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08/05/2026

दरअसल हुआ यह कि मैं ठाकुर जी की सेवा में गोलोकधाम मे था।
वहां बैठे-बैठे दूर पृथ्वी की चकाचौंध कर देने वाली बनावटी जगमगाहट मुझे अपनी ओर आकर्षित करने लगी।मुझे लगा एक बार तो जाकर देखना चाहिए।

मैंने ठाकुर जी से कहा कि मुझे भी उस लोक को देखने की लालसा हैं।

ठाकुर जी बोले :- बाबा वो लोक तुझ जैसे जीवों के लिए नहीं है।तू तो यही आनंद कर।

मैंने कहा :- केवल एक बार भेज दो।बस थोड़ा सा देख कर वापिस आ जाऊंगा।

ठाकुर जी :- वहाँ देख कर आने वाला काम नहीं है।वहाँ तो फिर भोग कर ही आना पडता हैं।

परन्तु मैं तो जैसे बाल हट ही करें बैठा था।
" जाना है तो जाना हैं "

ठाकुर जी ने चलते समय फिर कहा :- बाबा एक बार और सोच लें।वहाँ माया बडी प्रबल प्रभाव डालती है.

मैंने कहा :- सोच लिया।मुझे माया नहीं सताएगी।

और अंततः ठाकुर जी ने मेरी हट स्वीकार कर मुझे इस धरा पर भेज दिया।

अब जैसे-जैसे मैं इस लोक के निकट आता जा रहा था।सारी चीजें स्पष्ट नजर आने लगी थी।वो जो उपर से चमचमाते तारे लग रहे थे वो केवल कचरे के ढेर पर पडे रंग बिरंगे खाली पोलोथिन थें।

जो जीव दूर से इतने दयालु और सुभाव से विनम्र लग रहे थे।उनमें निरा छलकपट भरा था।

बात धीरे-धीरे समझ में आने लगी थी।और अपनी हट पर पछतावा भी हो रहा था।परन्तु ठाकुर जी वो बात भी ध्यान में थी कि "वहाँ देख कर आने वाला काम नहीं है।वहाँ तो फिर भोग कर ही आना पडता हैं।"

थोड़ी देर में ही दम सा घुटने लगा।अब वापसी जाने की छटपटाहट थी।परन्तु उस समय भेजने वाला सामने था।अब पहले तो भेजने वाले को ढूंढना था।सो इस संसारिक जीवन के इक्यावन वर्ष लग गए उसे ढूंढने में।और आखिरकार उस दीनदयाल को मझ पर दया आ ही गई।और वो मिल गया मुझे कदम वृक्ष के नीचें।

उसे देखते ही मुझे अपने पिछले जीवन की सारी समृतिया आने लगी।

मुझे देखते ही ठाकुर जी मुख पर एक ही प्रश्न था :- बता बाबा क्या पाया ?

मैं चरणों में गिर कर फूट-फूट कर रोने लगा।और क्षमा याचना करने लगा :- गलती हो गई नाथ।वापिस अपनी सेवा में बुला लो।अब कभी ऐसी जिद्द नहीं करूंगा।

बस क्षमा याचना करते-करते ना जाने कब ठाकुर जी को मुझ पर दया आ गई और मेरा शरीर यही रह गया और मेरे प्राण निकल कर उनके श्रीचरणों मे विलीन हो गए।

सच में तुम बहुत दयालु हो नाथ।

(जय जय श्री राधे)

শাশুড়ি মায়ের অধিকার ( গল্প হলেও সত্যি!)গৈলে সাঁজাল জ্বালার কালে ছোট ঠাকুমা বিড়বিড় করা শুরু করতেন। আর অমনি বাঁশ বাগানের ভ...
06/05/2026

শাশুড়ি মায়ের অধিকার ( গল্প হলেও সত্যি!)
গৈলে সাঁজাল জ্বালার কালে ছোট ঠাকুমা বিড়বিড় করা শুরু করতেন। আর অমনি বাঁশ বাগানের ভেতর দিয়ে সুউউউউ... শব্দ তুলে দখিনা বাতাস উঠতো। আমাদের গোটা উঠোন ম-ম করত ধুনো আর অম্বুরি গুলের গন্ধে। বাড়ির সবাই মাথায় হাত ঠেকাত! দাদারা বৈঠকখানার পাশার ছক ছেড়ে চলে আইতেন। রাশভারি মানুষগুলোর চোখ বেয়ে টপটপ করে জল পড়ত।

দাদার মা অর্থাৎ আমাদের প্রপিতামহী কুমুদাসুন্দরী দেবী ছোট ঠাউর্দার জন্ম দিতে গিয়ে মারা যান। দিনটা ছিল দুর্ভিক্ষের সনের তেসরা বৈশাখ। যারে দশমাস দশদিন বয়ে বেড়ালেন, তাকে না দেখেই চলে যেতে হল।

তারপর থেকেই শুরু হল তার আনাগোনা। ছোট দাদা দোলনায় কাঁদছেন। রান্নাঘরে সবার হাতজোড়া। ছুটে এসে যে ধরবেন তার জো নেই... আচমকাই দেখা যেত শিশু চুপ করে গেছে৷ আর উঁ উঁ করে আওয়াজ তুলছে৷ দুধের গোঁদল ফাঁকা। দাদারও পেট ভর্তি। সারা উঠোনময় ম-ম করছে অম্বুরি গুলের গন্ধ। এই গুল দিয়ে তিনি দাঁত মাজতেন।

সবাই শান্তি-স্বস্তয়নের কথা বলেছিলেন কিন্তু বড়দাদা অর্থাৎ আমাদের প্রপিতমহ গা করেননি। স্ত্রীকে ভীষণ ভালোবাসতেন। মা যে সন্তানের ক্ষতি করতে পারে, তা তিনি প্রাণে ধরে বিশ্বাস করতে পারেননি। সব্বাইকে নাকি বলতেন, বাপ-মায়ের স্বপ্নই থাকে তার নাড়ি ছেঁড়া ধন বড় হোক। পরিচয় পাল। সে কোনদিন তাকে নিয়ে চলে যেতে পারেনে। কুমুদা ও পারবে নে...

এইভাবেই সব চলছিল। সারা বাড়ি তার অস্তিত্বের কথা জেনে গিয়েছিল।

ছোটঠাকুরদার বিয়ে হয় ষোলো বছর বয়সে ঠাকুমার বয়স তখন কেবল দশ। আমাদের বড়দাদাকে নাকি কুমুদাসুন্দরী দেবী দেখা দিয়ে বলেন, এইবার তোমার ছেলের একটা হিল্লে হয়েছে। এইবার আমি আসি।তমোঘ্ন

কিন্তু চাইলেই কি আর যাওয়া যায়! তিনি ততদিনে আটকে গিয়েছিলেন এই মায়ার টানে। তার ছোট বউমাটি একেবারেই কাদার তাল। শিল বাটতে গিয়ে আঙুল থেঁতো করে। মাছ কাটতে গিয়ে হাত কাটে। জ্বর এলে ঠোঁট ফুলিয়ে কাঁদে। মায়ের মন আর কত সইতে পারে। তিনি এলেন, শাশুড়ি নয় মা হয়ে।

ছোট ঠাকুমা প্রথম প্রথম ভয় পেতেন। কিন্তু তারপর আস্তে আস্তে সকলেই সয়ে গেল। মায়ের মমতার কাছে তিনি নিজেকে সমর্পণ করে দিয়েছিলেন। মাঝেমধ্যেই নাকি তিনি বিড়বিড় করতেন ছায়ার সাথে...

দিন গেল। মা- মেয়ের সম্পর্ক একইরকম। ঠাকুমার তখন চার ছেলে বড় হচ্ছে। অশরীরি মায়ের প্রশ্রয় ছিল বলে, ঠাকুমাও ডাকাবুকো ছিলেন। রাতের বেলা পূব পাড়ার মাঝিরা ইলিশ এনে দিত। ঠাকুমা কেটে ধু

06/05/2026

जिस भोर बहन जन्मी घर में
दादा ने माँ के पुरखों को गालियाँ दीं
दादी ने माँ के खानदान को
पिता ने माँ को
और बिलखती माँ ने ख़ुद को
सांझ होते-होते
लपेट लिये गये ईश्वर भी।
फिर भी बहन ने संस्कार सीखे
और मैंने गालियाँ।

अखिलेश श्रीवास्तव

06/05/2026

मक्खन नान (Butter Naan) रेसिपी
पोस्टर के अनुसार, यहाँ आपकी स्टेप-बाय-स्टेप रेसिपी दी गई है:
🛒 सामग्री (Ingredients):
* मैदा: 2 कप
* नमक: स्वादानुसार
* चीनी: 1 छोटा चम्मच
* दही: 1/2 कप
* बेकिंग सोडा: 1/4 छोटा चम्मच
* तेल: 2 बड़े चम्मच
* कलौंजी और हरा धनिया: स्वाद और सजावट के लिए
* मक्खन (Butter): नान पर लगाने के लिए
👩‍🍳 बनाने की विधि (Steps):
* आटा तैयार करें: एक बड़े बर्तन में मैदा, नमक, चीनी और बेकिंग सोडा डालकर अच्छी तरह मिला लें।
* दही और तेल: अब इसमें दही और थोड़ा तेल डालकर मिलाएं।
* गूंथना: हल्के गुनगुने पानी की मदद से एक बहुत ही नरम और लचीला आटा गूंथ लें।
* रेस्ट: आटे पर हल्का तेल लगाकर उसे ढक दें और कम से कम 1 से 2 घंटे के लिए फूलने दें।
* आकार देना: आटे की लोइयां बनाकर उन्हें अंडाकार (Oval) या गोल बेल लें। ऊपर से थोड़ी कलौंजी और हरा धनिया छिड़क कर बेलन से हल्का दबा दें।
* सेकना: नान की पिछली सतह पर थोड़ा पानी लगाएं और गरम तवे पर डाल दें। जब ऊपर बुलबुले दिखने लगें, तो तवे को पलट कर सीधी आंच पर सुनहरा होने तक सेकें।
* सर्विंग: नान को उतारकर उस पर खूब सारा मक्खन लगाएं।
💡 प्रो-टिप: नान को और भी सॉफ्ट बनाने के लिए आप पानी की जगह दूध का इस्तेमाल भी कर सकते हैं।

আমি খুব অল্প জানি। কিন্তু যতটুকু জেনেছি এতদিনের উপাসনায় জেনেছি এই মহিলা ভয়ংকর ধরনের স্ক্রিপ্ট রাইটার! সেই সৃষ্টির আদি ...
06/05/2026

আমি খুব অল্প জানি। কিন্তু যতটুকু জেনেছি এতদিনের উপাসনায় জেনেছি এই মহিলা ভয়ংকর ধরনের স্ক্রিপ্ট রাইটার! সেই সৃষ্টির আদি থেকে লিখে চলেছে, মনে জিজ্ঞাসা আসে তখনো কি এরকম পুঁথি কলম ছিল? হয়তো নয়। ঐ যে গানেই থাকে "ব্রহ্মাণ্ড ছিলনা যখন, মুণ্ডমালা কোথা পেলি?"

এই মহিলা নিজে থেকে মধু কৈটভকে তৈরি করেছে, আবার নিজেই তাদের পতনকেও দেখিয়েছে। নিজের হাতে উত্থান ঘটিয়েছে লক্ষ লক্ষ অসুরদের , আবার নিজেই তাদের নাশ করেছে।

তাই খুব খুব সাবধান! এই মহিলা বহু উত্থান-পতনের সাক্ষী। গতকাল যাকে উঠিয়েছিল আজ নামিয়েছে। আবার আজ যাকে উঠিয়েছে তাকেও , না থাক। সে কথা সময় বলবে। যদিও সময়টাই এনার মূল ডিপার্টমেন্ট।

আবার বঙ্গে এনার প্রচুর হেড অফিস। তাই নিজেদেরকে সামলে থাকতে হয়। কারণ ভাগ্যে থাকলে ইনি ক্ষমতা দেবেন, সতর্কও করবেন আবার নির্মমভাবে ধরাশায়ীও করবেন।

হ্যাঁ, পতনের আগে সতর্কও করেন, চালাক উপাসকরা ধরতে পারেন। বাকিরা নয়।

তাই সামলে! আমরা করি প্ল্যান, ইনি করেন মাস্টারপ্ল্যান!

25/04/2026

अर्देशिर गोदरेज भारत के उन शुरुआती उद्यमियों में से थे जिन्होंने ‘मेड इन इंडिया’ को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में काम किया। पहले वकील बनने की कोशिश असफल होने के बाद उन्होंने 1895 में सर्जिकल उपकरण और फिर ताले बनाने का व्यवसाय शुरू किया।
साबुन निर्माण में उनकी रुचि तब जागी जब उन्होंने देखा कि उस समय सभी साबुन पशु चर्बी से बनते थे, जिससे कई लोगों की धार्मिक भावनाएँ आहत होती थीं। इसी समस्या के समाधान के लिए उन्होंने 1919 में दुनिया का पहला शाकाहारी साबुन वनस्पति तेल से बनाया, जिसे ‘छवि’ नाम दिया गया। बाद में उन्होंने ‘गोदरेज No. 1’ ब्रांड लॉन्च किया, जो आज भी बेहद लोकप्रिय है और हर साल करोड़ों यूनिट्स बिकते हैं। महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर और अन्य नेताओं ने उनके स्वदेशी प्रयासों का समर्थन किया। अर्देशिर का मानना था कि भारतीय उत्पाद सिर्फ स्वदेशी ही नहीं, बल्कि गुणवत्ता में भी विश्वस्तरीय होने चाहिए।

25/04/2026

बंगला में उड़े अबीर...

हजार वर्षों से लगातार संघर्षों में जी रहे देश में पिछले कुछ दशकों से शांति पसरी हुई थी। योद्धा निकलते भी तो किधर? शस्त्र लहराते भी तो किस ध्वज तले? राजस्थान को छोड़ दें तो बड़ी शक्ति के रूप में या तो अंग्रेज बचे थे या मुगलों से जुड़े घराने! लड़ाके लड़ते भी तो किसकी ओर से लड़ते?
फिर सन सत्तावन में एक चिंगारी फूटी! एक नई हवा बही, कि किसी राजा के लिए नहीं, देश के लिए लड़ा जाय। गोलबंदी होने लगी... पेशवाई जगी तो कानपुर जग गया। झाँसी उठ खड़ी हुई। उधर गोंडवाना में महारानी दुर्गावती की महान परम्परा से शंकर उठ खड़े हुए। जिन्होंने रोटी की तलाश में अंग्रेजों की नौकरी पकड़ ली थी, उनका स्वाभिमान जगा। मेरठ, कानपुर, नखलऊ... देश उठ खड़ा हुआ। बागी बलिया के पांडे जगे तो हर ओर मङ्गल-मङ्गल हो गया।
बिहार में क्यों शान्ति रहती भला? आरे के एक छोटी रियासत के बुजुर्ग जमींदार बाबू कुंवर सिंह की रगों में बहता राजपूती रक्त उबलने लगा। क्यों न उबलता? संसार मे शौर्य की सबसे महान क्षत्रिय परम्परा का व्यक्ति युद्ध की आहट सुनते ही मचलने लगे तो इसमें आश्चर्य कैसा? बूढ़े हाथों ने थामी तलवार और गूँज उठा हर हर महादेव का जयघोष...
दानापुर छावनी के विद्रोही सैनिकों का सहयोग मिला, और अस्सी वर्ष के कुँवर(युवक) का महाभियान आरम्भ हो गया। जगदीशपुर से शुरू हुई लड़ाई और चार दिन में पूरा आरा कब्जे में आ गया। आरा को वापस लेने कैप्टन डनवर की ब्रिटिश और सिक्ख सैनिकों की फौज आयी, तो अगले दिन कैप्टन समेत सबकी लाशें गयीं...
अंग्रेज दुगुनी तैयारी से वापस आये। मेजर विंसेंट आयर जैसे टूट पड़ा जगदीशपुर पर! भीषण कत्लेआम... लूटपाट, आगजनी... जगदीशपुर में सबकुछ खत्म हो गया।
पर कुँवर अपनी स्वतंत्रता यात्रा पर निकल गए थे। लोगों को जगाते, राष्ट्रवाद की जोत जलाते, खुरपी थामने वाले हाथों में तलवार थमाते... आरा, रोहतास,सासाराम, बक्सर, कैमूर... आंदोलन का प्रभाव पूरे बिहार-झारखंड पर पड़ा था। संथाल परगना, हजारीबाग, सिंहभूम... छपरा, बलिया...
आम जन का सहयोग मिल रहा था। आतताइयों से त्रस्त भारत अपने लड़ाकों का हर सम्भव सहयोग कर रहा था। मिर्जापुर की ओर बढ़ते कुंवर सिंह ने पहले मिलमैन की विशाल सेना को पराजित किया, फिर कर्नल डेम्स को... आजमगढ़ पर अधिकार हो गया।
कुंवर सिंह जीत रहे थे, पर मन में मातृभूमि छूटने का दुख भरा हुआ था। सो विजयी सेना के साथ जगदीशपुर की ओर लौटे। अंग्रेजों को भनक मिली तो हिल गए। कुँवर सिंह की अब तूती बोल रही थी। उन्हें रोकने के लिए अंग्रेज सेना गङ्गा किनारे तैयार खड़ी हो गयी।
पर मातृभूमि की रक्षा के लिए निकला राजपूत किसके रोके रुकता है भाई! कुँवर सिंह के हाथ में गोली लगी, तो अस्सी वर्ष के उस उत्साहित युवक ने तलवार से हाथ काट कर माँ गङ्गा की लहरों में चढ़ा दिया।
कुँवर सिंह आरा में आये। अंग्रेज कैप्टन लीग्रैंड की सेना से भीषण युद्ध हुआ। लीग्रैंड मारा गया, कुंवर विजयी हुए। वह 23 अप्रैल 1858 था।
अस्सी साल की थकी हुई देह अब शांति ढूंढ रही थी। दो दिन बाद योद्धा ने अपने पुरुखों के महल में अंतिम सांस ली।
वे हमें अब भी याद है। हम आज भी फगुआ में गाँव के सबसे यशश्वी व्यक्ति के दरवाजे पर गाते हैं- बाबू कुँवर सिंह तेगवा बहादुर, बंगला में उड़ेला अबीर...
पूज्य लक्ष्मीबाई की शौर्यगाथा लिखती सुभद्रा कुमारी चौहान लिखती हैं,"बूढ़े भारत में आई वह फिर से नई जवानी थी"। वह बूढ़ा भारत कोई और नहीं, हमारे कुँवर सिंह थे...

सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।

25/04/2026

गुरूदत्त ने जब अपनी फ़िल्म आर-पार को सेंसर बोर्ड में सर्टिफ़िकेशन के लिए भेजा तो वहां एक दिक्कत हो गई। सेंसरबोर्ड ने इस फ़िल्म के गीत "कभी आर कभी पार लागा तीरे नज़र" पर आपत्ति जता दी। सेंसर बोर्ड का कहना था कि इस गीत को किसी फ़ीमेल आर्टिस्ट पर फ़िल्माया जाना चाहिए।

शमशाद बेगम द्वारा गा गए उस गीत को गुरूदत्त जी ने जगदीप पर फ़िल्माया था। सेंसर बोर्ड की आपत्ति के बाद गुरूदत्त प्रैशर में आ गए। क्योंकि फ़िल्म की रिलीज़ डेट घोषित की जा चुकी थी। गुरूदत्त साहब के पास वक्त नहीं बचा था। कुमकुम तब तक फ़िल्म इंडस्ट्री में आ चुकी थी। तो उन्होंने कुमकुम को बुलाया।

कुमकुम का स्क्रीनटेस्ट लिया। और कुमकुम को इस गीत के लिए फाइनल भी कर दिया। रोचक बात ये है कि इस गीत की कोरियोग्राफ़ी गुरूदत्त जी ने खुद ही की थी। आर पार जब रिलीज़ हुई तो इस गीत को बहुत पसंद किया गया। और कुमकुम जी को भी प्रसिद्धी मिल गई। संगीतकार थे ओ.पी.नैयर। नैयर साहब की भी ये पहली हिट फ़िल्म थी।

नृत्यांगना के तौर पर तो कुमकुम को ख्याति मिल गई। मगर उन्हें एक्ट्रेस भी बनना था। तो गुरूदत्त साहब ने ही उन्हें एक्ट्रेस बनने का मौका भी दिया। फ़िल्म थी 1955 की मिस्टर एंड मिसेज 55. हालांकि गुरूदत्त साहब ने इस फ़िल्म में कुमकुम जी को जो रोल दिया था उसका सिनेमैटोग्राफ़र वी.के.मूर्ति ने विरोध किया था।

गुरूदत्त ने पांच बच्चों की मां के किरदार में कुमकुम को लिया था। और वी.के.मूर्ति जी का कहना था कि ये तो खुद बच्ची दिखती है। ये इस रोल में कैसे जंचेगी? मगर गुरूदत्त अडिग रहे। उन्होंने कुमकुम को उस रोल से नहीं हटाया। मिस्टर एंड मिसेज 55 भी सफ़ल रही। और यूं कुमकुम नृत्यांगना के साथ-साथ बतौर अभिनेत्री भी फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गई।

कुमकुम के पास काम की कोई कमी नहीं रही। कई बड़ी फ़िल्मों में कुमकुम जी ने अभिनय किया। 1973 की जलते बदन कुमकुम जी की आखिरी फ़िल्म थी। एक्टर किरण कुमार इस फ़िल्म में कुमकुम जी के हीरो थे। वैसे 1976 में आई बॉम्बे बाय नाइट कुमकुम जी की आखिरी फ़िल्म थी। वो एक ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्म थी जो एक लेट रिलीज़ थी। उसमें संजीव कुमार कुमकुम जी के हीरो थे।

आज कुमकुम जी का जन्मदिवस है। 22 अप्रैल 1934 को कुमकुम जी का जन्म हुआ था। हालांकि कुमकुम जी की जन्मतिथि 21 दिसंबर 1935 भी बताई जाती है। सही क्या है, कहा नहीं जा सकता। फिलहाल हम भी 22 अप्रैल ही मानकर चल रहे हैं। वैसे तो कुमकुम जी के बारे में अधिकतर लोगों को यही पता है कि उनका जन्म बिहार के हुसैनाबाद में हुआ था।

उनके पिता वहां के नवाब थे। मगर बीते हुए दिन वाले शिशिर कृष्ण शर्मा जी के एक लेख में किसी वक्त पर भारत की प्रख्यात नृत्यांगना रही सितारा देवी के हवाले से लिखा गया है कि कुमकुम के पिता वासुदेव महाराज थे जो बनारस के मशहूर तबला नवाज़ और गोविंदा के नाना थे।

इंटरनेट पर ऐसी बातें तो हमेशा से सुनने-पढ़ने को मिलती रही हैं कि कुमकुम गोविंदा की सगी मौसी हैं। मगर इन बातों की पुष्टि कभी किसी लेख या वीडियो के ज़रिए हुई नहीं। सभी इनके रिश्ते पर धूल में लठ्ठ मारने जैसे कमेंट करते हैं। मगर शिशिर कृष्ण जी ने अपने लेख में कुछ दमदार फैक्ट्स रखे हैं। वो क्या हैं, चलिए जानते हैं।

गोविंदा की मां कौन थी? निर्मला देवी, जो किसी वक्त की मशहूर ठुमरी गायिका थी। कुमकुम और गोविंदा की मां के धर्म भी अलग थे। हालांकि गोविंदा की मां निर्मला देवी जी के बारे में भी बहुत जगह ऐसे दावे किए जाते हैं कि वो मुस्लिम परिवार में जन्मी थी। लेकिन बाद में धर्म परिवर्तन करके हिंदू बन गई थी। उनका नाम पहले नज़ीम हुआ करता था। जबकी कुछ लोगों ने कुमकुम के बारे में भी लिखा कि वो मुस्लिम नहीं थी। वो भी एक सिंधी हिंदू थी।

एक दिन शिशिर कृष्ण जी ने सितारा देवी जी से कुमकुम और निर्मला देवी के रिश्ते पर बात की। सितारा देवी जी ने शिशिर जी को बताया कि कुमकुम और निर्मला देवी के पिता एक ही थे। मां अलग-अलग थी। सितारा देवी जी ने ही शिशिर जी को ये भी बताया कि कुमकुम की एक छोटी बहन भी हैं जिनका नाम राधा है।

कुमकुम की छोटी बहन राधा भी कुछ फ़िल्मों में राधिका नाम से एक्टिंग कर चुकी हैं। मिस्टर एंड मिसेज 55 में राधिका भी थी। उसके अलावा राधिका जी ने रात के राही, लाल निशान, शोला जो भडके नामक कुछ फ़िल्मों में काम किया था। सितारा जी के मुताबिक, कुमकुम और राधा वासुदेव महाराज की बेटियां हैं। जबकी निर्मला देवी भी उन्हीं की बेटी है।

फ़र्क बस इतना है कि निर्मला देवी वासुदेव महाराज की पहली पत्नी, जो कि एक हिंदू महिला थी, उनकी संतान हैं। और कुमकुम व राधा वासुदेव महाराज की दूसरी पत्नी, जो एक मुस्लिम महिला थी, उनकी संतानें हैं। कुमकुम की मां को लोग मुन्नन आपा के नाम से जानते थे।

कुमकुम जी को शम्भू महाराज से नृत्य की शिक्षा दिलाने के लिए मुन्नन आपा ही लखनऊ लेकर गई थी। सितारा देवी जी ने ही शिशिर कृष्ण शर्मा जी को ये भी बताया था कि गोविंदा के नाना वासुदेव महाराज ठेठ बनारसी क्षत्रिय खानदान से थे। उनका नाम वासुदेव नारायण सिंह था।

इन्हीं वासुदेव महाराज के पुत्र थे लच्छू महाराज, जो भारत के मशहूर तबला वादक रहे हैं। और लच्छू महाराज गोविंदा के सगे मामा, यानि निर्मला देवी जी के सगे भाई थे। उनका नाम लक्ष्मण नारायण सिंह था। एक बड़े अखबार में कभी गोविंदा का कोई इंटरव्यू छपा था। उस इंटरव्यू में गोविंदा ने कुमकुम जी को कुमकुम आंटी कहकर संबोधित किया था। इस बात से भी लोग दावा करते हैं कि गोविंदा और कुमकुम का कुछ रिश्ता तो था।

08/04/2026

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