08/05/2026
दरअसल हुआ यह कि मैं ठाकुर जी की सेवा में गोलोकधाम मे था।
वहां बैठे-बैठे दूर पृथ्वी की चकाचौंध कर देने वाली बनावटी जगमगाहट मुझे अपनी ओर आकर्षित करने लगी।मुझे लगा एक बार तो जाकर देखना चाहिए।
मैंने ठाकुर जी से कहा कि मुझे भी उस लोक को देखने की लालसा हैं।
ठाकुर जी बोले :- बाबा वो लोक तुझ जैसे जीवों के लिए नहीं है।तू तो यही आनंद कर।
मैंने कहा :- केवल एक बार भेज दो।बस थोड़ा सा देख कर वापिस आ जाऊंगा।
ठाकुर जी :- वहाँ देख कर आने वाला काम नहीं है।वहाँ तो फिर भोग कर ही आना पडता हैं।
परन्तु मैं तो जैसे बाल हट ही करें बैठा था।
" जाना है तो जाना हैं "
ठाकुर जी ने चलते समय फिर कहा :- बाबा एक बार और सोच लें।वहाँ माया बडी प्रबल प्रभाव डालती है.
मैंने कहा :- सोच लिया।मुझे माया नहीं सताएगी।
और अंततः ठाकुर जी ने मेरी हट स्वीकार कर मुझे इस धरा पर भेज दिया।
अब जैसे-जैसे मैं इस लोक के निकट आता जा रहा था।सारी चीजें स्पष्ट नजर आने लगी थी।वो जो उपर से चमचमाते तारे लग रहे थे वो केवल कचरे के ढेर पर पडे रंग बिरंगे खाली पोलोथिन थें।
जो जीव दूर से इतने दयालु और सुभाव से विनम्र लग रहे थे।उनमें निरा छलकपट भरा था।
बात धीरे-धीरे समझ में आने लगी थी।और अपनी हट पर पछतावा भी हो रहा था।परन्तु ठाकुर जी वो बात भी ध्यान में थी कि "वहाँ देख कर आने वाला काम नहीं है।वहाँ तो फिर भोग कर ही आना पडता हैं।"
थोड़ी देर में ही दम सा घुटने लगा।अब वापसी जाने की छटपटाहट थी।परन्तु उस समय भेजने वाला सामने था।अब पहले तो भेजने वाले को ढूंढना था।सो इस संसारिक जीवन के इक्यावन वर्ष लग गए उसे ढूंढने में।और आखिरकार उस दीनदयाल को मझ पर दया आ ही गई।और वो मिल गया मुझे कदम वृक्ष के नीचें।
उसे देखते ही मुझे अपने पिछले जीवन की सारी समृतिया आने लगी।
मुझे देखते ही ठाकुर जी मुख पर एक ही प्रश्न था :- बता बाबा क्या पाया ?
मैं चरणों में गिर कर फूट-फूट कर रोने लगा।और क्षमा याचना करने लगा :- गलती हो गई नाथ।वापिस अपनी सेवा में बुला लो।अब कभी ऐसी जिद्द नहीं करूंगा।
बस क्षमा याचना करते-करते ना जाने कब ठाकुर जी को मुझ पर दया आ गई और मेरा शरीर यही रह गया और मेरे प्राण निकल कर उनके श्रीचरणों मे विलीन हो गए।
सच में तुम बहुत दयालु हो नाथ।
(जय जय श्री राधे)