सन 47 में देश जब आज़ाद हुआ और सत्ता कुछ लोगों ने संभाली तो वे देश के कुछ प्रतिष्ठित लोग ही थे। उस समय पसमांदा मुसलमानो कोई आवाज़ न थी। आज जब हम आज़ादी के 75वे साल में हैं तो यह हम सब के लिए जरूरी है कि समाज के सभी वर्गों की बराबरी की बात हो। ख़ासकर उनकी बात और हालत का विश्लेषण जरूर हो जो पायदान के आखरी छोर पर हो। देश की दूसरी बड़ी आबादी और उसक़ी मूलभूत आवश्यकताओं तथा उनकी शिक्षा और रोजगार के बरा
बर अवसर उपलब्ध कराकर उनको मुख्यधारा से जोड़ने की आवश्यकता है।
जब सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट कहती है कि देश के मुसलमानो कि हालात दलितों से बदतर है। खासतौर पर ओबीसी मुसलमानों के हालात। जिनको हिंदुस्तान के अशरफ मुसलमानो ने सामाजिक और राजनीतिक रुप से कभी आगे बड़ने का मौका नहीं दिया। बल्कि तमाम मुसलमानो को मिलने वाले फायदे से पसमांदा मुसलमानो को दूर रखा। मुसलमानो की 22प्रतिशत आबादी में से 16%प्रतिशत आबादी पसमांदा मुसलमानो की हैं। लेकिन सियासत के एतबार से लीडरशिप जीरो हैं। हिंदुस्तान में आज़ादी से पहले के या आज़ादी के बाद मुसलमानो के लिए बनाए गए इदारे सरकारी या गैर सरकारी, मजार, खानकाह, सरकारी नौकरी या पालिटिकल पार्टी आपको हर जगह बड़ी आबादी अशराफ मुसलमानो की ही मिलेगी।
यह बात सच है कि इस्लाम में भेदभाव नहीं है खाना पीना और मस्जिद में नमाज़ भी पढ़ने की आज़ादी है। क्योंकि इस्लाम एक वैश्विक मज़हब है और यह हमे हमारे नबी से मिला है। जबकि भारत में इस्लाम का भारतीयकरण हुआ है। उसने हिंदुओ के ब्राह्मणवाद की तरह अशरफवाद को ही फैलाया है।
और आज़ादी के लिए पुरी तरह जिम्मेदार है। इसी लिए हम लोगो ने हिन्दुस्तानी पसमांदा समाज का गठन करने का इरादा किया है।