31/07/2026
भारत के सैन्य इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्हें केवल पदक नहीं, बल्कि उनका साहस अमर बनाता है। ऐसे ही एक योद्धा थे विंग कमांडर पद्मनाभ गौतम (MVC & Bar, VM)। उनका जीवन केवल युद्ध जीतने की कहानी नहीं, बल्कि हर बार मौत को चुनौती देकर देश के लिए उड़ान भरने की गाथा है। उन्होंने दुश्मन के सबसे सुरक्षित ठिकानों पर बम बरसाए, गोलियों की बारिश के बीच मिशन पूरे किए और अंत में अपनी जान देकर अनगिनत मासूमों की जिंदगी बचा ली।
आज भी भारतीय वायुसेना में उनका नाम सम्मान, वीरता और सर्वोच्च कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या था जिसने उन्हें भारत के सबसे सम्मानित वायु योद्धाओं में शामिल कर दिया? आइए जानते हैं उस अद्भुत कहानी को, जिसे हर भारतीय को पढ़ना चाहिए।
जब एक साधारण कर्मकांडी ब्राह्मण परिवार का बेटा बना आसमान का सबसे निडर योद्धा
23 जुलाई 1933 को तत्कालीन मद्रास (अब चेन्नई) में जन्मे पद्मनाभ गौतम का बचपन किसी शाही परिवार में नहीं बीता था। उनके कर्मकांडी वैष्णव ब्राह्मण पिता पंडित नीलकंठ पद्मनाभ ने उन्हें अनुशासन, ईमानदारी और राष्ट्रसेवा का संस्कार दिया। उस दौर में भारत आज़ादी की नई राह पर था और युवाओं के भीतर देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज़्बा तेजी से बढ़ रहा था।
कम उम्र से ही उन्हें उड़ते हुए विमानों को देखकर आकर्षण होता था। उनके भीतर केवल पायलट बनने का सपना नहीं था, बल्कि भारत की रक्षा करने का संकल्प भी था। कठिन परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य से कभी समझौता नहीं किया। लगातार मेहनत और अनुशासन के बल पर उन्होंने भारतीय वायुसेना के 60वें पायलट कोर्स में प्रवेश पाया और 1 अप्रैल 1953 को भारतीय वायुसेना में कमीशन प्राप्त किया।
शायद उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही युवा आगे चलकर भारतीय सैन्य इतिहास का ऐसा अध्याय लिखेगा, जिसे आने वाली पीढ़ियां गर्व से पढ़ेंगी।
पहली बार दुनिया ने देखा उनकी बहादुरी... और संयुक्त राष्ट्र भी रह गया प्रभावित
साल 1961। अफ्रीकी देश कांगो गृहयुद्ध की आग में जल रहा था। संयुक्त राष्ट्र ने शांति स्थापना के लिए कई देशों की सेनाओं को भेजा, जिनमें भारतीय वायुसेना भी शामिल थी। फ्लाइट लेफ्टिनेंट पद्मनाभ गौतम को नंबर 5 स्क्वाड्रन के कैनबरा बॉम्बर विमान के साथ इस बेहद कठिन मिशन पर भेजा गया।
मौसम खराब था। दुश्मन पूरी तैयारी में था। फिर भी उन्होंने विद्रोहियों के कब्जे वाले कोल्वेज़ी एयरफील्ड पर सटीक हमला किया। कई दुश्मन विमान और सैन्य ठिकाने नष्ट कर दिए गए। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की जमीनी सेना को महत्वपूर्ण हवाई सहायता भी प्रदान की।
यह मिशन केवल सैन्य सफलता नहीं था, बल्कि उनके अद्भुत साहस और असाधारण उड़ान कौशल का प्रमाण था। इसी वीरता के लिए उन्हें वर्ष 1963 में वायु सेना पदक (Vayu Sena Medal) से सम्मानित किया गया। इसके बाद 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान भी उन्होंने जोखिम भरे टोही मिशन पूरे किए और हर बार अपने कर्तव्य को सर्वोपरि रखा।
1965 का युद्ध... जब दुश्मन की धरती पर छह बार मौत को हराकर लौटे
1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध भारतीय सैन्य इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। इस समय तक पद्मनाभ गौतम स्क्वाड्रन लीडर बन चुके थे और आगरा स्थित जेट बॉम्बर कन्वर्ज़न यूनिट की कमान संभाल रहे थे।
युद्ध के दौरान उन्हें ऐसे मिशन सौंपे गए, जिन्हें पूरा करना लगभग असंभव माना जाता था। उन्हें पाकिस्तान के भीतर गहराई तक जाकर महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों पर हमला करना था। पेशावर, गुजरात सेक्टर, अकवाल और चाविंडा जैसे रणनीतिक इलाकों में उन्होंने लगातार छह अत्यंत जोखिम भरे मिशन पूरे किए।
हर उड़ान के दौरान उनका सामना दुश्मन की एंटी एयरक्राफ्ट गनों, रडार सिस्टम और सेबर जेट लड़ाकू विमानों से हुआ। फिर भी उन्होंने कभी अपने मिशन से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। उनकी योजना, सटीक निशाने और अद्भुत नेतृत्व ने भारतीय वायुसेना को बड़ी सामरिक बढ़त दिलाई।
उनकी इस असाधारण वीरता के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश का दूसरा सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान महावीर चक्र (Maha Vir Chakra) प्रदान किया। यह सम्मान केवल उनके साहस का नहीं, बल्कि असंभव को संभव बनाने की क्षमता का प्रतीक बन गया।
एक ऐसा कारनामा, जिसकी चर्चा भारत ही नहीं, इराक में भी हुई
युद्धों के बीच भी पद्मनाभ गौतम लगातार युवा पायलटों को प्रशिक्षण देते रहे। इसी दौरान उन्हें इराक में पायलटों को प्रशिक्षण देने का अवसर मिला।
एक प्रशिक्षण उड़ान के दौरान उनके मिग-17 विमान में गंभीर तकनीकी खराबी आ गई। सामान्य परिस्थितियों में विमान दुर्घटनाग्रस्त हो सकता था, लेकिन उन्होंने अद्भुत सूझबूझ दिखाते हुए बिना इंजन के विमान को सुरक्षित उतार दिया। इसे विमानन भाषा में "डेड-स्टिक लैंडिंग" कहा जाता है और इसे सबसे कठिन आपातकालीन लैंडिंग में गिना जाता है।
उनकी इस उपलब्धि की सराहना केवल भारतीय वायुसेना ने ही नहीं, बल्कि इराकी वायुसेना ने भी की। यह साबित करता है कि महान पायलट केवल युद्ध नहीं जीतते, बल्कि असंभव परिस्थितियों में भी चमत्कार कर दिखाते हैं।
1971 का युद्ध... जब उनकी अगुवाई में कांप उठे दुश्मन के एयरबेस
1969 में पद्मनाभ गौतम विंग कमांडर बने और उन्हें नंबर 16 स्क्वाड्रन की कमान सौंपी गई। उन्होंने अपनी पूरी यूनिट को आने वाले युद्ध के लिए तैयार किया। ऊंचाई से बमबारी, रात्रि अभियान और दुर्गम युद्धकालीन एयरबेस से उड़ान जैसी जटिल तकनीकों का लगातार अभ्यास कराया गया।
फिर आया 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध।
इस बार उनके नेतृत्व में भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के पश्चिमी मोर्चे पर कई निर्णायक हमले किए। मियांवाली एयरबेस, रायविंड और मोंटगोमरी जैसे महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों पर रात के अंधेरे में अत्यंत सटीक बमबारी की गई। दुश्मन की भीषण गोलाबारी के बावजूद उन्होंने अपनी पूरी फॉर्मेशन का नेतृत्व किया और हर मिशन को सफलता के साथ पूरा किया।
उनकी स्क्वाड्रन ने पश्चिमी और पूर्वी दोनों मोर्चों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी वीरता इतनी असाधारण थी कि उन्हें महावीर चक्र पर बार (Bar to Maha Vir Chakra) से सम्मानित किया गया। भारतीय वायुसेना के इतिहास में यह सम्मान बेहद दुर्लभ है। बहुत कम अधिकारियों को दो बार महावीर चक्र प्राप्त करने का गौरव मिला है और पद्मनाभ गौतम उनमें प्रमुख हैं।
पदक बढ़ते गए... लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान था देश का विश्वास
विंग कमांडर पद्मनाभ गौतम के नाम तीन बड़े सैन्य अलंकरण दर्ज हैं—वायु सेना पदक (VM), महावीर चक्र (MVC) और महावीर चक्र पर बार (MVC & Bar)। यह केवल पुरस्कार नहीं थे, बल्कि हर उस मिशन की कहानी थे जिसमें उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर भारत की रक्षा की।
उनके नेतृत्व ने भारतीय वायुसेना की नई पीढ़ी को आधुनिक रणनीति, साहस और अनुशासन का महत्व सिखाया। वे उन अधिकारियों में थे जो स्वयं सबसे आगे उड़ते थे और अपने साथियों को पीछे से नहीं, बल्कि सामने रहकर नेतृत्व देते थे।
आखिरी उड़ान... जब उन्होंने अपनी जान देकर बचा लिए अनगिनत मासूम
25 नवंबर 1972।
पुणे के लोहेगांव एयरबेस से उनका मिग-21 विमान उड़ान भर चुका था। अचानक टेकऑफ के तुरंत बाद विमान के इंजन में गंभीर खराबी आ गई। विमान तेजी से नियंत्रण खो रहा था।
उस समय उनके सामने दो रास्ते थे। पहला, तुरंत इजेक्ट कर अपनी जान बचा लें। दूसरा, विमान को आबादी से दूर मोड़कर लोगों की जान बचाएं।
उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।
विमान के ठीक नीचे एक स्कूल और आबादी वाला इलाका था। यदि वह उसी दिशा में गिरता तो सैकड़ों निर्दोष लोगों की जान जा सकती थी। विंग कमांडर पद्मनाभ गौतम ने आखिरी क्षण तक विमान को मोड़ने का प्रयास किया। इस निर्णय में इतना समय निकल गया कि सुरक्षित इजेक्शन का अवसर समाप्त हो गया।
विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ और भारत ने अपना एक अमूल्य वीर खो दिया।
लेकिन उस दिन उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया कि सच्चा सैनिक अपनी जान से पहले अपने देशवासियों की सुरक्षा के बारे में सोचता है।
क्यों आज भी अमर है पद्मनाभ गौतम का नाम?
विंग कमांडर पद्मनाभ गौतम का जीवन हमें यह सिखाता है कि वीरता केवल युद्ध जीतने में नहीं होती, बल्कि हर कठिन निर्णय में होती है। उन्होंने कभी सम्मान के लिए युद्ध नहीं लड़ा। उन्होंने कभी प्रसिद्धि की इच्छा नहीं रखी। उनके लिए सबसे बड़ा उद्देश्य केवल राष्ट्र था।
कांगो के मिशनों से लेकर 1965 और 1971 के युद्ध तक, हर बार उन्होंने यह सिद्ध किया कि भारतीय वायुसेना केवल आधुनिक हथियारों से नहीं, बल्कि अपने जांबाज़ सैनिकों के साहस से महान बनती है। उनकी अंतिम उड़ान आज भी भारतीय सैन्य इतिहास की सबसे प्रेरणादायक घटनाओं में गिनी जाती है।
आज उनकी जयंती और बलिदान को याद करते हुए पूरा देश उस महान योद्धा को नमन करता है जिसने दो बार महावीर चक्र जीतकर इतिहास रचा और अंतिम क्षण तक अपने कर्तव्य से कभी समझौता नहीं किया।