महात्मा बुद्ध के उपदेश-विचार

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गुरु पूर्णिमा एक महत्वपूर्ण हिंदू और बौद्ध त्योहार है, जो गुरुओं और शिक्षकों के प्रति सम्मान और आभार व्यक्त करने के लिए ...
10/07/2025

गुरु पूर्णिमा एक महत्वपूर्ण हिंदू और बौद्ध त्योहार है, जो गुरुओं और शिक्षकों के प्रति सम्मान और आभार व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है। भगवान बुद्ध के विचारों में गुरु की भूमिका और महत्व को समझने के लिए, यहाँ कुछ प्रमुख बिंदु हैं:

1. *गुरु की भूमिका*: भगवान बुद्ध ने गुरु की भूमिका को बहुत महत्व दिया है। उन्होंने कहा कि एक सच्चा गुरु वह है जो ज्ञान और सत्य की खोज में मदद करता है।

2. *आत्म-ज्ञान*: बुद्ध ने आत्म-ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सच्चा ज्ञान और समझ अपने आप में ही प्राप्त की जा सकती है।

3. *ध्यान और विपश्यना*: बुद्ध ने ध्यान और विपश्यना की प्रथा को बढ़ावा दिया, जो आत्म-ज्ञान और आंतरिक शांति प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

4. *करुणा और प्रेम*: बुद्ध ने करुणा और प्रेम के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सच्चा ज्ञान और समझ के साथ-साथ करुणा और प्रेम भी आवश्यक हैं।

गुरु पूर्णिमा पर, भगवान बुद्ध के इन विचारों को याद करना और उन्हें अपने जीवन में लागू करने का प्रयास करना महत्वपूर्ण है।

हम जैसा सोचते हैं, वैसा बन जाते हैं। इसलिए, सकारात्मक और रचनात्मक विचार रखना महत्वपूर्ण है। नमो बुद्धाय।
05/07/2025

हम जैसा सोचते हैं, वैसा बन जाते हैं। इसलिए, सकारात्मक और रचनात्मक विचार रखना महत्वपूर्ण है। नमो बुद्धाय।

जीवन एक हीरे की तरह है, वह केवल तभी चमकता है,  जब उसे सही तरीके से तराशा जाए।। नमो बुद्धाय।। नमो बुद्धाय।। नमो बुद्धाय।।
28/06/2025

जीवन एक हीरे की तरह है,
वह केवल तभी चमकता है,
जब उसे सही तरीके से तराशा जाए।।

नमो बुद्धाय।। नमो बुद्धाय।। नमो बुद्धाय।।

नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ।नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ।नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ।बुद...
26/06/2025

नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ।
नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ।
नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ।
बुद्धं सरणं गच्छामि |
धम्मंसरणं गच्छामि ।
संघं सरणं गच्छामि ।
दुतियम्पि बुद्धं सरणं गच्छामि ।
दुतियम्पि धम्मं सरणं गच्छामि ।
दुतियम्पि संघं सरणं गच्छामि ।
ततीयम्पि बुद्धं सरणं गच्छामि ।
ततीयम्पि धम्मं सरणं गच्छामि ।
ततीयम्पि संघं सरणं गच्छामि ।
पाणातिपाता वेरमणी सिक्खापदम् समादियामि |
अदिन्नादाना वेरमणी सिक्खापदम् समादियामि ।
कामेसु मिच्छाचारा वेरमणी सिक्खापदम् समादियामि ।
मुसावादा वेरमणी सिक्खापदम् समादियामि ।
सुरा – मेरय-मज्जा – पमाद्वाना वेरमणी सिक्खापदम् समादियामि ।

पूर्णप्रज्ञ, अर्हन्, भगवान (बुद्ध) को नमस्कार है। पूर्णप्रज्ञ, अर्हन्, भगवान (बुद्ध) को नमस्कार है। पूर्णप्रज्ञ, अर्हन्, भगवान (बुद्ध) को नमस्कार है। मैं बुद्ध की शरण में जाता हूँ, धर्म के शरणापन्न होता हूँ, भिक्षु संघ की शरण में जाता हूँ, द्वितीय बार मैं बुद्ध के शरणापन्न होता हूँ, धर्म की शरण में जाता हूँ, संघ की शरण में जाता हूँ। तीसरी बार मैं बुद्ध के शरणापन्न होता हूँ, धर्म की शरण में जाता हूँ, संघ की शरण में जाता हूँ। मैं जीव की हिंसा न करने की प्रतिज्ञा करता हूँ। मैं उस वस्तु के न लेने की प्रतिज्ञा करता हूँ, जो मुझे न दी गयी हो । भोगों में मिध्याचरण न करने की मैं प्रतिज्ञा करता हूँ । असत्य वचन से बचने की मैं प्रतिज्ञा करता हूँ। मैं सुरा-मद्यादि मादक वस्तुओं से बचने की प्रतिज्ञा करता हूँ ।

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31/10/2024

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“अप्प दीपो भव:”

प्रश्न: भगवान बुद्ध ने कहा है: अपने दीए आप बनो। तो क्या सत्य की खोज में किसी भी सहारे की कोई जरूरत नहीं है?
यह जानने को भी तुम्हें बुद्ध के पास जाना पड़ेगा न!-अपने दीए आप बनो। इतनी ही जरूरत है गुरु की। गुरु तुम्हारी बैसाखी नहीं बनने वाला है। जो बैसाखी बन जाए तुम्हारी, वह तुम्हारा दुश्मन है, गुरु नहीं है। क्योंकि जो बैसाखी बन जाए तुम्हारी, वह तुम्हें सदा के लिए लंगड़ा कर देगा। और अगर बैसाखी पर तुम निर्भर रहने लगे, तो तुम अपने पैरों को कब खोजोगे? अपनी गति कब खोजोगे? अपनी ऊर्जा कब खोजोगे?
जो तुम्हें हाथ पकड़कर चलाने लगे, वह गुरु तुम्हें अंधा रखेगा। जो कहे: मेरा तो दीया जला है; तुम्हें दीया जलाने की जरूरत क्या? देख लो मेरी रोशनी में। चले आओ मेरे साथ। उस पर भरोसा मत करना। क्योंकि आज नहीं कल रास्ते अलग हो जाएंगे। कब रास्ते अलग हो जाएंगे, कोई भी नहीं जानता। कब मौत आकर बीच में दीवाल बन जाएगी। कोई भी नहीं जानता। तब तुम एकदम घुप्प अंधेरे में छूट जाओगे। गुरु की रोशनी को अपनी रोशनी मत समझ लेना। ऐसी भूल अक्सर हो जाती है।
सूफियों की कहानी है कि दो आदमी एक रास्ते पर चल रहे हैं। एक आदमी के हाथ में लालटेन है। और एक आदमी के हाथ में लालटेन नहीं है। कुछ घंटों तक वे दोनों साथ-साथ चलते रहे हैं। आधी रात हो गयी। मगर जिसके हाथ में लालटेन नहीं है, उसे इस बात का खयाल भी पैदा नहीं होता कि मेरे हाथ में लालटेन नहीं है। जरूरत क्या है? दूसरे आदमी के हाथ में लालटेन है। और रोशनी पड़ रही है। और जितना जिसके हाथ में लालटेन है उसको रोशनी मिल रही है, उतनी उसको भी मिल रही है जिसके हाथ में लालटेन नहीं है। दोनों मजे से गपशप करते चले जाते हैं। फिर वह जगह आ गयी, जहां लालटेन वाले ने कहा: अब मेरा रास्ता तुमसे अलग होता है। अलविदा। फिर घुप्प अंधेरा हो गया।
आज नहीं कल गुरु से विदा हो जाना पड़ेगा। या गुरु विदा हो जाएगा। सदगुरु वही है, जो विदा होने के पहले तुम्हारा दीया जलाने के लिए तुम्हें सचेत करे। इसलिए बुद्ध ने कहा है: अप्प दीपो भव। अपने दीए खुद बनो। यह भी जिदंगीभर कहा, लेकिन नहीं सुना लोगों ने। जिन्होंने सुन लिया, उन्होंने तो अपने दीए जला लिए। लेकिन कुछ इसी मस्ती में रहे कि करना क्या है! बुद्ध तो हैं। आनंद से कही यह बात उन्होंने। आनंद भी उन्हीं नासमझों में एक था, जो बुद्ध की रोशनी में चालीस साल तक चलता रहा। स्वभावतः, चालीस साल तक रोशनी मिलती रहे, तो लोग भूल ही जाएंगे कि अपने पास रोशनी नहीं है; कि हम अंधे हैं। चालीस साल तक किसी जागे का साथ मिलता रहे, तो स्वभावतः भूल हो जाएगी। लोग यह भरोसा ही कर लेंगे कि हम भी पहुंच ही गए। रोशनी तो सदा रहती है। भूल-चूक होती नहीं। भटकते नहीं। गड्ढों में गिरते नहीं। और आनंद बुद्ध के सर्वाधिक निकट रहा। चालीस साल छाया की तरह साथ रहा। सुबह-सांझ, रात-दिन। चालीस साल में एक दिन भी बुद्ध को छोड़कर नहीं गया। बुद्ध भिक्षा मांगने जाएं, तो आनंद साथ जाएगा। बुद्ध सोएं, तो आनंद साथ सोएगा। बुद्ध उठें, तो आनंद साथ उठेगा। आनंद बिलकुल छाया था। भूल ही गया होगा। उसको हम क्षमा कर सकते हैं। चालीस साल रोशनी ही रोशनी! उठते-बैठते रोशनी। जागते-सोते रोशनी। भूल ही गया होगा। फिर बुद्ध का अंतिम दिन आ गया। रास्ते अलग हुए। और बुद्ध ने कहा कि अब मेरी आखिरी घड़ी आ गयी। अब मैं विदा लूंगा। भिक्षुओ! किसी को कुछ पूछना हो, तो पूछ लो। बस, आज मैं आखिरी सांस लूंगा।

31/10/2024

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Lucknow
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