07/04/2026
“लोक रंग” (सामाजिक एवं सांस्कृतिक विमर्श की त्रैमासिक पत्रिका) अब डिजिटल लाइब्रेरी एवं पब्लिशिंग प्लेटफ़ॉर्म Notnul पर उपलब्ध है।
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लोक रंग | जनवरी - मार्च ’26
जनपदीय भाषाएँ और राष्ट्रभाषा परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक और आत्मीय सहचर हैं। जिसे हम जनपदीय साहित्य कहते हैं, उसमें स्थानीय रंग, लोक-स्मृति और क्षेत्रीय जीवनानुभव की अपनी विशिष्ट छटा अवश्य मिलती है, लेकिन भाव और अभिव्यक्ति के स्तर पर उसमें ऐसी गहरी समानताएँ भी हैं, जो यह बताती हैं कि ये भाषाएँ हिंदी से अलग नहीं, बल्कि उसकी जीवंत, बहुरंगी और आत्मीय पोशाक हैं।
भारतीय भाषाई संस्कृति का सौंदर्य ही इसकी विविधता में निहित है।
कहावत है—
“कोस-कोस पर पानी बदले, पाँच कोस पर बानी।”
यानी भाषा का जीवित स्वभाव ही यह है कि वह समय, समाज, भूगोल और लोकानुभव के साथ बहती हुई अपने रूप बदलती चले। ठीक गंगा की धारा की तरह—जो अपने मार्ग में आने वाली हर मिट्टी, हर स्पर्श, हर रंग को अपने साथ समेटती चलती है।
जनपदीय भाषाओं की वाचिक परम्परा केवल बोलचाल या लोक-उच्चारण का मामला नहीं, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक स्मृति, सामूहिक अनुभव और लोक-ज्ञान की अमूल्य धरोहर है। इन भाषाओं में केवल शब्द नहीं, बल्कि पीढ़ियों की जीवन-दृष्टि, संवेदना और सांस्कृतिक विरासत भी संरक्षित रहती है।
पढ़िए — डॉ. विद्या विन्दु सिंह का महत्त्वपूर्ण आलेख
‘जनपदीय भाषाओं की वाचिक परम्परा’
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