29/12/2025
साल 2012...
उत्तर प्रदेश को नया मुख्यमंत्री मिला था Akhilesh Yadav । पूर्वांचल दौरे से लौटते हुए उनका काफिला हाईवे पर था। लगातार बारिश हो रही थी। तभी उन्होंने कहा “हाईवे छोड़ो… गांवों के रास्ते से चलो।” ड्राइवर ने हिचकते हुए कहा, “साहब, रास्ता बहुत खराब है।” अखिलेश जी ने कहा “कोई बात नहीं, चलो।”
काफिला कच्ची सड़क पर मुड़ा। चारों ओर खेत, पानी से भरी मेड़ें और मिट्टी में धँसे रास्ते। तभी एक बस्ती आई। लेकिन वहाँ कुछ अजीब था सन्नाटा। न बच्चों की हँसी, न किसी आंगन से आवाज़, न चूल्हे का धुआँ। एक जगह कुछ लोग जमा थे अखिलेश जी ने गाड़ी रुकवाई गई।
अखिलेश जी नीचे उतरे और पूछा यहाँ सब ठीक तो है?
इतने में एक बुज़ुर्ग आगे आया। भीगी धोती, काँपते हाथ, आँखों में डर। उसने धीरे से कहा, “साहब… सब ठीक कैसे हो सकता है…”
“क्या हुआ, बाबा?” अखिलेश जी ने पूछा।
बुज़ुर्ग की आवाज़ भर्रा गई।
“हमरी बहू है… पेट में बहुत दर्द है। बच्चा अटक गया है। सुबह से तड़प रही है। गाड़ी नहीं है साहब… डॉक्टर बहुत दूर है।”
पीछे से एक और औरत बोल पड़ी, आँचल से आँसू पोंछते हुए
“साहब, बचा लो… अगर आज नहीं बचे तो…”
वाक्य पूरा नहीं हो सका।
अखिलेश जी ने तुरंत कहा काफिले में चल रही एंबुलेंस से महिला को अस्पताल भिजवाया लेकिन महिला को बचाया नहीं जा सका।
पूरा काफिला वहीं रुका रहा। कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। कोई औपचारिकता नहीं। बस एक मुख्यमंत्री खड़ा था चुप। सामने गांव के लोग थे, जिनकी आँखों में सवाल था।
अखिलेश यादव ने बहुत धीमे स्वर में कहा
“अगर समय पर एंबुलेंस मिल जाती… तो शायद ये जान बच जाती।”
फिर उन्होंने खुद से जैसे वादा किया
“अब किसी गांव को यह दिन नहीं देखना पड़ेगा।”
उसी क्षण एक फैसला हुआ अब उत्तर प्रदेश में कोई भी इंसान इलाज के इंतज़ार में नहीं मरेगा। उसी दर्द से जन्मी समाजवादी एंबुलेंस सेवा (108)। एंबुलेंस को गाड़ी नहीं, जिम्मेदारी बनाया गया। आज प्रदेश में 4,800 से अधिक एंबुलेंस सड़कों पर हैं गांव, कस्बे, शहर सबके लिए। मुफ्त सेवा, प्रशिक्षित स्टाफ, GPS ट्रैकिंग, ताकि मदद रास्ता न भटके।
यही फर्क होता है सत्ता और सेवा में। जब शासक गांव की मिट्टी में उतरता है, तब योजनाएँ कागज़ नहीं रहतीं जीवन बन जाती