मर्द को भी होता है दर्द'
भारत में महिला अधिकारों की लड़ाई के बीच 'मेन्स राइट्स एसोसिएशन लुधियाना' भी उभर रहा है। जहां पहले पुरुष अधिकारों की बात कहीं होती नहीं दिखती थी वहीं अब कई शहरों में हर हफ्ते पुरुष अधिकार एक्टिविस्ट मीटिंग भी करते हैं मेन्स राइट्स एसोसिएशन नामक संगठन बनाने की जरुरत इसलिए महसूस हुई क्योंकि 498ए (दहेज प्रताड़ना) के केस में काफी लोग जिनमे महिलाए भी है(सास,ननद) उनको बे वजह जेल
जाना पड़ॉ इसी बीच काफी लोग हमारे संपर्क में आए। जो झूठे 498ए(dowry),domestic violence का केस झेल रहे थे। तब हमने मिलकर एक एनजीओ बनाया जिसका नाम रखा मेन्स राइट्स एसोसिएशन लुधियाना' जो 'सेव इंडियन फैमिली' (SIF) के साथ काम करता है। इसका मकसद तय किया गया कि यह पुरुषों के हकों की लड़ाई लड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट के जज अरिजीत पसायत ने कहा कि 498ए लीगल टेररिजम जैसा है। क्योकि इस कानून का दुरूपयोग ज्यादा है बहुए बदला लेने के लिए इसका उपयोग कर रही है सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के दूसरे देशों में भी पुरुषों के साथ बराबरी का बर्ताव नहीं हो रहा है और वहां भी लोग अब पुरुषों के हकों की लड़ाई लड़ने लगे हैं। भारत मे बहुए कानूनों की आड़ मे पुरुषो और उनके परिवार वालो से धन उगाई के लिए ब्लैकमेलिंग कर रही है इससे फैमिली ब्रेक हो रही हैं। हमें उनकी एंटी-मेल सोच से दिक्कत है। इसलिए हम पुरुषों को जागरूक कर रहे हैं कि उन्हें अपने हक की आवाज उठानी होगी। हमारे देश के कानून सिर्फ महिलाओं के लिए ही बने हैं। पुरुषों के लिए कुछ भी नहीं है। महिलाओं के मुकाबले शादीशुदा पुरुष तीन गुना स्युसाइड कर रहे हैं इससे उनके डिस्ट्रेस लेवल का पता चलता है। हर स्तर के पुरुष आज हमारे पुरुष विरोधी कानूनों से तनाव में हैं। हर जगह सिर्फ महिलाओं की ही बात होती है। महिलाएं पुरुषों को दहेज के झूठे मामले में फंसा रही हैं और कानून भी उनके हक़ के लिए बने है मारपीट के झूठे आरोप, हर जगह बस पुरुष को ही निशाना बनाया जा रहा है। हम महिला विरोधी नहीं हैं। क्युकि हमारी बहन और मां भी तो महिला ही है। लेकिन कानून उन्हें क्यों महिला के अधिकार नहीं देता। एक बहू अगर झूठे आरोप लगा दे तो पति के साथ मां- बहन सबको जेल में ठूंस देते हैं। क्या तब उनके महिला होने का ध्यान नहीं होता। क्या सिर्फ पत्नी ही महिला है। मां और बहन नहीं। पत्नी के नाम पर कानून ने उन्हें इतने अधिकार दे दिए हैं कि वह होम मेकर नहीं होम ब्रेकर बन गई हैं। घरेलू हिंसा मामले में पति की कोई नहीं सुनता। अगर हम पुलिस के पास जाकर कहें कि पत्नी ने मारपीट की है, मेंटली टॉर्चर किया है तो हमारी कोई नहीं सुनता। लेकिन अगर पत्नी झूठे आरोप भी लगा दे तो कानून जाग जाता है। उनके लिए तो महिला आयोग से लेकर मंत्रालय तक सब है। हमारे लिए क्या है? तो हमारे लिए कौन लड़ेगा? हमारे लिए भी मेन्स वेलफेयर कमिशन होना चाहिए। अभी हमारे सारे कानून ऐसे हैं कि कोई भी महिला किसी भी पुरुष को झूठे फंसा सकती है। ऐसे में पुरुषों को कौन बचाएगा?(कानून का दुरूपयोग करके) कोई शादीशुदा महिला संदेहास्पद हालात में मरती है तो तुरंत उसके पति और परिवार वालों को दहेज प्रताड़ना में बुक कर लिया जाता है लेकिन पुरुष मरे तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। हम चाहते हैं कि सारे कानून जेंडर न्यूट्रल होने चाहिए। लेकिन हमारी पुरुष प्रधान सोसाइटी में सब कुछ तो पुरुषों के हाथों में है?यह बस नाम का है। अब तो पुरुष के तौर पर पैदा होना क्राइम हो गया है। पत्नी अगर पढ़ी लिखी है, वर्किंग है तब भी कानून सारी जिम्मेदारी पति के ऊपर डालता है। । एलिमनी ऐंठने के लिए पत्नियां पुरुषों को झूठे फंसा रही हैं। लड़कियों को फ्री में पढ़ाया जाता है। स्कॉलरशिप दी जाती है। महिलाओं के नाम पर कई कार्यक्रम चल रहे हैं। पर पुरुषों के लिए कुछ नहीं। हम चाहते हैं कि हमारे हकों की बात भी की जाए।