्ग की सबसे बड़ी भूमिका है।
शिक्षित वर्ग को आगे आकर लोगों को जागरूक करना होगा। मोहल्ले, वार्ड और गाँव स्तर पर समाज के घर-घर जाकर सही जानकारी एकत्र करनी होगी।
यह ध्यान रखना होगा कि कहीं कोई व्यक्ति अपनी जाति छुपाकर दूसरी जाति में दर्ज तो नहीं हो रहा।
बुद्धिजीवी समाज का पथ-प्रदर्शक होता है। यदि वही चुप रहेगा तो फिर सामान्य लोग कैसे जागरूक होंगे?एकता की आवश्यकता
यदि हमें आने वाली पीढ़ियों को स्वाभिमान और सम्मान दिलाना है, तो हमें सबसे पहले अपनी जातिगत पहचान को मजबूती से स्थापित करना होगा। इसके लिए हमें चाहिए कि –. मोहल्ले और गाँव स्तर पर समाज की जनसंख्या का डेटा एकत्रित करें। . जनगणना में केवल और केवल “रावणा राजपूत” लिखवाएँ। किसी भी प्रकार के अमीरी-गरीबी, ऊँच-नीच या आपसी मनमुटाव को दरकिनार कर समाज के स्वाभिमान के लिए खड़े हों।
स्वाभिमान बनाम स्वार्थ
आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई लोग समाज के बजाय अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को अधिक महत्व देते हैं। वे सोचते हैं कि यदि वे जाति छिपाएँगे या दूसरी जाति में दर्ज होंगे, तो उन्हें व्यक्तिगत लाभ मिलेगा। लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि व्यक्तिगत लाभ क्षणिक होता है, जबकि समाज की ताक़त स्थायी होती है। यदि समाज मज़बूत होगा, तो प्रत्येक व्यक्ति स्वतः मज़बूत होगा। यदि समाज कमज़ोर होगा, तो चाहे कोई कितना भी संपन्न क्यों न हो, उसका सम्मान और भविष्य खतरे में रहेगा। आने वाली पीढ़ियों की जिम्मेदारी हमारा यह कर्तव्य है कि हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मजबूत नींव रखें। यदि हमने आज जातिगत पहचान और जनसंख्या आँकड़ों के विषय में गंभीरता नहीं दिखाई, तो हमारी अगली पीढ़ियाँ हमें कोसेंगी। वे कहेंगी कि –
“हमारे पूर्वजों ने केवल नारे दिए, परंतु ठोस काम नहीं किया।”इसलिए आज का समय हमें जागरूक होने का संदेश दे रहा है।