28/09/2025
सादर नमन
अमर शहीद भगत सिंह की जयंती पर शत शत नमन
धन्यवाद Lok Sadan तीन दिनों मे भारत की आज़ादी के दो स्तंभों पर विशिष्ट अग्रलेख प्रकाशित करने के लिए।
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भगत सिंह - एक दिव्य चरित्र
राकेश श्रीवास्तव
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बम और पिस्तौल से क्रांति नहीं आती, क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।'
भगत सिंह
जो लोग भगत सिंह की तस्वीर को केवल पिस्तौल से जोडकर देखते हैं उनके लिये यह मानना बहुत मुश्किल है कि ये पंक्तियां भगत सिंह की हैं।भगतसिंह बौद्धिकता के साथ ही विचारात्मक एवं क्रियात्मक ऊर्जा के उल्कापिंड थे।चौबीस वर्ष से भी कम उम्र मे उन्होने जितना अध्ययन कर लिया था उतना अधिकांश राजनैतिक व्यक्ति पूरे जीवन मे नही कर पाते हैं। वह अपने ज्ञान को निरंतर परिष्कृत करते रहे।उनका चिंतन तालाब का ठहराव न होकर समुद्र का उदात्त प्रवाह था।वास्तव मे भगत सिंह एक दिव्य चरित्र थे।
असेंबली मे बम फेंक कर उनका इरादा किसी को मारना नहीं वरन अंग्रेजी हुकूमत को जगाना था।वह हुकूमत को जगा कर ही माने, भले ही इसके लिए वह शहीद हो गए। उन्होंने किसी भी तरह की माफी मांगने से इंकार कर दिया। यहां तक कि जब अनन्य देशभक्त, उनके पिता सरदार किशन सिंह ने एक अर्जी देकर बचाव पेश करने के लिए अवसर की माँग की तो उसके जवाब में भगत सिंह ने अपने पिता को एक पत्र लिखा।उसका एक छोटा सा हिस्सा नीचे नीचे उद्धत है "अन्त में मैं आपसे, आपके अन्य मित्रों एवं मेरे मुकदमे में दिलचस्पी लेनेवालों से यह कहना चाहता हूँ कि मैं आपके इस कदम को नापसन्द करता हूँ। मैं आज भी अदालत में अपना कोई बचाव प्रस्तुत करने के पक्ष में नहीं हूँ।" आज आवश्यकता है कि भगत सिंह जैसे दिव्य चरित्र के बहुआयामी पहलुओं को जन जन के मानस मे उतारने की।
भगत सिंह कहते हैं कि" सांप्रदायिकता समाज की उतनी ही बड़ी दुश्मन है, जितना साम्राज्यवाद।" उनकी 'नौजवान भारत सभा' का कोई भी सदस्य किसी भी रूप मे किसी भी साम्प्रदायिक गुट से किसी तरह का संबंध नहीं रखेगा। उनकी सोच थी कि सांप्रदायिक नेता दंगे करवाते हैं।अखबार वालों और साम्प्रदायिक नेताओं को वह दंगे भड़काने के उत्प्रेरक तत्व मानते थे।धर्म को वह निजी मामला मानते थे। भगत सिंह की पुस्तक "मै नास्तिक क्यों हूं" का व्यापक प्रचार प्रसार करने की जरूरत है।
इसके साथ ही भगत सिंह साम्राज्यवाद को मानवता का दुश्मन मानते थे।मात्र तेईस वर्ष की आयु मे ही मार्क्स,लेनिन गोर्की,तुर्गनेव, डिकेंस, सिंक्लेयर जैसे लेखकों को पढने वाला नवयुवक पूंजीवाद के खतरों को देख पा रहा था।भगत सिंह का संक्षिप्त जीवनकाल मानव जिजीविषा के उत्कर्ष का समय था।स्वामी विवेकानंद,गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर,महात्मा गांधी,नेताजी सुभाष चंद्र बोस,भगत सिंह, मुंशी प्रेमचंद,सीमांत गांधी,जयप्रकाश,डाक्टर राम मनोहर लोहिया जैसे लोगों की सदी थी।इन सब के मार्ग भले ही अलग-अलग हो परंतु उनका व्यक्तित्व और कृतित्व का फलक बहुत ही विस्तृत था।सबका लक्ष्य अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति के साथ ही एक ऐसे समाज की स्थापना था जिसमें सबके लिए बराबर संसाधन एवं अवसर उपलब्ध हों,जहां मानवता शीर्ष पर हो,जहां किसी का शोषण न हो,जहां भूख और दरिद्रता का स्थान न हो।यह सभी महान दूरदृष्टि के स्वामी थे।इनका लक्ष्य अंग्रेजी शासन को समाप्त करना के साथ ही साथ समाज में बराबरी एवं मानव की गरिमा बनाए रखना भी था।आज भगत सिंह जैसे दिव्य चरित्र को किताबों से बाहर निकाल कर जनमानस मे पहुंचाने की आवश्यकता है जिससे आम जनता इस "क्रियाशील चिंतक" के बौद्धिक पक्ष से भी रूबरू हो सके।
रिपोस्ट
28/9/2021
Rakesh Srivastava